हिंदी भाषा की 'विलक्षण क्षमता'

पूजा अनिल
- पूजा अनिल

बोली अथवा भाषा मनुष्यों के लिए संवाद और सम्प्रेषण का सर्वाधिक सुगम माध्यम है। किन्तु प्रत्येक भाषा को समान उदारता से अंगीकार करना सभी के लिए इतना सुगम नहीं होता। अक्सर कोई एक भाषा के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है तो कभी कोई दूसरी किसी भाषा के प्रति।

मैं बचपन से सोचती थी कि मैं इसी भाषा में बात क्यों करती हूँ जो उस समय मेरी भाषा थी और आज भी है? मुझे इस बात पर भी अचरज होता था कि कोई भी भाषा ठीक उसी भूभाग में क्यों बोली जाती है जहाँ वह बोली जा रही होती है? कौन सा कारण रहा होगा कि वह भाषा ठीक उसी भूभाग में पनपी और समृद्ध हुई? क्या वजह रही होगी कि उस धरातल पर कोई और भाषा नहीं पनपी?

और अधिक हैरानी की बात यह है कि कैसे संभव है कि एक ही जननी बोली से कई भाषाएँ जन्म लेती हैं और अपने वैयक्तिक रूप में दुनिया के कोने-कोने तक फैल जाती हैं?

सवाल और भी हैं जैसे सबसे पुरातन भाषा को किसने विकसित किया होगा? किसने शब्द निर्माण आरम्भ किया होगा? सर्वप्रथम व्याकरण की रचना किसने की होगी? सर्वप्रथम भाषा की आवश्यकता किसने महसूस की होगी? किसने यह खोज की होगी कि बोलने और बात करने के लिए मानव कंठ समुन्नत है?

मुझे इस समय स्पेनिश भाषा की एक व्याख्याता मेरसेदेज़ याद आ रही है। वह मुझसे बार-बार कहती थी कि जब वह युनिवर्सिटी में लैटिन भाषा की पढाई करती थी तो उसे बताया गया था कि लैटिन भाषा की जननी संस्कृत है, जबकि मैं हमेशा से यही मानती रही थी कि यूरोपीय भाषाएँ ग्रीक और रोमन भाषाओँ की आत्मजा हैं। इसके बाद लैटिन भाषा से अन्य यूरोपीय भाषाएँ विकसित हुईं। अर्थात उन सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है। मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि भारत में समृद्ध संस्कृत से यूरोपीय भाषाएँ किस तरह विकसित हुई होंगी? कैसे पहुँची होगी संस्कृत भाषा वहाँ तक?

प्रश्न अभी ख़तम नहीं हुए हैं। आपने अक्सर सुना होगा कि फलाँ बोली अब विलुप्त हो गई या विलुप्तप्रायः है। यही तो अस्तित्व का यक्ष प्रश्न है। कौन तय करता है कि किसी भाषा को अब विलुप्त हो जाना चाहिए? और यह भी कि क्यों किसी भाषा को विलुप्त हो जाना होता है?

मैं स्वयं भाषा की हैरत भरी नौका में सवार रहती हूँ। भाषा को जानना और समझना मेरा प्रिय खेल भी है। मैं भाषा वाहक भी हूँ। जब भी मैं अपने विद्यार्थियों को पढ़ाना आरम्भ करती हूँ तब कक्षा के प्रारम्भ में ही उनसे एक बात अवश्य कहती हूँ, वह यह कि मानव मस्तिष्क में दुनिया की सभी भाषाएँ पहले से फीड की हुई हैं बिलकुल किसी कंप्यूटर की तरह अथवा आजकल के स्मार्टफोन की तरह। बस, हमें स्विच ऑन करके भाषा को बाहर निकलना होता है। वयस्क व्यक्ति के लिए यह कर पाना बहुत आसान तो नहीं लेकिन उतना कठिन भी नहीं जितना प्रतीत होता है। सवाल उठता है समस्या क्या है भाषा सीखने में?

दरअसल, कोई भी नई भाषा सीखने में सबसे बड़ी बाधा वह भाषा होती है जो हम पहले से जानते हैं या बोलते हैं। अगर आप कुछ देर के लिए अपनी पहचानी हुई भाषा को छुट्टी दे दें तो कोई भी नई भाषा बहुत जल्दी और बिना रुकावट सीख सकते हैं। किन्तु मैंने अक्सर देखा है कि भाषायी अहंकार बेहद ताकतवर होता है। वह आपको पीछे खींच लाता है और कोई नवीन भाषा सीखने से रोकने की कोशिश करता है। जिसने भी उस भाषायी अहंकार पर विजय हासिल कर ली, वह बेहिचक कई भाषाओं पर अपना अधिकार भी प्राप्त कर कर लेता है। सबसे अच्छी बात यह है कि सभी सीखी हुई भाषाएँ कालांतर में किसी न किसी तरह उपयोगी सिद्ध होती हैं, आजमाइयेगा कभी।

लोग पूछते हैं मैं कौन-कौन सी भाषाएँ जानती हूँ? मेरी जन्म भाषा सिंधी है। लेकिन कर्म भाषा हिंदी है। इन दोनों ही बोलियों को मैं अपनी मातृभाषा मानती हूँ। पिताजी अंग्रेजी शिक्षक थे, अतः घर में अंग्रेजी भी बोली जाती रही थी। इस तरह जन्म से ही ये तीन भाषाएँ साथ चलती रही हैं। राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में पैदा होने से मेवाड़ी भाषा भी अपनी लगती है। स्कूल में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा संस्कृत सीखना अनिवार्य था तो संस्कृत भाषा का दामन भी थाम लिया। जीवन ने स्पेन की धरती पर स्थान दिया तो स्पेनिश भी जुड़ गई साथ में। अब मैं फ्रेंच और इतालवी भाषा सीखना चाहती हूँ। कब सीखूंगी? यह अभी कोई नहीं जानता।

मैं जब भाषाओं की बात करती हूँ तो मुझे कोई भी भाषा परायी नहीं लगती। अजीब सा प्रेम है मुझे दुनिया की विविध भाषाओं से। मेरे लिए भाषाएँ किसी जादू के पिटारे से कम नहीं। कभी अपने व्याकरण से सम्मोहित करती हैं, कभी लहज़े से और कभी अपने चमत्कारी वाक्य विन्यास से रचे मुहावरे और कहावतों से। दरअसल भाषा मेरे लिए सिर्फ शब्द विन्यास नहीं बल्कि मित्र सामान है। ऐसी मित्र जो हर पल मेरे साथ अवलम्ब बनकर उपस्थित है। लेकिन यह मित्र इतनी रहस्यमय परतें लिए है कि मेरे भीतर जिज्ञासा हमेशा बनी रही है और मैं निरंतर इसकी खोज करती चलती हूँ।

मैं अक्सर कहती हूँ कि हिंदी मेरी बहुत प्रिय भाषा है। क्यों है यह मेरी प्रिय भाषा? इसकी दो विशेषताएँ मुझे बांधती हैं। पहली, इसमें शब्दों को ठीक उसी तरह उच्चारित किया जाता है जिस तरह से लिखा गया है। और दूसरी है इस भाषा की कोमलता या लचीलापन। यह दुनिया के किसी भी शब्दकोष से कोई भी शब्द बड़ी आसानी से अपना लेती है। मैं इसे हिंदी भाषा की 'विलक्षण क्षमता' कहती हूँ। इस 'विलक्षण क्षमता' की वजह से विविध भाषाओं के शब्द जस के तस किसी भी हिंदी वाक्य में फिट हो जाते हैं।

हालाँकि हिंदी भाषा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है फिर भी अपने आप में विलक्षण तो है ही यह भाषा। इण्डो-आर्यन समूह में, हिन्दवी, हिंदुस्तानी से होते हुए हिंदी भाषा और खड़ी बोली बनी। इसके इतिहास पर चर्चा फिर कभी। अभी इतना ही कि भाषाओं के विकास में सदियाँ लग जाती हैं इसलिए सभी भाषाओं के प्रति सहृदयता रखिये। सम्मान और प्रेम दीजिये दुनिया भर की भाषाओं को, फिर इनके चमत्कारी प्रभाव से कोई बच नहीं सकता।

3 comments :

  1. वाह, बहुत सुंदर भाषा दर्शन

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  2. अशोक वाधवाणीJanuary 8, 2019 at 11:05 AM

    मेरे तीन प्रिय विषय हैं, राष्ट्र -राष्ट्रभाषा -राष्ट्रपिता। किसी पत्र पत्रिकाओं में इन विषयों पर सामग्री हो तो खुद को रोक नहीं पाता पढ़ने से। आपका लेख सराहनीय, स्वागत योग्य है। सिंधी बहन ने लिखा है, इसलिए बढ़िया लगा है। बधाई!

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  3. अशोक वाधवाणीJanuary 8, 2019 at 11:07 AM

    मेरे तीन प्रिय विषय हैं, राष्ट्र -राष्ट्रभाषा -राष्ट्रपिता। किसी पत्र पत्रिकाओं में इन विषयों पर सामग्री हो तो खुद को रोक नहीं पाता पढ़ने से। आपका लेख सराहनीय, स्वागत योग्य है। सिंधी बहन ने लिखा है, इसलिए बढ़िया लगा है। बधाई!

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