समीक्षा: वंदना अवस्थी दुबे की 'बातों वाली गली'

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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बातों वाली गली
लेखिका: वंदना अवस्थी दुबे vandana.adubey@gmail.com
प्रकाशक: रुझान प्रकाशन
मूल्य: ₹ 150.00 / US $10.00
ईमेल: vivekranjan.vinamra@gmail.com
दूरभाष: +91 94258 06252
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वंदना अवस्थी दुबे से एक दशक से पुराना परिचय रहा है ब्लॉग के माध्यम से। वंदना ने ब्लॉग का सफर जब शुरु किया तो यह कहते हुए किया कि:
'इस ब्लॉग के ज़रिये हो सकता है मेरे बहुत से पुराने साथी मिल जायें। हो सकता है बहुत से नये साथी बन जायें। वरना मुझ जैसे अदना से इन्सान को ब्लॉग की क्या ज़रूरत थी।'

वन्दना अवस्थी दुबे
बस, यह पढ़ा और हम शामिल हो गये उनके नये साथियों के फेहरिस्त में। फिर तो एक दूसरे को पढ़ते, टिप्पणियाँ करते जाने कब फोन पर बात भी शुरु हो गई। वंदना की लेखनी सदा ही प्रभावित करती रही। एक बोल चाल की भाषा में नित की बातों पर कहानी बुनना वंदना की खासियत है।
हाल ही मुझे उन्होंने अपनी किताब ’बातों वाली गली’ बड़े ही स्नेह एवं जतन से भेजी। किताब उठाई और कब किताब पूरी पढ़ गया, पता ही नहीं लगा। बीस कहानियाँ अलग अलग रंग रुप वाली 118 पन्नों की किताब में समाई हुई हैं।

कुछ कहानियों की बानगी देखिये, सभी पात्र और घटनायें आपको अपने आसपास के जाने पहचाने ही नजर आयेंगे:

’बातों वाली गली’ की शीर्षक कहानी से - 

गृहणियों का मोहल्ले में निंदारस एवं गपाष्टक के अड्डे का चित्रण:
शाम चार बजे से मिसेज गुप्ता के दरवाज़े पर पड़ोस की बतरस प्रेमी महिलाओं की पंचायत शुरू होती जो शाम साढे छह के बाद ही ख़त्म होती, सबके पतियों के ऑफिस से लौटने के बाद। हर महिला के हाथ में कोई न कोई काम होता, लेकिन ये काम एक रत्ती आगे न बढ़ता। बढ़तीं तो केवल बातें। एक बात में से दस बातें निकलतीं। बात का रूप ही बदल जाता।

अनु बहुत डरती है इस पंचायत से। असल में न तो उसका स्वभाव मेल खाता है इन महिलाओं से, और न ही उसके पास समय है। वैसे समय होता तब भी उस सभा में तो नहीं ही जाती अनु।

निंदारस का आनन्द उठाते जिस अफवाह को सच का दर्जा मिल गया था उस पर लिखते हुए:

अनु ने उन्हें बहुत देर तक असमंजस में नहीं रहने दिया। सधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया उसने-" मैं आज बहुत ज़रूरी बात कहने और एक आग्रह करने आई हूँ। हमारी नई पड़ोसन के बारे में आप सबने जो राय क़ायम की है, जिन अफवाहों को फैलाया है, प्लीज़ अब उन्हें ख़त्म करने का काम भी करें, क्योंकि आप में से कोई भी नहीं जानता कि कभी सुबह, कभी दोपहर तो कभी रात में जो आवाज़ रेडियो के माध्यम से आपके घरों में गूंजती है , और जिन शचि दीदी के फरमाइशी कार्यक्रम की मिसेज़ सिंह दीवानी हैं, ये वही शचि हैं।

रेडियो की ड्यूटी के कारण आप उन्हें देर-सबेर आते-जाते देखते हैं। और हाँ वह संदिग्ध गाड़ी आकाशवाणी की गाड़ी है जो उन्हें लेने आती है। सो प्लीज़…"
हांफने लगी थी अनु। ... और सामने बैठा महिलाओं का हुजूम हतप्रभ था, नि:शब्द भी।

फिर एक कहानी है: ’रमणीक भाई नहीं रहे’

एक ऐसे परिवार की कहानी का ताना बाना जहाँ मुखिया अपने हाथ में पूरे घर की कमान थामे रखता है:
"रमणीक भाई ठक्कर नहीं रहे" … अखबार के नगर पृष्ठ का मुख्य समाचार था ये आज ।
“अरे! रमणीक भाई नहीं रहे! अब क्या होगा?”  समाचार पढ़ के आभा चिंतित हो उठी।
“क्या होगा माने? आखिर जिंदा रहने की भी कोई लिमिट होती है। अट्ठासी साल के तो हो ही गए थे, और कितना जिंदा रहते?”
आम ख़बरों की तरह इसे भी अभय ने सहजता से स्वीकार कर लिया था। अस्वीकार की कोई गुंजाइश तो आभा के पास भी नहीं थी, लेकिन चिंता अब उसे ठक्कर परिवार की थी, जिसकी कमान पूरी तरह रमणीक भाई के हाथ में थी।
इस उम्र में भी गजब की फुर्ती और दिमाग था उनके पास। क्या मजाल कि दो दुकानों में से किसी एक पर भी कोई गड़बड़ हो जाए? साठ - साठ साल के लड़के हो गए, लेकिन अभी भी पिता की दी हुई "खर्ची" पर निर्भर!
कहानी ’नहीं चाहिये आदि को कुछ’ एक बाल मन का चित्रण है। स्त्रियों की बात और उनकी समस्याओं पर विमर्श करती अनेक कहानियाँ हैं। ’मीरा जाग गई है’, ’करत करत अभ्यास के’, ’बड़ी बाई साहब’ आदि इन्हीं विषयों के इर्द गिर्द बुनी गई हैं।

पूरी किताब से गुजरने के बाद सभी कहानियाँ दिल में कहीं न कहीं जगह बना लेती हैं और बस एक ही बात मन में आती है कि अगली किताब जल्दी आये तो कुछ और कहानियाँ पढ़ी जायें। मुझे लगता है इस सशक्त लेखनी और ताना बाना बुनने की कला के साथ वंदना को अब एक उपन्यास के साथ आना चाहिये।

मुझे विश्वास है कि बातों वाली गली पढ़ने के बाद आप निश्चित ही मेरी तरह वंदना की लेखनी के मुरीद हो जायेंगे।

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