काव्य: पंखुरी सिन्हा

पंखुरी सिन्हा

पंखुरी सिन्हा


शांति की बहाली

भूलकर सारा भाई भतीजावाद
भूलकर सारी क्षेत्रीय पहचान
भूल कर सारी भाषागत प्रतिबद्धता
शांति बहाल करें
भूलकर परिचय के सारे सूत्र
भूल कर पिछली बहाली का जश्न
भूलकर न हुई बहाली का मातम
शांति बहाल करें
कि इन बेहद कामकाज़ी गलियारों में
कोई भर रहा है
उठा पटक की हिंसक राजनीति
बेहद हिंसक राजनीति
नापाक करता इन ताक़तवर गलियारों को
बना रहा है
फाइल नामक एक कोड
और चित्रित भी कर रहा है उसे
मुखरित भी
थामे एक फाइल को हाथों में अपने
पेट के ऊपर
नाभि के कुछ नीचे
किसी की अनावश्यक चहलकदमी है
अत्यधिक
अनावश्यक भी
और चहलकदमी भी
एक ऐसी फुदकनी चाल में
जो तमाम मेज़ कुर्सी पर बैठे लोगों के
क्रोध में दांत किटकिटा दे
खामोश वो गुहार करें
पुकार करें
शांति बहाल करें
कि विचित्र सी हिंसा है
सड़क पर
घरों में
शांति बहाल करें।


किसका प्रकोप

केवल नदी की बाढ़ है
या कि बरसात भी
मौसम का प्रकोप है
कि मौसम का युद्ध भी
और सबसे ज्यादा
तैयारी हमारी
कि होगी बारिश तेज़
पर कितनी बुलंद थी इमारत हमारी?
कितनी पुख्ता सडकें हमारी?
कितने तैयार थे लोग?
कहाँ था उनका बसेरा?


किसके प्रहलाद

ये तो उम्दा है
बहुत उम्दा
कि मिटटी में है इतना संगीत
प्रतिमाएँ गढ़ लेती हैं
खुद को
सच है अगर यह
फिर राह में स्थापित होने की
या कि सिर्फ उस दिशा में
इतने कंटक क्यूँ?
इतने कंकड़ क्यूँ?
अवरोध क्यूँ इतने?
इतने रोड़े बिछाने वाले कौन?
इतना आर्तनाद किसका
इतने प्रहलाद किसके?
इतना रक्तपात किसका?
किसकी ये तलवार?
कैसी इसकी धार है?
कहाँ मिटटी का लेप है?
कहाँ वह आँगन, स्पर्श, अतिरेक है?
रास्ता बंद
ये कौन, आगे आगे चलता उसके
बंद किये दे रहा है
रास्ते सारे
कहता कि व्यर्थ सब प्रयास है
किसी से कुछ नहीं होगा
कि इससे, उससे
युक्ति, विधि, उपाय से
कुछ नहीं होगा
इनका, उनका शिकंजा है
ज़िन्दगी पर आपकी
निकलना मुश्किल गिरफ्त से
पाना मुश्किल न्याय
कहकर वो चिप्पियाँ लगा रहा है
इन ताक़तों की मुझपर
या कि पहले से ही
इतनी मज़बूत थी
पकड़ इनकी?
किनकी, कौन है?
क्या है? कहाँ है? कैसे है?
जो जैसे है
कैसे जिया जाये?
बेसवाल, कि हों हम
बेज़ुबान
कैसे पिया जाये
ज़हर इतना?
पर क्यों हर कोई बंद किए देता है
रास्ते सारे
बनाकर फाटक ढेरो ढेर
कि इलाके हैं
प्रथाएँ, कब्ज़ा, परंपरा
कुछ भी नहीं आगे अँधेरे के।
खिलो तुम
खिलो तुम, मिलो तुम, राहों में
जैसे बागों में उनके
खिले होते हैं, गुलदाउदी के फूल
एक एक गुलाबी वर्ण जिसका
सहलाता है सर्दी की मार
मसलता है ठंढ की अकड़ को
जनवरी के कुहासे में
जब दिखता नहीं कुछ भी पार
तुम्हारे चुम्बन के।


सज्जा

सज्जा
सिर्फ सज्जा
जिसे त्याग देने को जी करता था
जोगन बन जाने को जी करता था
बन जाने को सन्यासी
साधू व्रत ले लेने को
इतनी खूँख्वार लड़ाई थी
इतनी वहशी दहशत
ऐसे क्षत विक्षत शरीर आ रहे थे
अस्पताल में
जहाँ नयी नयी नर्स की नियुक्ति हुई थी उसकी
लैंडमाइंस से ध्वस्त शरीर
बर्बर आक्रमण पैरों पर
फिर कभी न चल पाने की सज़ा देता
एक आयातित हथियार
प्रेषित हथियार
जिसके इस्तेमाल में निपुण बनाये जा रहे थे बच्चे
हथियार नहीं वह यहाँ का
भाषा नहीं वह यहाँ की
ज़बान नहीं वह यहाँ की
फैक्ट्रियाँ नहीं यहाँ उसकी
क्या बनायी जायें फैक्ट्रियाँ
प्रत्युत्तर में
केवल प्रत्त्युत्तर में
कैसे क्रूर सवाल
जबकि स्याह पड़ गए होठों पर
पीली पड़ गयीं आँखों में
सूखते अधरों पर
काँपती हो ख्वाइश कोई
थामने को उसका हाथ
उस सैनिक का जो लड़ता हो बंदूकों से
आमने-सामने
जब डाक से आ रही हों पत्रिकाएँ विदेशी
रानियों की तस्वीरों वाली
शांतिदूतों की
राजदूतों की
और सिर्फ टिंचर
आयोडीन की महक हो हवा में
और घर में डेटोल की शीशी
हाथ धोने के बाद के लिए
पूरी तरह डेटोल से हाथ धोने के लिए
मेल नहीं खाए तस्वीरों से हवा की गंध
और भयाक्रांत हो सारे शब्द
सारे सपने, आवाजें सारी
पत्तों का खडकना तक
और सिर्फ जन्म देने की आतुरता
पंख फैलाती हो
उसकी नारी देह में
और ये तय करना मुश्किल हो
कि ज़्यादा पाक तस्वीर कौन सी है?
सन्यास की, या गृहस्थ की?


नए हवन कुंड

बिल्कुल नयी पूजा की विधि थी
नए किस्म के पाक धुंए
क्रॉस को थामने और चूमने के अंदाज़ नए थे
उस विदेशी पादरी के
आवाज़ नयी थी उसकी
उच्चारण नया
लम्बी प्रार्थना थी
बड़ी मांगें
फूलों से लदा था कमरा
सज्जा जैसी एक नैसर्गिक इच्छा प्रबल हो रही थी
फूल तोड़ने की भी
अर्पित करने की भी
अर्पित होने की भी
सन्यास का रुमान मंच पर बोल रहा था
माइक से बोल रहा था
कान्वेंट के फाटक के बाहर
लड़के ऐन छुट्टी के वक़्त नज़र आ रहे थे
अपने सत्रहवें जन्मदिन के लिए
उसने पहली बार चूड़ियाँ पहनी थीं।

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