आरंभिक हिंदी आलोचना और मलिक मुहम्मद जायसी

- प्रभात उपाध्याय

शोधछात्र, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
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हिंदी साहित्य अपनी जिन थोड़ी सी कालजयी कृतियों के सहारे विश्व साहित्य में स्थान पाता आ रहा है, उन्हीं में ‘पद्मावत’ का भी नाम लिया जाता है। सही अर्थों में क्लासिक्स की श्रेणी में इस तरह की रचनाओं को शामिल किया जाता है। इसके रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी उन नामचीन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने साहित्य को समृद्ध करने में अपना सार्थक सहयोग दिया है। जायसी संबंधी हिंदी आलोचना का विकास गार्सा-द-तासी से माना जा सकता है। गार्सा-द-तासी ने हिंदी के इतिहास लेखन की परंपरा आरंभ की, यद्यपि उन्होंने जायसी संबंधी आलोचना सूचनात्मक रूप में प्रस्तुत की है। जायसी संबंधी विशुद्ध आलोचना की परंपरा आचार्य शुक्ल से मानी जाती है। इसका कारण यह है कि शुक्ल जी ने ‘जायसी-ग्रंथावली’ लिखकर जायसी संबंधी स्वतंत्र चिंतन की परंपरा आरंभ की। उन्होंने न केवल जायसी संबंधित स्वतंत्र आलोचना की परंपरा आरंभ की बल्कि जायसी को सूरदास एवं तुलसीदास की श्रेणी में स्थापित भी किया।

गार्सा-द-तासी ने ‘इस्तवार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी’ की रचना फ्रेंच भाषा में की। तासी की पुस्तक का अनुवाद लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने ‘हिंदुई साहित्य का इतिहास’ नाम से किया। इस पुस्तक में जायसी संबंधी जो बातें लिखी गई है उसी को अधार रूप में स्वीकार किया गया है। तासी ने जिस समय अपने ग्रंथ की रचना की उस समय हिंदी साहित्य से संबंधित इतनी सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाई थी जितनी आज है। जाहिर सी बात है कि तासी ने कुछ सुनी-सुनाई बातों एवं कुछ अनुमान के आधार पर जायसी के बारे में लिखा। जायसी के संबंध में तमाम तरह की बातें लोक में प्रचलित रही है। इन्हीं बातों में से एक बात जायसी के मुसलमान होने की भी है। इसी बात को तासी ने इस प्रकार बताया है कि, “जायसी (मालिक मुहम्मद) जिन्हें जायसी दास भी कहा जाता है, जो उनके हिंदू से इस्लाम धर्मानुयायी बनने की ओर संकेत करता प्रतीत होता है।”  तासी की आलोचना जायसी में हिंदू से मुसलमान बनने वाले संकेत को लक्षित करते हुए आरंभ होती है।

जायसी की भाषा के बारे में आज तमाम तरह के तथ्य हमारे सामने हैं। गार्सा-द-तासी ने जायसी की भाषा के संबंध में लिखा है कि, “मलिक मुहम्मद जायसी ने (यद्यपि मुसलमान थे) हिन्दुई में कविता और दोहरों की रचना की है। उन्होंने उत्तर की उर्दू या मुसलमानी हिंदुस्तानी में भी लिखा है।”  तासी की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि जायसी ने मुसलमान होकर हिंदुई में कैसे अपने ग्रंथ की रचना की? मध्यकाल ऐसा समय रहा है जिसमें बड़े से बड़ा कवि या साहित्यकार ने अपने साहित्य अथवा रचना के माध्यम से हिंदू एवं मुसलमान में साम्य स्थापित करने का प्रयास किया है।

गार्सा-द-तासी ने जायसी की रचनाओं की सूची कुछ इस प्रकार दी है, “वह ‘पद्मावती’ शीर्षक काव्य के रचयिता है। इसी लेखक की ‘सोरठा’ शीर्षक रचना है वह दोहरा नाम के पद्य भेद में लिखी गई है। अंत में इस लेखक की ‘परमार्थ जपजी’ शीर्षक रचना है और ‘घनावत कवित्त’।”  तासी द्वारा दी गई रचनाओं की सूची में केवल ‘पद्मावत’ अथवा ‘पद्मावती’ का पता चलता है। ‘सोरठा’, ‘परमार्थ जपजी’ एवं ‘घनावत्त’ नामक रचना का अभी तक पता नहीं चला है। तासी ने जिस ‘घनावत्त कवित्त’ की चर्चा की है शायद वह ‘कन्हावत’ का अशुद्ध नाम हो।
जायसी संबंधी आलोचना यदि आज अपने पूर्ण अवस्था में है तो उसका श्रेय निश्चित रुप से तासी को दिया जाना चाहिए, कारण यह कि तासी ने जायसी के संबंध में कोई महत्वपूर्ण स्थापना तो नहीं की फिर भी उन्होंने पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। उस समय को देखते हुए यह प्रतीत होता है कि उनका लेखन कार्य अपने आप में महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि, “जायसी शेरशाह के राजत्व काल में जीवित थे, क्योंकि 947 (1540-1541) में उन्होंने अपनी पद्मावती काव्य की रचना की।”  यह सत्य है कि जायसी का शेरशाह के समय में जीवित रहने का संकेत मिलता है। ‘पद्मावत’ में जायसी ने लिखा है कि, “शेरशाह दिल्ली सुल्तानु।” परंतु इसमें अभी मतैक्य स्थापित नहीं हो पाया है कि ‘पद्मावत’ की रचना शेरशाह के समय में ही पूर्ण हो गई थी अथवा नहीं।

जायसी के संबंध में आज तमाम तरह के शोध हो चुके हैं और सतत जारी भी हैं। आचार्य शुक्ल से लेकर रघुवंश एवं वागीश शुक्ल तक की पीढ़ी ने जायसी संबंधित तमाम तथ्यों की जानकारी उपलब्ध कराई है। इन तथ्यों के मद्देनज़र यह बात कही जाती है कि ‘पद्मावत’ की भाषा अवधी तथा लिपि फ़ारसी है। इस तथ्य के सूत्र को तासी की रचना में देखा जा सकता है, “यह रचना, जो हिंदी में लिखी गई है या तो फ़ारसी अक्षरों में यह देवनागरी अक्षरों में लिखी गयी है।”  तासी का महत्व यह है कि उन्होंने सर्वप्रथम जायसी संबंधी लेखन को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। उनके पहले का पूरा साहित्य जायसी के संबंध में कौन है।

सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने ‘द मॉडर्न वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ लिखा जिसका हिंदी तर्जुमा किशोरीलाल गुप्त ने ‘हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास’ नामक शीर्षक से किया है। तासी की अपेक्षा ग्रियर्सन का अध्ययन काफी हद तक सुव्यवस्थित एवं सुसंगठित है। ग्रियर्सन ने केवल जायसी की ही नहीं बल्कि पूरे हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन की नई परंपरा प्रारंभ की है।

जायसी के संबंध में जो सूत्र गार्सा-द-तासी से प्राप्त हुआ उसी क्रम में ग्रियर्सन ने अपनी चिंतन धारा को प्रवाहित किया। ग्रियर्सन ने लिखा है कि, “मलिक मुहम्मद अत्यंत पाक मुसलमान फकीर थे।”  उन्होंने आगे लिखा है कि, “मलिक मुहम्मद ने मुसलमान और हिंदू दोनों आचार्यों से पढ़ा था और उन्होंने अपने युग की शुद्धतम में भाषा में ‘पद्मावत’ नामक दार्शनिक महाकाव्य लिखा था।”  जायसी मुसलमान थे, इसका उल्लेख ग्रियर्सन से पहले तासी ने किया था। वर्तमान समय में जबकि जायसी पर तमाम तरह की एकेडमिक चर्चाएं एवं तमाम तरह के शोध हो चुके हैं और हो रहे हैं, यह स्वीकार कर पाना कि ‘पद्मावत’ दार्शनिक महाकाव्य है संभव नहीं है। दार्शनिकता के पुट तो लगभग सभी महाकाव्यों में मिलता है परंतु केवल इसी को आधार मानकर ‘पद्मावत’ को दार्शनिक महाकाव्य कहना असंगत है।

गार्सा-द-तासी की अपेक्षा ग्रियर्सन ने जायसी का मूल्यांकन बहुत ही ठीक-ठाक ढंग से किया है। उसने लिखा है कि, “स्पष्ट भाषा में कहता हुआ भी यह ग्रंथ एक रूपक काव्य है, जिसमें बुद्धिमता के लिए आत्मा की खोज और वह सभी कठिनाइयां एवं दुर्लोभ जो उस पर यह यात्रा करते समय आक्रमण करते हैं, वर्णित है।”  ग्रियर्सन ने ‘पद्मावत’ को रूपक काव्य माना है, जो पद्मावत की सबसे अच्छी व्याख्या है। जिस तथ्य का वर्णन पद्मावत के अंतिम भाग में मिलता है और जिसके कारण उसमें रहस्यवादिता एवं दर्शन के पुट देखे जाते हैं उसका विवेचन ग्रियर्सन के यहाँ मिलता है।

जायसी के ‘पद्मावत’ की भाषा सामान्य बोलचाल की अवधी भाषा है। वह आम जनमानस की भाषा है। उसमें साहित्यिकता के पुट उस रूप में नहीं दिखाई पड़ेंगे जिस तरह से ‘रामचरितमानस’ में दिखाई पड़ते हैं। ग्रियर्सन ने लिखा है कि, “केवल भाषा के अध्ययन के लिए, सौभाग्य से पद्मावत इतना अमूल्य है कि इसका महत्व आँका नहीं जा सकता।”  ग्रियर्सन भाषा के मर्मज्ञ विद्वान थे। उनको इस बात की जानकारी थी कि यदि किसी को उस भाषा के विषय में जानना है तो उसके मौलिक रूप को जानना आवश्यक है न कि किसी अन्य भाषा के साथ उसके मिलावटी रूप को। ‘पद्मावत’ की भाषा अवधी है लेकिन वह फारसी लिपि में लिखा गया है। ग्रियर्सन ने लिखा है कि, “मलिक मुहम्मद ने इस हिंदू परंपरा की चिंता नहीं की और अपना ग्रंथ फारसी लिपि में लिखा और इस प्रकार जो शब्द उन्होंने लिखा उसके उच्चारण का विशेष ध्यान रखा।”  हालांकि यह सत्य नहीं है कि उन्होंने हिंदू परंपरा की चिंता नहीं की। यदि उन्हें हिंदू परंपरा की चिंता नहीं होती तो ‘पद्मावत’ की भाषा अवधी क्यों चुनी गई? यदि हिंदू परंपरा की चिंता नहीं थी तो हिंदुओं की प्रेमकथा, प्रेम प्रसंग को क्यों चुना गया? क्यों रत्नसेन (हिंदू) नायक बनाया गया? क्यों जायसी की सहानुभूति रत्नसेन (हिंदू) के प्रति है अलाउद्दीन (मुसलमान) के प्रति नहीं? इसका तो कई जगह विवेचन भी मिलता है। जायसी को हिन्दू संस्कारों एवं परंपराओं का गहरा ज्ञान था। ‘पद्मावत’ में कई जगह शंकर-पार्वती एवं राम-सीता का भी उल्लेख मिलता है।

ग्रियर्सन ने एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिससे जायसी संबंधी आलोचना का विकास समुचित तरीके से हो सकता है। ग्रियर्सन के बाद जायसी संबंधी आलोचना के विकास के क्रम में मिश्रबंधुओं का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। मिश्रबंधुओं (शुकदेव बिहारी, श्याम बिहारी, एवं गणेश बिहारी मिश्र) ने ‘मिश्रबंधु विनोद’ में लिखा है कि, “मलिक मुहम्मद जायसी ने अखरावट और पद्मावत नामक दो ग्रंथ बनाया है जो हमारे पास प्रस्तुत है।”  मिश्रबंधुओं ने उनके  द्वारा रचित दो ग्रंथों के बारे में बताया। आज जायसी के संबंध में काफी खोजबीन के पश्चात यह पता चला है कि उन दो ग्रंथों के अलावा भी उन्होंने ‘आखिरी कलाम’, ‘कन्हावत’ इत्यादि की रचना की है।

जायसी ने अपनी रचना ‘पद्मावत’ में अपने समय के राजा एवं शासक की प्रशंसा की है। कुछ विद्वान यह मानते हैं कि अपने समय के राजा, शासक एवं शाहेवक्त की प्रशंसा करना सूफी काव्य धारा की एक प्रवृत्ति है। इस पद्धति को कुछ विद्वानों ने मसनवी शैली का नाम दिया है। इस संबंध में मिश्रबंधुओं ने लिखा है कि, “बादशाह के नाम से लिखने की आवश्यकता पड़ी की फारसी नियमानुसार ग्रंथ बनाने में खुदा, रसूल और खलीफाओं की स्तुति करके उस समय के बादशाह की भी तारीफ की जाती है।”  जिस मसनवी शैली अथवा फारसी नियम की बात मिश्रबंधुओं ने बतायी है, उसी को आज के कुछ प्रगतिशील आलोचक जायसी के संबंध में अपना पैरामीटर मान चुके हैं। हालांकि विजयदेव नारायण साही ने इस प्रकार के सभी अवधारणाओं को खारिज किया है।

यह माना जाता है कि जायसी ने अवधी भाषा में ‘पद्मावत’ की रचना की। जायसी से पहले कुछ लोग अवधी भाषा में लिख रहे थे, परंतु जायसी ने ‘पद्मावत’ जैसे बृहद काव्य की रचना अवधी भाषा में की। पद्मावत की भाषा स्वयं में एक प्रतिमान के रूप में आज भी उपस्थित है। ‘पद्मावत’ के बाद अवधी प्रमुख रूप से काव्य की भाषा बन गई। ‘पद्मावत’ से पहले भी अवधी भाषा में कुछ लोग काव्य सृजन कर रहे थे लेकिन इस भाषा में दो बड़े महाकाव्य लिखे गए, जिसमें यह समय के हिसाब से पहला है। इस रचना के बाद काव्य की भाषा ही बदल गयी। उसके बाद जब तक काव्य के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग शुरू नहीं हुआ तब तक इस भाषा का एकाधिपत्य स्थापित रहा। कुछ लोग यह सिद्ध करना चाहते हैं कि जायसी अवधी भाषा के प्रथम कवि हैं। मिश्रबंधुओं ने लिखा है कि, “बहुत लोगों का मत है कि यह महाशय वर्तमान भाषा के वस्तुतः प्रथम कवि हैं, हमारा इस मत से विरोध है।”  तात्पर्य यह है कि मिश्रबंधुओं ने जायसी को अवधी भाषा का प्रथम कवि स्वीकार नहीं किया है। मिश्रबंधुओं ने इसका कारण भी बताया। उन्होंने लिखा है कि, “ ‘पद्मावत’ बनने के 15 वर्ष पूर्व संवत 1558 में दादर ग्राम निवासी हरप्रसाद पुरुषोत्तम ने ‘धर्मस्वमेघ’ नामक बड़ा ग्रंथ बनाया।”

पद्मावत को दो भागों में बांटा गया है। पूर्वार्द्ध भाग में राजा रत्नसेन तथा पद्मावती के जन्म से लेकर दोनों के मिलन तक की कथा है। उत्तरार्द्ध भाग में अल्लाउद्दीन के चित्तौड़गढ़ आने से लेकर पद्मावती के अग्निस्नान तक की कथा है। इसके पूर्वार्द्ध को काल्पनिक माना जाता है तथा उत्तरार्द्ध को ऐतिहासिक माना जाता है। मिश्र बंधुओं ने लिखा है कि, “इस ग्रंथ की कथा मनगढ़ंत नहीं है, वरन् सिवा दो-एक छोटी-छोटी बातों के अक्सर इतिहास से मिलती हैं।”  जबकि सत्य नहीं है।

जायसी पर यह विचार आरंभ से ही थोपा जाता है कि वह सूफी कवि हैं तथा ‘पद्मावत’ सूफी काव्य। यह परंपरा ग्रियर्सन से चली आ रही है मिश्रबंधुओं ने लिखा है कि, “जायसी की कथा में सूफ़ी रहस्यवाद के अद्वैत सिद्धांत भी मिले हुए हैं।”  सूफी काव्य के विकास के संबंध यह माना जाता है कि इसमें इस्लाम से संबंधित दार्शनिक तथ्यों के साथ – साथ भारतीय दर्शन का भी समावेश पाया जाता है। आज का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण जायसी को कवि मानता है केवल और केवल कवि न की सूफी कवि। इस तथ्य की पुष्टि विजयदेव नारायण साही एवं रघुवंश ने की है।

‘पद्मावत’ एक संपूर्ण महाकाव्य है। इसमें जिस प्रकार कलापक्ष का प्रवाह देखने को मिलता है उससे कहीं ज्यादा भाव पक्ष (हृदय पक्ष) का प्रभाव दिखता है। विजयदेव नारायण साही जी ने ‘पद्मावत’ को त्रासदी माना है। शुक्ल जी ने इस संपूर्ण काव्य में प्रेम तत्व को रेखांकित करना ही उचित समझा है। मिश्र बंधुओं ने लिखा है कि, “कला पक्ष पर विशेष ध्यान न देकर जायसी ने हृदय पक्ष पर परिश्रम किया है। इसमें मानव जीवन की विश्रांत जीवन की इच्छा अधिक पड़ती है।”  यह सत्य है कि जायसी ने ‘पद्मावत’ में मानुष जीवन को रेखांकित करने का प्रयास किया है। ‘पद्मावत’ का आधार मानुष प्रेम ही है –
‘मानुष प्रेम भयो बैकुंठी’

इन सभी रचनाकारों को देखने पर एक बात साफ हो जाती है कि इन तीनों इतिहासकारों ने जायसी को सूफ़ी कवि घोषित किया है। इसी परंपरा का समर्थन आगे चलकर शुक्ल जी ने किया है। हालांकि शुक्ल जी ने जायसी संबंधी आलोचना का विस्तार किया है जायसी को एक व्यापक फलक प्रदान किया है फिर भी वे अपने युगीन बोध से तथा परंपरागत ज्ञान से उबर नहीं पाए हैं।

संदर्भ
  1. हिंदुई साहित्य का इतिहास : गार्सा-द-तासी (अनु. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय), पृ. सं. -83, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1953
  2. वही, पृ. सं. – 84
  3. वही, पृ. सं. – 86
  4. वही
  5. वही
  6. हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास : सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (अनु. किशोरिलाल गुप्त), पृ. सं. – 81, हिंदी प्रचारक वाराणसी, 1957
  7. वही, पृ. सं. – 51
  8. वही
  9. वही
  10. वही, पृ. सं. – 52
  11. मिश्रबंधु विनोद : मिश्रबंधु, पृ. सं. – 245, गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ, चतुर्थ संस्करण – 1937
  12. वही, पृ. सं. – 246
  13. वही, पृ. सं. – 247
  14. वही
  15. वही, पृ. सं. – 249
  16. वही, पृ. सं. – 250
  17. वही, पृ. सं. – 253

1 comment :

  1. आदरणीय भाई प्रभात उपाध्याय जी द्वारा प्रस्तुत यह आलेख ज्ञानप्रद एव हिन्दी साहित्य के आदिकाल की विशेष जानकारियों के लिए प्रसंसनीय है।

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