उच्च शिक्षा में साहित्य के अध्ययन की चुनौतियाँ

- रचना

असिस्टेंट प्रोफेसर-अंग्रेज़ी विभाग,सी.एम.पी. कॉलेज, प्रयागराज 

साहित्य समाज का दर्पण है और मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की कसौटी भी। साहित्य के पठन-पाठन से व्यक्ति की समाज को देखने की दृष्टि बेहतर हो जाती है और वह मनोरंजन के साथ-साथ साहित्य से जीवन के पाठ भी सीखता है। इस दृष्टिकोण से साहित्य का एक व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। दुनिया में न जाने कितने ऐसे दृष्टांत हैं, जिनसे पता चलता है कि किस तरह एक पुस्तक के पढ़ लेने मात्र से किसी व्यक्ति का समूचा जीवन ही बदल गया। कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक तथा अन्य साहित्यिक विधाओं ने चिरकाल से व्यक्ति को मनोरंजन के साथ-साथ संस्कारित करने का काम भी बखूबी किया है और आज भी साहित्य इस काम को पूरी मुस्तैदी से अंजाम दे रहा है। इसीलिए बच्चे की प्राथमिक शिक्षा के साथ ही उसे साहित्य की शिक्षा भी दी जाती है, लेकिन उच्च शिक्षा जैसी विशेषज्ञता की मांग करने वाली कक्षाओं तक पहुँचकर साहित्य की प्राथमिकता कहीं पीछे जाने लगती है। 

वर्तमान युग भौतिकतावादी युग है और यह ‘ऋणम् कृत्वा घृतम पिवेत्’ के भोगवादी सिद्धांत का पालन करता है, जिसमें मानसिक संतुष्टि का स्थान भौतिक साधनों के पीछे अंधी दौड़ ने ले लिया है। आज की उच्च शिक्षा में कैरियर निर्माण व्यक्ति निर्माण की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा में साहित्य जैसे मानसिक ख़ुराक देने वाले विषयों का अध्ययन आज उतना ज़रूरी नहीं समझा जाता, जितना अन्य विषय। यह तथ्य साहित्य के शिक्षण से जुड़े हम शिक्षकों के लिए चुनौती भी है और सम्भावनाएँ जगाने वाले अवसर उपलब्ध कराने वाला भी क्योंकि आधा भरे गिलास को कुछ लोग आधा खाली समझकर नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं और आधा भरा मानने वाले इसमें भी सकारात्मकता ढूँढ लेते हैं। हमें साहित्य के शिक्षण की वर्तमान दौर की चुनौतियों को सकारात्मक दृष्टि से लेते हुए इसके प्रति युवाओं में अभिरुचि पैदा करने के उपाय करने ही होंगे तभी साहित्य का अध्ययन एक बार पुनः अपने गौरवशाली अतीत की ओर अगसर हो सकेगा।

साहित्य का अध्ययन मूलतः भाषाओं से अंतर्संबंधित होता है। भारत की उच्च शिक्षा में यदि साहित्य के अध्ययन को देखें तो हम पाते हैं कि यह मुख्यतः अंग्रेज़ी एवं हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं में बिखरा हुआ है। उस पर भी भारत देश में पाठकों का एक बड़ा वर्ग अंग्रेज़ी फ़िक्शन को बड़े चाव से पढ़ता है और विदेशी तथा भारतीय लेखकों की अंग्रेज़ी पुस्तकों को बड़े चाव से पढ़ता है। यह भारत का मध्यम और उच्च वर्ग है, जिसके अंतर्गत भारत की 40 करोड़ से अधिक आबादी आ जाती है। इसके द्वारा पढ़े जाने वाले लेखकों में विलियम शेक्सपीयर से लेकर आर्थर कानन डायल, सलमान रुश्दी, सर विद्यासागर नयपाल, नीरद सी. चौधरी, विक्रम सेठ तक न जाने कितने ही नाम लिए जा सकते हैं, जिन्हें भारत में पूरे चाव से ऐसे पाठकों द्वारा पढ़ा और सराहा जाता है। यही स्थिति हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की भी है। प्रेमचंद (हिंदी), जयशंकर प्रसाद(हिंदी), शरत (बंगला), महाश्वेता देवी(बंगला), इस्मत चुगताई (उर्दू), प्रतिभा राय (उड़िया), विजय तेंदुलकर(मराठी), कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (हिंदी तथा गुजराती), सुब्रह्मण्यम भारती (तमिल), जी. शंकर कुरुप (मलयालम), गिरीश कर्नाड (कन्नड़), अमृता प्रीतम (पंजाबी), इन्दिरा गोस्वामी (असमिया) जैसे अनगिनत साहित्यकार अनुवादित कृति के रूप में आकर सभी भाषाओं के पाठकों द्वारा समान रूप से पढ़े और सराहे जाते हैं। अतः भारत में साहित्य की समझ रखने वाले और इन्हें सराहने वाले सुधी पाठकों की कमी नहीं है। ऐसे में साहित्य का अध्ययन करने में अभिरुचि की कमी आश्चर्यजनक है और चिंतनीय भी।

उच्च शिक्षा में साहित्य के अध्ययन के प्रति घटते रुझान के पीछे के कारणों की ओर जब हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं तो कतिपय मान्यताएँ इसके पीछे खड़ी दिखाई देती हैं, जिनमें सबसे बड़ी मान्यता है- साहित्य का रोजगारपरक न होना। यदि हम इस मान्यता की गहराई से पड़ताल करते हैं तो कुछ रोचक निष्कर्ष प्राप्त होते हैं, जो इस मान्यता का कुछ हद तक समर्थन करते हैं तो कुछ हद तक इसके विपक्ष में खड़े नज़र आते हैं। सबसे पहले तो हमें यह देखना होगा कि साहित्य के क्षेत्र में रोजगार की क्या स्थिति है। यदि मोटे तौर पर देखें तो साहित्य में सर्वाधिक रोजगार शिक्षा के क्षेत्र में है। निजी क्षेत्र में नर्सरी तथा माध्यमिक स्कूलों में अंग्रेज़ी के शिक्षकों की सर्वाधिक मांग है और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने वाले शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में आकर्षक पैकेज पर नियुक्त किया जाता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कमोबेश यही स्थिति है। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में अंग्रेज़ी प्राध्यापकों के काफी पद रिक्त हैं क्योंकि इनमें नियुक्ति हेतु अर्ह प्राध्यापक नहीं मिल पा रहे। निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी अंग्रेज़ी में दक्ष अभ्यर्थियों की काफी मांग है क्योंकि वैश्विक स्तर पर सम्पर्क भाषा अंग्रेज़ी होने के कारण यह सेक्टर अंग्रेज़ी में दक्ष अभ्यर्थियों को सदैव वरीयता देता है। जहाँ तक हिन्दी का प्रश्न है तो देश के प्रायः सभी सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में हिन्दी शिक्षकों के पद होते हैं। उच्च शिक्षा में भी यही स्थिति है।

यह सर्वविदित तथ्य है कि देश की प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में सर्वाधिक पद हिन्दी के ही होते हैं। अतः न्यूनतम अर्हता प्राप्त कर कोई भी सुयोग्य अभ्यर्थी शिक्षक बन सकता है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रांतवार ऐसी ही स्थिति है। इसके अतिरिक्त यदि कोई विद्यार्थी स्नातक स्तर पर हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य विषयों का अध्ययन करता है तथा हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी विषय से परास्नातक उपाधि प्राप्त करता है तो उसे देश भर में फैले केन्द्र सरकार के कार्यालयों एवं बैंकों आदि में हिन्दी अनुवादक, हिन्दी अधिकारी, राजभाषा प्रबंधक, सहायक निदेशक राजभाषा, उपनिदेशक राजभाषा, निदेशक राजभाषा आदि पदों पर नियुक्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इन अभ्यर्थियों को विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों अथवा विदेश जाने वाले भारतीय शिष्ट मण्डलों में दुभाषिया या इण्टरप्रेटर के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। भारत सरकार के अंतर्गत भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद प्राथमिक, माध्यमिक स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में सेवारत हिन्दी शिक्षकों को एक नियत समयावधि हेतु अध्यापन कार्य करने तथा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से विदेशों में स्थित विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भेजता है। संस्कृत में अर्ह अभ्यर्थी अपनी योग्यतानुसार प्राथमिक, माध्यमिक स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्त तो हो ही सकते हैं, भारतीय सेना में पण्डित अथवा पुरोहित के रूप में भी इनकी काफी मांग है और विदेशों में कर्मकाण्डों का सम्पादन कराने हेतु संस्कृत में दक्ष अभ्यर्थियों को हाथों हाथ लिया जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी सर्वस्वीकृत तथ्य है कि साहित्य में सुयोग्य विद्यार्थी की लेखन तथा प्रस्तुतीकरण क्षमता दूसरों से बेहतर होती है, इसलिए कार्यालयी क्रियाकलाप जैसे- पत्र लेखन, टिप्पण, प्रारूपण आदि में साहित्य पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर होता है।

आजकल अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थियों हेतु सेक्रटरियल प्रैक्टिस, आफिशियल वर्क, नोटिंग, ड्राफ्टिंग, लेटर राइटिंग, ट्रांसलेशन आदि में जॉब ओरिएण्टेड डिप्लोमा कोर्स तथा हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों हेतु प्रयोजनमूलक हिन्दी, अनुवाद, स्क्रिप्ट लेखन, उद्घोषक, पत्रकारिता आदि में जॉब ओरिएण्टेड डिप्लोमा कोर्स चलाए जा रहे हैं, जिन्हें उत्तीर्ण कर कोई भी अभ्यर्थी सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में सरलतापूर्वक रोजगार प्राप्त कर सकता है। ऐसे अभ्यर्थी इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, टी.वी., रेडियो, फिल्म जगत आदि में भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। यही नहीं, साहित्य के विद्यार्थी मौलिक लेखन के माध्यम से अथवा प्रकाशन जगत में प्रूफ रीडिंग का कार्य करके, अनुवाद के माध्यम से, पत्रकारिता जगत में सम्पादक या पत्रकार बनकर, स्तम्भ लिखकर या इलेक्ट्रानिक मीडिया और टी.वी.-फिल्म जगत अथवा वेब सीरीज़ में कमेंट्रेटर, आर.जे., टी.वी. जाकी, वीडियो जाकी, गीतकार, लेखक आदि की भूमिका में आकर अपनी सर्जनात्मकता को रोजगार से जोड़ सकते हैं।

इन सबके बावजूद साहित्य में नौकरी के अवसर की कमी की बात आंशिक सत्य है। इसका कारण यह कि देश में साहित्य विषय से स्नातक और परास्नातक करने वालों की भारी संख्या है, जिनमें सबको एक साथ रोजगार दे पाना सम्भव नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि साहित्य विषय लेकर अध्ययन करने वाले विद्यार्थी प्रायः अध्ययन के प्रति अधिक गम्भीर नहीं होते क्योंकि उन्हें लगता है कि साहित्य विशेषकर हिन्दी हमारी मातृभाषा होने के कारण इसमें बिना पढ़े उत्तीर्ण हो सकते हैं तथा अन्य साहित्य की भाषाओं में ‘कुछ’ भी लिखकर उत्तीर्ण होने लायक अंक आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। हालांकि यह भी स्थापित तथ्य है कि स्नातक कक्षाओं में सर्वाधिक विद्यार्थी साहित्य में ही सबसे कम अंक लाते हैं या अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। फलतः अयोग्य अथवा लापरवाह विद्यार्थियों का एक बड़ा बोझ साहित्य विषय को झेलना पड़ता है, जो अनुत्तीर्ण होकर या बहुत कम अंकों से उत्तीर्ण होकर साहित्य के विद्यार्थी के रूप में बेरोजगारों की फौज बढ़ाते हैं। अतः साहित्य से जुड़े शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि वे विद्यार्थियों को साहित्य के अध्ययन की गम्भीरता से अवगत कराएँ और उनकी यह गलतफहमी दूर करें कि साहित्य में बिना पढ़े भी उत्तीर्ण हुआ जा सकता है।

बदली हुई सामाजिक परिस्थितियों में साहित्य को भी अपने पाठ्यक्रम में अनुप्रयोगात्मक पक्ष का समावेश करना होगा क्योंकि आज के भौतिकतावादी युग में ‘अर्थ’ का महत्त्व स्वतः स्पष्ट है। अतः साहित्य में ऐसे पक्षों को जोड़ना होगा, जिनसे साहित्य भी बाज़ार की ज़रूरतों के मुताबिक बनकर रोजगार के नए अवसर पैदा कर सके। इसके लिए साहित्य के पाठ्यक्रम को बाज़ार फ्रेंडली बनाना होगा। साहित्य में कॉल सेंटर की भाषा, सॉफ्टवेयर निर्माण, एप निर्माण, फाण्ट डिज़ाइनिंग, प्रस्तुतीकरण क्षमता, व्यक्तित्व विकास जैसे अनेकानेक नए क्षितिजों की खोज करनी होगी, तभी हम साहित्य के क्षेत्र में उपस्थित नयी चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सकेंगे।

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