काव्य: अंजु लता सिंह

अंजु लता सिंह
वसंत

सुरभित मस्त पवन पुरवाई रे
आई रे...
तन मन नाचें झूम झूमकर
मस्ती छाई रे...
ऐ... ऐ ...ऐ... ऐ ...
वन, उपवन, घर, आंगनआंगन
आई अजब बहार
वासंती ये पवन बहे
गावे मस्त मल्हार
ढेरों खुशियाँ संग में लाई रे
लाई रे..लाई रे ..
तन मन  नाचें झूम झूमकर
मस्ती छाई रे ...
सुरभित मस्त पवन पुरवाई रे...

कोयल कूक रही
अमुवा की डाली पर इतराए
तितली भंवरे फूल फूल पर
इधर उधर मंडरायें
कैसी हरियाली मुस्काई रे
आई रे...
तन मन नाचें झूम झूमकर मस्ती छाई रे ..
सुरभित मस्त पवन पुरवाई रे..

वासंती चूनर ओढ़े ये धरती सजे सजाए
परदेसी बलमा की राह तके
गोरी हरषाये
दिल में हूक उठे शरमाये रे
हाय रे
मन गाए रे...
तन मन नाचें झूम झूमकर मस्ती छाई रे ...
सुरभित मस्त पवन पुरवाई रे...

पीली पगड़ी बांधे सरसों
हिल-हिल हमें बुलायें
टेसू फूल रहे वृंतों पर
नैनों को भरमायें
केसरी झुकी
डाल मुस्काई रे
तन मन  नाचें झूम झूमकर मस्ती छाई रे
सुरभित मस्त पवन पुरवाई रे
आई रे ... आई रे...
तन मन  नाचें झूम झूमकर मस्ती छाई रे ...
ऐ ऐ ऐ ...


सूरज को हमने रात में आते नहीं देखा...

हँसते हैं गुल ए शाख
लुटाने को अपनी आब
उनको सदा बुलबुल को लुभाते हुए देखा
जंगल में भटकते हुए भयभीत हम हुए
भँवरों और तितलियों को मुस्कुराते हुए देखा
चंदा की ओट से ही झाँकती है चांदनी-
उतरे जमीं पर चांद किसी ने नहीं देखा।
सूरज को हमने रात में आते नहीं
देखा...

मीठे मधुर से बोल छुपे उसके गानों में
कोयल की कूक से घुले हैं रंग
कानों में
बगिया में रंगरेज को आते नहीं देखा
सूरज को हमने रात में
आते नहीं देखा...

मात पिता का सदा करती है जो सम्मान
तारीफ के काबिल बड़ी होती है वो संतान
चुप रहके ही नजरों से बतियाते उन्हें  देखा
सूरज को हमने रात में
आते नहीं देखा...

दहलीज के दीपक से उजाला हुआ दुगुना
महफिल में लौ को आग लगाते हुए देखा
सूरज को हमने रात में
आते नहीं देखा...

मृत हो गए जज्बात जुबाँ तेज सी छुरी
हांकते हरदम ही जो डींगे बड़ी बड़ी
उस बेवफा सनम को निभाते नहीं देखा
सूरज को हमने रात में
आते नहीं देखा ...


रुखसत

जंग जीवन की लड़ी ना
वीर भी कहला ना पाए
कितने माँ के लाल बेबस
सो गए कुछ कह ना पाए

रखवाली का भार था
कांधों पे उनके देश का
करते रहे निर्मूल प्रसरित
द्वेष और विद्वेष का

हो गए रुखसत हमीं से
जो हमारी शान थे
काल भी ना जान पाया
वो तो बस मेहमान थे

पा गए अमरत्व सारे
भू पर शहीदी हो गए
आसमाँ के फरिश्ते बन
मन में उम्मीदी बो गए

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।