पुस्तक समीक्षा: आदर्श और व्यवहारिक जीवन के यथार्थ के बीच प्रेम की पड़ताल

अमरेन्द्र सुमन

कविता संग्रह: कई-कई बार होता है प्रेम।
रचनाकार: अशोक सिंह
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर पृष्ठ संख्या: 152
प्रकाशन वर्ष: 2018
मूल्य: ₹ 150

जल, जंगल, जमीन से जुड़े हाशिये के जनमुद्दों और झारखण्ड के आदिवासी समुदाय के संघर्ष, शोषण व आंदोलनो के साथ-साथ उसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक मान्यताओं, परंपराओं तथा लोक साहित्य एवं लोक कलाओं पर लगभग पिछले दो-ढाई दशकों से शोध पत्रकारिता करने वाले युवा लेखक पत्रकार अशोक सिंह आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता एवं सामाजिक कार्यों के अलावा साहित्य की अलग-अलग विधाओं के माध्यम से न सिर्फ झारखण्ड बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाले अशोक सिंह मूलतः मन-मिजाज से कवि हैं और वह भी राष्ट्रीय फलक पर एक सफल युवा कवि। समाज की मुख्यधारा से कटकर जंगल, नदी पहाड़, झरना, खेत-खलिहान व सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे आदिवासी समुदायों के बीच रहकर, उनकी दिनचर्या में खुद को शामिल करते हुए, अपने जीवन के कई साल के बाद फक्कड़पन में गुजार देने वाले कवि अशोक सिंह ने जहाँ एक ओर आदिवासी जीवन व संस्कृति को करीब से देखा, सुना-गुना, वहीं दूसरी ओर उसके संघर्ष और आंदोलनों में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से शामिल होकर उसकी आवाज को भी बुलंद करता रहा। इस बात को उनके पिछले दो दशक की स्वतंत्र पत्रकारिता और भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली से प्रकाशित संताली कविताओं के हिन्दी अनुवाद की अनुदित, चर्चित व विवादास्पद पुस्तक ‘नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द' से जोड़कर देखा-परखा जा सकता है।

अमरेन्द्र सुमन
अपने अव्यवस्थित जीवन की अस्थिरता, संघर्ष, उपेक्षा और आर्थिक कठिनाईयों के साथ-साथ सामाजिक, पारिवारिक उलाहनाओं के बीच रहकर भी स्वाभिमान को बचाए रखते हुए, जिस हिम्मत, हौसले और नाउम्मीदी में भी उम्मीदों के साथ उन्होंने साहित्य की दूरियाँ नापी और एक-एक कदम चलते हुए अपनी मुकम्मल पहचान बनाए वह महत्वपूर्ण ही नहीं, प्रशंसनीय भी है। बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी बाहरी दबाव व झिझक के, पूरी सच्चाई, ईमानदारी व दमखम के साथ अपनी बातों को रखना अशोक सिंह की खासियत रही है। वे न तो खुद छिपना जानते हैं और न ही अपना कुछ छुपाना। उनमंे न तो अपने बुरे होने या कहे जाने का भय व संकोच दिखता है और न ही अपने किसी किये हुए अच्छे-बुरे कार्यों को लेकर आत्ममुग्धता और आत्मग्लानी ही। वे प्रेम भी करते हैं तो छुपकर नहीं करते। किसी के प्रति समर्पित भी होते हैं, तो समर्पण के हद तक समर्पित। विरोध में बातें रखनी होती है, तो उसके परिणाम की चिन्ता नहीं करते। विवादों में रहकर भी उन्होंने कभी किसी से विवाद नहीं किया, बल्कि जो कुछ देखा-सुना, जीया-भोगा, बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी शब्दों के आवरण के सीधा-सीधा कह दिया। अभी-अभी हाल में आए उनके पहले कविता संग्रह 'कई-कई बार होता है प्रेम' से गुजरते हुए कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है।

यह कविता संग्रह सिर्फ अशोक सिंह के जीवन और प्रेम का आख्यान मात्र नहीं है। यह संग्रह उनकी जीवटता, प्रगतिशीलता व अध्ययनशीलता का एक सामूहिक कोलाज भी है, जिसमें उनका जीवन भी दिखता है और सामाजिक सरोकार भी। समकालीन कविता के इस दौर में उनकी कविताएँ आम आदमी के भीतर पूरी सहजता के साथ उतरने में सक्षम है। कोई नारेबाजी, लफफाजी और बड़बोलापन नहीं। जितनी सरल, उतनी ही सहज और तरल भी। यह अलग बात है कि आज हिन्दी साहित्य में विशेषकर समकालीन हिन्दी कविता में जो स्थान आज उन्हें मिलना चाहिए वह उन्हें नहीं मिल पाया है। जबकि देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं जैसे- वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथादेश, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, इन्द्रप्रस्थ भारती, साहित्य अमृत, आजकल, अक्षर पर्व, पाखी, जनपथ, बसुधा, दोआबा, कादम्बिनी, परिंदे, विपाशा, मधुमती एवं युद्धरत आम आदमी आदि में प्रमुखता से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। साथ ही साथ विभिन्न भारतीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं में उनकी कई कविताओं के अनुवाद भी हो चुके हैं जो इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविताओं का एक बड़ा पाठक वर्ग भी है।

अब बात जहाँ तक उनके कविता संग्रह 'कई-कई बार होता है प्रेम' की है, तो बोधि प्रकाशन से आए इस संग्रह में कवि की कुल 68 कविताएँ हैं। तमाम कविताएँ जीवन की अलग-अलग घटनाओं, स्मृतियों, संवेदनाओं व जीवानुभवों के साथ-साथ विविध विचारों से उत्प्रेरित एवं अनुप्राणित हैं। उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर टूटन-घुटन, सफलता-असफलता, विश्वास और समर्पण, आसक्ति-विरक्ति और हार कर जीतने व जीत कर हारने की मार्मिक पीड़ा है। वहीं दूसरी ओर घर-परिवार, आस-पड़ोस के साथ-साथ माँ, पिता, बहनें, दादी, औरतें, लड़कियाँ, दोस्त, दुश्मन, बिछुड़े हुए लोग, टूटा हुआ आदमी, बाजार, महंगाई, अकाल, अपने गाँव की पुस्तैनी जमीन, होस्टल के लड़के, काली लड़की, अकेली औरत, से लेकर सभागार में बुद्धिजीवी और छोटे लोग तक और तुम मानो न मानो तुम्हारी आँखों से दुनिया देखना चाहता था से लेकर अपनी तमाम कमजोरियाँ स्वीकारने तक की ईमानदार अभिव्यक्ति है।

इस कविता संग्रह में माँ को समर्पित उनकी पहली कविता 'माँ का ताबीज' में जहाँ एक ओर अंधविश्वास के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर है, वहीं दूसरी ओर माँ के प्रति विश्वास और आस्था भी है। वह नहीं जानता माँ के दिये हुए ताबीज का गणित और उसके पीछे का रहस्य। वह जानता है तो बस इतना कि माँ के दिये हुए ताबीज में उसका विश्वास बंधा है। उसकी आस्था जुड़ी है। कविता के अंत की ये पंक्तियाँ 'माँ मैं ताबीज नहीं/तुम्हारा विश्वास पहन रहा हूँ माँ/पहन रहा हूँ तुम्हारा विश्वास। इसी तरह 'बहनें और घर' में कवि ने एक घर में बहनों की उपस्थिति और उसके महत्व के साथ-साथ, पूरे घर के भूगोल, अर्थशास्त्र व समाजशास्त्र में उनकी भूमिका को भी अपने शब्दों में अभिव्यक्त करता है। कविता की इन पंक्तियों को गौर से देखें- बहनें गीली लकड़ियों से भी बना लेती हैं घर की रसोई/वे अंधेरे में भी टटोल लेती हैं माचिस की डिबिया/वे जानती हैं तेज हवाओं से बचाना संझोती का दीया। अंतिम पंक्तियाँ कुछ प्रकार हैं- वे होती हैं/माँ के हाथ/पिता की आँखें/घर की ताजा हवा/घर से विदा होने तक नहीं जानतीं वे/कि उन्हींे से यह घर था। कवि की सोच जितनी बड़ी और निराली है, कहने का अंदाज भी उतना ही प्रभावकारी व आकर्षक है। अपनी अगली कविता 'मुझे ईश्वर नहीं तुम्हारा कंधा चाहिए' में कवि ने ईश्वर के अस्तित्व की बातें तो स्वीकारी हैं, किन्तु उसने यह भी कहा है कि उसने ईश्वर को कभी नहीं देखा। कवि कहता है-'मुझे सिर झुकाने के लिये ईश्वर नहीं/सिर टिकाने के लिये/एक कंधा चाहिए/और वो ईश्वर नहीं तुम दे सकती हो। जीवन के झंझावातों से जुझते हुए जब-जब भी कवि मानसिक, शारीरिक पीड़ा व थकान का अनुभव करता है, तब-तब ईश्वर को नहीं किसी बहुत अपनों और उसके कंधे को याद करता है। इसी तरह 'तुम मानो न मानो' में कवि पूरी सच्चाई से इस बात को रखता है कि-‘‘तुमसे प्रेम करना है/यह सोचकर नहीं किया था तुमसे प्रेम/सुसताने को तलाशा जब-जब कोई छाँव/चिलचिलाती धूप में तन्हा चलते/तब-तब पेड़ की घनी छाँव सी मिली तुम। कविता की इन पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह सिर्फ प्रेम के लिये, किसी से प्रेम नहीं करना चाहता। प्रेम वह इसलिये करना चाहता है कि व्यवहारिक जीवन में उसकी ऊर्जा पाकर एक साफ-सुथरी, सुंदर व सफल जीवन जी सके। वह कहता है-‘‘जब कभी भी जरुरत पड़ी किसी सहारे की/वहाँ सिर्फ तुम्हारे ही हाथ दिखे। ये वही हाथ थे जो कभी कवि के निराश मन को अपनी संवेदनाओं के सहारे थामे खड़े थे। कविता की कुछ अगली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-‘थका हारा जब-जब लड़खड़ाया/लरजते हुए चाहा टिकाना कहीं अपना सिर/वहीं पाया तुम्हारा कंधा।' प्रेम में विश्वास की जड़ें कितनी गहरी होनी चाहिए, कविता की उपरोक्त पंक्तियों से गुजरते हुए सहजता से समझा जा सकता है। कवि जीवन में प्रेम को कमजोरी नहीं, ताकत के रुप में पाना चाहता है। यह अलग बात है कि कहीं-कहीं प्रेम में पड़क रवह कमजोर भी हो जाता है। प्रेम को सकारात्मक और जीवन की उर्जा के रुप में देखने वाला कवि कहता है- "मैं तुमसे इसलिये प्रेम नहीं करता/ कि तुम्हारे प्रेम में पड़कर अंधा हो जाउँ/बल्कि इसलिये करता हूँ तुमसे प्रेम/ कि मै। तुम्हारी आँखें से दुनिया देख सकूँ। इसी कविता के अंत में कवि फिर कहता है- "तुमने ही यह कहकर पढ़ाया प्रेम का सच्चा पाठ/कि प्राप्ति प्रेम की समाप्ति है/और सच कहूँ तो मैं तुम्हें पाकर/तुम्हें खोना नहीं चाहता। कवि भावनात्मक रुप से इस कविता में खुद को काफी अंदर तक जुड़ा पाता है। उसके इरादे नेक हैं लेकिन होता कुछ और ही है। इसी तरह की अपनी एक कविता 'तुम्हारी आँखों से दुनिया देखना चाहता था' में कवि कहता है-"मैं चाहता था/तुम मेरी ताकत बनो/पर अफसोस तूम मेरी कमजोरी बनकर/अक्सर कमजोर करती रही मुझे/और मैं हारता रहा जिन्दगी की हरेक वह जंग/जिसे तुम्हारे साथ मिलकर कभी जीतने की सोचा था। जबकि कविता 'एक दुश्मन दोस्त के साथ रहते हुए' में वह ठीक उसका उल्टा पाता है। कवि कहना चाहता है कि जिन यातनाओं से तंग आकर वह कभी न लौटकर वापस आने की प्रतीज्ञा लेकर निकल पड़ा था, थक-हारकर फिर उसे वहीं आना पड़ा। एक ऐसे यातनागृह में उसे लौट आना पड़ा जहाँ न जेल की सलाखें हैं, और न ही उँची-उँची दीवारें। न ही बड़े-बडे दरवाजे हैं और न ही दरवाजे पर खड़े मुश्तैद पहरेदार। कवि की स्वतंत्रता यहाँ कैद होकर रह जाती है। पंख तो है, किन्तु पंख फड़फड़ाकर उड़ने की आजादी उससे छीन ली गई है। लाख प्रयास के बावजूद वह प्रेम के पिंजरे से आजाद नहीं हो पा रहा। इस कविता में कवि का दर्द कुछ इस कदर छलक पड़ा है। कवि कहता है--"एक भरी पूरी देह है/जिसकी गुफाओं में मैं कैद हूँ बारह वर्षों से/एक जोड़ी बड़ी-बड़ी आँखें हैं/धोखे और फरेब से भरी हुई/जिसमें नजरबंद हूँ सन उन्नीस सौ चैरानवे से"।

प्रेम के अलग-अलग रुप हैं, अलग-अलग रंग। अलग-अलग अनुभव, अलग-अलग विचार हैं प्रेम को लेकर। अलग-अलग मान्यताएँ, धारणाएँ हंै प्रेम की। जितने मुँह उतनी बातें है प्रेम के बारे में। कोई कहता है प्रेम जीवन में सिर्फ और सिर्फ एक बार होता ह,ै तो कोई इसे मानने से इनकार करता है। आदर्श और व्यवाहरिक जीवन के बीच प्रेम के यर्थाथ को जानने-समझने की कोशिश करता कवि अपने अनुभवों से कहता है- "कई कई बार होता है प्रेम"। पुस्तक के नामकरण से जुडे़ इस शीर्षक कविता में कवि कहता है-‘‘किसने कहा इतना बड़ा झूठ/कि प्रेम जीवन में एक बार होता है/सच तो यह है/जाने-अनजाने/कई-कई बार होता है जीवन में प्रेम/कई कई बार होता है/यह सब हमने जाना एक स्त्री के प्रेम में पड़कर।" अंतिम पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं-‘‘वैसे भी इस दौर में/प्रेम में धोखा खाने/और दूबारा फिर कभी किसी से/प्रेम न करने की घोषणाओं के बावजूद/जब हम तलाशते हैं दुख के क्षणों में किसी का कंधा/तब क्या सचमुच हम कह सकते हैं पूरे विश्वास से/इस अविश्वास भरे दौर में पूरी ईमानदारी से/कि प्रेम जीवन मंे सिर्फ व सिर्फ/एक बार होता है/कह सकते हैं दिल पर हाथ रखकर पूरी ईमानदारी से' ? कितनी साफगोई और ईमानदारी से यह बात सामने आयी है कि एक बार किसी से प्रेम करने व उससे धोखा खाने के बाद व्यक्ति अनन्तकाल के लिये कोमा में नहीं चला जाता बल्कि प्रेम पाने की लालसा आदमी के मन में हमेशा बनी रहती है। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। व्यवाहरिक जीवन में देखें तो बचपन से लेकर किशोरवस्था और किशोरवस्था से लेकर युवा व प्रौढ़ावस्था तक जाने-अनजाने जीवन में कई-कई मोड़ और कई-कई पड़ाव आते हैं। कई लोग मिलते-बिछुड़ते हैं और उनकी स्मृतियाँ स्वभाविक रुप से जीवन से जुड़ती चली जाती हैं।

कविता 'बिछुड़े हुए लोग' में कवि महसूस करता है कि बिछुड़े हुए लोगों की तादाद लम्बी होती है किन्तु कुछ चेहरे ऐसे होतें हैं, जिसकी स्मृतियाँ जीवन में ऐसे घुलमिल जाती हैं जिन्हें भूल पाना काफी कठिन होता है। अपनी एक कविता 'कभी न आने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में' कवि कहता है-"कितनी अजीब बात है/इतने वर्षों बाद भी/हम करते हैं इन्तजार अक्सर/प्लेटफाॅर्म पर बैठ एक ऐसी ट्रेन का/जिसका नहीं होता है कभी आना/पर इन अजीबोगरीब बातों में भी होती है एक खास बात/कि कभी न आने वाली/उस ट्रेन की प्रतीक्षा की खुशबू से ही/बंधी होती है किसी की आती-जाती सांस। इसी कड़ी में "तुम्हारे साथ रहते हुए हमने जाना" में कवि प्रेम में पड़कर बहुत कुछ खोने के साथ-साथ बहुत कुछ पाने की भी ईमानदार स्वीकारोक्ति सबके सामने करता है। जंगल, पहाड़ का दुख, नदियों की खामोशी, उसकी विवशता, औरतों का श्रम, उसका गीत-संगीत, जानवरों को चराते उसके बच्चों के निश्छल स्वभाव, उसकी जिज्ञासा, उसकी भूख-गरीबी, उसका शोषण, उसका संघर्ष और उसके इतिहास के साथ हुए छल-प्रपंच को भी कवि उसके साथ रहते हुए ही समझ पाया। इतना ही नहीं कुल्हाड़ियों के भयानक सपने से जंगल की चीख, कुहाते पहाड़ व अंधेरे में मुँह ढांपकर रोती नदियों के अकल्पनीय दृश्य ने कवि को आदिवासी चेतना का एक सजग कवि बनाया। जिसकी वजह से कवि आदिवासी जीवन और संस्कृति के साथ-साथ उसकी चीजों को भी आदिवासी-दृष्टि से देखना सीखा। तभी तो कवि तन के गोरे व मन के काले फरेबी-परदेशियों की दोहरी नीति, गंदी चाल, गिरगिट सा स्वभाव, शोषण, दमन व उनके अत्याचार के विरुद्ध उसके सामूहिक संघर्ष में उसके साथ जा खड़ा हुआ और 'उठो काली औरतों गाओ कोई गीत' अपनी कविता में कवि कह उठा- "उठो काली औरतों/देखो बुला रहा मनमीत/इस काली अंधेरी रात में गाओ कोई गीत/घर उजड़ा, जंगल उजड़े/उजड़े खेत-खलिहान/उठो जागो कदम बढ़ाओ/अबकी होगी तुम्हारी जीत/इस काली अंधेरी रात में/मिलकर गाओ कोई गीत"। भरोसे की जिन्दगी, दान-दया की रोटी और दिखावटी सहानुभूति से मन व शरीर को लूटने वालों के खिलाफ कवि आदिवासी औरतों को खबरदार करना चाहता है। आदिवासी स्त्रियों को देना चाहता है हौसलों का पंख ताकि संगठित होकर सामूहिक रूप से वह प्रतिरोध कर सके।

जिस वातावरण, जिस परिवेश और जिस कालखंड में कवि जन्मा, पला-बढ़ा, जवान हुआ, उस परिवेश में रहकर कवि ने कई-कई सपनों को अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते हुए देखा है। उसने देखा है जंगल पहाड़ों को उजड़ते, भूख और पलायन से आदिवासी समाज को अपनी जमीन से उखड़ते, जिसमें कहीं काली लड़की के सपनों में छलता गोरा रंग है, तो कहीं उसके भीतर पसरी काली अंधेरी रात का सूनापन। वह कहता है-गोरा लड़का नहीं मिलना चाहता है काली जड़की से/और काली लड़की डरती है रात के अंधेरे में गोरे लड़के संग मिलने से। इतना ही नहीं, काली लड़की के कालेपन से जब कोई रिश्ता टूट जाता है तब टूट जाती है अंदर से काली लड़की। काली लड़की जानती है, गोरापन उसके जीवन का स्थायी समाधान नहीं है। उसके लिये वही काला जीवनपर्यन्त उसके साथ होगा। इस प्रकार 'काली लड़की' शीर्षक कविता में कवि ने काली लड़की के मन की बात को बड़ी सूक्ष्मता से टटोलने का प्रयास किया है।

इस संग्रह की कविताएँ अलग-अलग रंग, अलग-अलग मिजाज की हैं। अपने शहर की एक चर्चित कवयित्री के पलायन पर लिखी गई कविता ‘एक सामूहिक शोकगीत' एक विशेष प्रकार की कविता है, जिसका अपना कुछ अलग ही मिजाज है। कवि जीवन की जिन वास्तविकताओं से रुबरु होना चाहता था, वहाँ उसे नफरत, जिल्लत व घृणा के अलावा कुछ भी न मिला। जिस संघर्ष में शामिल होकर कवि अपनी कविता और उससे जुड़े पात्र को एक मुकाम तक पहुँचाना चाहता था, उसे स्थापित करना चाहता था, उसकी आवाज को बुलंद करना चाहता था, उसी पात्र ने कवि के सपनों को, उसके विश्वास को, उसकी आस्था को, उसकी उम्मीदों-आकांक्षाओं को, सस्ती लोकप्रियता की अंधी दौड़ में अपने पैरों तले रौंद दिया, जिसके परिणामस्वरूप संभवतः कवि की तार-तार हुई आत्मा से निकली होगी यह कविता, जिसमें कमोबेश उसकी आत्मकथात्मक व्यथा ही सुनाई पड़ती है। लेकिन इस कविता के मूल में जो एक महत्वपूर्ण बात है, वह है एक कवि-लेखक के लेखकीय व सामाजिक सरोकार में आया भटकाव। जिसको लेकर वह अपनी इस कविता में सवाल उठाता है। यह कविता अपने कई अर्थों में बहुत ही महत्वपूर्ण और अलग से चर्चा के योग्य है। एक कवयित्री के लेखन और उसके सामाजिक सरोकार के बीच बढ़ती खाई और उससे जुड़े विरोधाभासों को कवि देखने-दिखाने की कोशिश करता है। उसकी कविता से ही विभिन्न पात्रों को उठाकर उसके लेखकीय सरोकार में आए भटकाव की सच्चाईयों को परत-दर-परत खोलकर रख देती है यह कविता। कविता लम्बी जरुर है पर बोझिल नहीं। जिस उम्मीद, उर्जा व विश्वास के साथ उसने उसका दामन थामा और एक अनाम सी बस्ती की टूटी-बिखरी झोपड़ी से हाथ पकड़कर बाहरी दुनिया से रुबरु कराया, उसके कंधे से कंधे मिलाकर संघर्ष किया, उसके जीवन को एक नया अर्थ दिया, उसे जमीन से उठाकर आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाया, उसी ने अपने छोटे-छोटे स्वार्थ की खातिर उसके विश्वास का गला घोंट दिया। कवि कहता है- "पलायन पर लिखते-लिखते/हमारे शहर की एक चर्चित कवियत्री खुद/अपने क्षेत्र से पलायन कर गई/और बोलते-बोलते व्यवस्था के खिलाफ/घुल-मिल गई व्यवस्था में। चीख-चीख कर जिस दिल्ली को जिन्दा दफन होते लोगों का श्मशान व सोने की मायावी लंका कहकर कोसती रही, उसी दिल्ली से वह अपना दिल लगा बैठी। अब दिल्ली उसके लिये ठीक उसी तरह हो चुका ह,ै जैसे किसी कस्बे का बाजार हो। जब तक दूर रही दिल्ली से, दिल्ली को गरियाती रही, धिक्कारती रही दिल्ली वालों को। जिस तबके, जिस वर्ग, जिस व्यवस्था की जमीन पर खड़ी हो, दिखाती रही अपनी उपस्थिति का दमखम, एक दिन उसी व्यवस्था की रंगीनियों में खो गई। यहाँ तक कि वह अपने उस दढ़ियल दोस्त को भी भूल चुकी, जो कभी अपना सब कुछ भूलकर, जंगल-पहाड़, हाट-बाजार से लेकर नगर महानगर तक उसकी परछांई बना कदम-कदम पर उसका साथ देता रहा। जिसने दुनियादारी की पेंचिदगियों से खबरदार करते हुए, व्यवस्था से लड़ने का हौसला दिया, जुबान और कलम को शब्द दिया, डायन के नाम पर पिटती पकलु बुढ़िया और सजोनी किस्कु की चीख को सुनना-गुनना सिखाया। नदी में स्त्री और स्त्री में नदी को, पेड़ में आदमी और आदमी में पेड़ को देखना सिखाया, वह अब सस्ती लोकप्रियता के मोहजाल में फँसकर बड़े-बड़े सभा-सेमिनारों और पुरस्कार, सम्मान की आदी हो चुकी है। उसकी चर्चाओं में अब बड़ी-बड़ी नामचीन हस्तियाँ, ओहदे वाले लोग ही अक्सर आते हैं। कविता की इन पंक्तियों को देखें-अब उसे पता नहीं है/अपने शहर से काठीकुण्ड, शिकारीपाड़ा/और रायकिनारी की ओर/जाने वाली गाड़ी का नाम और समय/ड्राईवर, कंडक्टर, खलासी के चेहरे और नाम/तो वह कब का भूल चुकी है/पर वह बता सकती है ठीक-ठीक/दिल्ली की ओर जाने वाली/गाडियों के नाम और समय। कवि कहता है-"यह उसका विकास नही तो और क्या है/कि वह अपने शहर और कस्बों से ज्यादा/अब दिल्ली को जानती है।

यूँ तो इस काव्य संग्रह की अधिकतर कविताएँ प्रेम और कवि की जीवन के आसपास घूमती हैं लेकिन प्रेम और व्यक्तिगत आशा-निराशा, कुंठा से अलग घर-परिवार और सामाजिक सरोकार से जुड़ी कविताएँ भी इसमें देखने को मिलती हैं, जिसमें उँच-नीच, अमीर-गरीब, गोरे-काले, सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों और अपने समय की विडंबनाओं पर भी तीखा प्रहार करती नजर आती हैं। कुछ कविताओं की बानगी देखिये। अपनी एक कविता बाजार से बचकर कहाँ भागूँगा में कवि कहता है-"बाजार कितना बड़ा है/पर कितना कम है मेरे लिये/जबकि बाजार के विज्ञापनों से पटी है/मेरे घर की बाहरी-भीतरी दीवारें/भीतर से कितना डरा होता हूँ/जब धरता हूँ पैर किसी चकमक दूकान पर"। छोटे लोग कविता में कवि कहता है-"छोटे लोग बसाते हैं/बड़े-बड़े शहर/और खुद होते जाते हैं शहर से दूर/वे अक्सर डरते हैं बड़े लोगों से/लेकिन जब वे डरना छोड़ देते हैं/तो डरने लगते हैं उनसे बड़े-बड़े लोग। इसी श्रेणी की एक और कविता 'एक सभागार में बुद्धिजीवी' में कवि कहता है-"वहाँ जंगल नहीं था/पर मौजूद था वहाँ जंगल का हरापन/कोई पुल नहीं था/पर पुल की तरह ही दिख रहा था कुछ/घर की तरह ही कुछ बन रहा था/पर घर नहीं थे वहाँ/भूख थी मगर रोटियाँ नहीं/सिर्फ शब्द थे वाक्पटुता थी"। इसी तरह 'कोई तो है सुनील भाई कविता में' कवि कहता है-"कोई तो है सुनील भाई/ जो हमेें धकिया रहा है/हमारी जेब का हलकापन भांपते हुए/कोई तो है/जो हमारी देशज चीजों को/बाजारु रुपांतरण कर/विदेशी लेवल के साथ/बेच रहा है हमारे ही बीच/और हमारी चीजें/हमारी ही पहुँच से दूर/बाजारों में पहुँचकर/हमारा ही मुँह चिढ़ा रही हैं"।

गौरतलब है कि संग्रह की ऐसी कविताओं में कवि का सामाजिक सरोकार तो दिखता ही है, उसकी जनपक्षधरता भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यह चूप रहने का वक्त नहीं है कविता में कवि का प्रतिरोध देखिये-"यह चूप रहने का वक्त नहीं है/बोलो, और दहाड़ते आतंक के बीच फटकारकर बोलो/बोलो कि चाहे बोलने में जितना भी विरोध सहना पड़े/मगर बोलो और बार-बार बोलो/बोलो कि अच्छे दिन आने में/और अब कितने बरस लगेंगे ?/इतना बोलो, इतना बोलो/ कि सामने वाला चुप्पी तोड़कर बोले/कि बहुत बोलते हो तुम। जब भूख पर चर्चा होगी कविता में कवि की पक्षधरता देखिये-"जब भूख पर चर्चा होगी/तब रोटी का जिक्र आएगा ही/अघाए लोगों का तर्क है/कि रोटी पर बहस करना/रोटी की राजनीति करना है/अगर यह सच है/तो मैं ऐसी राजनीति के पक्ष में हूँ/अब देखना है हमारे पक्ष में कौन-कौन है"।

कुल मिलाकर अशोक सिंह के इस संग्रह से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि इस संग्रह में प्रेम कविताओं की बहुलता तो है लेकिन प्रेम से उपर उठकर सामाजिक सरोकार से जुड़ी कविताएँ भी प्रयाप्त हैं, जो अपनी सरलता, सहजता में पठनीय व संप्रेषणीय है। कितना मुश्किल है, होस्टल के लड़के, अकेली औरत, माफ करना बाबू, अच्छे दोस्त, टूटा हुआ आदमी, पेड़, उमो ंिसंह के ढोलक, अब नहीं दूँगा तुम्हारे पैरों को कंघा, बुसी सोरेन के लिये, तब आउँगा मैं तुम्हारे पास, हमारे जाने के बाद, कुछ न कुछ बचा रह जाउँगा और मेरे शब्दों के बीच मुझे ढूँढ़ना जैसी कविताएँ संग्रह की महत्वपूर्ण कविताएँ हैं, जिसमें कवि की संवेदना का विस्तार दिखाई देता है। लेकिन एक बड़ी बात महाकवि सूरदास के शब्दो में कहें तो- "मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै, जैसे जहाज को उड़ी पंछी, पुनः जहाज पर आवै"। सचमुच प्रेम और विद्रोह में रचा-बसा कवि संघर्षों में थक-हार कर बार-बार प्रेम की ओर लौटता है और प्रेम पाना चाहता है।

कविता संग्रह में 'पीले पड़ते प्रेम पत्र' से कवि अपनी लेखनी को विराम देता है। वह कहता है-‘‘जैसे-जैसे उधर/पीले पड़ते जा रहे हैं/तुम्हारे पास रखे मेरे प्रेम पत्र/वैसे-वैसे इधर/आने लगी है मेरे बालों में सफेदी/जैसे-जैसे उधर/धुंधली पड़ती जा रही है उसकी लिखावट/वैसे-वैसे इधर/धुंधलाने लगी हैं मेरी स्मृतियाँ/जैसे-जैसे उधर/टूटने लगे हैं उसके तह/वैसे-वैसे इधर/टूटने लगा हूँ अंदर से मैं भी.../जब तक वो बचे रहेंगे तुम्हारे पास/शायद तब तक/मैं भी बचा रहूँ इस धरती पर! वैसे अशोक सिंह की प्रेम कविताओं में कहीं-कहीं भाव और भाषा का अतिक्रमण भी दिखाई पड़ता है लेकिन सुखद बात यह है कि उनकी अधिकतर प्रेम कविताएँ जितनी सरल व सहज हैं उसमें प्रेम की कोमलता भी उतनी ही कोमल है। वास्तव में यह कविता संग्रह उन पाठकों को सबसे अधिक रोचक व उपयोगी लगेगा जो प्रेम में लहुलूहान हुए हैं, बावजूद प्रेम करने से नहीं चुकते! जिन्हें प्रेम के अलग-अलग इम्तिहान से कई-कई बार गुजरना पड़ा है।

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