भारतीय जनमानस में हिमालय: संदर्भ नये पुराने

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

अस्तित्युरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:
पूर्वोपरो तोयनिधी वगाह्य स्थित: पृथिव्यामिव मानदण्ड:
- कालिदास

उत्तराखंड के कुमायूँ  अंचल में बसे छोटे से नगर अलमोड़ा में बीते बचपन की यादों में एक यादगार दृश्य  मेरे स्मृति पटल पर अक्सर उभर आता है - प्रात:कालीन रवि किरणों में जगमगाता हिमालय की दमकती श्रेणियों का दृश्य। फिर जब कुछ सोचने समझने लायक हुआ मेरी जिज्ञासा का एक बडा हिस्सा इन श्रेणियों से ही संबंधित होता और उन दमकते शिखरों को पास जाकर छू लेने का मन करता। आज कई दशकों के अंतराल के बाद  जब पुन: वहाँ जाने का अवसर मिला तब भी वह आकर्षण कम नहीं हुआ अपितु उसमें कुछ जुड़ता दिखायी दिया और साथ ही कुछ नवीन संदर्भ भी आ जुड़े। जीवन में जीने के लिये बहुत कुछ करना होता है जिसमें इस तरह के उत्कट अनुभव व आकर्षण यादों की पृष्ठभूमि में चले  जाते हैं जो फिर कभी अवकाश या खुशी के विशेष पलों में स्मृति पटल पर उभरते आते हैं। बाद के वर्षों में हिमालय का मेरा सान्निध्य छूटा जब आगे अध्ययन के लिये प्रयाग विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया पर कुछ संतोष था कि गंगा के रूप में हिमालय का एक प्रतिनिधि तो मौजूद है उसकी याद ताजा रखने हेतु। हिमालय और गंगा – भारतीय जन मानस को कितना समृद्ध किया है दोनों ने और समृद्ध किया है संस्कृत, हिन्दी व अन्य भाषाओं के साहित्य को, और उसके इतर कृषि व उस पर  आधारित अर्थव्यवस्था को भी। हिमालय व गंगा के साथ अंतरंग रूप में जुडा है भगवान शिव शंकर का नाम। शिव, हिमालय  और गंगा -- इन तीनों के बिना भारतीय पौराणिक साहित्य, लोक साहित्य और संस्कृति -  शायद अधूरे ही लगें।

किसी देश की संस्कृति, अर्थव्यवस्था व रहन सहन उसकी भौगोलिक लाक्षणिकता से प्रभावित हों यह स्वाभाविक है पर उसका विशिष्ट स्वरूप वहाँ के निवासियों के रुझानों से भी परिभाषित होता है। भारत में धीरे धीरे हिमालय प्रतीक बनता गया देवभूमि का, तपोभूमि का और आध्यात्मिक अभियानों का, और वह देश के जनमानस पर छाता चला गया। साहित्य पर उसका प्रभाव होना स्वाभाविक था और हुआ भी जो कालिदास से लेकर बीसवीं सदी के साहित्यकारों की रचनाओं में साफ़ दिखायी देता है। एक अन्य आयाम में ये हिमाच्छादित श्रेणियाँ  आकर्षण का केन्द्र बनती रहीं साहसिक पर्वतारोहण अभियानों के लिये भी।

निचले और मध्यम ऊँचाई पर इन श्रेणियों के अनेक भ्रमण पथ (हाइकिंग ट्रेल्स) पैदल भ्रमण के लिये सुगम हैं और सामान्य प्रयत्न करने पर पद-भ्रमण का आनन्द लिया जा सकता है। मैं लेखक पाल थेरू के सुझाव को ध्यान में रख पर्यटन और भ्रमण में अंतर रखना चाहूँगा। पर्यटन में मौज-मस्ती पर जोर अधिक होता है जबकि भ्रमण में सभी तरह के रुझान शामिल किये जा सकते हैं।

जहाँ तक कम से कम प्रयत्न मे हिमालय की भव्यता और विराट के दर्शन की बात है मेरी यादों में कुछ नाम विशेष रूप से उभर आते हैं मुक्तेश्वर, अल्मोडा के निकट बिनसर और कौसानी। इन तीनों स्थलों से हिमालय का दृश्य अभिभूत कर देता है। खास बात यह कि इन जगहों पर पहुँचने के लिये अधिक प्रयत्न या कठिन यात्रा नहीं करनी होती। कौसानी से देखने पर लगता है जैसे हम हिमगिरि के द्वार पर आ पहुंचे हों। यह दृश्य किसी भी प्रकृति प्रेमी को अभिभूत करने की क्षमता रखता है। ऐसे ही किसी पल में बिल एटकेन(1)  ने उस परम आनन्द की अनुभूति का जिक्र किया है ‘जब हिमाच्छादित शृंखला की दृश्यावली ने इन्द्रियों की रागिनी छेड दी’’ और उन्होंने इसी अनुभूति के अध्ययन व शोध में अपना जीवन बिताने का निश्चय कर लिया। 

दोहरा भ्रमण
यदि भ्रमण पथ बहुत कठिन व दुर्गम न हो तब बाह्य भ्रमण के अलावा अक्सर अंदरूनी  भ्रमण-पथ पर निकलना संभव हो जाता है लगभग साथ-साथ। हिमालय के इन क्षेत्रों में पदयात्रा बहुत रुचिकर हो सकती है जो हमें बाहर और भीतर के जाने अनजाने रास्तो  पर एक खोजी व समन्वयात्मक दृष्टि प्रदान करने की क्षमता रखती है बशर्ते अंदर थोडी सी भी जगह हो इन चीजों के लिये। यह बात और है कि आजकल की भागदौड़ वाली जिन्दगी में अंदर की जगह काफी कम हो गयी है जो शायद हमारी समझ व साथ ही जिन्दगी से जुड़ी कुछ समस्याओं के मूल में है। ऐसे में अंग्रेजी के कवि टी एस ईलियट (2)  की कविता बरबस याद आ जाती है जिसमें वे कहते हैं
 हमने जीवन कहाँ खो दिया जीवन-यापन में
 हमने विवेक कहाँ खो दिया ज्ञान में
 हमने ज्ञान कहाँ खो दिया सूचना में।

ये और इस तरह के गहन प्रश्न ऐसे अवसरों पर उभरते आते हैं और कभी कभी संभावित उत्तर भी। मुझे पर्वतों के कई भ्रमण पथों पर इस तरह की दोहरी यात्रा का आनन्द प्राप्त होता है और कई बार नये विचार व अनुभूति इन अवसरों पर प्रचुरता से मिले हैं। राबर्ट पीरसिग की प्रेरणाप्रद किताब (3) में ऐसे ही दोहरे भ्रमण का बहुत खूबसूरती से जिक्र हुआ है जिसमें लेखक सहज ही पाठक को अपने साथ चलने के लिये मजबूर कर देता है। उनका भ्रमण मोटर साइकिल पर था पर बात वही थी दोहरे भ्रमण की – अंदर और बाहर, मोटर साइकिल का रख-रखाव जैसे दैनिक जीवन से जुड़े यथार्थपरक मसले और जीवन में अर्थ और गुणवत्ता की जरूरत जैसे दार्शनिक सवालों को लगभग साथ-साथ लेकर जीवन से जुड़े द्वैत को वे खूबी से उजागर कर देते हैं।

एक लम्बे अंतराल के बाद जब मैं दोबारा इस तरह के भ्रमण पर निकला मेरा बाल्यकाल का पुराना अनुभव दोहराया गया यह कहना आंशिक रूप से सच हो सकता है पूरी तरह नहीं। संभवतः कुछ था जो अपरिवर्तित था पर बहुत कुछ  ऐसा था जो बदल चुका था। पर्वत वही था पर शायद मैं बदल रहा था उम्र के लिहाज से और जानकारी के लिहाज से भी। मैं हिमालय की गोद में पला बढा था और मेरा उसके प्रति आकर्षण स्वाभाविक भी था। इस आकर्षण में विराट का सौन्दर्य-बोध तो था ही और था पौराणिक संदर्भ। कुछ नये और आधुनिक संदर्भ जब सम्मुख आये तो सहसा विश्वास नहीं हुआ पर यह भी जिन्दगी का सच है कि जीवन भिन्न व असम्पृक्त संदर्भों को संतुलित करने पर ही अर्थ पाता है।

नवीन संदर्भ
अब जब मैं पूरी बात को बेहतर जान रहा हूँ कई नये संदर्भ उद्भाषित हो रहे हैं और मैं अभिभूत हूँ पुराने पौराणिक व नूतन वैज्ञानिक संदर्भों को एक साथ देखने और परखने के प्रयासों में। इस लेख में यही कुछ चर्चा का विषय रहेगा।

हिमालय की पौराणिक धारणा  और  आज वैज्ञानिक जानकारी से प्राप्त चित्र – दोनों को साथ लेकर चलने में सामान्यतया कठिनाई की आशा स्वाभाविक होती पर यह नहीं हुआ जो मेरे लिये न केवल एक सुखद  आश्चर्य  था अपितु एक विशेष प्रकार के जीवन दर्शन का आधार भी। हिमालय का जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ उसपर भूगर्भ विज्ञान की अब तक की जानकारी रोमांच से भरी है। हमारी धरती का भौगोलिक स्वरूप सामान्यतया अपरिवर्तित रहता है पर यह बात दीर्घ समयान्तराल के लिये नहीं कही जा सकती। लगभग पचास करोड साल पहले इस भूभाग का भौगोलिक परिदृश्य वैसा नहीं था जैसा आज हम देखते हैं। तब भारतीय उप महाद्वीप एशिया का हिस्सा नहीं अपितु एक अलग महाद्वीप का हिस्सा था। उत्तर में था लौरेशिया जिसमें आज के एशिया का बड़ा भाग शामिल था और दक्षिण मे गोंडवाना जिसमें भारतीय भूभाग शामिल था। लगभग बीस करोड़ साल पहले गोंडवाना उत्तर की ओर गतिमान था जो लगभग पाँच करोड़ साल पहले जा टकराया एशिया के उस  भाग से जो आज तिब्बती पठार का भाग है।

 दो महाद्वीपों का यह टकराव साधारण घटना नहीं थी। अवश्य ही इसमें भूखंड का कुछ हिस्सा नष्ट हुआ होगा और कुछ था जिसका सृजन, यह उस विराट टक्कर का प्रभाव था कि  संघट्ट रेखा के निकट का भूखंड पर्वत के  आकार में उठ गया। संक्षेप में यह है हिमालय के जन्म की कथा (4)। इस टक्कर का प्रभाव हिमालय के जन्म का कारण बना पर उस दाब का क्या जो  उत्तर की ओर गतिमान भूखंड आज भी प्रस्तुत कर रहा है। यह उस निरंतर दाब का असर है कि हिमालय समय अक्ष पर स्थिर नहीं और उसकी ऊंचाई आज भी लगातार बढ रही है लेकिन धीरे धीरे – करीब कुछ इंच प्रति वर्ष।

 बिनसर व कौसानी के निकट ऐसे ही किसी दोहरे भ्रमण के दौरान ये सारे विचार मुझे आन्दोलित करते हैं। कभी आश्चर्य भी होता है कि पौराणिक व वैज्ञानिक संदर्भों को एक साथ लेकर चलने में कोई विरोधाभास नहीं दिखायी देता। सृष्टि और विध्वंस हिमालय के जन्म से अंतरंग रूप में जुडे हैं भूमिगत टैक्टोनिक परतों का विध्वंस और पर्वत शृंखला की सृष्टि – शिव-तांडव के प्रतीकात्मक रूप में सृष्टि-विध्वंस का शाश्वत अविरल दर्शन, सृष्टि और विनाश का अविरल चक्र। कैसा संयोग है कि नटराज शिव का हिमालय से नाता है और उनके तांडव में सृष्टि-विनाश का शाश्वत खेल बिम्बित होता है जो हिमालय के जन्म से अंतरंग रूप में जुड़ा है।

शांति, तप व अध्यात्म के लिये सदा से जाना जाता रहा जो हिमालय उसका जन्म कितने विध्वंसात्मक तरीके से हुआ सहसा विश्वास नहीं होता। लेकिन यह भी जानते रहे हैं हम कि हिमालय का पूरा क्षेत्र उस ‘सीजमिक जोन’ में आता है जिसमें भूकम्प का खतरा सबसे ज्यादा होता है। करीब चार साल पहले उत्तराखंड व नेपाल में भूकम्प की विध्वंस लीला की यादें अभी ताजा हैं। भूगर्भ शास्त्रियों का अनुमान है कि निकट भविष्य में एक बडे शक्तिशाली भूकंप द्वारा इस क्षेत्र में तबाही की संभावना है। यह क्रम चलता रहेगा क्योंकि भूमिगत टैक्टोनिक परतों का दबाव समय समय पर निकट की धरती को हिलाता रहेगा और असीम शांति का प्रतीक यह पर्वत इस तरह की उथल पुथल का केन्द्र बना रहेगा और इन सारी  बातों के बावजूद असीम आकर्षण का भी। इन सबके साथ नटराज भगवान शिव का पौराणिक संदर्भ मेरे हिमालय के प्रति आकर्षण को दुगुना कर देता है।

एक और दोहरा भ्रमण, इस बार थोड़ा दक्षिण का रुख करते हैं सुदूर गुजरात की पावागढ पहाड़ियों का। पहाड़ी के शिखर पर मां के दर्शन के बाद वापस आया चिर परिचित दोहरे भ्रमण पर और हिमालय की याद ताजा हो आयी। विराट हिमालय  उम्र के लिहाज से बच्चा है दक्षिण और मध्य भारत की अपेक्षाकृत छोटी पर बहुत प्राचीन शृंखलाओं की तुलना में। हिमालय का जन्म लगभग पाँच–छह करोड़ साल पहले का है जबकि पावागढ़ पहाड़ियों विंध्याचल और दक्षिण की अनेक पर्वत शृंखलाओं का लगभग 50 से साठ करोड़ साल पहले का। यह भी कि इनमें से कुछ का जन्म ज्वालामुखी फटने की प्रक्रिया से जुड़ा है जबकि हिमालय का दो भूखंडों  के टकराने से।

एक और अंदरूनी भ्रमण: मन की संरचना
मैं पुन: हिमालय की वादियों में लौट आता हूँ वैसी ही दोहरी यात्रा के पथ पर। अनायास ही सोचने लगता हूँ मन की चेतन, अवचेतन और अचेतन की परतों के विषय में। पृथ्वी की भूमिगत टैक्टोनिक परतें व उनकी गतिशीलता अनायास ही तुलनात्मक संदर्भ में सामने आ जाती हैं। भूमिगत परतें स्थिर नहीं गतिमान हैं धीरे-धीरे। मन की परतों में भी हलचल है अक्सर धीरे-धीरे पर कभी तेजी से भी –  कभी-कभी लगभग वैसे ही विध्वंसक अंदाज में। यह अंदाज दो परतों के टकराने जैसा भी हो सकता है या ज्वालामुखी विस्फोट सरीखा भी। जो भी हो मुझे लगता है बाहरी जगत का बहुत कुछ बिम्ब मन की संरचना में भी दिखायी देता है। लगता है जैसे मन की संरचना ढली है कुछ-कुछ बाहरी जगत की  घटनाओं के नमूने पर ही। इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये, क्योंकि मन मस्तिष्क की प्रक्रिया से जुड़ा है जो स्वयं जैविक-विकास-प्रक्रिया के फलस्वरूप सामने आया है और यह भी कि जैविक विकास प्रक्रिया पर्यावरण से अंतरंग रूप से जुड़ जाती है और बाहर का सम्पूर्ण घटनाचक्र उसे प्रभावित कर सकता है।     

बात से बात चल निकलती है एक संदर्भ से दूसरा जुड़ता है और फिर तीसरा। यह जुड़ना और भी सहज प्रतीत होने लगता है जब हम यह जानते हैं कि ये सब घट रहा है उस एक ही जगह जिसे हम मस्तिष्क कहते हैं। उसके एक क्षेत्र में जो घट रहा होता है वह दूसरे क्षेत्र के घटनाचक्र से बहुत दूर नहीं है और कभी इधर का उधर हो भी सकता है। शायद यही वजह है हम पौराणिक संदर्भ से शुरू कर भूगर्भ वैज्ञानिक परिदृश्य से गुजरते हुए मनोवैज्ञानिक ताने बाने तक आसानी से भ्रमण कर जाते हैं। अब तो बात  इस से भी आगे निकल चुकी है न्यूरोलाजिकल संदर्भों तक; न्यूरोलाजी मस्तिष्क की कोशिका-तंत्र का विज्ञान है जो मस्तिष्क की कार्यविधि समझने में सहायक है। पिछले तीन दशकों में इसमें नयी शोधों व आधुनिक प्रौद्योगिकी ने हमारी जानकारी में अभूतपूर्व वृद्धि की है।

सोचना व होना: पहले कौन
दार्शनिक-गणितज्ञ देकार्त का एक कथन काफी चर्चित हुआ है:
‘मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ’ (Ergo cogito, ergo sum)।
मतलब यह कि ‘मेरा अस्तित्व या होना मेरे सोचने का प्रतिफल है’। बात कुछ अटपटी लगती है क्योंकि सहज ज्ञान पर आधारित तर्क होगा: ‘मैं हूँ इसलिये मैं सोचता हूँ’ यानी मेरा सोच मेरे अस्तित्व का प्रतिफल है। अगर मैं न होता तब सोचता कैसे। दूसरी ओर देकार्त का कथन भी ठीक लगता है कि अगर मैं सोचने में सक्षम न होता तो जानता कैसे कि मैं हूँ। पहाड़ क्या जानता है कि वह है या नदी क्या यह कह सकती है कि वह है। क्या हिमालय को पता है कि वह है और विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत है? क्या हिमालय सोच सकता है? शायद नहीं,  मामला उलझता जाता है। क्या ब्रह्मांड को मालूम है कि वह अस्तित्ववान है? शायद हाँ। अब आप पूछेंगे कि ब्रह्मांड को कैसे पता? क्या वह सोचने में सक्षम है? उत्तर होगा कि वह सोच सकता है। है ना कुछ अजीब सी बात?

अहं ब्रह्मास्मि
मैं सोच सकता हूँ तब ब्रह्मांड निश्चित ही सोच सकता है। अगर मैं कह दूँ कि मैं और हम सभी ब्रह्मांड की अरब-खरब आँखें है तब शायद गलत न होगा। हम ब्रह्मांड के हिस्से हैं वैसे ही जैसे हमारी आँखें हमारा हिस्सा हैं। जब मेरी आँख देखती है तब मैं कहता हूँ कि मैं देख रहा हूँ, जब मेरा मुंह बोलता है तब मैं कहता हूँ कि मैं बोल रहा हूँ और जब मेरे पैर चल रहे होते हैं तब मैं कह उठता हूँ कि मैं चलता हूँ।  तब ब्रह्मांड क्यों नहीं कह सकता कि वह देख रहा है, या बोल और चल रहा है? बात मे दम तो है।

तब उस प्राचीन संस्कृत कथन ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का क्या? और मिर्जा गालिब के खूबसूरत शेर का क्या-
न था कुछ तो खुदा था न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता।

यह सोच ही तो है जो होने का बोध कराता है और डूबने का भी। वैसे होना या न होना या डूबना - इसका पता सोचने की प्रक्रिया में ही लग सकता है इसलिये मन की भूमिका अहम है। विश्व की जो भी जानकारी हमारे पास है वह इन्द्रियों के माध्यम से उन मस्तिष्क तंतुओं तक पहुँचती है जो हमारी चेतना का आधार हैं।  सोचने की अद्भुत सामर्थ्य वाला मन और चेतना – इनका उद्भव कैसे हुआ होगा कहना मुश्किल है। विज्ञान की हमारी जानकारी हमें बहुत आगे ले चली है फिर भी कई प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं जिनमें एक चेतना और मन के उद्भव का है। मनोविज्ञान, न्यूरोलाजी, कम्प्यूटर विज्ञान, भौतिकी, गणित  – सभी दिशाओं से लगातार प्रयास हो रहे हैं इस गुत्थी को सुलझाने की दिशा में। पर यह गुत्थी इतनी आसानी से जल्दी सुलझ जायेगी नहीं लगता। फिर भी यह कहना सही होगा कि अब हम मस्तिष्क की कार्यविधि को काफी कुछ समझने लगे हैं।

यह गुत्थी जैसे भी और जब भी सुलझे हमारी चर्चा के आगे बढ़ने में इस से कोई कठिनाई नहीं होगी। मस्तिष्क की हमारी जानकारी काफी आगे हमें ले जा चुकी है। मस्तिष्क कई खंडों में बँटा है और  हर क्षेत्र की भूमिका अलग है मन की कार्यविधि में। देखना, सुनना, स्पर्श, स्वाद व महक – पांचों इन्द्रियों के क्षेत्र अलग हैं। विभिन्न प्रकार की बातों के लिये भी अलग क्षेत्र हैं मसलन गणित, भाषा वाचन व भाषा की समझ के क्षेत्र अलग हैं। भाषा की समझ और वाचन दोनों क्षेत्रों में अंतर है। बात कुछ अजीब और अविश्वसनीय सी लगती है पर यह सब प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है(5)।  भाषा में अलंकारों का महत्व है और उनके लिये भी प्रावधान है न्यूरॉनों के जुड़ाव में। न्यूरॉनों के बीच संपर्क सूत्र हैं वे एक दूसरे से जुड़ सकते हैं। कभी-कभी इस जुड़ाव में कुछ कसर रह जाती है और जुड़ाव थोड़ा गलत भी हो जाता है तब हम कहते हैं कि अमुक को खास तरह की मनोवैज्ञानिक समस्या है। कभी-कभी यह अप्रत्याशित जुड़ाव विशेष प्रकार की योग्यता का कारण भी बन जाता है। 
मस्तिष्क प्रकृति की देन है मानव को, जैविक विकास प्रक्रिया के माध्यम से; इसमें मानव का अपना कोई योगदान नहीं है। यह बात दूसरी है कि हम इसे अपनी उपलब्धि मानकर मिथ्या अभिमान से स्वयं को गौरवान्वित करते रहें। विज्ञान से प्राप्त यह जानकारी हम किस रूप में लेंगे यह जरूर हमारे चिंतन पर निर्भर है। अपने विकसित मस्तिष्क की वजह से  मानवीय उपलब्धियों की लम्बी फेहरिस्त है और साथ ही लम्बी फेहरिस्त है मानव द्वारा पृथ्वी तथा जीव जगत के अनियंत्रित दोहन की। लगभग रोजाना पृथ्वी का ताप बढ़ने की बात होती है जलवायु परिवर्तन पर बहस होती है पर्यावरण प्रदूषण की भी चर्चा होती रहती है। प्रकृति द्वारा मानव मस्तिष्क का ऐसा विकास स्वयं उसके लिये एक समस्या बन चुका है और इसकी परिणति क्या होगी यह भी उसी मानव मन के निर्णयों पर निर्भर होगा।

जैविक और सांस्कृतिक विकास के फलस्वरूप आज हम इस जगह पर हैं। हमें नहीं पता कि प्रकृति की जिन प्रक्रियाओं ने जीव व जन्तु जगत को जन्म दिया है उनका प्रयोजन क्या था? हो सकता है कोई खास प्रयोजन न हो और यह प्राकृतिक घटनाओं एवं प्रक्रियाओं का महज संयोगवश प्राप्त एक परिणाम हो। जो भी हो यह निश्चित है कि अगला चरण एक सीमा तक मानव मन व उसकी सोच पर निर्भर होगा। वैसे मानव मन कोई एक चीज तो है नहीं जिसको आसानी से परिभाषित किया जा सके। मानव मन के पूरे वर्णपट को देखें तो पहली बात जो सामने  आती है वह है उसका जन्तु स्वरूप, जो अन्य जन्तुओं की तरह केवल अपने लिये जीता है। उसकी जिजीविषा, सुरक्षा व जीवन-यापन इसमें प्रमुख हैं। पर विकसित मस्तिष्क के कारण चेतन मन अपने से इतर उड़ान भरने को प्रयत्नशील रहता है जिसे हम मानव का समष्टि परक स्वरूप भी कह सकते हैं। इन दो स्वरूपों – व्यक्तिपरक–समष्टि परक – का  द्वैत मानव जीवन की विड़म्बना है जहाँ वह पूरी तरह से इन दोनों में से एक का चयन नहीं कर सकता और दोनों के बीच एक तालमेल बैठाने में प्रयासरत रहता है। यह द्वैत एक ओर उसकी परेशानी का सबब है तो दूसरी ओर उसकी सृजनशीलता का स्रोत भी।
मैं गोते लगाता हूँ
आकृतियों के समंदर में
खोजता हुआ लगातार
वह मोती – निराकार।
- रवीन्द्रनाथ टैगोर
(लेखक द्वारा अंग्रेजी से अनूदित)

एक हिमालय सामने है दूसरा मेरे मन अभ्यंतर में, पहला साकार है दूसरा निराकार।

हिमालय तब एक पर्वत मात्र न होकर मेरे लिये प्रतीक बन जाता है कठिन संघर्ष से उपजी एक रचना का, प्रसव पीड़ा के उपरान्त एक नव आगमन का। मेरे मन की भट्टी में सब पकता रहता है, पृथ्वी – जो हमारा  घर है व सूर्य, हमारा ऊर्जा-स्रोत - हमारे अस्तित्व के जनक और गवाह। सूर्य भी  अजन्मा नहीं, पृथ्वी भी नहीं; जो जन्मा है उसका अंत होगा ही। यह है विराट के कैनवस पर रचा जा रहा विराट का खेल। हम जानते हैं कि हर चीज – तारे, सूर्य, दुनिया, जीव-जगत – परमाणुओं से बनी हैं और परमाणु की क्या कहें, वह भी तो जन्मा है तारों की कोख से। यह भी रोमांचकारी कथा है कि पहले केवल हाइड्रोजन के परमाणु थे शेष सभी परमाणु तारों के गर्भ में करोड़ों डिग्री के ताप पर निर्मित हुए।

हिमालय भी जन्मा  है और अभी शिशु ही है चंचल भी है नटखट भी। यह हिमालय मेरे लिये बहुत कुछ है लेकिन सबसे अहम मेरे लिये वह प्रतीक है तो स्रोत भी है हिम का, हिमनद का और सरिता का। अब हिमनद की ही बात करें तो बात में से बात निकलने लगेगी।

मैंने पहले जिक्र किया था जैविक विकास के फलस्वरूप मानव मस्तिष्क और मन ढलता गया है बहुत कुछ बाहर घटित होती प्रक्रियाओं की तर्ज पर। मोटे तौर पर मस्तिष्क को अगर कम्प्यूटर की तरह मानें तब मन को सोफ्टवेयर की तरह लिया जा सकेगा। पृथ्वी की टैक्टोनिक परतों के टकराव व मन अभ्यंतर की परतों के टकराव की समानता और दोनों में  सृष्टि-विध्वंस का अनवरत चलता खेल। हिमनद या ग्लेशियर हिमालय में हैं और मन में भी हैं प्रतीकात्मक रूप में। हिमनद जल का संचय करता रहता है और जब ग्रीष्म में उसकी जरूरत होती है तब हमें जल से वंचित नहीं करता। मन में भी  दीर्घकालिक स्मृति के क्षेत्र हैं जिनमें बचपन की सुखद स्मृतियाँ संजोयी रहती हैं जो ग्लेशियर से धीरे धीरे प्राप्त जल की तरह जीवन के कठिन पलों में आशा और  आस्था की कमी नहीं होने देतीं। यह भी सच है कि सभी एक से खुशनसीब नहीं होते और कई वंचित रह जाते हैं सुखद स्मृति रूपी  ग्लेशियर के सामयिक जीवनदायी प्रवाह से। यह भी याद रखना है कि ये ग्लेशियर भी वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण सिमट रहे हैं (6) और भविष्य में उनका अस्तित्व खतरे में हो सकता है।

दोहरे भ्रमण पथों पर चलता हुआ लगातार सोचता हूँ वह गोताखोर तलाशता मोती जो है निराकार; तलाश जो कभी समाप्त नहीं होगी, तलाश जो उतनी ही शाश्वत है जितना सृष्टि-विध्वंस का प्रक्रम। तलाश चलती रहेगी इसलिये नहीं कि मोती मिलेगा नहीं। वह जारी रहेगी क्योंकि एक के मिल जाने पर मन थोड़ी देर ही संतुष्ट रह सकता है स्थायी रूप से नहीं यह उसका स्वभाव है तभी अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा: चंचलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवदृढ़म्, तस्या निग्रहं मन्यो वायुरैव सुद्दष्कृतम।

मन की यह चंचलता उसकी उर्जा का स्रोत है परेशानियों का भी। क्या यह संभव है कि वह ऊर्जा धनात्मक कार्यों में ही उद्भाषित हो? शायद यह संभव है पर आंशिक रूप से। मन संभावनाओं की तलाश में रहता है और जो उसका स्वभाव थोड़ा बहुत समझते हैं उसकी ऊर्जा का प्रबंधन अधिक सुव्यवस्थित तरीके से कर सकते हैं।
मैं फिर फिर लौट आता हूँ उसी जगह, जहाँ से उड़ान भरता हूँ जहाज के पंछी की तरह। कृष्ण का जन्म भी तो कठिन परिस्थितियों में हुआ था फिर भी उनके जीवन की विविधता, समरसता, कर्मठता एक  अद्वितीय बहुमुखी व्यक्तित्व का आभास देते हैं। संघर्ष और सृजन उनके जीवन से वैसे ही जुड़ा है जैसा हिमालय से। हिमालय कभी दीखता है देवतात्मा, कभी नगाधिराज, कभी ग्लेशियर का जनक, कभी गंगा व सैकड़ों नदियों का उद्गम स्थल, कभी उत्तर की ठंढी बर्फीली हवाओं के समक्ष दीवार, कभी नटराज शिव की कर्मभूमि –- सृष्टि-विध्वंस के शाश्वत खेल का नवजात शिशु और कभी धरती की टैक्टोनिक परतों की हलचल का केन्द्र। मेरे बचपन का हिमगिरि सुन्दर और विराट था आज इस सब जानकारी के बाद उतना ही सुन्दर है वैसा ही विराट। मेरे मन में भी हिमालय बिम्बित है – निराकार वही जिसे आकारों के समंदर में पाया है मैंने।

मन लोभी है एक या दो मोतियों से मान लेगा यह उसका स्वभाव नहीं। मैं गोते लगाता रहूँगा और वह मुझे ज्यादा के लिये उकसाता रहेगा। मैं भी जान गया हूँ उसकी आदतें; मैं जो भी लाता हूँ उसे वह स्वीकार लेता है सोचता है मैं मोती ही लाया होऊंगा। लेकर आऊंगा उसके लिये सुन्दर, उदार और प्रगतिशील विचारों के मोती। समंदर भी होगा मेरे मन का समंदर।

जब जब मुझे आयेगी कठिनाई मेरे सामने होगा हिमालय, मेरे मन के निराकार को सशक्त करता प्रतिपल। कवि जयशंकर प्रसाद की एक कविता की पहली पंक्ति मैं कभी गुनगुनाया करता था: “हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती”; थोड़ा परिवर्तन कऱ अब गुनगुनाता हूँ: “हिमाद्रि तुंग श्रंग पर प्रबुद्ध विश्व-भारती”। स्वप्निल आँखों में प्रबुद्ध भारती के तुंग श्रंग पर पहुँचने का चित्र अक्सर ही मन में उभरता था। तब एक बाल मन की कल्पना थी पर  आज भी वह पूरी तरह विस्मृत नहीं हुई।

कभी खुद से पूछ लेता: क्या कभी वो दिन आयेगा जब प्रबुद्ध विश्व-भारती तुंग श्रंग पर होगी? पूछूंगा हिमालय से ही और उसका जवाब क्या होगा यह मैं जानता हूँ: निश्चय ही वह कहेगा “मेरे जन्म का इतिहास देख लो वहीं तुम्हें उत्तर मिल जायगा।”

शायद यही करना सही होगा। सामने का देवतात्मा नगाधिराज और मेरे मन में छिपा संघर्षरत, हलचल का केन्द्र हिमगिरि - मुझे सदा प्रेरित करता, उकसाता, उद्वेलित करता और सारे पौराणिक तथा वैज्ञानिक संदर्भों के साथ मुझे अनंत संभावनाओं के द्वार की तरफ धकेलता।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


संदर्भ
(1) बिल एटकेन, The Nanda Devi Affair, Penguin Books India, 1994
(2) T S Eliot (quoted poem): Where is the life we have lost in living/ Where is the wisdom we have lost in knowledge/ Where is the knowledge we have lost in information
(3) राबर्ट पीरसिग, Zen and the Art of Motorcycle Maintenance,  A Bantam New Age Book, 1981
(4) Russell Banks, Continental Drift, Harper Perennial Modern Classics, 2007
(5) वी रामचन्द्रन,  The Emerging Mind, Profile Books Ltd, London, 2003
(6) चन्द्रमोहन भंडारी, Changing Weather: Shifting Glaciers,  Mainstream Weekly, Vol 48, December 26, 2009

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