अतिथि देवो भव: (संस्मरण)

शशि पाधा

- शशि पाधा

हमारे उपनिषदों में एक बहुत ही सार्थक और अमूल्य पंक्ति है –अतिथि देवो भव। यानी अतिथि देवता के समान पूजनीय और आदरणीय है। हर प्राणी को घर आए अतिथि का तन, मन और धन के साथ सत्कार करना चाहिए। इन तीन शब्दों में भारत की पूरी संस्कृति समाहित है। यही हमारे जीवन मूल्यों की पूञ्जी भी है। हमने बचपन से अभी तक बड़े होते हुए अपने घरों में यही देखा है कि कोई भी, किसी भी समय घर पर आए, उसका मान-सम्मान करना और आदर सत्कार करना हमारा कर्तव्य हो जाता है।

समय बदल गया है और ‘अतिथि’ शब्द का अर्थ भी बदल गया है। अब अतिथि के आने की तिथि भी महीनों पहले पता होती है और समय भी। कितने दिन रहना है, यह भी तय होता है। किसी मेहमान के अचानक आ जाने की जो खुशी घर में छा जाती थी, वैसा अनुभव शायद आज की पीढ़ी को हो नहीं सकता। अतिथि सत्कार का जो अनुभव मैंने आज से लगभग 30 वर्ष पूर्व किया है उस सुखद अनुभव को शब्दों में बाँध पाना ही कठिन है। फिर भी आप के साथ साझा कर रही हूँ।

हिमाचल प्रदेश में एक छोटा सा नगर है – नाहन। पहाड़ों की गोद में बसे इस नगर में स्थित सैनिक छावनी में हम कुछ परिवार बड़े शहरों की दौड़-धूप से दूर प्रकृति के आंगन में रहते थे। आस पास पहाड़, देवदार के वृक्ष और पहाड़ी झरनों के साथ हमारा प्रतिदिन का मेलजोल था। छोटी सी छावनी में रहते हुए सभी परिवार कुछ नया, कुछ रोमांचक करते ही रहते थे। कभी पहाड़ी पर ट्रैकिंग के लिए निकल जाते थे और कभी किसी नदी में तैरने। मनोरंजन के इन प्राकृतिक साधनों को छोड़ कर वहाँ कुछ करने को नहीं था।

एक बार तीन छुट्टियाँ इकट्ठी आ गईं। हमारे सैनिक परिवार ने नाहन नगर से दूर हरिपुरधार के जंगलों में दो दिन की पिकनिक मनाने का फ़ैसला लिया। फैसला यह भी था कि ज़्यादा सामान न लिया जाये। यानी जो भी वहाँ पर उपलब्ध हो उसी से गुज़ारा किया जाए। निर्णय चुनौतीपूर्ण था क्योंकि सब के बच्चे छोटे थे, फिर भी ऐसी चुनौती के लिए सभी उत्साहित थे।

हरिपुरधार का पहाड़ी क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से आकर्षक है। वहाँ जंगल भी हैं, पहाड़ भी और झरने भी। वहाँ वन विभाग का एक डाकबंगला भी था। तो बस देरी किस बात की। हाँ, एक बात थी कि यह नगर नाहन से लगभग 106 किलोमीटर की दूरी पर था। जाने का रास्ता संकरा भी था, कच्चा-पक्का भी और घुमावदार भी। लेकिन हमारा उत्साह कोई कम नहीं था। हम सब इस नये प्राकृतिक स्थल को देखने के लिए लालायित थे।

सैनिकों का जीवन जीने का अपना एक अलग ढंग होता है। जहाँ जाओ, मैस डिटैचमेंट साथ ही चलती है। अपने पाठकों को मैं ‘मैस’ शब्द का अर्थ समझा दूँ। छावनियों में प्रत्येक यूनिट की अपनी मैस होती है जिसमें अविवाहित अधिकारी या जिनका परिवार उस स्टेशन पर नहीं रहता, खाना खाते हैं। यूनिट की सारी पार्टियाँ भी मैस में ही होती हैं। जैसे शहरों में क्लब होते हैं लगभग वैसे ही सैनिक मैस होती है। लेकिन फौजी मैस का वातावरण घर जैसा ही होता है। हमारी मैस के सबसे कुशल और प्रिय संचालक हवलदार ठाकुर प्रसाद हर एक की रुचि का ध्यान रखते थे। बच्चों में तो वो कुछ ज़्यादा ही प्रिय थे क्योंकि उन्हें जो चाहिए ठाकुर प्रसाद भैया कहीं से भी उपलब्ध करा ही देते थे।

इस पिकनिक के लिए भी सभी निश्चिन्त थे। ठाकुर प्रसाद भैया जो थे हमारी चिंता करने वाले। जाने वाले दिन की सुबह हम सब बड़े और बच्चे अपनी-अपनी गाड़ियों में सवार हो कर इस सफ़र के लिए निकल पड़े। याद नहीं पर शायद तीन-चार जीप-जोंगा* गाड़ियों में हम सब थे और ठीक पीछे वन टन** में मैस डिटैचमेंट यानी खाने-पीने का बंदोबस्त, कुक, वेटर और ठाकुर प्रसाद भैया। दूरी तो केवल 106 किलोमीटर की थी किन्तु पहाड़ी रास्ते पर गाड़ियाँ रेंगती हुई जा रही थी। आसपास प्रकृति भी अपने पूरे ताम-झाम के साथ हमारे साथ-साथ ही चल रही थी। सब मजे में थे।

आधे से अधिक रास्ता तय करने के बाद बच्चों को भूख सताने लगी और बड़ों को चाय-काफ़ी की तलब। हम सब अपनी गाड़ियों से उतर कर एक ढलान पर बैठ कर उस गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगे जिसमें खाने-पीने का बंदोबस्त था। आधा घंटा तो अन्ताक्षरी में नये- पुराने गाने गाते बीत गया। आधा और बच्चों को बहलाने में। लेकिन मैस की गाड़ी का कोई नामो-निशान नहीं। रेडियो सेट पर बात करने से पता चला कि हमारे खाने पीने के सामान वाली गाड़ी खराब हो गई है और उसके आने में दो तीन घंटे लग सकते थे। हम और कितनी देर तक बच्चों को पहाड़ी झरने का पानी पिला कर बहला सकते थे। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। आस –पास घनी धुंध भी थी और घने जंगलों में कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। सूरज देवता भी आँख मिचौली खेल रहे थे। आगे का रास्ता भी अभी और लंबा था।

तभी हम से किसी की दृष्टि दूर पहाड़ी पर बैठे एक बकरवाल पर पड़ी जो वहाँ अपनी भेड़-बकरियाँ चरा रहा था। एक सैनिक अधिकारी ने उसे आवाज़ लगाई तो वो इतने सारे लोगों और सैनिक वाहनों को देख कर कुछ हैरान हो गया, क्योंकि ऐसे स्थान पर लोगों का आना –जाना कम ही होता होगा। कुछ झिझक कर वो हमारे पास आया तो हमने उससे पूछा कि क्या यहाँ बच्चों के लिए कुछ खाने को मिल सकता है। उसने बड़ी सहजता से उत्तर दिया, “हाँ जी, अगर आप यहाँ से कुछ ही दूर ढलान पर जाएँ तो वहाँ एक छोटा सा गाँव है। कुछ ही घर हैं लेकिन वहाँ आपको कुछ न कुछ मिल सकता है। मेरा ठिकाना तो यहाँ से बहुत दूर और भी ऊपर है। नहीं तो मैं ही बच्चों के लिए दूध ले आता।”

हम भूख के मारे भी थे और उस अनजान पर्वत पर पहाड़ी गाँव देखने को भी उत्सुक थे। हमने उन कच्चे-पथरीले रास्तों से नीचे ढलना शुरू किया। थोड़ी ही दूरी पर दो तीन घर दिखाई दिए। हमें उन लोगों ने नीचे ढलान से उतरते देख लिया था और वे सब घरों से बाहर खड़े जैसे हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। पास जाकर लगा कि वो लोग हमें देख कर खुश भी थे और हैरान भी। स्त्रियाँ और बच्चे दूर खड़े हो कर हमें और हमारे बच्चों को बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे।

हमारे साथ आए एक अधिकारी ने अपना परिचय दिया और फिर बड़े संकोच के साथ उन्हें हमारे इतनी दूर सड़क से नीचे उतरने का कारण बताया। कुछ मिनटों में वहाँ आदर-सत्कार की झड़ी लग गई। बीच आंगन में दो चारपाइयाँ बिछ गईं। किसी घर से मक्की और बाजरे की रोटियाँ, किसी घर से आम का आचार और कहीं से कुछ मीठा पीतल की थालियों में सजा हुआ आ गया। गाँव के सभी लोग हमारे आस-पास हाथ जोड़ कर खड़े रहे। हमें उस स्वादिष्ट खाने का आनन्द तो आ रहा था पर हम उनके निश्छल स्नेह से अभिभूत थे। दो तीन आदमी दोनों अधिकारियों से बातचीत में मग्न थे। स्त्रियाँ और खाने का आग्रह करने लगीं। इतने में एक सात-आठ बरस का बच्चा भागता हुआ आया। उसके हाथ में ग्लूकोस बिस्किट के दो पैकेट थे। आते ही उसने वे पैकेट खोले और पूरी आत्मीयता के साथ हमारे बच्चों के बीच बाँटने लगा। उस दिन शायद हमारे बच्चों को इससे अधिक स्वादिष्ट चीज़ नहीं मिली होगी। अब वहाँ के बच्चे और हमारे बच्चे जाने क्या-क्या बातचीत कर रहे थे। गाँव के बच्चे उन्हें वहाँ लगे पेड़ों पर फल दिखला कर खुश हो रहे थे। कहीं सेब, कहीं नाशपाती और कहीं खुमानियाँ लगी थी।
हम लोग आराम से वहाँ बैठ कर उन पहाड़ी लोगों से बातचीत करने लगे। उनका निर्मल स्नेह और आतिथ्य पाकर हम धनी हुए जा रहे थे। हमें लगा ही नहीं कि हम सब पहली बार मिल रहे हैं। पूरा वातावरण बहुत सुखद था। हम भूल ही गए थे कि यह हमारी मंजिल नहीं थी। अभी तो हमें और दूर जाना था। इतने में ऊपर की पगडंडी से हमारा ड्राइवर उतर के आ गया। उसने सूचना दी कि गाड़ियाँ ठीक हो कर निकल पड़ी हैं और अब हम भी आगे की यात्रा कर सकते हैं।

हम सब उन्हें धन्यवाद कहते हुए आपस में गले मिलने लगे। शहरों के व्यवहार के अनुसार हमारे साथ आए एक अधिकारी ने अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले। वो जैसे ही वहाँ खड़े सब से वृद्ध आदमी को पैसे देने लगा, तो वे भलेमानस हाथ जोड़ कर खड़े हो गये और बड़े स्नेह से बोले, “न, साहब जी न। यह क्या कर रहे हैं आप? आप हमारे मेहमान हैं। हमारा सौभाग्य है कि हमें ईश्वर ने आपसे मिलने का अवसर दिया। आप लोग फौजी हैं, आप हमारी रक्षा करते हैं, आप तो हमारे भगवान हैं। पैसे देकर आप हमें शर्मिंदा मत कीजिए। आप को और कुछ चाहिए तो बिना झिझक के बता दीजिए।”

उनके इन स्नेहसिक्त शब्दों को सुन कर हमें लगा जैसे हम अपने ही घर से किसी यात्रा पर निकल रहे हैं। जाते-जाते उस छोटे से गाँव के लोगों ने बच्चों को पेड़ से तोड़ कर ताज़ा फल भेंट किए।

यह बात आज से लगभग 35 वर्ष पुरानी है। तब हम सब के बच्चे बहुत छोटे थे। किन्तु आज भी जब हम हरिपुरधार की पिकनिक की बात करते हैं, सब से पहले उस गाँव की याद आ जाती है। अब युग बदल गया है। इसके साथ जीवन मूल्य और आचार-व्यवहार भी। अब सोचती हूँ कि गाँव के लोगों के घर में रोटी-सब्जी तो थी ही लेकिन उस छोटे से बच्चे ने अपने हिस्से के बिस्किट भी बड़े स्नेह से हमारे बच्चों को खिला दिए। वहाँ कोई दुकान तो थी नहीं, उस बच्चे को भी यह उपहार में मिले होंगे, जब कोई परिवार का सदस्य पास के किसी नगर में गया होगा।

सोचती हूँ --- इसमें आश्चर्य की कोई बात ही नहीं। यही हमारी संस्कृति है और यही हमारी परम्परा। हम वहाँ से जो सेवा-सत्कार का उपहार ले कर जा रहे थे वो अमूल्य था और वो अनुभव किन्हीं शब्दों में गढ़ा नहीं जा सकता।
टिप्पणी
*वन टन - सेना में प्रयुक्त होने वाला क्लास-3 ट्रक फौज जो सामान्य भारतीय ट्रक से कुछ छोटा होता है।
**जोंगा जीप का निसान द्वारा परिकल्पित विकल्प जो भारतीय सेना व अर्धसैनिक बलों के लिये जबलपुर में बनाया जाता था। हाई ग्राउण्ड क्लीयरेंस तथा वन-टन के समान शक्तिशाली इंजन के कारण यह आल-वील-ड्राइव एसयूवी वाहन भारतीय सेना में उपयोगी था।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।