हिमांशु जोशी: एक साक्षात्कार (सुखद अनुभूतियाँ)

हिमांशु जोशी
(4 मई 1935 - 23 नवम्बर 2018)

- रवि शर्मा (शोधार्थी)

                             जुलाई माह की चिलचिलाती धूप और पसीने से लबरेज करने वाली अत्यधिक गर्मी होने के पश्चात भी मेरा उत्साह कम नहीं हो रहा था क्योंकि रविवार, 27 जुलाई 2014 को मैं एक ऐसे व्यक्तित्व से मिलने जा रहा था जो हिंदी साहित्य के महान साहित्यकारों में अपना स्थान रखते थे। एक अलग ही उत्साह मेरे मन में समाया हुआ था कि इतने महान साहित्यकार से आज मेरी मुलाकात होगी। हिमांशु जोशी जी के द्वारा मिलने का जो समय दिया गया था उसी समय मैं इनके निवास स्थान नवभारत टाइम्स अपार्टमेंट, मयूर विहार, नई दिल्ली पहुँचा। जब मैं इनके अपार्टमेंट कि सीढियाँ चढ़ रहा था तो मन में उत्साह के साथ एक घबराहट भी थी कि जोशी जी का व्यवहार मेरे प्रति कैसा रहेगा? इन सब स्थितियों को मन में अनुभव करते हुए मैं जोशी जी के समक्ष उपस्थित हुआ। प्रथम परिचय होने के पश्चात् भी जोशी जी का व्यवहार एक मित्र के समान रहा। जब मैंने जोशी जी के प्रथम दर्शन किए तो इनके आकर्षक व्यक्तित्व ने सहज ही मुझे अपनी ओर आकर् षित किया। इनके चेहरे पर चमक, भरा हुआ चेहरा, आँखों पर चश्मा और लम्बा कद आदि विशेषताओं ने एक चुम्बकीय आकर्षण उत्पन्न किया। मैं इनके आकर्षक व्यक्तित्व से प्रथम परिचय होते हुए भी अत्यधिक प्रभावित हुआ। जोशी जी ने एक मित्र के समान घर के अंदर आने का आग्रह किया मुझसे परिचय नहीं होते हुए भी मुझे अपने घर में उचित स्थान दिया, आवभगत की, मुझे अपने निकट बैठाया, सहजता एवं सरलता से वार्ता की और मेरे सुख-दुख के विषय में पूछा; आदि इनके सरल हृदय से युक्त व्यवहार ने एक मित्र का सा अहसास कराया।

             हिमांशु जोशी जी मानवतायुक्त व्यवहार करते हुए कहा, "आइए बैठिए! इस चिलचिलाती धूप में आप अनेक कष्ट सहकर मुझसे मिलने आए, इसके लिए आभार! आपके द्वारा सहे गये इन कष्टों का मूल्य मैं किस प्रकार चुका सकता हूँ, कहिए!" इस व्यवहार ने मुझे जोशी जी में विद्यमान मानवीय संवेदना का प्रत्यक्ष दर्शन कराया और मैंने यह अनुभव किया कि एक महान साहित्यकार ऐसे ही निर्मित नहीं हो जाता क्योंकि उसमें सामान्य व्यक्ति से कुछ अलग विशेषता होती है तभी वह दूसरों के दुख-दर्द को अपना समझते हैं और समाज में अपना नाम एवं स्थान निर्धारित करते हैं।
       सामान्य वार्तालाप के पश्चात् जोशी जी से प्रश्नों का दौर प्रारंभ होता है और प्रथम प्रश्न पूछते हुए मैंने कहा -
प्रश्न:  अपने जन्म के विषय में एवं उस समय की तात्कालिक परिस्थितियों के विषय में बताइए?
उत्तर -  प्रश्न को सुनकर जोशी जी थोड़ा मुस्कराये और गंभीर होकर बोले - मेरा जन्म पर्वतीय अंचल में 4 मई 1935 को उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के जोस्यूड़ा ग्राम में हुआ था मेरे पिता पूर्णानंद जोशी और माता तुलसी देवी थी। इनके सामाजिक संघर्ष ने मुझे जीवन से संघर्ष करने का जोश प्रदान किया। पर्वतीय अंचल की कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों ने भी मुझे यह संदेश दिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हो घबराना नहीं चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति इन परिस्थितियों से समझौता नहीं करके इन पर विजय प्राप्त करता है वही जीवन में प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है। जीवन में सदैव विपरीत परिस्थिति होने के पश्चात् भी मैंने कभी हार नहीं मानी और इनसे ईमानदारी से संघर्ष करता रहा और ईश्वर भी मेरा साथ देता रहा इसी कारण आज मैं इस स्थिति में हूँ कि कोई भी विपरीत परिस्थिति मुझे विचलित नहीं करती है। बचपन में जीवन की परिस्थितियाँ तब तक अनुकूल रही जब तक पिताजी जिवित थे। पिताजी के देहांत के पश्चात् जीवन संघर्ष देखने को मिला तथा मेरी माताजी के संघर्ष ने जीवन की उचित परिभाषा मेरे समक्ष प्रस्तुत की।

प्रश्न: साहित्य के प्रति आपका लगाव कैसे उत्पन्न हुआ?
उत्तर - मानव जीवन विविध परिस्थितियों से निर्मित होता है। परिस्थितियाँ ही मनुष्य को बनाती हैं। मैं भावुक हृदय वाला हूँ। बचपन में भावों की धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती थी। इन भावों को जब कभी मैं लिख भी देता था तो यह मुझे अच्छा लगता था। धीरे-धीरे यह लगाव कविता के प्रति बढता गया और मैं कविता लिखने लगा। कविता लिखने के पश्चात् प्रौढ़ता आने पर विचार भी परिपक्व होने लगे और मैं कविता के साथ-साथ कहानी, उपन्यास आदि विधाओं में भी लिखने लगा। परिपक्व विचारों का प्रथम आयाम 1955 में उदित हुआ जब मेरी प्रथम कहानी ‘बुझेदीप’ प्रकाशित हुई। यह कहानी काफी पसंद की गई और मैं साहित्य सृजन करता गया। गद्य की लगभग समस्त विधाओं पर मैं लेखनी चला चुका हूँ। लिखने की तथा और पढ़ने की इच्छा आज भी होती है।
 
प्रश्न: आप साहित्य लेखन का उद्दे श्य क्या मानते हैं तथा साहित्य समाज के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकता है?
उत्तर - (कुछ मुस्कुराते हुए) साहित्य समाज का एक दर्पण है। साहित्य में समाज का प्रतिबिम्व रूपायित होता है। समाज के अभाव में साहित्य का कोई औचित्य नहीं है। मेरी दृष्टि में साहित्य समय के अनुसार अपनी प्रवृत्ति बदलता है। पहले परिस्थितियाँ भिन्न थी तो उसके अनुसार साहित्य सृजन होता था और आज उससे भिन्न। आज की स्थिति के अनुसार साहित्य अपना उद्देश्य निर्धारित कर रहा है। आज वही साहित्य उपयोगी है जो समाज की यथार्थ स्थितियों एवं विसंगतियों को समाज सापेक्ष लाकर उनके निवारण का प्रयास करें और ऐसे ही साहित्य को मैं  श्रेष्ठ मानता हूँ जो समाज हित के लिए लिखा जाता हो क्योंकि साहित्य का उद्देश्य ही सभी का हित करना है। इसी कारण जो साहित्य समाज का हित सुनिश्चित करेगा वही साहित्य समाज के निकट पहुँचकर जनसामान्य के हृदय का हार बनेगा जैसा कि प्रेमचंद के साहित्य में हमें दिखाई देता है।

प्रश्न: आपके साहित्य में किस प्रकार के जनजीवन की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर - मेरा जन्म पहाड़ी ग्रामीण परिवेश में हुआ मैंने जीवन का स्वर्णिम समय वहाँ व्यतीत किया और मानव की जन्मस्थली सदैव उसके संस्कारों में दिखाई देती है। आज मैं देश की राजधानी में रह रहा हूँ और यहाँ के परिवे श को भी बहुत निकट से देखा है व महसूस किया है। यदि मेरे साहित्य में जनजीवन की बात कही जाए तो ग्रामीण और  शहरी दोनों ही परिवेशों का चित्रण किया गया है। जैसे ‘अरण्य’, ‘कगार की आग’ आदि उपन्यासों में पर्वतीय अंचल के माध्यम से ग्रामीण परिवेश का तथा ‘तुम्हारे लिए’ उपन्यास में पर्वतीय अंचल के साथ-साथ  शहरी परिवेश का चित्रण किया गया है। मेरी कहानियों में भी ये दोनों परिवेश देखे जा सकते हैं। मेरा साहित्य इन दोनों ही परिवेशों का मिला-जुला रूप है। मैं ग्रामीण संस्कृति से भी प्रभावित हुआ और  शहर आकर यहाँ के परिवेश से भी। इसी कारण मेरे साहित्य में इन दोनों ही प्रकारों के जनजीवन की अभिव्यक्ति हुई है।

प्रश्न: पत्रकारिता को जीवन का आधार बनाने का कोई विशेष प्रयोजन था?
उत्तर - देखिए, पत्रकार खुले गगन का स्वतंत्र पक्षी होता है। वह समाज में जो बुराई देखता है उसके निवारणार्थ तत्काल अपनी लेखनी चला देता है, उसकी कलम में जो ताकत होती है उससे वह समाज की हर बुराई पर वज्रपात कर सकता है। इसी कारण पत्रकारिता ने मुझे अपनी तरफ आकर्षित किया। मैं भी समाज में विसंगतियों को दूर करना चाहता था और इसके लिए पत्रकारिता से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता था इसी क्रम में मैंने ‘कादंबिनी’ तथा ‘नवभारत टाइम्स’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अपने इस कार्य का निर्वाह ईमानदारी से किया। इसी कारण मैंने इसे अपने जीवन का माध्यम बनाया और जीविकोपार्जन का साधन भी यही बना।

प्रश्न: आप साहित्य में किन-किन लेखकों से प्रभावित हुए हैं तथा इनका साहित्य आपको क्यों अच्छा लगा?
उत्तर - मैंने अपने जीवन में अनेक लेखकों के साहित्य का अध्ययन किया और इन सभी साहित्यकारों ने कहीं न कहीं मुझे प्रभावित अवश्य किया है। इनमें बांग्ला लेखक  शरत्चंद्र, प्रेमचंद, चेखव, टाल्सटॉय, स्टीफन आदि प्रमुख हैं। मैं इन सबका कृतज्ञ हूँ कि इन्होंने इतनी अच्छी कृतियाँ समाज को प्रदान की। इनके साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात् एक विशेष अनुभूति हुई कि मुझे साहित्य से अच्छा कोई साथी नहीं मिला। इन साहित्यकारों का साहित्य सामान्य जनजीवन का साहित्य है। जनसामान्य इनके नायक हैं। जब सामान्य व्यक्ति किसी कृति का नायक बन जाता है तो वह कृति विशेष हो जाती है क्योंकि वह जनसामान्य तक अपनी पहुँच बना लेती है। इसी कारण जनसामान्य पर लिखा गया साहित्य ही मुझे अधिक प्रिय लगता है और मैंने भी अपने साहित्य में अधिकांशतः इसी परंपरा का निर्वाह किया है।

प्रश्न:  वर्तमान में आप साहित्य को किस दृष्टि से देखते हो तथा भविष्य के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर -  वर्तमान में जब मैं साहित्य को देखता हँ तो उसमें कहीं-कहीं मुझे उपयोगितावाद की झलक दिखाई देती है। यह मैं समस्त साहित्य के लिए नहीं कह रहा बल्कि कुछ साहित्य इस प्रकार का लिखा जा रहा है। जिससे समाज को कोई लाभ नहीं होने वाला है। मेरे मन में एक इच्छा आज भी मुझे कचोटती है कि मैंने अब तक जो कुछ लिखा है मैं उससे और भी अच्छा लिख सकता था और उसे लिखने का प्रयास भी किया था परन्तु वह आज तक नहीं लिख सका जो मैं लिखना चाहता था, कोई एक ऐसी रचना जो समाज के लिए एक आदर्श और एक मिसाल कायम कर सके। मैं इसके लिए प्रयासरत हूँ। साहित्य के प्रति अपना दृष्टिकोण बताते हुए जोशी जी आगे कहते हैं कि समाजहित के लिए जो साहित्य सृजित किया जाएगा वही साहित्य समाज के लिए उपयोगी होगा और मैं ऐसे ही साहित्य का पक्षधर हूँ।

      कुछ मुस्कराते हुए जोशी जी कहते हैं कि आज भी आप लोगों की मुझपर और मेरे साहित्य के प्रति जो  ष्रद्धा है वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज 79 वर्ष की अवस्था होने के पश्चात् भी जब आप मुझसे यह कहते हो कि अब आप क्या कर रहे हैं तो मेरी इच्छा और बहुत कुछ अच्छा लिखने की होती है परन्तु यह इच्छा केवल इच्छा तक ही सीमित रह जाती है क्योंकि इतनी उम्र होने के पश्चात् तथा अस्वस्थता के कारण अब लिखना संभव नहीं हो पाता है।

(जोशी जी के घर में पक्षियों के घोंसलों को देखकर एक प्रश्न सहज ही मेरे मन में उत्पन्न हुआ)
प्रश्न: ये घोंसले पक्षियों ने स्वयं बनाये हैं या आपने?         
उत्तर- हमारे घर में पक्षी आते-जाते रहते हैं। पहले ये पक्षी जब आते थे तो घर में बिजली से चलने वाले पंखे से इनकी मृत्यु हो जाती थी परन्तु अब मैंने इनके लिए अलग से घोंसला बना दिया है। जिसमें ये आराम से रह सकें। जोशी जी का पक्षियों के प्रति संवेदनात्मक जबाव को सुनकर मैं गद्गद हो गया।

        इस प्रकार इनके मानवीय संवेदनायुक्त व्यवहार ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। जोशी जी के साथ प्रश्नों का दौर समाप्त हुआ तथा मैंने इनसे घर जाने की आज्ञा माँगी तो वे अस्वस्थ होते हुए भी मुझे अपने घर के गेट तक छोड़ने के लिए आए।

23 नवंबर, 2018 को जब मैंने यह सुना कि जोशी जी दिव्यलोक गमन कर गये तब मेरा हृदय अत्यधिक दुखी हुआ। जोशी जी का वह चेहरा जो साक्षात्कार के समय मुझे आकर्षित कर रहा था वह आज इस संसार में नहीं रहा! मैं इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था परन्तु यही सत्य था और ईश्वर की यही इच्छा थी। मैंने अपनी नम आँखों से इस महान आत्मा को  श्रद्धाजंलि दी। मैं आज भी जोशी जी के महानतम व्यक्तित्व और इनके मानवीय संवेदनायुक्त आदर्श व्यवहार के प्रति नतमस्तक हूँ।

डॉ. अशोक कुमार गुप्ता                              रवि  शर्मा
शोध-निर्देशक, एसोसिएट प्रोफेसर                 लेखक, शोधार्थी
चलभाष: +91 861 946 1921                        चलभाष: +91 894 709 2951
हिन्दी विभाग, एम. एस. जे राजकीय, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भरतपुर (राजस्थान)

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