बिहारी सतसई में लोकजीवन

- गुड्डू कुमार

पी एचडी शोधार्थी, अ.मु.वि, अलीगढ़

बिहारी रीतिकालीन साहित्य में रीतिसिद्ध काव्यधारा के शिखर कवि हैं। उनका एक मात्र ग्रन्थ ‘बिहारी-सतसई’ है जिसमें 713 दोहे संकलित हैं। ‘बिहारी-सतसई में संकलित इन दोहों को तीन वर्गों में बाँट सकते हैं। पहला वर्ग शृंगार वर्णन का है जिसमें इन्होंने नायिका भेद, रूप वर्णन, यौवन, संयोग-वियोग आदि को लिया है। दूसरा वर्ग भक्ति का है। यद्यपि भक्ति के ये दोहे संख्या की दृष्टि से कम है किन्तु मार्मिकता की दृष्टि से उनका स्थान रीतिकाव्य में अलग पहचाना जाता है। तीसरा वर्ग नीतिपरक दोहों का है। नीतिपरक दोहे बिहारी के अपने जीवनानुभव के आधार पर रचे गये हैं और सूक्तिपरक हैं।’[1]

बिहारी-सतसई अपने युग की तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों के अध्ययन की प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करता है। उत्तरमध्यकालीन उत्तरी भारत की सामाजिक दशा का जैसा चित्रण बिहारी-सतसई में है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इस ग्रंथ पर यह आरोप लगाया जाता है कि यह सिर्फ दरबारी एवं सामंती विलास में ही रमता है। इसमें लोकजीवन का अभाव है। यह आरोप कुछ हद तक सही भी है किन्तु सच यह है कि यदि तटस्थ भाव से देखें तो बिहारी-सतसई के भीतर कई ऐसे प्रसंग है जिसमें लोकजीवन का वर्णन है।
सतसई में शृंगार के वियोग पक्ष की अपेक्षा संयोग वर्णन का बाहुल्य है। उसमें वर्णित प्रेम का स्वरूप क्रीड़ात्मक है। प्रेम को लेकर कवि बिहारी में खास तरह का अंतरविरोध है। उनके प्रेम का आदर्श उदात्त है वहीं व्यावहारिक पक्ष अनुदात्त। प्रेम के औदात्त के संबंध में उन्होंने लिखा है -
 गिरि तें ऊँचे रसिक-मन बूढ़े जहाँ हजारु।
 वहै सदा पसु-नरनु कौ प्रेम-पयोधि पगारु।। [2]

बिहाई-सतसई में राजनीतिक विसंगतियों को भी प्रकाशित किया गया है। इस संदर्भ में बिहारी की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी राजनीतिक चेतना है। दरबारी कवि होते हुए भी उन्होंने अपने आश्रयदाता की कमियों को उभारा है। राजा जयसिंह एक किशोरी नायिका के प्रेम में इस तरह उलझ गये थे कि उन्हें अपने राज-काज का कोई ध्यान नहीं था। इस स्थिति का समाधान करने के लिए बिहारी ने जयसिंह के कोपभाजन से भयभीत हुए बिना एक प्रतीकात्मक दोहा लिखकर भेजवाया जो उन्हें राजनीतिक दायित्वों का याद दिलाने के लिए पर्याप्त था। कहते हैं इस दोहे ने राजा जयसिंह की आँखें खोल दी और बिहारी उनके प्रिय दरबारी कवि हो गये –
 नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल।
 अली कली ही सों बंध्यौ, आगे कौन हवाल।। [3]
बिहारी-सतसई में ऐतिहासिक घटनाओं का भी वर्णन है। बिहारी, राजा जयसिंह के राजनैतिक नीतियों से सहमत नहीं थे। जयसिंह का शाहजहाँ की तरफ से हिन्दू राजाओं एवं सामंतों से लड़ते रहना बिहारी को नापसंद था। राजा जयसिंह के इस व्यवहार से शिवाजी भी नाखुश थे। उन्होंने राजा जयसिंह को पत्र लिखकर फटकारा था – ‘जे खूने दिलो दीदाए हिन्दुवाँ, तु ख्वाही शवी सुखरू दर् जहाँ।’[4] कवि बिहारीलाल ने भी अपने आश्रयदाता राजा जयसिंह को हिन्दू राजाओं एवं सामंतों से नहीं लड़ने की गुहार लगाते हैं। वे लिखते हैं –
 स्वारथु, सुकृतु न, श्रमु बृथा; देखि, बिहंग, बिचारी।
 बाक, पराऐं पानि परि तूँ पच्छीनु न मारि।। [5]

बिहारी दरबारी कवि थे। दरबार के रसिकों में धैर्य का अभाव होता था। उनमें से अधिकांश समाज में हो रहे उचित-अनुचित कार्यों से बेख़बर होते थे। यहीं कारण है कि बिहारी की सामाजिक चेतना प्रखर नहीं है। वे सामंती जीवन से बाहर बहुत कम निकलते हैं, पर जब कभी वे समाज की ओर रुख़ करते हैं, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते नजर आते हैं। बिहारी अपने समसामयिक समाज की विसंगतियों को उजागर करने के लिए व्यंग्य का प्रयोग करते हैं। बिहारी ने जिन पौराणिकों, वैद्यों, ज्योतिषियों, रसिकों आदि पर व्यंग्य किया है, वह न केवल उनके युगीन समाज की विसंगतियों को उजागर करता है बल्कि वह आज के समाज की कथा-वाचकों, वैद्यों, ज्योतिषियों, रसिकों आदि का भी चरित्र-चित्रण करता है। इस संदर्भ में मिश्रबंधुओं ने लिखा है कि “कलियुग के दानियों की इन्होंने बहुत निंदा की है और अपनी कविता में यत्र-तत्र मजाक भी अच्छा रक्खा है।”[6] निम्नलिखित दोहों में बिहारी ने एक वैद्य पर व्यंग्य एवं एक पौराणिकजी की कथनी और करनी में अंतर करते हैं कि –
 बहु धनु लै, अहसानु कै, पारौ देत सराहि।
 वैद-बधू, हँसि भेद सौं, रही नाह-मुँह चाहि।। [7]

 परतिय-दोषु पुरान सुनि लखि मुलकी सुखदानि।
 कसु करि राखी मिश्र हूँ मुँह-आई मुसकानि।। [8]

बिहारी-सतसई में सामाजिक विसंगतियों के साथ-साथ पारिवारिक कुरीतियों को भी प्रकाशित किया गया है। बिहारी ने पारिवारिक जीवन के बिखराव को भी अपनी कविता का विषय बनाया है। संयुक्त परिवार के भीतर सामाजिक मर्यादा को बनाए रखने के लिए कभी-कभी स्त्रियों को किस दशा से गुजरना पड़ता है, इसकी गहरी समझ बिहारी को थी। उन्होंने संयुक्त परिवार की मर्यादा को बचाए रखने के लिए देवर की कुमति और भौजाई की विवशता को निम्न दोहा में उजागर किया है –
 कहति न देवर की कुबत कुल-तिय कलह डराति।
 पंजर-गत मंजार-ढिग सुक ज्यौं सूकती जाति।। [9]

बिहारी-सतसई का एक पक्ष धर्म-संबंधी आचार-विचार से भी संबंधित है। बिहारी का संबंध राधावल्लभ संप्रदाय से माना जाता है। इस संप्रदाय में राधा और कृष्ण में राधा को ज्यादा महत्त्व दिया गया है। बिहारी ने अपने समकालीन राजाओं-सामंतों की अभिरुचि को ध्यान में रखकर राधा-कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति प्रदर्शित की है। बिहारी के प्रेमपूर्ण भक्ति-भावना में इनके आराध्य राधा-कृष्ण विद्यापति के सदृश्य अलौकिक कम तथा लौकिक अधिक नजर आते हैं। बिहारी की इस रागात्मक भक्ति से साथ ही साथ इनकी भक्ति-भावना का एक दूसरा रूप भी है जिसमें उन्होंने भक्त को अपने आराध्य के सामने दीन-हीन दिखया है। भक्त अपने आराध्य की उपासना करते हुए कहता है कि –
“मोहूँ दीजै मोषु, ज्यौं अनेक अधमनु दियौ।
जौ बाँधैं ही तोषु, तौ बाँधौ अपनैं गुनगु।। [10]

बिहारी ने प्रचलित धार्मिक आडंबरों पर भी चोट किया है। उन्हें भक्ति-भाव का दिखावटी स्वरुप जैसे जपमाला, छापा, तिलक, आदि पसंद नहीं था। वे इस बनावटी भक्ति-भावना की निंदा करते हुए लिखते हैं कि –
 जपमाला, छापैं, तिलक, सरै न एकौ कामु।
 मन काँचै नाचै वृथा, साँचे राँचे रामु।। [11]

बिहारी-सतसई परंपरा से चली आ रही लोक-संस्कृति का भी वाहक है। सतसई में एक ओर ब्रज क्षेत्र की लोक-संस्कृति का भरमार है तो दूसरी ओर तीज, गोवर्द्धन आदि जैसे लोक-पर्वों का भी जिक्र है। इन लोक संस्कृतियों और पर्वों को माध्यम बनाकर बिहारी मान-सम्मान की भी बात करते हैं। किसी व्यक्ति के क्षणिक सम्मान के बाद उसके अपमान को अभिव्यक्त करने के लिए बिहारी ने गोवर्द्धन पर्व को अन्योक्ति बनाते हुए कहा है कि – “गोधन, तूँ हरष्यौ हियैं घरियक लेहि पूजाई। समुझि परैगी सीस पर परत पसुनु के पाई।। ”[12] बिहारी अपनी सतसई में लोक-संस्कृति एवं लोक-त्यौहारों के साथ ही साथ लोक-कहावतें एवं लोक-विश्वासों (मिथकीय कथन) को भी उचित स्थान देते हैं। उनके सतसई में व्यक्त लोक-कहावतें किसी प्राणिजात के गुण-अवगुण को अन्योक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। बिहारी-सतसई से उद्धृत लोक-विश्वास एवं लोक-कहावत से संबंधित एक-एक दोहा निम्नलिखित है –
 पूस-मास सुनि सखिनु पैं साईं चलत सवारू
 गहि कर बीन प्रबीन तिय राग्यौ रागु मलारु।। [13]
 बड़े न हूजै गुननु बिनु बिरद-बड़ाई पाइ।
 कहत धतूरे सौं कनकु, गहनौ गढ्यौ न जाइ।। [14]

निकर्षत: यह कहा जा सकता है कि बिहारी-सतसई दरबारी संस्कृति को संबोधित करने वाला प्रतिनिधि काव्य है। इस काव्य में दरबारी संस्कृति की समस्त प्रवृतियाँ मौजूद हैं। इस मुख्य प्रवृत्ति से इतर सतसई में सैद्धांतिक रूप से उदात्त प्रेम, राजनीतिक व्यंग, जातीयता का भाव, सामाजिक बोध, पारिवारिक विसंगतियाँ, भक्ति-भावना, अंधविश्वासों पर प्रहार, लोक-संस्कृति, लोक-त्यौहार, लोक-कहावत एवं लोक-विश्वास आदि से संबंधित उक्तियाँ भी यथा स्थान मौजूद हैं। सतसई में उल्लिखित इन इतर प्रवृत्तियों में ही लोकजीवन से संबंधित तथ्यों को खोजने का प्रयास किया गया है।

संदर्भ
[1] हिंदी साहित्य का इतिहास; विजयेन्द्र स्नातक
[2] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’; पृ० 109
[3]बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’; पृ० 38 
[4]बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 127 
[5]बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 127 
[6] मिश्रबंधुविनोद; पृ० 480
[7] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, पृ० 187
[8] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 114
[9] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 54
[10] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 113
[11] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 73
[12] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 261
[13] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 75
[14] बिहारी रत्नाकर; जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ पृ० 90

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