अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की सीता

डॉ. मुकेश कुमार

ग्राम हथलाना, पो. मंजूरा, जिला करनाल। (हरियाणा)
चलभाष: +91 989 600 4680

शोध सारांश -
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘वैदेही वनवास’ एक मात्र ऐसा महाकाव्य है, जो पूर्ण रूप से सीता जी पर आधारित है। इस महाकाव्य को 18 सर्गों में विभक्त किया हुआ है। इस महाकाव्य पर पूर्णतः वाल्मीकि रामायण का प्रभाव दिखाई देता है। सीता इसमें ऐसी पात्र है जो परम पवित्रता, कष्ट सहिष्णुता, धैर्यशील, आदर्श सेविका, त्यागशील सरह स्वभाव एवं शांत स्वभाव, सात्विक, लोककल्याणी, मंगलकारी है जो हमेशा प्रत्येक जीव का भला चाहती है।

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी द्विवेदी युग के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इन्होंने खड़ी बोली में प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ का सृजन किया। इनके ‘प्रिय प्रवास’ व ‘वैदेही वनवास’ दोनों महाकाव्य खड़ी बोली में रचित है। प्रियप्रवास कृष्ण व राधा पर आधारित है व ‘वैदेही वनवास’ सीता व राम पर
आधारित है।
महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी की सीता देवी का रूप थी। वह एक पतिपरायण, विभापूंज पतिव्रता की साकार मूर्ति है। इस विश्व की सभी सतियों में सबसे सर्वश्रेष्ठ व आदर्श नारी है। आपका व्यक्तित्व कमल की तरह खिला हुआ है। आपके ऊपर पति प्रेम की आलौकिक छाया है। आप अपने पति के प्रति एवं कत्र्तव्य परायण आपके प्राण पति के प्राण हैं। कवि ने एक आदर्श नारी के गुण एवं पति प्रेम का आदर्श चित्रण किया है-
"आप मानवी हैं तो देवी कौन है।
महा-दिव्यता किसे कहाँ ऐसी मिली।।
पतिव्रता अति पूत सरोवर अंक में।
कौन पति-रता पंकजिनी ऐसी खिली।।
पति-देवता कहाँ किसको ऐसी मिली।
प्रेम से भरा ऐसा हृदय न और है।।
पति-गत प्राणा ऐसी हुई न दूसरी।
कौन धरा की सतियों की सिरमौर है।।"1
माता सीता के गुणों का अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी ने बहुत सुंदर ढंग से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि आपकी महानता एवं गरिमा इस कारण नहीं कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की पत्नी है या चक्रवर्ती महाराज दशरथ की पुत्रवधू है एवं महाराज जनक की पुत्री। सीता माता जी इस संसार के लिए एक आलौकिक आदर्श, कत्र्तव्यपरायण, त्याग की मूर्ति आदि गुणों से विद्यमान नारी थी। जानकी माता जी सहधर्मिणी सतियों की सिरमौर है। अपने इस ‘वैदेही वनवास’ महाकाव्य में ‘हरिऔध’ जी ने आदर्श गुणाों वाली नारी का गुणगान किया है-
"किसी चक्रवर्ती की पत्नी आप हैं।
या लालित है महामना मिथिलेश से।।
इस विचार से हैं न पूजिता वंदिता।
आप अर्चिता हैं आलौकिकादर्श से।।"2
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी की सीता आदर्श पतिव्रता, पति प्रेमिका आदि का ही दर्शन नहीं होता बल्कि वह कोमलता ममता से परिपूर्ण है। वह आर्य सन्तान है। उसके एक-एक अंग में सद्भावना, उदारता एवं लोकाराधना की रश्मियाँ प्रसारित हैं। कवि ने इन्हें मानवता की विमल चन्द्रिका के रूप में अवलोका है तथा लोक-कल्याणी नारी के रूप में
दिखाया है-
"आर्या कोमलता ममता की मूर्ति है।
हैं सद्भाव-रता उदारता पूरिता।।
हैं लोकाराधन-निधि-शुचिता-सुरसरी।
हैं मानवता-राका-रजनी की सिता।।"3
माता सीता के गुणगान से कवि की प्रतिभा में और निखार आता है। वह देवी शक्ति, महानता, धृति, उदारता, सहृदयता, दृढ़ता, पतिव्रता आदि सद्गुणों से परिपूर्ण होते हुए भी कवि शंका में है कि पति वियोग से पीड़ित इन महान गुणों के होते हुए भी जानकी सह सकेंगी अथवा नहीं, परन्तु उस माता की धृति के बल पर उस उसके हृदय में दृढ़ विश्वास प्रकट होता है कि पति परायणता, पति वियोगी माता सीता इस प्रेम एवं विरह वेदना को सहन कर लेती है। कवि लिखता है-
"पुत्री आपकी शक्ति महत्ता विज्ञता।
धृति उदारता सहृदयता दृढ़-चित्तता।।
मुझे ज्ञात है किन्तु प्राण-पति प्रेम की।
परम प्रबलता तदीयता एकान्तता।।
ऐसी है भवदीय कि मैं सन्दिग्ध हूँ।
क्यों वियोग-वासर व्यतीत हो सकेंगे।।
किन्तु कराती है प्रतीति धृति आपकी।
अंक कीर्ति के समय-पत्र पर अँकेगे।।
जो पति प्राणा है पति इच्छज्ञ पूर्ति तो।
क्या न प्राणपण से वह करती रहेगी।।
यदि वह है सन्तान-विषयिणी क्यों न तो।
प्रेम-जन्य-पीड़ा संयत बन सहेगी।।"4
पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की सीता अपनी सतीत्व परीक्षा सफल रही है। केवल छः मास तक माता सीता का पति वियोग रहा है। क्योंकि उस दौरान रावण उसे हर के ले गए थे। उसी दौरान माता सीता का सतीत्व काल रहा जिसमें वह उत्तीर्ण नहीं हुई जिससे पूरे संसार की ललनाओं के समक्ष सतीत्व रक्षण का आदर्श रखा। क्योंकि रावण इतना शक्तिशाली था जिससे सारा संसार कांपता था। जिसके दशमुख दी भुजाएँ रखते हुए भी बीस भुजाओं वाला रावण कहलाया। वह तलवार का धनी रहा। माता सीता को अनेक लोभ लालच देता रहा जिससे वह माता सीता के सतीत्व पर किसी प्रकार की आंच नहीं पहुँचा सका। क्योंकि माता सीता एक पतिव्रता नारी थी जिससे उसका पतिव्रत उसकी सदा रक्षा करता रहा। इन्हीं पंक्तियों के माध्यम से हरिऔध जी ने भारतीय नारी को पतिव्रता की शिक्षा दी है-
"रख त्रिलोक की भूति प्रायशः सामने।
राज्य-विभव को चढ़ा-चढ़ा पद पर।
न तो विकम्पित कभी कर सका आपको।
न तो कर सका वशीभूत बहु मुग्ध कर
जिसकी परिखा रहा अगाध उदधि बना।
जिसका रक्षक स्वर्ग-विजेता-वीर का।।
जिसमें रहते थे दानव-कुल-अग्रणी।।
जिसका कुलिशोपम अभेध-प्राचीर था।।"5
महाकवि पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय जी की सीता एक पतिव्रता, राष्ट्र के प्रति समर्पित है। वो कहती हैं कि मैं राम की सेवा उसके साथ रहकर करूँगी। मैं हमेशा उसकी हाँ में हाँ रखूँगी, हमेशा उसका साथ व उसकी प्रशंसा करूँगी। उसकी दासी बनकर रहूंगी। मेरा उनके साथ जो संयोग है मैं उसकी प्यासी हूँ-
"सेवा उसकी करूँ साथ रह,
जी से जिसकी दासी हूँ।
हूँ न स्वार्थरत, मैं पति के
संयोग-सुधा की प्यासी हूँ।।"6
महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने माता सीता की पति परायणता का चित्रण लक्ष्मण के मुख से करवाया है। सभी कष्ट झेले हैं माता सीता जी ने इन कांटों पर चलकर एक नया जीवन बनाया है। लोक लाभ के संकल्प पर चलकर जीवन में सफलता का रास्ता देखा। दृढ़ विश्वास, आदर्शता उनका मुख्य गुण था। परन्तु चरणों के दर्शन की लालसा लगी रही-
"उनको है कत्र्तव्य ज्ञान वे आपकी-
कर्म-परायण हैं सच्ची सहधर्मिणी।।
लोक-लाभ-मूलक प्रभु के संकल्प पर।
उत्सर्गी कृत होकर हैं कृति-ऋण-ऋणी।।
फिर भी प्रभु की स्मृति, दर्शन की लालसा।
उन्हें बनाती रहती है व्यथिता अधिक।।
यह स्वाभाविकता है उस सद्भाव की।
जो आजन्म रहा सतीत्व-पथ का पथिक।।"7
माता सीता प्रतिदिन, प्रतिक्षण अच्छा ही सोचती रहती थी। वह पशु, पक्षी, कीटें, जीव-जन्तु सभी के साथ समान भाव से व्यवहार करती थी तथा सभी को अपना समझती थी। वह अपने हाथों से सभी का भला करती रहती थी। वह शांति निकेतन के आस-पास सभी रहने वाले प्राणियों का हित सोचती थी, सबका भला चाहती थी। यहाँ पर अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी ने माता सीता के आदर्श रूप से समाज को शिक्षा देते हैं कि हमें सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे सब के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए तथा सबका दर्द समझना चाहिए। वे कहते हैं-
"पशु, पक्षी क्या कीटों का भी प्रति दिवस।
जनक नन्दिनी कर से होता था भला।।
शांति-निकेतन के सब ओर इसीलिए।
दिखलाती थी सर्व-भूत-हित की कला।।"8
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी की सीता त्यागी, तपस्वी व परोपकारी थी। क्योंकि त्यागी से बड़ा कोई नहीं हुआ। सीता कहती है मैंने जो त्याग किया है वही उचित है। क्योंकि ऐसा करना मेरे लिए शुभ कर्म के समान है। मैं हर पीड़ा को सह सकती हूँ। क्योंकि यही मेरे लिए उचित है। त्याग करना ही सहधर्मिणी का परम धर्म होता है। सीता भारतीय नारी को त्याग की शिक्षा देती है।
"मैंने जो है त्याग किया वह उचित है।
ऐसा ही करना इस समय सुकम्र्म था।।
इसलिए सहमत विदेहजा भी हुई।
क्योंकि यही सहधर्मिणी परम धर्म था।।"9
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी ने सीता को आदर्श सती के रूप में ही देखा है। वियोग जनित कष्टों की कल्पना कर भीत हो गई। लेकिन पति के धर्म का पालन अपना परम धर्म मानकर उन सभी कष्टों को सहर्ष झेलने को तैयार हैं। वह सभी कष्ट सहन क्षमता रखती है और कहती है-
"वह तो स्वाभाविक प्रवाह था, जो मुँह से बाहर आया।
आह! कलेजा हिले कलपता कौन नहीं कब दिखलाया।।
किन्तु आपके धर्म का न तो परिपालन कर पाऊँगी।
सहधर्मिणी नाथ की तो मैं कैसे भला कहाऊँगी।।
वह करूंगी जो कुछ करने की मुझमें आज्ञा होगी।
त्याग करूंगी इष्ट सिद्धि के लिए मुझे आज्ञा होगी।।"10
सीता पति परायण है, वह अपने आपको हमेशा पति के चरणों में अर्पित रखती है। वह हमेशा विरह में रहती हुई भी लोक कल्याण के बारे में सोचती रहती है। वह अपना सौभाग्य समझती है लोक हित की सेवा के लिए। वह हमेशा सत्य के पथ पर चलती है। वह अपने आपको गौरवशाली समझती है। हरिऔध जी ने कहा है-
"पति परायण थी वह क्यों जीवित रह पाती।
पति चरणों में हुई अर्पित पति की थाती।।
धन्य भाग्य उसे अपना जन्म बनाया।
सत्य-प्रेम-पथ-पथिका बन बहु गौरव पाया।।"11
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि अयोध्यासिंह उपाध्याय जी द्वारा रचित ‘वैदेही वनवास’ महाकाव्य में सीता एक ऐसी नारी है जो ऐसे समाज की कल्पना करती है, जिसमें सदैव मंगल ही मंगल होता, सबका उत्थान होता, सभी लोग फलते-फूलते और कोई दुःखी नहीं होता। वह हमेशा लोक कल्याण की सोचती है। इसी प्रकार से पूरे समाज का भला चाहने की हमेशा इस महाकाव्य के माध्यम से कवि ने सीता जैसी नारी बनने की भारतीय नारी को प्रेरणा दी है। यह महाकाव्य कालजयी एवं अमर ग्रंथ है।

संदर्भ:-
1. सम्पा. सदानन्द शाही, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ रचनावली, वैदेही
वनवास खंड 1, षष्ठ सर्ग-29, पृष्ठ 384
2. वही, 31, पृष्ठ 384
3. वही, 39, पृष्ठ 396
4. वही, 51-53, पृष्ठ 387
5. वही, 44-45, पृष्ठ 386
6. वही, दशम सर्ग, 73, पृष्ठ 412
7. वही, नवम सर्ग, 20-21, पृष्ठ 393
8. वही, त्रयोदश सर्ग-11, पृष्ठ 439
9. वही, नवम् सर्ग-69, पृष्ठ 400
10. वही, नवम सर्ग, पृष्ठ 405
11. वही, दशम सर्ग, पृष्ठ 402

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