व्यंग्य: एक नया तत्व

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

हम दर्शन को ‘फाकालॉजी’ भी कहते हैं पर मैं फाक नहीं रहा हूँ। सच कह रहा हूँ। हमारे प्राचीन ग्रंथों में पंच-तत्वों को बख़ाना गया है। पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल और वायु। ये असार संसार के सार हैं इसलिए तत्व हैं। मैंने एक और ऐसे ही तत्व की खोज की है।

संसार में सार नहीं है यह बात चमचों और बिचौलियों के गले नहीं उतरती है पर हारे हुए नेता, रिटायर्ड कर्मचारी आदि-आदि इस सत्य को स्वीकारते हैं। इसी विश्वास पर मेरी, भगवान रजनीश और महर्षि महेश योगी की दुकानें चल रही हैं। फिर भी, जो लोग विज्ञान से प्रभावित हैं वे तर्क कर सकते हैं कि तत्व एक सौ अठारह हैं, कालान्तर में ज़्यादा भी हो सकते हैं और संसार का सार ये तत्व ही हैं। मैं इनसे भी सहमत हूँ। बुद्धिजीवी कहलाने के लिए हर टोपी में सिर घुसाना पड़ता है। इसलिए मैंने दर्शन, विज्ञान, साहित्य, कला आदि लफड़ों की एक संविद टोपी सिला रखी है। यह टोपी मेरी प्रतिभा का पर्दाफाश करती है। इस टोपी को धारण करके मैं एक फॉर्मूला दे रहा हूँ। दर्शन के छह तत्व बराबर विज्ञान के एक सौ अठारह तत्व। आप जानते हैं न, पानी, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से बना है। पृथ्वी लोहा, तांबा, सोना-चाँदी आदि धातु-अधातु एवं अन्य तत्वों से अटी पड़ी है। इसलिए मेरा फार्मूला सही है। सही क्यों न हो, इसे खोजने में मैंने सौ वर्षों तक सतत् साधना की है। क्या हो सकता है यह तत्व? मैं आपसे इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि मैंने अपना नाम नोबेल पुरस्कार के दावेदारों की सूची में भी खड़ा करवा दिया है।

हो सकता है तत्वों के बारे में आपका ज्ञान सीमित हो। इसलिए मैं तत्वों की सामान्य परिभाषा बता देना चाहता हूँ। ‘तत्व’ वह है जिसमें अन्य कोई पदार्थ नहीं निकले। वह लोहा है तो तोड़ने-मरोड़ने पर भी लोहा ही रहे, दस-बीस हज़ार रुपये दे कर सोना न हो जाए। वैसे तत्व की बात भारतवासियों के गले उतरेगी नहीं। अपने यहाँ इस क़दर मिलावट है कि एक तत्व में दो-तीन अन्य तत्व निकल ही आते हैं। खैर, तत्व वह है जो मिलावट रहित है, अपूर्व और निजी सत्ता वाला है। मैंने ऐसे ही एक ‘तत्व’ की खोज की है।

मैंने जो तत्व खोजा है वह सक्रिय है। लिजलिजा कम है, ठोस ज़्यादा है। भारी है, सस्ता है और हर जगह प्राप्य है। लोग उससे डरते हैं। सरकार उस पर इनाम देती है और थानों की आवर्त सारणी में उसका नाम चस्पा रहता है। यह तत्व है ‘गुण्डा तत्व’। सुप्रसिद्ध ‘गुंडा-तत्व’ शहरों में भारी तादाद में और गाँवों में कम तादाद में पाया जाता है। यह इतना विस्फोटक है कि इसे गहरे नीले रंग की बंद पुलिस गाड़ियों में भर कर इधर से उधर ले जाया जाता है। भय के मारे पुलिस इसे रात में बारह ताले के पिंजरे में और दिन में बेड़ियों में रखती है। प्रारम्भिक अवस्था में यह जेब कतरा, उचक्का, चोर आदि के रूप में मिलता है। जेलों में छँटाई-कुटाई के बाद इसका असली रूप सामने आने लगता है। चार-छ: बार जेल की हवा खाकर यह शुद्ध ‘गुण्डा-तत्व’ बन जाता है। एक सौ चालीस करोड़ जनसंख्या वाले देश भारत में स्वाभाविक ही गुंडा-तत्व के भंडार भरे पड़े हैं।

गुण्डा तत्व में भौतिक और रासायनिक दोनों गुण होते हैं। भौतिक गुण वे होते हैं जिनसे चरित्र में कोई बदलाव नहीं आता। मसलन जनता मारे या कोर्ट दो-चार साल की सजा दे दे, ‘गुण्डा-तत्व’ गुण्डा तत्व ही रहता है। रासायनिक गुण वे होते हैं जो चरित्र बदल देते हैं। जैसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से पानी बनता है वैसे ही गुण्डा तत्व और पैसे के संयोग से नेता बनते हैं। गुंडा, बुद्धि के संयोग से स्मगलर बनता है। गुंडा, धर्म से क्रिया कर आत्म समर्पण करता है। गुण्डा तत्व, पैसे और धर्म से एक साथ क्रिया कर भगवान का आधुनिक अवतार बन जाता है। जिस तरह प्राणवायु ऑक्सीजन के बिना जगत का अस्तित्व नहीं है, वैसे ही गुण्डे के बिना समाज की रचना अधूरी है। वह समाज में रहते हुए भी असामाजिक तत्व कहलाता है। उसमें भीड़भाड़ और निर्जन, दोनों जगहों में अपना कमाल दिखाने की क्षमता होती है। मुझे लगता है गुण्डा तत्व में चुम्बकीय गुण भी होते हैं जो पुलिस को भी प्रभावित करते हैं और दूध से धुले अधिकारियों को बहला फुसलाकर घपले, घोटाले और काण्ड आदि को जन्म देते हैं।

आज के युग में गुण्डा तत्व उपयोगी तत्व है। वह भगवान की महत्ता स्थापित रखता है और लोगों में भय बनाए रखता है। सत्य को झूठ और सफ़ेद झूठ को शपथपूर्वक सच साबित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। गुण्डा तत्व राज्य परिवहन निगम की अटाला गाड़ियों तथा रेलगाड़ी के जीर्ण-शीर्ण डिब्बों का दाह-संस्कार करता है। कमज़ोर पटरियों को उखाड़ फेंकता है। टॉकीजों की खटमलमयी कुर्सियों की चीरफाड़ करता है, दुकानें लूटता है और सुसंस्कृतज्ञ बनने के लिए गुरुजनों को ठोक-बजाकर समझाता है। गुण्डा तत्व भारतीय फिल्मों की आत्मा है। यहाँ इसे ‘विलेन’ कहते हैं। दर्शक उसे देखते हैं और उसका चुम्बकीय प्रभाव ग्रहण करते हैं।

मैं दो अनुरोध कर रहा हूँ। पहला सरकार से कि वह गुण्डा तत्व का विदेशों को निर्यात करे तथा निर्यात की संभावनाएँ जानने के लिए मुझे विश्व भ्रमण पर भेजें। दूसरा अनुरोध समाज से है कि वह गुण्डा तत्व की अमूल्य प्रतिभा को परखे। रहीमदास जी ने कहा है “बड़े बुराई ना करे, बड़े न बोले बोल। रहीमन हीरा कब कहे लाख टको मेरो मोल।” इसलिए हीरा रूपी तत्व को समाज में उचित स्थान मिलना चाहिए और मेरी खोज को एक सामाजिक तत्व की खोज माना जाना चाहिए।
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