आओ हिंदी सीखें - भाग 2

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी भाषा: एक परिचय
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर वह अपनी बातें दूसरों से साझा करता है, विचारों का आदान-प्रदान करता है। इस प्रक्रिया को संप्रेषण कहा जाता है। संप्रेषण के लिए जिस माध्यम का सर्वाधिक सहारा लिया जाता है, वह है भाषा। भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने भाषा की अनेक परिभाषाएँ व्यक्त की हैं। इन परिभाषाओं में सर्वाधिक उपयुक्त एवं सार्थक परिभाषा बी. ब्लॉक तथा जी.एल. ट्रैगर की है, "भाषा यादृच्छिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है ,जिसके द्वारा मानव परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता है।" (A Language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which a social group cooperates." - Outline of Linguistic & Analysis) भाषा शास्त्रियों के अनुसार भाषा के मुख्यतः दो रूप होते हैं - मौखिक (या उच्चरित) भाषा, तथा लिखित भाषा। मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई ध्वनि है। इसका प्रयोग तब किया जाता है जब श्रोता वक्ता के सामने होता है। लिखित भाषा का इतिहास मौखिक भाषा की तुलना में अधिक पुराना नहीं है। लिखित भाषा के लिए चिह्न या वर्णों की आवश्यकता होती है। इस दृष्टि से जहाँ उच्चरित भाषा की आधारभूत इकाई 'ध्वनि' है वहीं लिखित भाषा की आधारभूत इकाई 'वर्ण' है। लिखित भाषा, भाषा का स्थाई रूप है। इनमें से भाषा का उचित रूप प्रधान, मुख्य है और लिखित रूप गौण है।

मौखिक भाषा को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए लिखित चिह्न या वर्ण बनाए गए। वर्णों की इसी व्यवस्था को 'लिपि' कहा जाता है। लिपि को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है - "मौखिक ध्वनियों को लिखित रूप में प्रकट करने के लिए निश्चित किए गए चिह्नों (प्रतीकों) की व्यवस्था को लिपि कहते हैं। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि प्राचीन ब्राह्मी लिपि से निसृत हुई है। यह बायीं ओर से दायीं ओर लिखी जाती है। भारत के संविधान में 14 सितंबर, 1949 को संघ की राजभाषा हिंदी के उस रूप को स्वीकार किया जो देवनागरी में लिखा जाता है। अर्थात् देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को भारत की राजभाषा का सम्मान प्राप्त हुआ। हिंदी के अतिरिक्त मराठी, नेपाली तथा संस्कृत भाषाएँ सामान्यतः देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।

हिंदी शब्द की उत्पत्ति:
प्रसिद्ध भाषा शास्त्री भोलानाथ तिवारी के अनुसार हमारी प्राचीन 'स' ध्वनि ईरान की अवेस्ता में 'ह' ध्वनि रूप में उच्चरित होती है। जैसे- सप्त से हफ्त तथा सप्ताह से हप्ताह। प्राचीन ईरानी साहित्य में हिंदू शब्द नदी (सिंधु) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सर्वप्रथम ईरानी लोग सिंध प्रांत की तरफ से आए तो सिंधु नदी के पास का भूमिवाचक सिंध शब्द धीरे-धीरे पूरे भारत का वाचक हो गया। 'सिंध' को ईरानी में 'हिंद' कहा गया। आगे चलकर हिंदी शब्द में ईरानी के विशेषणार्थक प्रत्यय 'ईक' जुड़ने से 'हिंदीक' शब्द बना। जिसका अर्थ था- हिंदी का। यही हिंदीक अरबी से होता हुआ ग्रीक में इंदीक, लैटिन में इंदिया तथा अंग्रेजी में इंडिया हुआ। हिंदी शब्द का सर्वप्रथम लिखित उल्लेख 1424 ई. में सरफुद्दीन यज्दी की पुस्तक 'जफ़रनामा' में मिलता है। नवीन अर्थ में हिंदी का स्पष्ट रूप से लिखित प्रयोग कदाचित सर्वप्रथम कैप्टन टेलर ने 1812ई. किया।

भाषा परिवार और हिंदी:
जिस प्रकार मनुष्य का परिवार या कुल होता है। उसी प्रकार भाषाओं का भी परिवार या कुल होता है। ऐसी भाषाओं का समूह जिनका जन्म किसी एक मूल भाषा से हुआ हो -'भाषा परिवार' या 'भाषा कुल' कहलाता है। 'परिवारों' की संकल्पना के पीछे सबसे बड़ा आधार होता है; इन समूह भाषाओं में ध्वनिगत तथा रूपगत समानताएँ। विश्व की लगभग 3000 भाषाओं को 12 भाषा परिवारों में विभाजित किया गया है। ये परिवार हैं -
1. भारोपीय
2. द्रविड़
3. चीनी
4. सेमेटिक (सामी)
5. हेमेटिक (हामी)
6. आग्नेय
7. यूराल-अल्टाइक
8. बाँटू
9. अमेरिकन (रेड इंडियन)
10. काकेशस
11. सूडानी
12. बुशमैन

भाषा परिवारों के विभाजन के क्रम में हम देखते हैं कि मुख्य परिवारों के उपपरिवार बनते चले जाते हैं, जिनके मूल में एक भाषा होती है, जैसे- हिंदी तथा उत्तर भारत के अधिकांश भाषाएँ (गुजरात, सिंधी, कश्मीरी, उड़िया, असमिया, उर्दू, मराठी, पंजाबी, बांग्ला आदि) भारोपीय परिवार में 'आर्य भाषाएँ' उपपरिवार की भाषाएँ मानी जाती हैं। इनका मूल स्रोत संस्कृत है। भारोपीय परिवार की वे भाषाएँ जो भारत में बोली जाती हैं वे 'भारतीय आर्य भाषाएँ' कही जाती हैं। इसके अलावा भारत में एक दूसरा भाषा परिवार द्रविड़ कुल भी है, जिसकी मुख्य भाषाएँ तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ हैं। ये चारों भाषाएँ दक्षिण भारत के क्रमश: तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल तथा कर्नाटक प्रांतों की भाषाएँ हैं। भारोपीय भाषा परिवार जिसको भारत-यूरोपीय भी कहा जाता है - जनसंख्या और भौगोलिक विस्तार दोनों दृष्टि से - संसार का सबसे बड़ा भाषा परिवार है। इसके बोलने वाले भारत तथा यूरोप के देशों में बसते हैं। इसी से निकली भारतीय भाषाओं को विकास क्रम के अनुसार तीन कालों में बाँटा जाता है -

1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा - वैदिक संस्कृत - 2000 ई.पू. से 1000 ई.पू.
 लौकिक संस्कृत (संस्कृत) - 1000 ई.पू. से 500 ई.पू.
2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा - पालि और प्राकृत - 500 ई.पू. से 1 ई.
 अपभ्रंश और अवहट्ठ - 500 ई.से 1000 ई.
3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा - हिंदी और हिंदीतर भाषाएँ - (बंगला, उड़िया, असमिया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी) 1000 ई. से अब तक।

वैदिक संस्कृत का व्यवहार चारों वेदों में मिलता है। इनमें ऋग्वेद संसार का सबसे प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है; जिसका संकलन पंचनद (पंजाब) में हुआ माना जाता है। वेदों को अपौरुषेय ग्रंथ भी कहते हैं। वेद वह ईश्वरीय वाणी है जो ईश्वर ने गुरुओं को दी और गुरुओं ने अपने शिष्यों को मौखिक रूप से अभ्यास करवाया। यह अभ्यास छंदबद्ध था इसलिए वेदों को 'छांदस' तथा 'श्रुति ग्रंथ' भी कहते हैं। बाद में इनका संकलन महर्षि वेदव्यास ने किया।

लौकिक संस्कृत या जिसे सामान्यतः 'संस्कृत' भी कहते हैं, में लिखित ग्रंथ हैं - रामायण, महाभारत तथा परवर्ती प्रचुर साहित्य। आज पठन-पाठन में इसी संस्कृत का व्यवहार होता है, जिसे प्राचीन काल में लौकिक संस्कृत कहा गया। 'संस्कृत' शब्द का सर्वप्रथम लिखित रूप में उल्लेख वाल्मीकि कृत 'रामायण' में मिलता है। पाणिनी कृत 'अष्टाध्यायी' जो इसी संस्कृत का व्याकरण है। अर्थात यह इसी संस्कृत की रचना है। कालिदास, भवभूति, विश्वनाथ, मम्मट, भामह, वामन, कुंतक, क्षेमेंद्र आदि सब विद्वान इसी संस्कृत के हैं।
लौकिक संस्कृत का परवर्ती रूप है - पालि। पालि को हम बुद्धवचन की भाषा भी कहते हैं। संपूर्ण बौद्ध साहित्य इसी में लिखित है। धम्मपद, त्रिपिटक, दीपवंश, महावंश इस भाषा के गौरव ग्रंथ हैं। प्राकृत का क्षेत्र विस्तार अधिक रहा। इसे अनेक भागों में विभाजित करके आधुनिक हिंदी परंपरा का मूल्यांकन करते हैं। प्राकृत का रूप परिवर्तित हुआ। देश में उस समय यानी 500 ई. तक प्राकृत का प्रभाव दृष्टिगत होता है। 500 ई. में अपभ्रंश और अवहट्ठ की उपस्थिति हुई। अपभ्रंश की विभिन्न अवस्थाओं में शौरसेनी, मागधी, अर्द्धमागधी, ब्राचड़, पैशाची, महाराष्ट्री आदि कई रूप प्रचलित थे। अपभ्रंश जैन साहित्यकारों की मुख्य भाषा रही, जिसका क्षेत्र विस्तार गुजरात तथा राजस्थान रहा। अपभ्रंश के प्रमुख रचनाकारों में स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल, मुनिकनकामर, जोइंदु आदि नाम प्रमुख हैं। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है, जिसका प्रयोग 500 ई. से 1000 ई. के बीच हुआ। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि -

वैदिक संस्कृत >लौकिक संस्कृत> पालि> प्राकृत> अपभ्रंश> अवहट्ट> पुरानी हिंदी तथा हिंदी;
यह है हिंदी की गौरवपूर्ण परंपरा की शृंखला।

हिंदी के विकास के चरण:
हिंदी के विकास की बात करते हैं, तो खड़ी बोली के साहित्यिक रूप को देखा जाता है। जिसके प्राचीन नमूने दसवीं शताब्दी के आसपास मिलते हैं। इसी से हम हिंदी साहित्य की शुरुआत मानते हैं। सर्वप्रथम अमीर खुसरो की पहेलियों और मुकरियों में हमें खड़ी बोली का प्रयोग मिलता है। खड़ी बोली जब बोलचाल रूप में प्रचलित थी उस समय साहित्यिक रचनाओं अर्थात काव्य की भाषा ब्रज और अवधी हुआ करती थी। इस दृष्टि से हम हिंदी को तीन रूपों में विभक्त करके देख सकते हैं - 1. प्राचीन हिंदी 2. मध्यकालीन हिंदी, तथा 3. आधुनिक हिंदी।
प्राचीन हिंदी के अंतर्गत आदिकालीन साहित्य को लिया जा सकता है। जिसमें अमीर खुसरो, विद्यापति, चंदबरदाई जैसे रचनाकारों की हिंदी सम्मिलित हो सकती है। मध्यकालीन हिंदी की प्रमुख बोलियाँ ब्रज और अवधि अपने भाषायी रूप में प्रधानता प्राप्त किए हुई थीं, जिसमें हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन तथा रीतिकालीन रचनाकारों को सम्मिलित किया जा सकता है। सूरदास ब्रजभाषा के सिरमौर कवि थे, तो तुलसीदास अवधी के सुमेरु कवि तथा जाज्वल्यमान नक्षत्र थे। आधुनिक काल का आरम्भ हम भारतेंदु काल यानी 18वीं शताब्दी से मानते हैं, जब कोलकाता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। जॉन गिलक्राइस्ट हिंदी अर्थात हिंदुस्तानी विभाग के अध्यक्ष तथा प्राचार्य थे। इस कॉलेज में चार भाषा मुंशियों की नियुक्ति हुई - लल्लूलाल, सदल मिश्र, इंशाअल्लाह खाँ, सदासुखलाल 'नियाज'। चारों ने आधुनिक खड़ी बोली संपन्न हिंदी की नींव रखी, जिस पर आगे चलकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद रूपी कारीगरों ने इस महल को सुंदरता प्रदान की। वर्तमान हिंदी यानी खड़ी बोली को परिष्कृत करने वाले आचार्य तथा लेखक थे महावीर प्रसाद द्विवेदी जिन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से आज की हिंदी का वर्तमान प्रांजल, परिष्कृत रूप सामने रखा। उत्तर भारत की खड़ी बोली को मुसलमान दक्षिण भारत ले गए जहाँ दक्खनी हिंदी के रूप में इसका विकास हुआ। बाद में इसी खड़ी बोली के परिष्कृत, मानक रूप को हिंदी का दर्जा प्राप्त हुआ। संविधान में इसके मानक रूप को अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी नाम से उल्लेख किया।

हिंदी की प्रमुख उपभाषा तथा बोलियाँ:
हिंदी भाषा के अंतर्गत पाँच उपभाषाओं का उल्लेख किया जाता है। इन पाँच उपभाषाओं के अंतर्गत कुल अठारह बोलियाँ शामिल की जाती हैं। जिनका उल्लेख निम्नलिखित है -

उपभाषा बोली
1. पश्चिम हिंदी - 1. ब्रजभाषा, 2. खड़ी बोली, 3. बाँगरू (हरियाणवी), 4. कन्नौजी, 5. बुंदेली
2. पूर्वी हिंदी - 1. अवधी, 2. बघेली, 3. छत्तीसगढ़ी
3. बिहारी - 1. मगही, 2. मैथिली, 3. भोजपुरी
4. पहाड़ी - 1. पश्चिमी पहाड़ी, 2. मध्यवर्ती पहाड़ी, 3. पूर्वी पहाड़ी
5. राजस्थानी - 1. पश्चिमी राजस्थानी, 2. पूर्वी राजस्थानी, 3. उतरी राजस्थानी, 4. दक्षिणी राजस्थानी

इतिहास के आईने में हिंदी:
1. हिंदी दिवस -14 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिन 14 सितंबर, 1949 को संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया था।
2. हिंदी का प्रथम व्याकरण सन् 1685 में हॉलैंड निवासी जॉन जेसुआ केटेलर ने 'हिंदुस्तानी भाषा' शीर्षक से 'डच' भाषा में लिखा था।
3. हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास ग्रंथ फ्रेंच भाषा में गार्सा द तॉसी द्वारा 1839 में 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई हिंदुस्तान' लिखा।
4. नागरी लिपि का टाइप सबसे पहले यूरोप में बना। सन् 1716 में एम्सटरडम में प्रकाशित चाइना इलेस्ट्रेला पुस्तक में नागरी के कुछ अक्षर पहली बार छापे गए।
5. हिंदी का प्रथम समाचार-पत्र 'उदन्त मार्त्तण्ड' 30 मई,1826 को कोलकाता से जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में  नाम से निकला जो छह महीने चलकर 11 दिसंबर, 1827 को बंद हो गया। यह साप्ताहिक पत्र था।
6. हिंदी का पहला दैनिक समाचार पत्र 'समाचार सुधावर्षण' कोलकाता से 1854 में बाबू श्यामसुंदर सेन के संपादन में निकला।
7. हिंदी भाषी क्षेत्र से छपने वाला हिंदी का पहला समाचार पत्र 1845 में राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' के संपादन में 'बनारस अखबार' नाम से काशी में छपा था।
8. महिलाओं की समस्याओं पर आधारित हिंदी की पहली पत्रिका 'बाला बोधिनी' 1 जून, 1874 को भारतेंदु हरिश्चंद्र ने निकाली। जो मासिक पत्रिका थी।
9. हिंदी भाषी क्षेत्र से निकलने वाला प्रथम दैनिक समाचार-पत्र था - 'हिंदोस्तान' जिसे 1885 में प्रतापगढ़, कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने निकाला था।
10. भारत में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर (महाराष्ट्र) में 10-14 जनवरी, 1975 को संपन्न हुआ।
11. विदेशों में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरिशस में 28 अगस्त, 1976 को हुआ जो द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन था।
12. अब तक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं। 11वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरिशस में 18-20 अगस्त, 2018 को संपन्न हुआ।
13. हिंदी में एम.ए. कक्षाएँ सर्वप्रथम कोलकाता विश्वविद्यालय में सन् 1918 में आरंभ हुई। उस समय हिंदी विभागाध्यक्ष पंडित सकल नारायण शर्मा थे।
14. राजभाषा आयोग की स्थापना 7 जून, 1955 को की गई। आयोग के प्रथम अध्यक्ष श्री बालगंगाधर खरे थे।
15. सर्वमान्य रूप से 'सरहपा 'को हिंदी का प्रथम कवि माना जाता है। इनका संबंध बौद्ध- सिद्ध साहित्य से है।
16. खड़ी बोली हिंदी का प्रथम कवि अमीर खुसरो को माना जाता है।
17. खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास (सन् 1914) माना जाता है। इसके रचनाकार अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' थे।
18. हिंदी की पहली कहानी लेखिका राजेंद्र बाला घोष (1882-1949) थीं, जिन्हें 'बंग महिला' के नाम से भी प्रसिद्धि मिली। इनकी महत्वपूर्ण कहानी 'दुलाईवाली' है।
19. हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास लाला श्रीनिवासदास कृत 'परीक्षा गुरु' (सन् 1882) माना जाता है।
20. हिंदी में सर्वप्रथम क्रिकेट उद्घोषक श्री देवराज पुरी और ज्ञानेंद्र नारायण थे। यह कमेण्टरी सन् 1952 में आरंभ हुई।

हिंदी भाषा का इतिहास, स्वरूप तथा विकास का क्रम बहुत ही व्यापक तथा जटिल है। जिसे कुछ शब्दों या पृष्ठों में शब्दबद्ध करना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है। हिंदी की सामान्य जानकारी से पाठकों को रूबरू करवाने के लिए यह तो एक प्रयास था। इस संबंध में सामान्य तथ्यपरक जानकारी को दृष्टिगत रखा गया है। प्रमुख रूप से इतिहास क्रम के विभिन्न चरणों के अंतर्गत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को दृष्टिगत रखा गया कि जिनका वर्णन छूटना नहीं चाहिये। इस शृंखला को आगे अन्य आलेखों में किसी न किसी रूप में वर्णित किया जाना हमारा मुख्य ध्येय है। हिंदी का इतिहास लगभग 1000 वर्ष का है। यह स्वर्णिम इतिहास है। इसको अनेक रचनाकारों, भाषाविदों ने अपनी साधना से पल्लवित एवं पुष्पित किया है। आज हिंदी के अनेक रूप प्रचलित हैं - जिनमें प्रयोजनपरक, मीडियाकालीन हिंदी, जनसंचार की हिंदी, फिल्मों की हिंदी, बाजार की हिंदी आदि अन्यान्य रूप सम्मिलित हैं। इस विशाल वटवृक्ष की शाखा-प्रशाखाएँ देश और देश से बाहर फैलती जा रही हैं। बाजार ने हिंदी को एक नई पहचान और पोशाक दी है। जिससे यह पुरातन दुल्हन अपने नए नाज़-नखरों के साथ बराबर विकास की ओर उन्नति के लिए अग्रसर है। हमारा प्रयास आपको हिंदी के इस विकास क्रम में आने वाली समस्त कड़ियों का संक्षिप्त एवं सारगर्भित वर्णन-विश्लेषण आगामी आलेखों में उपलब्ध करवाने का है। आपसे विनम्र अपील है कि क्रमबद्ध रूप में गुँथे हुये प्रत्येक आलेख को पढ़ते जायें और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते जायें।


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