कविताएँ: रंजना शरण सिन्हा

रंजना शरण सिन्हा
जादू जुगनुओं का

मुझे लगा था तुम लुप्त हो गये
परंतु आज सहसा रात के अँधेरे में
कहीं दूर तुम्हारी भुक्-भुक्
मुझे याद दिला जाती है
बचपन के दिनों की

तुमसे निकलती हुई
हरी-सफेद-चमकीली रोशनी
सड़क की तेज बत्तियों के बीच
विलीन हो जाती है
सूरज की रोशनी में फीके चांद की तरह

बचपन में आश्चर्यचकित हो
मैं अपलक निहारती थी
तारों भरे आकाश को
सफेद पत्थरों से भरा झरना भी
भाता था मुझे

तब चंद्रमा एक रहस्य था
फूलगोभी - जैसे बादल
निरंतर बदलती आकृतियों - से
मुझमें कौतूहल भर देते थे

रात के घने अँधेरे में जब
आम के बगीचे से आती हुई
झींगुरों की तेज़ आवाज़
निस्तब्धता को चीरती थी
तुमने अपनी टिमटिमाती रोशनी से
एक सितारों - भरे आकाश का निर्माण किया

ऐसा लगा मानो उतर पड़ी हो
आकाशगंगा धरती पर
पहने हुए
मुकेश- भरी काली साड़ी

परंतु दशकों बाद एक बार फिर
तुम दिख जाते हो
तुम्हारा जलना- बुझना
अब जादुई नहीं रहा
लगता है रोशनी की चकाचौंध में
तुम प्रकाश फैलाने का
असफल प्रयत्न कर रहे हो

बचपन की तरह
जादू और सम्मोहन भी
कहीं दूर भाग गया है
काश! वह कौतुहल- भरा आनंद
सदा टिक पाता!
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कुहरे की चादर

दिसंबर की ठंडी और स्लेटी सुबह
सूरज की मौत का
मातम मना रही है
खिड़की से बाहर झाँकती हूँ
सामने बगीचे में
कुहासा बादलों की तरह
फैल गया है
ठंडी सफेद चादरों में लिपटे
लंबे हरे पेड़
धुंधली आकृतियों में
तब्दील हो गये हैं
शान्त, घने कुहासे का एहसास
तन-मन में समा जाता है
कुहासे के आलिंगन में
समाहित हो जाना चाहती हूँ
कुहासे की गंध
बेचैन कर देती है
उसका आर्द्र स्पर्श
विगत स्मृतियों को जगा देता है
यादों के गलियारे में
खिंचती चली जाती हूँ
मेरा बचपन, मेरा यौवन!
एक कसक लौटने की!

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