संत नितानन्द की शिक्षा और स्त्री चिंतन का स्वरूप

अनीश कुमार

ICSSR Research Fellow, पी-एच.डी. शोध छात्र, हिन्दी विभाग
सांची बौद्ध भारतीय- ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, बारला, रायसेन, मध्य प्रदेश
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भारतीय इतिहास के प्रारम्भिक रूप के अध्ययन से ज्ञात होता है कि शुरू से ही नारी भारतीय परिवार का केन्द्र बिन्दु रही है। कहा जाता है कि तत्कालीन समय परिवार मातृसत्तात्मक था। खेती की शुरूआत तथा एक जगह बस्ती बनाकर रहने की शुरूआत भी नारी ने ही की थी, इसलिए सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भ में नारी है, किन्तु कालान्तर में धीरे-धीरे सभी समाजों में सामाजिक व्यवस्था मातृ-सत्तात्मक से पितृसत्तात्मक होती गई और नारी समाज के हाशिए पर चली गई। आदिमकालीन नारी से लेकर वर्तमानकालीन नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत कठिन, बंधनों के जकड़न से युक्त, बर्बर, मर्यादाओं, अत्याचारों और शोषण से युक्त रही है। मध्ययुग के तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक स्थिति का प्रभाव देश की सामाजिक, आर्थिक स्थितियों पर पड़ा। लगातार विदेशी आक्रमणों एवं भिन्न सांस्कृतिक परिवेश के साथ भारत में इस्लाम के आक्रमण ने पहले संघर्ष किए फिर सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए जमीन तैयार की तो इसका प्रभाव स्त्रियों की स्थिति में भी दिखाई दिया। आक्रमणकारियों के वर्चस्व का जितना असर पुरुषों की स्थिति पर दिखायी देता है, स्त्रियों की अधीनस्थ की भूमिका में भी दिखाई दिया। वह उसे क्रमशः अवनति की ओर अग्रसर किए।

मध्यकाल में इन सभी स्थितियों के बीच भारतीय जनमानस में समाज सुधारको व संतों का योगदान सामाजिक सुधारों में मिलता रहा। भक्ति काल में कवियों की नारी विषयक दृष्टिकोण में उसे नागिन व नरक का द्वार कहा है तो दूसरी और अपनी-अपनी आत्मा को नारी रूप में अंकित किया है। एक ओर नारी को मुक्ति मार्ग की बाधा मानकर उसकी उपेक्षा की है तो दूसरी ओर उसके आदर्श रूप की सराहना भी की है। किन्तु अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सामान्य नारी के प्रति इनका दृष्टिकोण उदार नहीं है। लेकिन ये प्रवृत्ति सभी संतों में अलग अलग दिखाई देती है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने कहा* है,
"ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी"

(हालाँकि तुलसीदास के इस पंक्ति को लेकर हिन्दी साहित्य में खासा विवाद है। सबसे ज्यादा विवाद ‘ताड़ना’ शब्द को लेकर है। कुछ लोग इसका अर्थ ‘ताड़न’ अर्थात ‘गंतव्य तक पहुँचाने वाले’ का अर्थ लगते हैं तो कुछ लोग ‘पीटने’ के संदर्भ में इसका अर्थ लेते हैं।)

वहीं दूसरे संत कवि कबीर ने तो नारी की परछाईं से बचने का उपदेश दिया,
"नारी की झाईं परत अंधा होत भुजुंग कबीरा, तिनकी का गति जो नित नारी के संग।"1

अर्थात नारी को स्वतंत्र नहीं देखा जाता था। उसको वश में करने के अनेकों प्रबंध किए गए थे। वहीं संत नितानन्द ने तो नारी को नरक का द्वार बताते हैं। कहते हैं कि नारी ज्ञान, ध्यान, बल और बुद्धि सभी हर लेती है। इसलिए नारी से दूर रहना चाहिए।
"ज्ञान ध्यान बल बुध हरे, करे भक्ति में भंग।
नरक पड़ई जन्म मरै, कामी कामन संग ॥"2

इस काल में धीरे-धीरे बाल-विवाह, पर्दे की बेड़ियाँ तथा अविद्या का अंधकार नारी समाज के लिए अभिशाप बनने लगे। स्वेच्छाचारिता तथा अमानुषिकता की पराकाष्ठा हो गई थी, क्योंकि आत्मज्ञान में निमग्न पुरूषों ने उसे मोक्ष मार्ग की मुख्य बाधा माना। सभ्य पुरूषों ने स्त्री की चर्चा करना वैषियकता का लक्षण माना और विरक्तों ने उसका मुखावलोकन करना निषिद्ध माना। विलासियों, संतों और कवियों ने उसे विलास की वस्तु समझा। गृहस्थों ने माता, भगिनी तथा कन्या के रूप में उसे देवता, धरोहर माना परन्तु किसी ने भी उसे तुल्य, स्वत्व और पराक्रम मानव नहीं माना। उस समय पुरूष ने स्त्री को अपनी भोग्य वस्तु बना लिया था, वह पशु के तुल्य पराधीन हो चुकी थी। मध्यकाल तक आते-आते नारी के उपर्युक्त रूप में पर्याप्त अन्तर आया। अब नारी का वह स्थान डांवाडोल होता गया और कन्या के जन्म को ही अवांछनीय माना जाने लगा। उसे चंचला, छल-छद्म से परिपूर्ण और अविश्वसनीय तक कहा गया। संतों ने तो उसे माया रूप तथा भगवद्भजन में बाधक माना है, साथ ही इसे दूर रहने को कहा। संत नितानंद जी कहते हैं -
"नारी प्यारी जगत में, लगे अंग से आय।
ज्ञान ध्यान और प्राण को, नितनन्द भख जाय।"3

तत्कालीन संतों ने नारी के कामिनी और भामिनी रूप की भर्त्सना करते हुए उसे साधना के मार्ग में बाधक माना है। नितानन्द जी भी इससे अपने आपको अलग नहीं कर पाये। इस संदर्भ में नितानंद जी चेतावनी देते हुए कहते हैं -
"नख सिख सभ काला करै, जिसके मारै डंक।
नितानन्द बैराग में, नारी बड़ा कलंक ॥"4

संत कवियों का स्त्री विरोधी स्वर ज्यादा दिखाई देता है। संत नितानन्द जी भी स्त्रियों से दूर रहने की ही बात हमेशा किए। स्त्री को लेकर इनका भी मत स्पष्ट नहीं दिखाई देता है। स्त्रियों की चपेट में साधक के अलावा सामान्य गृहस्थ भी आ जाता है। स्पष्ट तौर पर कहते हैं -
"नारी ना ये नाहरी, करै नैन की चोट ।
कठिन चपेटा काम का, दुनिया लोटम लोट ॥"5

नितानन्द जी कहते हैं कि नारी ठगिनी बनकर सभी को चाहे वह पंडित हो या विद्वान हो लूट लेती है। इसी प्रकार नारी स्वीकीया हो या परकीया उससे दूर ही रहना चाहिए। क्योंकि नारी अग्नि के समान होती है और अग्नि काम सिर्फ जालना ही होता है।
"सुंदरी कहूँ कि सिंहनी, जिसका जगत शिकार।
सुर नर पंडित बहुगुणी, भखे सुंदरी नार ॥"6
"क्या अपनी क्या और की, पावक देत जराय।
नितानन्द उबरा चाहे, तो हरगिज हाथ न लाय ॥"8

 संत जन नारी को शेर से भी बलशाली मानते है जिसने सारे ब्रह्माण्ड को अपने वशीभूत कर लिया है -
 "सबल सुंदरी सिंह ते, दो मुख रही पसार ।
 नितानन्द सभ ब्रह्मांड को, निगल गई कर प्यार ॥"7

इन्होंने कहीं इसे जलता हुआ फौलाद की छुरी, कहीं मीठी खाण्ड (गुड़) और कहीं जहर (विष) कहकर तथा इसे नरक अर्थात बरबादी का द्वार बताकर इससे बचने का सन्देश दिया है -
"नारी छुरी फौलाद की, राखी खाण्ड लपेट।
नितानन्द जो खाएगा, उसका पाड़ई पेट ॥"
"क्या अपना क्या और का, जहर न लीजै खाय।
नार पराई आपनी, नरक मांहि ले जाय ॥"9

केवल यही नहीं जहाँ नितानंद जी ने नारी के व्याभिचारी रूप निन्दा की है, वहीं नारी के पतिव्रता रूप की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की हैं। इन्होंने पति की सेवा न करने वाली नारी को व्याभिचारिणी कहा है -
"पति की सेवा न करे, नितानन्द जो आन।
लोग रिझावै कपट से, सो विभाचारन जान ॥"10

मनसा-वाचा-कर्मणा अपने पति का ध्यान रखने वाली नारी ही पतिव्रता है। इससे भिन्न चंचल मति वाली नारी को इन्होंने व्याभिचारी कहा है -
"जाके चित्त में पति बसै, सोई सुलखनी नार।
जब लग चित जित तित फिरे करे कोटि व्यभिचार ॥"11

संत नितानन्द जी ने नारी के व्यभिचारी रूप का वर्णन करते हुए उसका तिरस्कार किया है वहीं दूसरी ओर उन्होंने पतिव्रता नारी को पूजनीय बताते हुए उसका यशोगान किया है। नितानन्द जी पतिव्रता नारी को एक आदर्श नारी के रूप देखते हैं। उसका गुणगान करते हुए लिखते हैं -
"पतिव्रता शोभा भरी, उज्ज्वल अंग अनूप।
मान-गुमान करे नहीं, शीतल सुतह सरूप ॥"12
"पतिव्रता मैले वसन, नहीं आभूषण अंग।
सब जग में जगमग करे, हर हीरा के संग ॥"13

नितानन्द जी ने नारी को नागिनी की संज्ञा देते हुए कहा है कि नारी मनुष्य को भीतर तक डस लेती है, जिससे कोई औषधि काम नहीं करती है -
"नितानन्द नारी डस्या, जीवत ही मर जाय।
आप डसावै आप को, जब क्या पार बसाय ॥"14
नितानन्द यह नागनी, भीतर से डस जाय।
जिसका खाया ना बचे, कोटि औषधी लाय ॥"15

नितानन्द जी नारी को ‘काम’ की प्रतीक माना तथा उसे कामिनी कहा। उसे भगवद् विषय के लिए हानिकारक बताया। कहते हैं कि इसके रहने से मोक्ष का कपाट कभी नहीं खुलता -
एक कनक और कामिनी, बंके ओघट घाट।
नितानन्द इनके परे, खुले रहे मुक्त कपाट ॥"16
कामी से कुत्ता भला, करै समय पर भोग।
नितानन्द नर अंध के, लगा रैन दिन रोग ॥"17

नितानंद जी पतिव्रता नारी के मार्ग को अनुकरणीय एवं वन्दनीय बताते हैं। इन्हों ने उसे भी संत तुल्य मानते हुए कहा है-
पवित्रता प्रीतम सखा, नितानन्द कोई नाहिं।
साहब सो हिलमिल रहे, जुग-जुग चरनों माहिं ॥"18
पतिव्रता पिव को भजै, पकड़ प्रेम की टेक।
नितानन्द गोबिन्द से, मिल गई एकम एक ॥"19

पतिव्रता नारी और संतों का जीवन तलवार की धार पर चलने जैसा है। वे सांसारिक मोह-माया से कोसों दूर रहकर परम तत्त्व में लीन रहते हैं -
"पतिव्रता और संत, जन धरे धार पर पाँव।
तन का लालच त्याग कर, मिलें निरंजन राव ॥"20

नितानंद जी नारी के संदर्भ में कहते हैं कि उसे माँ, बहन और पुत्री के रूप में देखना चाहिए। उसे आसक्तिजन्य दृष्टि से नहीं अपितु सात्त्विक भाव से देखना चाहिए-
"नितानन्द नर-नारि सब, बहन बीर कर देख।
जेते प्राणी जगत में, सब का पिता आलेख ॥"21

नितानन्द जी पतिव्रता नारी को वंदनीय मानते हैं और व्यभिचारिणी को त्याज्य एवं उससे दूर रहने का संदेश देते हुए उसे माया रूपिणी मानते हैं। वे पतिव्रता नारी को प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति तथा सद्गुणों की खान बताते हैं। नितानन्द जी की साहित्य साधना समाज के सभी पक्षों को लेकर चलती चलती है। किन्तु कुछ पक्षों पर अंतर्विरोध भी दिखाई देता है। उनकी वाणी तत्कालीन समाज के लिए ही जितनी उपयोगी नहीं थी बल्कि समसामयिक भौतिकवादी समाज के लिए तो अत्यन्त सार्थक,सारगर्भित एवं उपयोगी दिखाई देती है, जिसका अनुगमन तथा अनुपालन कर व्यक्ति अपने जीवनस्तर को ऊँचा उठा सकता है। अतः आवश्यकता है कि इनकी वाणी का प्रचार-प्रसार कर उसे जन-मन तक पहुँचाया जाये ताकि यह भौतिकवादी समाज केवल विपरीत परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी इसका अनुकरण कर जीवन को उन्नत किया जा सके।

संदर्भ ग्रंथ: 
1. स्त्री: भारतीय एवं पाश्चात्य अवधारण, डॉ. मधु देवी, अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका, शोध, समीक्षा और मूल्यांकन, पृ. सं. 74
2. वही, पृष्ठ संख्या 193
3. प्रजाचक्षु, भोलानाथ. (सं.). सत्य सिद्धान्त प्रकाश, पृष्ठ संख्या 194
4. वही, पृष्ठ संख्या 192
5. वही, पृष्ठ संख्या 193
6. वही, पृष्ठ संख्या 197
7. वही, पृष्ठ संख्या 197
8. वही, पृष्ठ संख्या 194
9. वही, पृष्ठ संख्या 199
10. वही, पृष्ठ संख्या 101
11. वही, पृष्ठ संख्या 101
12. वही, पृष्ठ संख्या 103
13. वही, पृष्ठ संख्या 103
14. वही, पृष्ठ संख्या 192
15. वही, पृष्ठ संख्या 192
16. वही, पृष्ठ संख्या 200
17. वही, पृष्ठ संख्या 203
18. वही, पृष्ठ संख्या 104
19. वही, पृष्ठ संख्या 107
20. वही, पृष्ठ संख्या 105
21. वही, पृष्ठ संख्या 195
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* सम्पादकीय नोट: तुलसीदास की कृति रामचरित मानस के एक पात्र के संवाद को तुलसीदास का कथन, या मंतव्य समझना या बताया जाना सही नहीं है। वास्तव में किसी भी साहित्यिक रचना में वर्णित पात्रों के कुछ संवादों को चुनकर उनके लेखक पर आरोपित करना रचनाकार के प्रति अन्याय है। हाँ, स्वतंत्र काव्य, दोहों, आदि में कहे वक्तव्यों की बात अलग है।

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