मेरा देश - चंद्रमोहन भण्डारी की कविताएँ

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


दो देश, दो हिन्दुस्तान

गर्मी में झुलसते पेड
भूरी बदरंग होती घास
हर तरफ़, दिनों-दिन सिकुडते
हरियाली के द्वीप
आग उगलता सूरज, चटखती जमीन
धूल का बवंडर, धुंधलाया सूरज
सूखे चरागाह, हड्डी का ढाँचा गायें
आसमान की ओर निर्निमेष ताकते किसान
भविष्य से आतंकित
फ़िर भी उसमें कुछ खोजते बुजुर्ग, सयाने;
कहीं भी न झाँकते, आँखों में शून्य लिये
युवा और किशोर।

यह है एक हिन्दुस्तान
हमेशा खोजता भविष्य अपने अतीत में
आकाश चटखती जमीन में
अनन्त तलाशता एक विराट शून्य में।

वर्तमान वह नहीं देख पाता
वर्तमान, जो कैदी है
व्यवस्था की बेडियों में
कागजी पुलिदों के दानवी शिकंजों में
नये-नये नियमों के अघोषित अडंगों में
जीवन आधार हिलाती निराधार शर्तों में
होने, जीने और चरित्र का प्रमाण देतीं
स्वयं भ्रष्ट निकायों में।
कहने को और भी बहुत कुछ,
कैसे कैद होता है युवा वर्तमान
कोरे आश्वासनों में
जिंदगी बीत जाती है
खड़े-खड़े लाइनों में।

यह सब जिनके हाथों में है
गरूर और छलावा जिनकी बातों में है
उनके हर तरफ आसमान है
वह दूसरा हिन्दुस्तान है।

कितना फ़र्क है दोनों में
पहला हिन्दुस्तान भविष्य का आश्वासन
अतीत में पाता है और वह दूसरा
पहले की मेहनत से सोने की चिडिया बन
वर्तमान की हथेली पर सोना उगाता है।

दोनों हिन्दुस्तानी है
पर मात्र नाम समान होने से
एक नहीं हो जाते;
एक ही नाम के दो देश
दो महाद्वीप दो विश्व दो ब्रह्मांड;
हर मायने में
एक-दूसरे से अलग,असमपृक्त
सिवाय इसके कि एक का होना
दूसरे का अस्तित्व
और भी उजागर कर जाता है।

 
हिन्दुस्तान अभी जिन्दा है

मलय समीर का झोंका
या गगन में पुरवा के साथ
चलते चले आये मेघ
पछवा का झलक आता दुलार
हिमगिरि के हिमनदो से छनकर
बहकर आता अमृतमय उपहार
मानो सुदूर अंतरिक्ष से
प्रकाशवर्षीय दूरियों को मिटाते
किरण रथ पर सवार आ पहुंचे हो तुम
लेकर पहली बार ही में
आत्मीयता का अनुपम उपहार।

इतना कुछ पाकर
मै खुद से ही छला जाता हूं
अपने ही रचे ताने बाने में
यों उलझा चला जाता हूं
मेरा हाथ विदाई की मुद्रा में
उठा रह जाता है
और मुझे सहज आमीयता में सराबोर कर
तुम चले जाते हो।

जानता हूँ सभी कुछ नहीं मिला करता
हर एक को एक साथ -
गंगा यमुना भी, हिमगिरि भी
नर्मदा ताप्ती भी, नीलगिरि भी।
सुदूर उस दक्षिण प्रदेश तक
न पहुँच सके भगीरथ तो क्या
गंगा, यमुना, सरस्वती समन्वित हो
कावेरी बन बैठी है।
वैविध्य को स्वीकारती यह जमीन
राष्ट्रीय अस्मिता को नया आयाम देती है
उधर सरस्वती रूप अनगिनत धारायें
अप्रत्यक्ष होते भी उपस्थित हैं यहां
तटीय प्रतिबंधों से मुक्त
मानवीय ऊष्मा से परितृप्त।

अगली बार चला चलूंगा तुम्हारे साथ
उस हर सरिता तट पर
जहाँ सहज विवेक की निर्मल धारा
मानवीय ऊष्मा से परिपूर्ण
सभी धाराओं से जुड जाती है
और ढूंढ लेती है
इतिहास के धुंधलके व भौगोलिक विस्तार में
प्रगाढ आत्मीयता का अपरिभाषित सूत्र
जिसमें उत्तर, दक्षिण, पूरब व पश्चिम की
सभी धारायें एक हो आतीं हैं
अपनी अलग पहचानो के बावजूद।
         
नैराश्य की सदियो पुरानी परतों को चीर
प्रकाश की क्षीण किरण
सहसा मैं थाम लेता हूं
तब मुझे लगता है
भूखा, नंगा, पिछडा मेरा यह हिन्दुस्तान
अभी जिन्दा है।


कौन चलाता है

सरकारी भवनों की भूरी मटमैली दीवारें
जहां तहां उखडते पलस्तर के
आधुनिक कलाकृतिनुमा पैबन्द
रोशनदानों में शीशे की जगह
मकडजालों का पारदर्शी आवरण
बेतरतीब फैले फर्नीचर का
बेहिसाब अंबार
कलाकारों द्वारा हाथ के बजाय
मुख से बनायी गयी
दीवारों को सुशोभित करती
कत्थई कलाकृतियां
दीवार व फर्श के
संधिस्थल को परिभाषित करतीं
भारतीयता व सरकारी पन का
सम्मिलित आभास देतीं
पान की पीकें।

बाहर लम्बी कतारों में
चींटी चाल में सरकते लोग
पान की दूकान पर
पूरे वोल्यूम में चीखता रेडियो
पूरी श्रद्धा से पान खाते खिलाते
कस्टमरो को  आश्वस्त करते
दलालों के झुंड।

चींटी चाल सरकती लाइन के
अग्रिम सिरे के करीब पहुंचा – मैं
अपनी विशिष्ट स्थिति से
मन में उपजता सुरक्षा भाव;
देर से पान खाने गये
बडे बाबू के लौटने की आतुर प्रतीक्षा
और उनके लौटने की संभावना दिखाता
कुर्सी पर टंगा उनका कोट,और
खुली पडी उनकी कलम।

बस अब थोडी देर में मेरा नंबर होगा
मेरे फार्म पर होगा
बडे बाबू की तीखी निगाहों का
प्रखर आघात
मेरे ह्रदय की धडकनों का
उनके चेहरे पर उभरते
भावों से सीधा संबंध।
मेरे पीछे वालों की निगाहों में
मेरी वजह से सबको
देरी होने का आतंक।

चार घंटे प्रतीक्षा बाद हाथ आया
भूरे मटमैले कागज का टुकडा
अपठनीय उसमें लिखे अक्षर
अपठनीय सरकारी मोहर
अपठनीय तिथि व संस्तुति
अपठनीय हस्ताक्षर।

उस मटमैले कागज को
पूरी हिफाजत से
संभाल रखने की अनिवार्यता
इस और ऐसे ही कागजी नमूनों में
छिपी बडी ताकत, एक पूरी सभ्यता।

यही है इस देश का राग
यही है इस देश का भाग
समय कोई हो, जगह कोई
कागज ऐसा ही और ऐसे ही दिखेगा
उद्योग, पूंजी, पेट्रोल नहीं चलाते
इस देश को
मटमैले कागजों में अंकित
अपठनीय संस्तुतियों के विस्तार
इसे चला पाते हैं
यह चमत्कार नहीं
तो क्या है इस धरा का
लोग क्यों निरर्थक बातों पर
समय गँवाते हैं
कागजी उस धरोहर को
अंदर की जेब में सावधानी से संभाल
मैं सुरक्षित महसूस करता हूं
जेब में बार-बार हाथ डाल
अमूल्य उस  धरोहर के प्रति
निश्चिंत हो स्वयं को
उसकी शक्ति से आश्वस्त कर लेता हूं।


यह जो है देश मेरा

अद्भुत था देश मेरा
गंगा और यमुना का, कृष्णा, कावेरी का
सीता, सावित्री का, राम, कृष्ण, गौतम का
नानक, कबीर, गांधी का
रामायण, महाभारत, वेद, पुराण, गीता का।

सत युग, द्वापर, त्रेता की
कलियुग की भी सारी- कथाऐं न्यारी-न्यारी
बातों ही बातों में मूल्यों-संदर्भों की आ जाती थी बारी
लोमहर्षक चित्र कभी डराते भी, हँसाते भी
उलझते-उलझाते सवालों के हुजूम
जीवन यथार्थो से परिचय कराते भी।

कथाएँ वो बेशुमार - याद रहीं, भूली भी
बोझिल थीं कुछ, तो कुछ अंतर्मन छूती थी।
लोक कथाओं से यथार्थ घटनाओं तक
सुनी जो कहानियाँ दादी से, नानी से
माँ, बुआ, मौसी से- उनके नहीं ओर-छोर
आप्लावित कर देतीं मन-अभ्यंतर तक
चेतन, अचेतन सब कर जातीं सराबोर ।

संचित मन-हिमनद से होकर द्रवीभूत
स्नेह-सरित कर जातीं मन-प्राण आप्लावित
बालपन का मधुर सुंदर वह सपना था
विरासत में मिला जो हमारा था, हममें था।

सुना जो फिर पढा भी, गुना भी हजार बार
घर, पाठशाला में, विद्यालय गलियारों में
स्मृति-पटल अंकित हर तस्वीर उभर आयी थी
बातें वे सारी मन प्राण में समायी थी।

हाँ, यही तो था देश मेरा सपनों का
पैमाना ऊँचाई का, आस्था का मेरुदण्ड
स्नेह-सरित मरुथल में, तमस में प्रकाश-पुंज;
बसा मन प्राण में वह मुझमें, मैं उसमें था।

अदभुत यह द्दश्य कभी उलझता-उलझाता
आलोक अभ्यंतर तक आप्लावित कर जाता
पर जाने क्यों कुछ था जो रास नहीं आ पाता
कभी कहीं चुपके से दस्तक सी देकर
कोई मन के कपाट जोर से हिला जाता।

ऐसे ही अवसर पर एक दिन अचानक
देखा कोई खडा अंत:करण के द्वार,
पूछ बैठा एक बार:
कौन है रे तू, होश में है
किधर किस लोक में है?
अरे पूछ खुद से कौन है वो
जन-मन गुमराह करता
कौन वह जो विकृति सारी
भारत के नाम करता?
उपजी जहां संस्कृति मानवीय गरिमा की
अबाध स्वस्थ चिन्तन की, सर्वांगीण जीवन की
सच है अगर सब फिर
यह ध्वंस-लीला किसने मचाई है?
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
तत्र - मासूम बहुएँ किसने जलाई हैं?
कहाँ से आयी वह विकृति
बलात्कारी को मासूमों तक लायी है?
एकल घटनायें नहीं हैं ये,
जड़ें इनकी गहरी समायी हैं।

हमने तो गीता को मंत्र मूल माना था
कर्मण्येवाधिकारस्ते – भाव अपनाया था
आत्मवत सर्वभूतेषु, दर्शन यह जाना था
तब यह कर्मविहीन फल की लालसा
यह मुफ्तखोरी कहा से पाई
यह आपाधापी-लूटखसोट
पैशाचिक वृत्ति कहाँ से आई
आतिशबाजी मूल्यों-आदर्शों की
किनकी साजिश से हो पाई?
कौन चला आया हमें बदनाम करने
किसने ये सारी नफरत फैलायी?

और जो अहिंसा के गीत हम सुनाते हैं
वसुधैव कुटुम्बकम कहते न अघाते हैं
सर्वे भवन्तु सुखिन: के राग मधुर गाते हैं
अपनों का ही दर्द जान नहीं पाते हैं
दीनों-असहायों पर जुल्म किये जाते हैं
तब देख निज छाया खुद ही डर जाते हैं।

अंतर्विरोध के साये कहाँ तक छुपायेंगे
इतिहास के पन्ने दिखायेंगे हजार बार
विकृत छायाऐं, बहता दर्द का लावा
शिराओं कोशिकाओं तक उतर  आता
आंखों में अपना ही विकृत प्रतिबिम्ब
आवर्धित हजार बार तिरता चला आता।

है कैसा यह मोहभंग?
क्या देख रहा मैं अपनी ही
पराजित आस्था का लहूलुहान प्रतिबिम्ब?
अपनी कमियों को छिपाता वैचारिक द्वन्द।
सारी उपलब्धियों के बावजूद सुनायी दे रहीं
गौरव गाथाओं के घोष में दबी-दबी
बेजुबानों की मासूम चीखें;
इतिहास के धुंधलके को चीर
सुनायी देता करुण क्रन्दन,
उदारता, सहिष्णुता की गाथाओं के साथ
निर्मम क्रूर कदमों की पैशाचिक थिरकन;
बर्बरता को क्षितिज तक पहुंचाता
असहाय एवं मासूम की ग्रीवा तक पहुंचता
संकुचित होती मानवता का उद्दाम नर्तन।

ये तो न था देश मेरा
मेरी कल्पना का हिन्दुस्तान
वो विराट ह्रदय, सर्वस्वीकारी
वसुधैव कुटुम्बकम का हिमायती
कैसे मान लूं सीमित है वह छवि
मात्र कथाओं तक ही?

मंथन चलता मन में
कैसे हम सदियों तक खुद से भी भाग रहे
करवट ली वक्त ने अब
साये हमारे ही उत्तर थे मांग रहे।

तभी निर्देशक मन का
ले चला मुझे खोजने उत्तर
भटकाता वनों में
घाटियों में, गिरि शिखर में
एकांत में, जन समूहों में।

मेघों में तभी
हलचल सी मची, वाष्प कुछ संघनित हुई
सहसा एक झोंका आस्था का
उत्तर सा मन में ध्वनित हुवा –
जिसे तुम ढूंढते बाहर कहीं
गहन मन में ही तुम्हारे
मनीषी भी वहीं, दैत्य, क्रूर पिशाच भी
संकीर्ण मन का अधम भी
और ह्रदय विराट भी।
रखना याद - उपजना, पलना
नकारात्मक वृत्तियों का
नहीं सीमित मात्र एकल व्यक्तियों में
जडें उनकी दूर तक हैं
मन की विकृतियों औ कुरीतियों तक
अचेतन की अतल गहराइयों तक।

संतुलित औ विवेकी समदृष्टि लेना
सभीका, तुम्हारा भी फर्ज होगा
अतिरंजित सभी वे कल्पनाऐं
न भटकायें कभी फिर से
ध्यान रखना तुम्हारा संकल्प होगा।

और भी कुछ याद है रखना तुम्हें
मानव मूलत: पशु एक
मस्तिष्क विकसित कर प्रकृति ने
चेतन मन उसे उपहार देकर
द्वन्दमय जीवन दिया है
जो कहीं विकृतियों का स्रोत है
तो सृजन का उत्कर्ष भी है।
विरासत में बोध मिल सकता नहीं
हर एक को राह खुद ही ढूंढना है
इतिहास को ढोते चले जाना नहीं
उससे जहां तक हो सीखना है।
यही गलती सदा हम करते रहे
झूठे दम्भ से पथभ्रष्ट होते ही रहे
उन गलतियों की श्रंखला को तोड़ना है
स्वीकार त्रुटियाँ कर स्वयं को जोड़ना है।

लौट आया स्वयं से कुछ डरा सा
आश्वस्त भी था जरा  सा
इतिहास से ले सबक आगे चलेंगे
अनावश्यक दंभ से भी बचेंगे
मन की अतल गहराइयों में
मंथन चक्र चलता ही रहेगा
अमृत के साथ विष भी मिलेगा
जीवन द्वैत में विरोधी वृत्तियों का
पूरक रूप प्रयत्नों से ढूंढना होगा
तभी अपनी कल्पना के देश की छवि
प्रयत्नों से सुरक्षित रख सकेंगे
और अपनी गलतियों पर
निज की निगाहों का
वर्जनामय आक्रोश कुछ सह सकेंगे।

नतमस्तक हुवा मैं
विश्वास मन में था भले ही देर से हो
राह हमको मिलेगी
सामूहिक विवेकी प्रयासों से
बात कुछ कुछ बनेगी
विश्वास मन में है अटल
मेरे, तुम्हारे, सभी की
कल्पना का देश, भारत हमारा
हकीकत में हमारे सामने होगा
विरोध में निहित वृत्तियों को
पूरक रूप में उद्भाषित कर
मेरा, तुम्हारा – हम सभी का संकल्प होगा प्रखर
तोड़ेगा अंधे-युगों की श्रंखला
अंध-कूपों से निजात दिलाएगा
मंथन में मिला विष पिएगा
कर पराजित दैत्य अंदर का
स्वयं नीलकंठ बन जाएगा।

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