काव्य: मुण्डा आदिवासी क्षेत्र

आलोका कुजूर

झारखण्ड, छोटानागपुर के दक्षिण भाग के मुण्डा आदिवासी क्षेत्र में माना जाता है पहाड़ हमें कई विपत्तियों से बचाता आ रहा है। इसलिये 31 दिसम्बर से ले कर 14 जनवरी तक बुरु यानि की पहाड़ो की पूजा होती है और गाँव-गाँव में जतरा यानि मेला लगता है। हर मुण्डा आदिवासी के घर में इसकी पूजा होती है। यह मुंडा आदिवासी संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा है। मैंने पहाड़ से प्रेरित होकर ये कविताएँ लिखी हैं। शायद यह लेखन अपने तरह का अनोखा लेखन होगा।


किरीबुरू (एक पेड़ का नाम)
किरीबुरु को झारखण्ड से जाते देखा
कभी ट्रेन तो कभी ट्रक में
रातों  में
हाईवे से गुजरते देखा
भारत से जाते
अमरीका के रास्ते किरीबुरू को सजते देखा
कभी लोकसभा तो कभी विधानसभा
में बिकते देखा।
विकास की हवा को झारखण्ड आते देखा
उस हवा में अपनों को छितराए देखा
फैलते देखा किरीबुरु के बाज़ार को
बिक रहे थे खेचा और जमा में पहाड़
बिक रहे हैं जहाँ बेशकीमती
लोहे के पाउडर
खरीदार कार से आते एटीएम से बहा ले जाते
देखा मैंने जंगल को भागते हुए
नहीं देखा बिकते दातुन और फुटकल के फूल
बदलते हुए आदिवासियों के हाट में
बाज़ार सजा है उसी गाँव में
पहरेदार भी उसकी गाँव के 
वर्दी सरकारी थी
चौहद्दी को हथियारों से सजाया था
हॉर्न बजा बजा कर भाव पूछे जाते है.
जितना फैला है बाज़ार
उतने बड़े है खरीदार
बड़े बाज़ार में मैंने
टोकरी में
किरीबुरु को लाते, बिकते देखा।


रोरो: बुरु (आवाज करता पहाड़/पत्थर)
धमका नवामुंडी के रास्ते घोड़ों की आवाज
गाँव निकले, जमा हो गये, रोरो बुरु के पास

लाल रोड पर चले हाथी, दे गए चाम
फिसल गयी विकास की मिटटी बिर नदी के पास

चमक गयी चीन  की सत्ता, रह गया हिंदुस्तान
रोरो  बुरु के टुकड़ों से निखर रहे कई जहान 

झारखण्ड की वीरान धरती चीख रही कई बार
बेदर्दी से मत लूटो, पर्वत हैं मेरी जान

खनक नहीं वादी में, सारंडा है बेहाल
सूख गए हमारे जंगल, सूख गयी है आस

व्यवस्था ने चोट दिया है, आदिवासी है बेहाल
धूप के ताप से जी उठे हैं, जीवन बना सवाल

टोकरी में भरकर लाई, भूख, गरीबी साथ
छोड़ दिया है पडोसी ने भी, अब हमारा साथ

घूम घूमकर सत्ता भी ढकेल रहा विनाश
विनाश की मार से हम, हो गये सत्यानाश।


सुकन बुरु 

तीस तीस कोस की रानी हूँ मैं
प्रकृति सौन्दर्य से समाहित हूँ मैं
प्रेम गीत की रागिनी हूँ मैं।

हवा में सुंदर तान हूँ मैं
कोरा जैसा, असरा हूँ मैं
छौआ रूठने की जगह हूँ मैं
सुस्ताने की आशियाना हूँ मैं
लम्बी दूरी राहगीर की छाया हूँ मैं
बदलते मौसम की पहचान हूँ मैं
गाँव सीमन की चिन्हा हूँ मैं
बरखा पानी खेतों तक पहुँचाती हूँ मैं
तीस तीस कोस की रानी हूँ मैं
सात मौजा निभाती हूँ मैं
सोते नहीं भूखे, भूख मिटाती हूँ मैं
बोन का हँसना बादल का गर्जना
सब से टकरा जाती हूँ मैं
सुकन बुरु की रानी हूँ मैं।



सारजोमईकीर बुरु (साल के पवित्र नदी का पहाड़)

बहुत सरल है एतवा मुंडा का गाँव
लालखंड लालिमा के बीच
प्रतिरोध के पाँव
जारी है उलगुलान के लिए
हवाओं में गुस्से की गंध
समझ लेते सब।
कुदागढ़ा मौजा में बोन
सारजोमईकीर बुरु लहक रही
गाँव के जवानों का मन
शरद हवा, तूफान है शांत
छेड़ दी है मिट्टी की बात
रुकेंगे नहीं पाँव
जीत लेंगे दुनिया सारी
बसा  है बसाया है
झरना पहाड़ सजाया है
काठी कुदाल लिए
गुजरते है पगडण्डी के साथ
किनारे किनारे बहती है नदी
साल गाँछ और उसका गाँव।

टिप्पणी:
सरजोम = सखुआ, सराई,
साल  इकिर = पवित्र झील, झारना, जलाशय 
बुरु = पहाड़ पर्वत, हो क्षेत्र में जंगल को बुरु कहा जाता है।
मुण्डारी में बड़ा जंगल को बिर और छोटा को गुटु कहते हैं।

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