भूमंडलीकरण की विसंगतियों का प्रतिपक्ष: कुँवर नारायण की काव्यदृष्टि

कुमार सौरभ
शोधार्थी (नेट-जेआरएफ), तेजपुर विश्वविद्याल, तेजपुर, असम
चलभाष: +91 801 181 0461
ईमेल: saurabhpoet@gmail.com

साहित्य का जीवन से और जीवन का साहित्य से गहरा संबंध है, परन्तु समय और परिस्थितियों के बदलाव ने इस संबंध की गहराई को प्रभावित किया है। इक्कीसवीं शताब्दी के इस दौर में मनुष्य की एक बड़ी आबादी भौतिक विकास को मानव-विकास का मानदंड मानने लगी है। यह दौड़ भावों के संकुचन का दौड़ है। हम प्रैक्टिकल हो चले हैं, हमारा हृदय भी, और उसमें बसने वाली संवेदना भी। भावों के संकुचन के इस दौड़ में यह एक विचारणीय प्रश्न है कि कविता जैसी, हृदय के भावना पक्ष से सम्बंधित विधा के लिए कितना स्थान शेष रह गया है। प्रश्न यह भी उठता है कि तमाम तरह की भौतिक विकास के साधनों के बीच कविता अगर हमारी ज़रूरत है तो किस तरह की ज़रूरत है? भूमंडलीकरण ने बाजारवाद को जन्म दिया और इस बाजारवाद ने मानव के वस्तु में परिवर्तित हो जाने की प्रक्रिया को बढ़ाया। मनुष्य की एक बड़ी आबादी मानो यंत्र में बदल चुकी है, और शेष आबादी लगातार यंत्र में बदलने की कोशिश हो रही है। कविता यांत्रिक हो नहीं सकती, कविता वस्तु बन नहीं सकती। तो फिर आखिर ऐसे परिवेश में कविता अपनी क्या भूमिका तय करे।

कुँवर नारायण साहित्य और कविता की सार्थकता पर विचार करते हुए कहते हैं,”मुझे वह साहित्य पसंद है जो इस मानसिक विस्तार का परिचायक हो (और नमूना भी) कि प्रगति का अर्थ केवल भौतिक या तकनीकी प्रगति नहीं- उसकी दिशा केवल जेट एज की ओर नहीं बुद्ध के आत्मान्वेषण की ओर भी हो सकती है”(मेरे साक्षात्कार, पृष्ठ-33) इस बुद्ध के आत्मान्वेषण का प्रतिफलन कवि के मानवीय सरोकारों से संबद्धता के रूप में हम पाते हैं। कविता का एक प्रधान उद्देश्य मानव-मानव के बीच चौरी होती खाई को पाटना भी है। भूमंडलीकरण से उपजे बाजारवाद ने जहाँ एक ओर गलाकाट-प्रतिस्पर्धा और एक दूसरे को कुचलकर आगे बढ़ जानेवाली मनोवृत्ति जैसी विसंगतियों को जन्म दिया वहीं कुँवर जी की कविताओं में हम इन विसंगतियों का प्रतिपक्ष देखते हैं। ऐसे समय में जब मानवता लहूलुहान हो रही है कुँवर नारायण का सम्मेदीन एक व्यक्ति मात्र नहीं रह जाता वह सम्पूर्ण मानवता का पोषक बन जाता है- “दुनिया को ख़बर रहे/ कि एक बहुत बड़े नैतिक साहस का/ नाम है सम्मेदीन कितना ज़रूरी है यह नैतिक साहस? ख़ास कर एक ऐसे समय में जब उसे पता है कि “जल्दी ही वह मारा जायेगा?” कविता शायद उसी उजाले को बचाने की कवायद है जिसके विषय में कुँवर नारायण लिखते हैं-
“बचाए रखना
 उस उजाले को
 जिसे अपने बाद
 ज़िंदा छोड़ जाने के लिए
 जान पर खेल कर आज
 एक लड़ाई लड़ रहा है
 किसी गाँव का कोई ख़ब्ती सम्मेदीन “

इस उजाले को बचाए रखना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यही उजाला मानवीय अस्तित्व की नीव को ऊष्मा प्रदान कर रहा है। यह लड़ाई सिर्फ सम्मेदीन की लड़ाई नहीं है यह मानवता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हर उस चरित्र की लड़ाई है जो अंधेरों के खिलाफ़ है।

           वैश्वीकरण ने तो एक देश के लिए दूसरे देश के द्वार को खोल दिये हैं परन्तु इसके प्रभाव ने एक मानव के लिए दूसरे मानव के हृदय के द्वार को बंद कर दिया है। कुँवर नारायण कविता द्वारा इस द्वार को खोलना चाहते हैं। वे कविता द्वारा इस सिकुड़ती हुई दुनिया को थोड़ा बड़ा करना चाहते हैं, उनके इस प्रयास को इन पंक्तियों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। “अपने को बड़ा रखने की/ छोटी-से-छोटी कोशिश भी/ दुनिया को बड़ा रखने की कोशिश है।” ध्यातव्य है कि बाजारवाद ने मनुष्य के बड़े होने की कसौटी को ही बदल दिया है उसने भौतिक संसाधनों के विकास को मानव-विकास का पैमाना बना दिया, जबकि यह विकास का वास्तविक नियामक नहीं है। कुँवर नारायण कविता का लक्ष्य मनुष्य को उसके वास्तविक विकास तक पहुंचाना मानते हैं। वे मानवीय गुणों को विकसित कर मनुष्य में निहित संभावनाओं को पर देना चाहते हैं। किसी व्यक्ति का जीवन उसके स्वयं के अनुभव तक सीमित नहीं है, कविता या साहित्य उसके स्वयं के अनुभव से ज्यादा बड़ी दुनिया कि तलाश है। कुँवर नारायण के शब्दों में, “जीवन को अक्सर हम केवल अपने ही अनुभव तक कुछ इस तरह सीमित मान लेते हैं कि उनका विशदीकरण नहीं हो पाता। मनुष्य के बाहर और भीतर की दुनिया एक व्यक्ति के निजी अनुभवों से कहीं ज्यादा बड़ी होती है; उसके उत्खनन और खोजबीन के साधनों का भी उपयोग कर सकने की क्षमता लेखक में होनी चाहिए। प्रखर रचनात्मक प्रतिभा केवल अपने ही नहीं दूसरों के अनुभवों को भी आत्मसात कर सकने में समर्थ होती है, तभी उसके अपने अनुभवों को भी वह व्यापकता गहराई और सम्पन्नता मिल पाती है जो श्रेष्ठ साहित्य का विशेष गुण माना गया है।” (मेरे साक्षात्कार, पृष्ठ-42)

           कुँवर नारायण की नज़रों में कविता का एक ख़ास स्थान इसलिए भी है क्योंकि कविता को वे मानवीय संभावनाओं की खोजबीन करने का माध्यम मानते हैं। वे कविता के माध्यम से जीवन पर विचार करना चाहते हैं, और इस विचार-मंथन से निकले तत्वों से मानवीय जीवन की व्यापकता और सार्थकता को सिद्ध करना चाहते हैं। भूमंडलीकरण से उपजी विसंगतियों का एक बुरा प्रभाव यह रहा है कि उसने मानव का मानवीय गुणों से भरोसा ख़त्म करने की दिशा में बहुत तेजी से कदम बढ़ाया है। कुँवर नारायण उस कविता को महत्त्व देते हैं, जिसके द्वारा मानवीय गुणों के प्रतिस्थापन का प्रयास हो किया गया हो। यही कारण है कि अपनी कविता में मानवीय संवेदनाओं की परिधि को उन्होंने कभी संकुचित नहीं होने दिया। कुँवर नारायण स्वयं भी इस बात को स्वीकारते हैं कि “मेरी कविताओं की एक विनम्र कोशिश रही है कि हमारी संवेदनाओं की परिधि संकुचित न होने पाए।”(मेरे साक्षात्कार, पृष्ठ-38)

           ध्यातव्य है कि यह वही मानवीय संवेदना है जिसे कुचलने की कोशिश बाजारवाद ने लगातार की है। संवेदनाओं की परिधि के संकुचन के इस दौर में कुँवर नारायण का उपरोक्त वक्तव्य हमें ढाढस बंधाता है। कुँवर नारायण की काव्य-दृष्टि मानव को वस्तु में बदलने वाली प्रक्रिया से सीधा मुठभेड़ करती है। कुँवर नारायण को साहित्य के जनवाद में गहरी आस्था है। उनकी यह स्पष्ट धारणा है, कि “कोई बड़ा साहित्य जन-विरोधी नहीं होता।...साहित्य का जनवाद राजनीति के जनवाद से ज्यादा पुराना है और ज्यादा व्यापक भी।”

           सार्वभौम मूल्यों के परिपालन को कुँवर नारायण ने सदा ही प्राथमिकता दी है। कुँवर नारायण की दृष्टि में मनुष्य के हितकारी जीवन-मूल्य को ही साहित्य-मूल्य भी होना चाहिए क्योंकि साहित्य और जीवन का गहरा संबंध है, एवं इसे एक दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता। कुँवर नारायण के अनुसार जीवन-मूल्य को ही साहित्य चिंता के मूल में रहना चाहिए। इसी मानव हित की भावना का परिणाम है कि उनके काव्य में हम व्यष्टि से समष्टि की यात्रा देख सकते हैं। कवि आत्मीयता का विस्तार कुछ इस तरह करना चाहते हैं कि सम्पूर्ण मानवता उस परिधि में समाहित हो जाए। कुँवर नारायण के विषय में मुक्तिबोध का मत दृष्टव्य है- “उसे वास्तविक मानवीय सार्थकता की तलाश है।” (‘माध्यम’ नवंबर, 1964 में प्रकाशित)

           कुँवर नारायण के वैचारिक धरातल में कोई संशय-बोध या दुविधा की स्थिति नहीं थी, यही कारण है कि सामजिक, राजनीतिक, आर्थिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी राय स्पष्ट थी। कवि को ‘आवश्यकतः विचारक’ मानने वाले इस चिंतक मिजाज़ के कवि को हमने कभी दुविधा का शिकार होते नहीं देखा। वे अपनी बात साफ़गोई से रखना जानते थे। कुँवर नारायण की सम्पूर्ण काव्य-यात्रा में शब्द के द्वारा मनुष्य को विकसित करने का प्रयास दिखाई पड़ता है। शब्द और मनुष्य दोनों में उनकी गहरी आस्था है। वे मानवीय संभावनाओं के जितने बड़े पैरोकार हैं, शब्दों को सही ढंग से बरते जाने के उतने ही बड़े हिमायती भी हैं। भूमंडलीकरण के बाद बाज़ार ने भाषा के सरलीकरण के नाम पर भाषा का जो सड़कीकरण किया है, कुँवर नारायण की कविता उसका प्रतिपक्ष है। जिस सहज भाषा-शैली में हम कुँवर नारायण को काव्य अभिव्यक्ति करते पाते हैं वह उनकी लम्बी साहित्यिक अनुष्ठान का प्रसाद है। उनकी कविता न तो दुरूहता के जंजाल में फँसती है न ही वहाँ सहजता के चक्कर में चालू शब्दावलियों का प्रयोग हम पाते हैं। कवि की सहजता आरोपित न होकर स्वाभाविक सी है। कुँवर नारायण की कविताओं में अगर लोक से जुड़े शब्द आते हैं तो इसीलिए क्योंकि कवि स्वयं लोक से जुड़े हुए हैं। उन्हें इस बात का भान है- “कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में/ आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी/ जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी/ अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ।”(प्रतिनिधि कविताएँ, कुँवर नारायण, सम्पादक- पुरुषोत्तम अग्रवाल, पृष्ठ-143)

           हम जिस समय में जी रहे हैं वह हिंसात्मक मनोवृत्तियों का युग है। मनुष्य खतरनाक हथियारों में तब्दील हो रहा है। पैसों से व्यक्ति की जान की कीमत तौली जा रही है। तमाम मानवीय मूल्य पीछे छूट रहे हैं। ऐसे वक्त में कविता महज़ मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती। अपने युग की विसंगतियों से मुठभेड़ ही कवि-धर्म है। कुँवर नारायण ने इस कविधर्म को बखूबी निभाया है। ‘आत्मजयी’ के नचिकेता के मन का प्रश्न युगधर्म की रक्षा का सवाल है। नचिकेता और उसके पिता का संवाद मात्र दो पीढ़ियों का संवाद नहीं है, अपितु दो वैचारिक ध्रुवों का संवाद है-
           “मेरी आस्था को बल दो”-कहते ही
             तुम्हारा हाथ ऊपर उठता है- एक वध और,
             यह अंतिम है। इसके बाद वरदान।...
             मेरी आस्था काँप उठती है।
             मैं उसे वापस लेता हूँ।
             नहीं चाहिए तुम्हारा यह आश्वासन
             जो केवल हिंसा से अपने को सिद्ध कर सकता है।
             नहीं चाहिए वह विश्वास, जिसकी चरम परिणति हत्या हो।
             मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ,
             अपनी नास्तिकता में अधिक धार्मिक।
             अपने अकेलेपन में अधिक मुक्त।
             अपनी उदासी में अधिक उदार।”(आत्मजयी, कुँवर नारायण)

अहिंसा में दृढ़ आस्था और हिंसा के प्रतिकार का स्वर कुँवर नारायण की रचनाओं में प्रमुखता से मुखरित हुआ है। आधुनिक चेतना से युक्त कवि का व्यक्तित्व युद्ध और हिंसा की व्यर्थकता को भली-भांति जानता है। कवि ने द्वितीय विश्वयुद्ध की त्रासदी को देखा है।

बाज़ारवाद ने चेतनशील कहे जाने वाले मानुष्य की बुद्धि को अपनी गिरफ्त में ले लिया और आधुनिक मनुष्य ने ख़ुद को एक मशीन बना लिया। एक ऐसा मशीन जो अपनी बुद्धि से नहीं किसी और कि बुद्धि से संचालित हो रहा है। कविता द्वारा कुँवर नारायण मनुष्य की खोयी हुई बौद्धिकता को लौटाना चाहते हैं। परिवेश: हम-तुम की भूमिका में कुँवर नारायण लिखते हैं कि “कवि मूलतः विचारक नहीं, आवश्यकतः विचारक भी है। उसका काम हमें बौद्धिक बनाना नहीं बुद्धिमत्ता के प्रति संवेदनशील बनाना है। हमारी समझ के उपकरणों को पैना रखना है ताकि हम वास्तविकता को बुद्धि, मन और प्रज्ञा के विभिन्न स्टारों पर साथ-साथ ग्रहण कर सकें: कोई एक क्षमता दूसरे को दबाकर बर्बर या दूसरों से दबकर दुर्बल न हो जाए।”

कवि की आधुनिक चेतना उन्हें बार-बार इस बात के लिए सजग करती है की कवि-धर्म महज़ शब्दों का जाल बुनना नहीं, अपितु मनुष्य की चुनौतियों से मुठभेड़ कर उसमें निहित संभावनाओं की तलाश है। इसलिए कविता में वैचारिकता के सन्निवेश को कुँवर नारायण आवश्यक मानते हैं। कुँवर नारायण का स्पष्ट मत है-
“आज कविता के लिए सिर्फ़ महसूस करना काफ़ी नहीं, महसूस किए हुए को और महसूस करते हुए को सोचना-समझना भी ज़रूरी है। विचारशीलता आधुनिक संवेदना का अनिवार्य हिस्सा है और एक ज़रूरी यकीन भी है कि अगर अक्ल आदमी की दुश्मन नहीं तो अक्ल कविता की भी दुश्मन नहीं हो सकती।” (आज और आज से पहले, कुँवर नारायण, पहला संस्करण 1998, पृष्ठ-123)


 सारतः हम यह देख सकते हैं की कुँवर नारायण की काव्य-दृष्टि भूमंडलीकरण की तमाम विसंगतियों का प्रतिपक्ष है। अपनी कविता द्वारा कुँवर नारायण ने मनुष्य में निहित संभावनाओं की पड़ताल की है। मानव जीवन में कवि का गहरा विश्वास है इसलिए कवि अपने काव्य द्वारा मानव जीवन की सार्थकता को स्थापित करने का प्रयत्न किया है।  

सन्दर्भ-ग्रंथ सूची 
[1] नारायण, कुँवर (1956). चक्रव्यूह. राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण
[2] नारायण, कुँवर (1987). परिवेश: हम-तुम. वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण
[3] नारायण, कुँवर (1989). आत्मजयी. भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नयी दिल्ली, सातवाँ संस्करण
[4] नारायण, कुँवर (2003).अपने-सामने. राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पहली आवृति
[5] नारायण, कुँवर (2007). कोई दूसरा नहीं. राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, तीसरी आवृति
[6] नारायण, कुँवर (2007). इन दिनों. राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पहली आवृति
[7] संपादक: भारद्वाज, विनोद (2010). तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं. राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, पहला संस्करण
[8] संपादक: भारद्वाज, विनोद (2010). मेरे साक्षात्कार. किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली
[9] नारायण, कुँवर (2013). शब्द और देशकाल. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण

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