फ़िराक़ गोरखपुरी - हिन्दुस्तानी तहजीब का शायर

रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

- मुहम्मद कामिल खान


        फ़िराक़ गोरखपुरी, पूरा नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी, शायर-ए-जमाल। वे किसी भाषा-विशेष के नहीं, बल्कि जनता के, जीवन के प्रत्येक रंग के शायर थे। उन्होंने अपनी शायरी में जिन्दगी के हर रंग को सहज-सरल और सुन्दर शब्दों में बयाँ किया है। यही वजह है कि उनकी शायरी की रोशनी आज भी दुनिया में जगमगा रही है। वास्तव में फ़िराक़ की सदाबहार शायरी दिल को छू लेने वाली शायरी है-
                   उसको हवाएँ न छू सकेंगी,
                   जो शम् सोखन जला गया हूँ।

        फ़िराक़ ने अपने साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ गजल से किया था। उन्होंने गजल, नज्म और रुबाई तीनों विधाओं में काफी कहा है।  उनके कलाम का सबसे बड़ा और अहम भाग गजल है और यही फ़िराक़ की पहचान है। वैसे फ़िराक़ की शायरी को प्रगति आंदोलन से जुड़ने के बाद मुकम्मल स्थान मिला। वह शायर भी हैं और समालोचक भी। उनकी आलोचना का स्तर बौद्धिक है। उन्होंने जो कुछ लिखा भावुक शैली में लिखा। जिसमें भाषा और वर्णन का बड़ा स्वाद है।

मुहम्मद कामिल खान
         फ़िराक़ की शायरी में समाजवाद, मानव समस्याएँ,प्रकृति की व्यापक अभिव्यक्ति और स्त्री के प्रति महज रूमानी नहीं बल्कि यथार्थपरक दृष्टिकोण प्रतिपादित हुआ। उन्हों छोटी और लम्बी नज्में दोनों ही कही, लेकिन गजल और रुबाई को एक नया लहजा और नई आवाज दी। इस आवाज में अतीत की गूंज भी है, वर्तमान की बेचैनी भी और भारत की आत्मा भी धड़कते हुए रूपों में जिन्दा हैं। फारसी, उर्दू, हिन्दी, संस्कृत, ब्रजभाषा और हिन्दू संस्कृति की गहरी जानकारी की वजह से उनकी शायरी हिन्दुस्तान की मिट्टी में रच-बस गयी।

        फ़िराक़ ने खयाली प्रेम से बचने की कोशिश की है। उनमें यह निडरता और साहस है कि वह वाह्य प्रेम को एक अच्छा विचार एवं सिद्धांत समझते है और बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं-
                     कोई समझे तो एक बात कहूँ,
                     इश्क तौफीक है, गुनाह नहीं।

         फ़िराक़ के काव्य में सच्चे, गहरे और स्थायीभाव के शोर बड़ी तादाद में मिलेंगे-
                        हमारी जिन्दगी-ए-इश्क  का तो पहला ख्वाब,
                        हमें भी भूल चुका है, तुम्हें भी याद नहीं।

          इश्क  के सूक्ष्म और स्थूल रूपों से रूबरू होते हुए फ़िराक़ को जो सौन्दर्य बोध हुआ, वह उनकी शायरी में नई सजधज के साथ उतरा-
                       झिलमिल झिलमिल तारों ने भी पायल की झनकार सुनी थी,
                       चली गई कल छम छम करती, पिया मिलन की रात कहाँ।

          फ़िराक़ के आशिक और महबूब वास्तव में उर्दू शायरी की दुनिया की प्रचलित परम्पराओं और मान्यताओं से बिलकुल अलग दिखते हैं-
                       रात भी, नींद भी, कहानी भी, हाय क्या चीज है जवानी भी,
                       दिल को शोलों से करती है सैराब, जिन्दगी आग भी है पानी भी।

             फ़िराक़ की सौन्दर्य प्रतिमाओं में उनके संयोग-वियोग चित्रण में भारतीय संस्कृति की अन्तर्धारा की शीतलता देखने को मिलती है-
                       मुद्दतें गुजरी तेरी याद भी आई न हमें,
                       और हम भूल गये हों तुझे, ऐसा भी नहीं।

              फ़िराक़ की रुबाइयों में टूटकर मोहब्बत करने वाली हिन्दुस्तानी औरत की ऐसी खूबसूरत तस्वीरें मिलती हैं, जिनकी मिसाल मुश्किल से मिलेगी-
                        निर्मल जल से नहा के रस की निकली पुतली,
                        बालों से अरगचे की खुश्बू लिपटी,
                        सतरंग धुनया की तरह हाथों को उठाये,
                        फैलाती है अलगनी पर गीली साड़ी।

            वास्तव में फ़िराक़ की कविता में दर्शन, विद्वता, लोकतत्व, नाद, व्यजंना, लौकिक सौन्दर्य और मानवीय विशेषताओं का संश्लेष है। ये सब मिलकर फ़िराक़ की महत्ता और उनकी रचनात्मक निजता ही निर्मित करते हैं। वे कविताओं को बहुत उतार-चढ़ाव, प्रवाह, मौन के साथ पढ़ते थे। इस तरह के वाचन में काव्यार्थ निहित होता था। तभी तो वह मुशायरों को लूट लिया करते थे। उनके नाम पर मुश्शायरों में भीड़ उमड़ पड़ती थी और मुशायरा कामयाब हो जाते थे।

           फ़िराक़ की शायरी में सामाजिक क्रांति का चिंतन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनका मानना था कि समाज की रुढ़िवादी परम्पराओं में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूरी है-
              देख वह टूट चला ख्वाबे गरां माजी का।
              करवटें लेती हैं, तारीख बदलता है समाज।

           वास्तव में एक पूरा जीवन दर्शन फ़िराक़ साहब की शायरी में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। यह जीवन दर्शन व्यक्तिगत न होकर व्यापक है। स्वयं फ़िराक़ का कहना है- शायरी केवल व्यक्तिगत भावनाओं के सुन्दर वर्णन का नाम नहीं है बल्कि उन भावनाओं के सुन्दर वर्णन का नाम है, जो व्यक्तिगत होने पर भी सामूहिक हैसियत रखती हैं। इसमें संदेह नहीं कि फ़िराक़ अपनी शायरी में एक नया स्वर, नयी शैली, नवीन भावुकता, एक नई शक्ति अपितु एक नई आशा लेकर आए। फ़िराक़ साहब की शायरी विशेष रूप से उनकी ग़ज़लगोई और रुबाइयों का सुनहरा दौर दूसरे विश्वयुद्ध और देश की आजादी के बाद तक का जमाना है। जिस दौरान उनकी शायरी की रोशनी दूर-दूर तक पहुँची।

           इस महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 28 अगस्त 1896 को हुआ था। पिता गोरख प्रसाद इबरत भी मशहूर शायर थे। प्रारम्भिक शिक्षा यहीं हुई, फिर इलाहाबाद चले गये। 1918 में आईसीएस परीक्षा पास की। इसके बाद आजादी की लड़ाई में भी कूदे थे। 1918-19 में शायरी शुरू कर चुके थे। फिर इलाहाबाद में ही अध्यापन कार्य से जुड़ गये थे।

           फ़िराक़ साहब के कई काव्य-संग्रह हैं। उनकी मशहूर शायरी में गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूहे कायनात, नग्म-ए-साज, गजलिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, शोअला व साज, रंज व कायनात, हजार दास्तान, चिरागाँ, बज्मे जिन्दगी, रंगे शायरी, के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश आधी रात, परछाइयां और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में भी लिखी हैं। सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की भी रचना फ़िराक़ साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियाँ भी लिखी हैं।

         फ़िराक़ साहब को कई सम्मान मिले। पद्म भूषण, 1961 में गुल-ए-नगमा पर साहित्य अकादमी व ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले। उत्तर प्रदेश से भी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1965 में सोवियत रूस से नेहरू पुरस्कार से नवाजा गया।
           3 मार्च 1982 को फ़िराक़ साहब का निधन हो गया। उन्होंने कहा था-
                           ऐ मौत आके हमको खामोश कर गयी तू।
                           सदियों दिलों के अन्दर हम गूंजते रहेंगे।
                                                         
फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लें
 1-
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम,
 उस निगाहे-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम।
 रफ्ता-रफ्ता गैर अपनी ही नजर में हो गये,
 वाह री गफलत तुझे अपना समझ बैठे थे हम।
इन्कलाबे-पैबपै हर गर्दिश्शो-हर दौर में,
इस जमीनों-आसमाँ को क्या समझ बैठे थे हम।
रफ्ता-रफ्ता इश्क मानूसे-जहाँ होता चला,
खुद को तेरे हिज़्र में तनहा समझ बैठे थे हम।
हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ ‘फ़िराक़’,
मेंहबां, नामेहबां, क्या क्या समझ बैठे थे हम।

2-
राज को राज रक्खा होता,
क्या कहना गर ऐसा होता।
दुनिया-दुनिया आलम-आलम,
होता इश्क और तनहा होता।
दरिया-दरिया सहरा-सहरा,
रोता खाक उड़ाता होता।
आज तो दर्दे-हिज्र भी कम है,
आज तो कोई आया होता।
मैं हूँ, दिल है, तनहाई है,
तुम भी जो होते, अच्छा होता।
हम जो तुझे कुछ भूल भी जाते,
दर्दे-मुहब्बत दूना होता।
कुछ तो मुहब्बत करके दिखाती,
कुछ तो जमाना बदला होता।
इससे तो, ऐ जमाने वालो,
सोया होता, खोया होता।
हम भी ‘फ़िराक़’ इन्सान थे आखिर,
तर्के-मुहब्बत से क्या होता।

3-
ये नकहतों की नर्म रवी ये हवा ये रात,
याद आ रहे हैं इश्क को टूटे ताल्लुकात।
मायूसियों की गोद में दम तोड़ता है इश्क,
अब भी कोई बना ले तो बिगड़ी नहीं है बात।
इक उम्र कट गयी है तेरे इन्तिज़ार में,
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात।

हम अहले-इन्तिजार के आहट प कान थे,
ठंडी हवा थी, गम था तेरा, ढल चली थी रात।
क्या नींद आये उसको जिसे जागना न आये,
जो दिन को दिन करे, वो करे रात को भी रात।
उठ बन्दगी से मालिके-तकदीर बन के देख,
क्या वसवसा अजाब का क्या काविशे-नजात।
मुझको तो गम ने फुर्सते-गम भी न दी ‘फ़िराक़’,
दे फुर्सते-हयात न जैसे गमे-हयात।

4-
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे,ऐ जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
मेरी नजरें भी ऐसे काफिरों की जानो-ईमां हैं,
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं।
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में,
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं।
रफीके-जिन्दगी थी अब अनीसे-वक्ते-आखिर है,
तेरा, ऐ मौत, हम ये दूसरा एहसान लेते हैं।
‘फ़िराक़’ अक्सर बदलकर भेस मिलता है कोई काफिर,
कभी हम जान लेते हैं, कभी पहचान लेते हैं।


मिर्जापुर, एफसीआई रोड, पो. झुंगिया बाजार, गोरखपुर - 273013 (उत्तर प्रदेश)
चलभाष: 09415258673

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