राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की वास्तविकता

शशांक मिश्र भारती

हिन्दी सदन, बड़ागांव, शाहजहांपुर 242401 (उत्तर प्रदेश)
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हिन्दी की अवधारणा, संस्थायें और सरकार 
 कांग्रेस कार्यसमिति में दो दो बार मतदान के बाद भी हिन्दुस्तानी से एक वोट से जीतकर 14 सितम्बर 1949 को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृत होने के बाद आज तक लगभग छह दशक का समय बीत चुका है। इस अवधि में न केवल हिन्दी भाषा व साहित्य में अनेक उतार-चढ़ाव आये अपितु भाषा को लेकर अनेक विवाद व प्रश्न भी उठे। विविध सरकारों द्वारा अनावश्यक और बोझिल निर्णय भी लिये गये । भारत की विभिन्न भाषाओं में शोध शिक्षण और प्रशिक्षण को दिशा और गति प्रदान करने के लिए भारतीय भाषा अकादमी की स्थापना की गई पर वह अब तक कितनी सफल है किसी से छुपा नहीं है कितना इन भाषाओं को एक दूसरे के निकट लायी है यह सब जानते हैं इन सबके मध्य देश में गुवाहाटी, ओडिसा, बेंगलूर, तिरूवनंतपुरम, अहमदाबाद, चेन्नै, प्रयाग, हुबली, पुणे, इम्फाल, आइजोल, मुंबई, वर्धा, राजकोट, हैदराबाद, जयपुर, देवधर, कटक, आदि में अनेक समितियों या संगठनों को सीधे सरकार द्वारा या सरकारी अनुदानों से चलाया जा रहा है।1

अनेक संस्थायें व संगठन विधिवत स्मारिका, पत्र, पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं, विविध प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं, और हिंदी के प्रचार-प्रसार व संवर्द्धन हेतु अभियान भी चलाते हैं। लेकिन यह सब वास्तव में कम, और दिखावटी व औपचारिक अधिक होता है। कुछ संस्थाएँ तो प्रतिवर्ष मात्र चौदह सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाकर या हिन्दी पखवाड़ा आयोजित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं। दूसरों की क्या कहें, देश का केंद्रीय नेतृत्व भी इस सम्बन्ध में अपने राजनीतिक स्वार्थ से हटकर रुचि नहीं ले पा रहा है। न ही अब तक किसी निर्णय का प्रभाव दिखा है। अभी 2015 में केन्द्र सरकार ने शपथ पत्र के माध्यम से उच्चतम नयायालय में अधिवक्ता शिवसागर तिवारी की याचिका के जवाब में कहा कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में काम काज की भाषा हिन्दी करना संभव नहीं हैं। पिछली सरकारों की तो छोड़ दीजिए वर्तमान सरकार से भाषा के विषय पर काफी अपेक्षायें थी पर वह भी परिणाम के धरातल पर ढाक के तीन पात रही; कैसा दुर्भाग्य है। कुल मिलाकर एक बार फिर प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर के अवसर पर अनेक राजनेताओं के समक्ष महीयसी महादेवी जी का भैरवनाद कानों में गूंज उठता है कि हमारी संस्कृति में दिशा निर्देशक दूसरे होते थे और शासक दूसरे। अब शासक ही दिशा निर्देश देने लगे हैं। इसलिए दिशा नहीं मिल रही है।2

भाषा दिखावे की या संस्कारों की 
 कुछ लोग अपने को अधिक शिक्षित संस्कारित दिखाने के लिए अपनी मातृभाषा राष्टभाषा को छोड़ परदेश की भाषा के पीछे भागते हैं उनको एक जापानी योइचि युकिशिता के इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए जो उसने यहाँ केन्द्रीय हिन्दी संस्थान नई दिल्ली में हिन्दी का अध्ययन करते हुए व्यक्त किये थे कि मैं कभी कभी सुनता हूँ कि भारत में सुशिक्षित आदमी उसे कहते हैं जिसे अच्छी तरह अंग्रेजी आती है जो अंग्रेजी में ही बोलना पसन्द करता है जिसके घर में अंग्रेजी किताबों का संग्रह है और जो अंग्रेजी अखबार आता है। परन्तु दूसरे देशों में शिक्षित उसे कहते हैं जिसे अपनी भाषा का पर्याप्त ज्ञान हो जिसके घर में राष्टभाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे अपनी मातृभाषा का साहित्य पढ़ने में विशेष रुचि हो। 3

भाषा शिक्षण और उसका कुञ्जीपटल (कीबोर्ड) 
 जिन्हें यह लगता है कि हिन्दी या कोई विदेशी भाषा बोलना या सीखना कठिन है उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. विश्वनाथ मिश्र के नवीनतम तकनीकी आविष्कार को समझना चाहिए जिसमें वे तीस घण्टे का ऐसा कार्यक्रम बताते हैं जहाँ रोज एक-एक घण्टे या एक पखवाड़े तक दो-दो घण्टे अभ्यास से हिंदी सीखी जा सकती है। यह निर्देशन उन्होंने विसकान्सिन मडिसन विश्वविद्यालय में 1991 में किया था। जहाँ तक हिन्दी टाइपिंग का प्रश्न है तो हिन्दी में भी एक ऐसा वाक्य उपलब्ध है जिसमें गृहमंत्रालय से स्वीकृत देवनागरी की बोर्ड के सभी अक्षर मात्राएँ आ जाते हैं इसका आविष्कार नब्बे के दशक में ही रमेशचन्द्र नाम के युवक ने कर दिया था यह वाक्य है बली पार्थ ऋषि से विद्या एवं दाऊ भाई द्वारिकाधीश श्री कृष्ण से गूढ़ ज्ञान लेकर कुरुक्षेत्र में जूझ पड़े और पाँच छः हठी प्रखर योद्धा मौत के घाट उतारे। 4

उत्तर के राज्यों की स्थिति, कई अन्यों की सोच व हिन्दी की यात्रा 
 इसी के साथ उत्तर के उन हिन्दी भाषी राज्यों की बात कहना भी दुः खद है जहाँ हिन्दी के लिए बड़े-बड़े बोल बोलने वाले अधिक रहते हैं। यह सब कुछ वह मात्र भावुकतावश या कुछ क्षणों दिनों मंचों पर भाषणों तक ही या झूठी वाहवाही लूटने तक ही कर पाते हैं। ‘खाने के दाँत और, दिखाने के और’ वाली कहावत अधिक सार्थक हो रही है। ये वही लोग हैं जो बड़ी-बड़ी बातों के बाद भी अपने हस्ताक्षर तक अंग्रेजी में करते हैं, और निमंत्रण पत्रादि अंग्रेजी में छपवाते हैं। अपने आपको छोड़कर सभी को हाशिये पर भी नहीं समझते हैं। ऊपर से हिन्दी अंग्रेजी के संक्रमण से हिंग्रेजी पैदा कर रहे हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि उत्तर से अधिक कार्य दक्षिण में हो रहा है। वहाँ बड़ी-बड़ी बातें नहीं हो रही हैं, न हिन्दी के नाम पर दुकानें सजती हैं। डिग्री उपाधियों और सम्मानों की बोली नहीं लगती है। पुरस्कारों को खरीदा बेचा नहीं जाता है। हाँ ऐसा भी नहीं है कि उत्तर भारत में सब नकारा ही हों, कुछ संस्था संगठन हिन्दी प्रेमी साहित्यकार प्रशंसनीय कार्य भी कर रहे हैं। समय-समय पर सार्थक चर्चाओं, संगोष्ठियों, व आयोजनों को करते रहते हैं जिनमें न केवल हिन्दी की दशा व दिशा का भान हो रहा है बल्कि हिन्दी की उत्तरोत्तर प्रगति को बल मिल रहा है।

 कई राज्यों में मैंने देखा कि उन्हें अपनी मातृभाषा राज्य की भाषा के बाद अंग्रेजी अधिक प्यारी है और व्यवहार में वे अंग्रेजी को हिन्दी से अधिक महत्व देते हैं। हिन्दी जानते हुए भी प्रयोग से बचते हैं, पत्र व्यवहार भी नहीं करना चाहते हैं। दूसरी ओर हम देखें तो स्वामी दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई, दूसरी मातृभाषाओं से होते हुए भी हिन्दी की ही वकालत करते थे। गांधी जी ने हरिजन पत्रिका के 9 जुलाई 1938 के अंक में अंगेजी के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के अपने कटु अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा है कि हमें और हमारे बच्चों को अपनी विरासत पर ही आगे बढ़ना होगा। अगर हम दूसरों से लेंगे तो अपने आपको शक्तिहीन बना देंगे। विदेशी खाद पर हम पनप नहीं सकते। मैं विदेशी भाषाओं के खजाने को अपनी भाषाओं के माध्यम से लेना चाहता हूँ। उन्होंने आगे कहा था कि शिक्षा का माध्यम किसी भी हालत में तुरन्त बदला जाना चाहिए। प्रादेशिक भाषाओं को अपना उचित स्थान मिलना चाहिए। मैं तो इस बढ़ती आपराधिक हानि की तुलना में उच्चशिक्षा में कुछ दिनों की उठापटक ज्यादा पसन्द करूंगा।6
यह स्पष्ट है कि हर भाषा का अपना अस्तित्व है उसी भाँति उसका अपना समाज, संस्कृति और परम्परायें हैं, जिनसे अटूट सम्बन्ध है। हर भाषा का अपने समुदायिक मूल्यों से जुड़ाव होता है इसलिए दूसरे भाषा भाषी को उसके सही अर्थ को सही रूप से समझने और ग्रहण करने में कठिनाई आती है जोकि भारतीय परिवेश में अंग्रेजी के द्वारा दशकों से सामने आ रही है तथा जो अन्देशा गांधी जी ने व्यक्त किया था जो अब तक हम और हमारे राजनेता या नेतृत्व समझ नहीं पा रहा है।

 पूर्व ब्रिटिश हाई कमिश्नर डा. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी ने लिखा है कि हिन्दी भारतीयों की भाषा ही नहीं बल्कि उनकी परिभाषा भी है।4 दैनिक हिन्दी मार्तण्ड से आरम्भ होने वाली हिन्दी की यात्रा बहुत आगे बढ़ चुकी है। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का उपन्यास निर्मला, रामचरितमानस, महाभारत आदि काफी लोकप्रिय हैं और अनुवाद होते ही विदेशों में हाथों हाथ बिक रहे हैं।

वर्तमान स्थिति और संभावनायें
 राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की वास्तविकता को यदि हम देखें तो वह देश के अधिकांश राज्यों में अभी भी अंग्रेजी के प्रभाव में है। अधिकांश सरकारी पत्राचार, आदेशों, और राजाज्ञाओं पर अंग्रेजी हावी है। जो कार्य हिन्दी से अंग्रेजी में होना चाहिए था वह अंग्रेजी से हिन्दी में हो रहा है। एक-दो केन्द्रीय मंत्रालयों व राज्य सरकारों को छोड़कर शेष अंग्रेजी के ही मकड़जाल में उलझी हैं। राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की प्रतीक संसद की कार्यवाही देखकर लगता ही नहीं कि यह वही स्थान हैं जहाँ हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। इस सबको देख-देखकर यहाँ पर समय-समय पर आने वाले विदेशी अतिथि भी चुटकी लेते हैं। संघ लोकसेवा आयोग बैंकिंग कर्मचारी चयन आयोग जैसी परीक्षा संस्थाओं को छोड़कर अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं पर अंग्रेजी ही हावी है।
यदि प्रचार-प्रसार बोलने व व्यवहार करने वालों की दृष्टि से देखें तो निश्चय ही हिन्दी राष्ट्र भाषा बन चुकी है। उसके बोलने समझने वाले भारतवर्ष में ही नहीं भारत के बाहर यूरोप खाड़ी के देशों, अमेरिका, अफ्रीका आस्ट्रेलिया व एशियाई देशों आदि में तेजी से बढ़ रहे हैं। 206 देशों तक हिन्दी पहुँच चुकी है जिसके परिणामस्वरूप व्यवहार करने व बोलने वालों की दृष्टि से हिन्दी ने 2015 के आंकड़ों के अनुसार चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, व रूसी को पीछे छोड़ दिया है। अब वह 130 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है, जबकि चीनी 120 करोड़, व अंग्रेजी 90 करोड़ लोगों द्वारा बोली जा रही है। हिन्दी भाषी दुनिया भर में तेजी से फैल रहे हैं दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए अपने कर्मचारियों को हिन्दी सिखानी पड़ रही है। तेजी से हिन्दी सीखने वाले देशों में चीन सबसे आगे है। आजकल चीन के 20 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। चीन में हिन्दी में कार्य करने वालों को डॉक्टरेट तक की उपाधि दी जाती है।

 आंकड़ों की बात करें तो 1997 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट में मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वाले चीनी को 87 करोड़ 04 लाख, हिन्दी को 36 करोड़ 60 लाख, अंग्रेजी को 34 करोड़ 10 लाख, स्पेनिश को 32 करोड़ 02 लाख, और अरबी को 20 करोड़ लोग हैं। अब तक बीते बाइस बरसों में यह संख्या और बढ़ गयी होगी। देश के अन्दर राज्यों में मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वाले राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड मध्यप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचलप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, चण्डीगढ़ में 80 प्रतिशत से अधिक है। वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, पंजाब, अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह में 10 से 20 प्रतिशत तक की मातृभाषा है।

 यही नहीं हिन्दी के विविध प्रकार से उपयोगी शब्दकोश की शब्द संख्या को वर्तमान 30 लाख शब्दों से बढ़ाकर दो करोड़ करने का तेजी से प्रयास केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा व भारतीय भाषा संस्थान मैसूर संयुक्त रूप से कर रहे हैं। हिन्दी में विभिन्न विषयों की श्रेष्ठ पुस्तकों साहित्य का सृजन भी हो रहा है। उपभोक्ता बाजार पर तो हिन्दी इतना प्रभाव छोड़ रही है कि देश-विदेश की कम्पनियों उत्पादों के विज्ञापन बिक्री के लिए हिन्दी को ही माध्यम बनाना पड़ रहा है। यही नहीं, विविध संचार माध्यम, दूरदर्शन आकाशवाणी, पत्र-पत्रिकाएँ, ईबुक्स, ऑडियो बुक्स, फिल्म उद्योग आदि भी कहीं न कहीं योगदान कर रहे हैं। हालांकि इनमें कुछ हिन्दी के मौलिक स्वरूप में शिथिलता व उच्छ्रंखलता भी ला रहे हैं, जिससे सावधान रहने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष
 यह कहा जा सकता है कि अनके तरह की उपेक्षाओं, उतार-चढ़ावों के बाद भी हिन्दी अपने बल पर देश की राष्ट्रभाषा बन चुकी है अपने उपभोक्ताओं पाठक वर्ग और सृजन धर्मियों के बल पर सभी को लड़खड़ाने पर सहारा ही न देगी अपितु निकट भविष्य में अपनी उपयोगिता, महत्व और प्रत्येक क्षेत्र में स्वीकार्यता से से अन्तर्राष्ट्रीय भाषा भी बन जाएगी।

सन्दर्भ 
1 बृहत हिन्दी निर्देशिका पृष्ठ 16-18
2 अणुव्रत एक मई 1997 पृष्ठ 28
3 विवरण पत्रिका दिसम्बर 1991 पृष्ठ 9
4 वही पृष्ठ 20
5 राष्टकिंकर मार्च 2018 पृष्ठ 10
6 जनभाषा सन्देश 2015 पृष्ठ 23


परिचय: शहीदों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध शाहजहाँपुर के बड़ागाँव में 1973 में जन्मे। 1991 से लेखन में सक्रिय। अब तक दस पुस्तकों का प्रकाशन एक पुस्तक उड़िया में प्रकाशित। सम्प्रति - प्रवक्ता संस्कृत के पद पर राजकीय इन्टर कॉलेज, टनकपुर, चम्पावत, उत्तराखण्ड में कार्यरत।

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