भारतीय सेना के रणबाँकुरों की प्रेरक गाथाएँ: निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ

समीक्षक: छत्रपाल


पुस्तक: ‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ
लेखक: शशि पाधा
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफ अली रोड
नई दिल्ली - 110002
मूल्य: ₹  300/-

प्रसिद्ध कवयित्री शशि पाधा भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान से अभिभूत हो कर, अपनी पिछली पुस्तक “ शौर्य गाथाएँ के बाद एक बार पुनः भारतीय वीरों के अदम्य साहसिक बलिदान और उनके परिवारों के जीवंत संघर्ष की प्रेरक कहानियों के संग्रह के साथ पाठकों के समक्ष हैं। उनकी 150 पृष्ठों पर आधारित यह पुस्तक “निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ” शीर्षक से प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है तथा इसमें 15 संस्मरण संग्रहीत हैं। यह कहानियाँ सैनिकों के रक्त की प्रत्येक बूँद में जोश मारती बलिदान की भावना, कर्तव्य-निष्ठा, और मृत्यु से आँख मिला कर शूरवीरता के नए कीर्तिमान स्थापित करने की परंपरा के स्वर्णिम उदाहरण हैं। जिन परिवारों के युवा बेटे लक्ष्य प्राप्ति के बाद माँ भारती की गोद में चिरनिद्रा में सो जाते हैं उन परिजनों के हृदय की दारुण वेदना, टीसती स्मृतियों की अनंत यात्रा, किसी युवा वीर नारी के आँसुओं में डूबी अंतहीन प्रतीक्षा, गौरव की भावना के बावजूद माँ के काँपते कंठ में रुके आँसुओं के वेग और बेटे के शव को कन्धा देने के बाद बाप की आयुपर्यन्त झुकी पीठ के मर्मस्पर्शी प्रसंग भी पुस्तक में शामिल हैं।
शशि पाधा
किसी भी काल में होने वाले युद्ध विनाश और हिंसा के दानव रहे हैं, मानवता के संहारक रहे हैं। जब कहीं कोई युद्ध होता है तो सबसे पहले शांति लहूलुहान होती है, संस्कृति क्षरित होती है। देश के समस्त संसाधन सीमाओं की ओर मुड़ जाते हैं। इस सब के बावजूद अवश्यम्भावी हो जाता है राष्ट्र की संप्रभुता और अस्मिता सुरक्षित रखना। पूरी शक्ति से शत्रु को परास्त करना ही राष्ट्र धर्म बन जाता है। और इस राष्ट्र-धर्म के निर्वहन के लिए फौलादी दीवार बन कर राष्ट्र की रक्षा का दायित्व सेना ही निभाती है। यदि युद्ध छद्म रूप से लड़ा जा रहा हो और कुछ अलगाववादी भी शत्रु से मिले हुए हों तो यह लड़ाई लम्बी खिंच सकती है। आतंकवाद इसी छद्म युद्ध का निकृष्टतम रूप है जिस का सर कुचलने के लिए भारतीय सेना के सैनिक समय की छाती पर बलिदान की नई गाथाएँ अंकित कर के मातृभूमि की रक्षा कर रहे हैं। पुस्तक में संग्रहीत संस्मरणात्मक कथाओं को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहली श्रेणी में उन पराक्रमी सैनिकों के शौर्य की गाथाएँ हैं जिन्होंने कई आतंकवादियों को मार गिराया और निरीह नागरिकों के नरसंहार के उनके मंसूबों की कमर तोड़ दी। इस प्रकार उन्होंने दुर्दांत आतंकियों को अदम्य शौर्य और जनून से मौत के घाट उतार दिया और जामे-शहादत पी कर अमर हो गए।

पुस्तक में सम्मिलित पहली तीन कहानियाँ कश्मीर में आतंकवादियों का सफाया करते प्राणोत्सर्ग करने वाले सेना के तीन वीर नायकों की शहादत की अमर दास्तानें हैं। “एक अंतहीन प्रेम कथा” में नायक मोहन गोस्वामी, “अपनी आत्मा का कप्तान” शहीद कप्तान देविंदर सिंह जस्स और तीसरी कहानी “निर्भीक योद्धा” में कप्तान मनीष सिंह की अद्भुत वीरता और महा-बलिदान को अति संवेदना के साथ संजोया गया है। अधिकाँश शहीदों की पलटन से सम्बद्ध वरिष्ठ सैन्याधिकारी की पत्नी होने के नाते शशि जी को पलटन के समारोहों में शहीद सैनिकों के परिवारों से मिलने और उनके विषय में जानकारी जुटाने की सुविधा और रुचि रही है जिस के पीछे शहीदों के बलिदान को युवा पीढ़ी को प्रेरित करने तथा उनके मन में राष्ट्र के प्रति कर्तव्य भावना जाग्रत करने का जज्बा रहा है। इन तीनों कहानियों का फॉर्मेट एक समान है। इनमें बलिदानी सैनिक के सम्मान समारोह का गौरवपूर्ण चित्रण, शहीद की शौर्य-गाथा/प्रशस्तिपत्र के आलेख का वर्णन और परिवारजनों तथा सैन्य सहकर्मियों से शहीद की स्मृतियों के उल्लेख का वर्णन मिलता है। सत्यकथा लेखन में तथ्य जुटाना बहुत श्रमसाध्य काम होता है। नायक के सर्वांगीण व्यक्तित्व के छवि उभारने के लिए अनेक सम्बद्ध व्यक्तियों से भेंट कर के तथ्यों को पूर्ण सत्यता के साथ जुटाना पड़ता है। यह कार्य लेखिका ने निहायत जिम्मेदारी के साथ निभाया है। शहीदों के परिवारों से बातचीत में शशि जी के भीतर का लेखक अत्यंत संवेदनशील हो उठता है और पाठकों के हृदय को द्रवित करता चलता है। नायक मोहन गोस्वामी की पत्नी भावना हो या शहीद देविंदर जस की बहन हरप्रीत अथवा शहीद कप्तान तुषार महाजन के पिता देवराज – लेखिका ने सभी से अत्यंत अपनत्व से अन्तरंग बातचीत कर शहीदों के जीवन के अनेक पक्षों को उजागर कर उनके प्रति आदर और गौरव की भावना उत्पन्न की है। मोहन गोस्वामी की पत्नी से एक भेंट में यह पूछने पर कि उसे पति के शहीद होने का समाचार कैसे मिला तो उस का जवाब था-- एस एम साहब का फोन आया था कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह रहे हैं बस सुन्न सी मैं यही समझ सकी... । शशि जी आगे लिखती हैं, "अब वो चुप थी। पहली बार मैंने उसके शरीर में कम्पन देखा था उसकी बच्ची चुपचाप अपनी माँ का हाथ लेकर उसे सहला रही थी। कितने असमय ही बड़े हो जाते हैं शहीदों के बच्चे। कैसे समझ लेते हैं अपना उत्तरदायित्व। मैंने उसके मौन को नहीं तोडा। उसकी आर्द्र आँखों की पीड़ा मेरी आँखों में भी प्रतिबिंबित हो रही थी।" इन कहानियों की एक अन्य विशेष बात यह की इन कथाओं में शहीदों के प्रत्यक्षदर्शी सहकर्मियों ने बातचीत के दौरान आतंकवादियों से मुठभेड़ों में वीर नायकों द्वारा प्रदर्शित अप्रतिम वीरता और युद्ध कौशल का छोटे से छोटा विवरण दे कर कथा के तथ्यों की पुष्टि की है जो सत्यकथा की पहली आवश्यकता मानी जाती है।

दूसरी श्रेणी में उन सैनिकों की गाथाएँ शामिल हैं जो युद्ध में भीषण रूप से घायल अथवा प्रशिक्षण के दौरान किसी दुर्घटना का शिकार होने के बाद जीवन भर के लिए विकलांग हो गए। ऐसी दो कथाएँ “मन के जीते जीत” तथा “उद्यम से अधिकार तक बढ़ाते क़दम” पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी। पहली कहानी के नायक कप्तान मनीष सिंह इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग छोड़ कर कर घर वालों को बिन बताए NDA में चले गए। 2012 को उनकी पोस्टिंग कुपवाड़ा में हुई जहा रात भर चली मुठभेड़ में उन्होंने तमाम आतंकवादियों का सफाया कर दिया किन्तु गोलियाँ लगने से स्वयं गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए। जीवित रहने की संभावना सीमित थी। उपचार के दौरान कुछ दिन वे कोमा में रहे। शत्रु पर विजय तो प्राप्त हुई किन्तु जीवन का युद्ध शुरू हो गया। उनका रणक्षेत्र बदल चुका था डाक्टरों ने घोषणा कर दी कि वे कभी अपने पाँव पर खड़े नहीं हो पायेंगे। चार बार स्टेम सेल सर्जरी (stem cell surgery) और असहनीय शारीरिक पीड़ा के चलते कठोर व्यायाम आदि के बाद अंततः वे व्हीलचेयर पर बैठने के योग्य हो सके। दृढ इच्छाशक्ति और बुलंद हौंसले के स्वामी कप्तान मनीष सिंह का कथन था – “मेरा एक टारगेट छूटा तो क्या दूसरा मेरे सामने है।” उनका दूसरा टारगेट था पिस्टल शूटिंग की प्रतिस्पर्धा। जिसका उन्होंने शारीरिक अपंगता और भयंकर पीड़ा के बावजूद डटकर अभ्यास किया, 2013 में राष्ट्रपति ने अशोक सभागार में मंच से नीचे आकर व्हीलचेयर पर उन्हें शौर्य चक्र से विभूषित किया।

नवीन गुलिया की कहानी नियति के क्रूर खेल का एक अत्यंत अनर्थकारी उदाहरण है। भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण के अंतिम दिन परेड की पूर्वसंध्या में एक प्रतिस्पर्धा के दौरान नौ फुट की ऊंचाई से सिर के बल गिरने से उनकी रीढ़ की हड्डी गर्दन के पास टूट गई। उनका सारा शरीर सुन्न हो गया अब उनका भविष्य डाक्टरों के हाथ में था। उनके सिर में सुराख कर के सरिये डाले गए, हिलने डुलने की सख्त पाबंदी रही। गहरी वेदना के पलों में भी वे विचलित नहीं हुए। कई अस्पतालों में चिकित्सा और विशेष व्यायाम के लम्बे कष्टदायी उपचार ने उन्हें व्हीलचेयर पर बैठने के काबिल बना दिया । उन्होंने अपने लिए एक नया द्वार खोला और अस्पताल के समीप एक कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र में प्रवेश ले लिया। केवल लेक्चर सुनकर उन्होंने 99 प्रतिशत अंकों से कोर्स पूरा किया। सैन्य हस्पताल में दो साल के बाद उन्हें सौ फ़ीसदी विकलांग मान कर सेना से सेवानिवृत कर दिया गया, जीवन संग्राम में पूर्ण मनोबल से लड़ते हुए उन्होंने पुणे में स्नातकोत्तर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। विकलांगता से युद्ध करने के लिए उन्होंने नई चुनौतियों की तलाश शुरू की और समाज सुधार के क्षेत्र का चुनाव किया। इससे पहले कुछ कर दिखने की भावना से उन्होंने स्वयं गाड़ी चला कर पर्वतारोहण के क्षेत्र में 18 हज़ार छह सौ 32 फुट ऊँचे मार्सिमिक-ला दर्रे को पार कर लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवा कर एक दुस्साहसपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की। सामाजिक कार्य क्षेत्र में आगे चल कर उन्होंने कम भाग्यशाली बच्चों, ईंट भट्ठों के बाल मजदूरों और ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा के लिए अदा चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। भले ही वे फौजी सैनिक नहीं बन पाए किन्तु सामाजिक सैनिक बन कर वे महति भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने सैकड़ों बच्चों के मन-मस्तिष्क को शिक्षा और नव जागरण के प्रकाश से रोशन किया। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, वे एक संवेदनशील कवि भी हैं। उनकी चंद पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:
विराट वट वृक्ष तू, शक्ति से समृद्ध है,
जीवन एक युद्ध है जीवन एक युद्ध है।
आंधियाँ चल रहीं, राह कुछ खल रही
हिम्मत आँख मल रही, लौ फिर भी जल रही
हार को ना मान तू, जीत को पहचान तू,
साहस और संकल्प में विश्वास तेरा दृढ है,
जीवन एक युद्ध है जीवन एक युद्ध है।

संग्रह में तीसरी कोटि की वे कथाएँ हैं जिनमें सैनिकों द्वारा संचालित सामाजिक, कल्याण और मानवीय गतिविधियों का वर्णन है। ”मिटटी का मोह” का सम्बन्ध 1965 में भारत पाक युद्ध में सेना के मानवीय रूप के दर्शन होते हैं। भारतीय सेना लाहोर से चंद किलोमीटर दूर बसे बर्की गाँव तक जा पहुंची। गाँव के अधिकांश लोग घर बार छोड़ कर चले गए थे। चिरागदीन नमक एक वृद्ध अपनी पत्नी की रुग्णता के कारण कहीं जाने में असमर्थ था। भारतीय सैनिक ने उस परिवार को हर प्रकार की सहायता की। सैनिकों के साथ उस बजुर्ग के बहुत आत्मीय सम्बन्ध हो गए। उस वृद्ध का जन्म जालंधर जिले के किसी गाँव में हुआ था और उसे अपने बचपन के घर की याद बहुत सताती थी। एक दिन उसने झिझकते हुए कप्तान केशव पाधा से विनती की – मैं मरने से पहले अपनी जन्म भूमि को देखना चाहता हूँ। कप्तान केशव ने शीघ्र ही उसकी इच्छा पूरी कर दी। अपने गाँव को देख कर चिरागदीन भाव विह्वल हो गया और बचपन के स्मृतियों में डूबता उतरता रहा लौटते समय गाँव के मिट्टी को चूमते और अपनी चादर में बांधते हुए भीगे स्वर में कहा – “साहब जी, अगर देश का बंटवारा नहीं होता तो आज मैं इसी धरती पर खड़ा होता और अंत से इसी मिट्टी में समा जाता”। ताशकंद समझौते के बाद सेना तो बर्की से लौट आई किन्तु अपने स्नेह, सद्भावना और मानवता की सुगंध छोड़ आई।

इस कोटि की दूसरी कहानी सेना द्वारा फिरोजपुर सीमा से सटे 650 एकड़ वीरान क्षेत्र को हरे भरे सुन्दर नंदन वन में परिवर्तित करने की उद्यमशीलता की प्रेरक दास्तान है। यह इस बात के प्रमाण है कि जहाँ युद्ध जैसी आपदा आने पर सैनिक शत्रु के विरुद्ध रौद्र रूप धारण कर लेते हैं तो वहीँ शांतिकाल में अपनी मातृभूमि की समृद्धि के लिए भी कर्तव्यबद्ध हो जाते हैं। यह वन इस बात का जीता जागता सबूत है। सेना की पहल पर भारी संख्या में स्वयंसेवक इस हरित परियोजना में योगदान के लिए आगे आए। सफल नियोजन और सहयोग भावना से यह स्थान इस क्षेत्र का प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट बन गया और 14 हज़ार से अधिक वृक्ष कई तालाब आदि आगंतुकों का स्वागत करने लगे। इस कथा के अंत में शशि जी के विचार उनके प्रकृति प्रेम और पर्यावरण की चित को दर्शाते हैं। वे लिखती हैं “आज विश्व के हर प्राणी का यह धर्म बन जाता है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि हम आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी दुनिया छोड़ के जा रहे हैं। हमें तो अपार सौन्दर्य से परिपूर्ण धरती विरासत में मिली लेकिन अब तो वो जीर्ण-शीर्ण होती जा रही है। धन्य हैं हमारे सैनिक जो सीमाओं पर रक्षा का धर्म भी निभा रहे हैं और प्राकृतिक संपदा की भी रक्षा करने में जुटे हुए हैं।

चौथी श्रेणी की कहानियों में अन्य चंद कहानियाँ रखी जा सकती हैं। “स्कर्दू की घेराबंदी” की ऐतिहासिक घटना में पाकिस्तानी आक्रमणकारियों द्वारा भारतीय युद्ध-बंदियों की नृशंस हत्याओं के बर्बरतापूर्ण प्रसंग के अतिरिक्त लेखिका के एक भुक्तभोगी परिजन की वर्षों बाद विस्मयकारी वापसी का वर्णन है। “डाकिया डाक लाया” एक संस्मरणात्मक कथा है जिसमें चंद दशक पूर्व सैनिकों तथा उनके परिजनों में पत्रों के महत्व को दर्शाया गया है। लेखिका ने अपने जीवन के कुछ प्रसंग जोड़ कर कथा को सरस बना दिया है। “अनाम सैनिक” कथा में पूर्वोत्तर में म्यान्मार से सटे जंगल में भारतीय सैनिकों को मोर्चे खोदते समय दूसरे विश्वयुद्ध के दो जापानी सैनिकों के अवशेष, दो हेलमेट और जंग लगी दो रायफलें मिलीं। सेना की यूनिट ने न केवल अज्ञात सैनिकों का अंतिम संस्कार किया अपितु एक स्मृति-स्थल भी बना दिया। यह कथा हमारी सेना के मानवीय गुणों और सच्चे आचरण की मुंह बोलती मिसाल है। “प्रधान मंत्री का प्रेरणा सन्देश” और “कदम मिला कर चलाना होगा” श्रीमती इंदिरा गाँधी और श्री अटलबिहारी वाजपेयी से जुड़ी स्मृतियों का वर्णन है। कुछ अन्य कहानियों का विषय भी सैनिक शहीद और युद्ध की विभीषिका आदि है।

भाषा की दृष्टि में यह पुस्तक एक अनुपम उपहार है। शशि जी की भाषा बहुत समृद्ध और प्रसाद गुण से परिपूर्ण है। उसमें एक सहजता और विषयानुकूलन है जो उनके संस्मरणों को सरस और पठनीय बनाती हैं। विषय के निर्वाह के लिए उन्होंने मुख्यता वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया है। चरित्र चित्रण के प्रति उनका विशेष आग्रह रहा है और हर शहीद के व्यक्तित्व की सम्पूर्ण छवि उभारी है जो उनका अभीष्ट भी था और आवश्यक भी। इस पुस्तक का ध्येय भी यही था। इसके लिए संवेदनशील लेखिका शशि पाधा जी बधाई की पात्र हैं।

सम्पर्क सूत्र: 18 ए, लेन -2, उधेवाला, जम्मू -180 018, जम्मू कश्मीर
चलभाष: +91 941 919 6313; email: chhatrapal2009@yahoo.in

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