दो लघुकथाएँ: दिलीप कुमार सिंह

दिलीप कुमार सिंह
देशभक्ति

जुलूस में पहुँचने से पहले वनिता राव ने ब्यूटी पार्लर जाना तय किया। ब्यूटी पार्लर में उनके चेहरे पर युवतियों जैसी लालिमा आ गयी। आज उन्हें शहीदों के सम्मान में निकाले जाने वाले जुलूस में शामिल होना था। जबसे कश्मीर में हमला हुआ तब से उनकी देशभक्ति हिलोरें मार रही थी। उन्होंने रक्तदान शिविर आयोजित करवाया, मगर खुद रक्तदान नहीं किया। अलबत्ता रक्तदान की फ़ोटो जरूर फेसबुक पर अपलोड कर दी।
चेहरे पर लालिमा कुछ ज्यादा ही लग रही थी। उन्होंने मुँह पर लगी क्रीम को पोंछ डाला। अरे ये क्या? चेहरे के दाग-धब्बे, झाइयाँ, झुर्रियाँ नजर आने लगीं जो कि उनकी असली उम्र की गवाही दे रहे थे। उन्होंने अपने हैंड बैग से एक क्रीम निकाली और मोबाइल में चेहरा देखकर दुबारा मेकअप किया। अब वो एक संघर्षशील अभिजात्य महिला नजर आने लगीं थीं।
अचानक उन्हें ख्याल आया कि उन्हें रैली में न जाने कितने नारे लगाने पड़ें और न जाने कितनी देर तक बोलना पड़े। इसलिये रैली स्थल से कुछ दूर पहले ऑटो से उतरकर उन्होंने छक कर नाश्ता किया और फिर दो-तीन गिलास जूस पिया। मुँह पोंछ कर उन्होंने हाथ में दमे वाला इन्हेलर ले लिया और हाँफते हुए रैली स्थल पर पहुँची। उन्हें देखकर लोग एकत्रित हो गये और वो हाँफने का अभिनय करते हुए बोलीं,
“अमर शहीदों का अपमान,  नहीं सहेगा हिंदुस्तान”
लोगों ने कोरस में उनके साथ नारे को दोहराया। बड़ी देर तक नारेबाजी चलती रही। फिर सदर एसडीएम को ज्ञापन दिया गया। वनिता राव की सेल्फियाँ फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर घूमने लगीं। जिसमें शहीदों के परिवारों के लिए दिल खोलकर मदद करने की अपील की गई थी और अपने ट्रस्ट का एकाउंट नंबर दे दिया था। उनकी अपील दर-ब-दर जारी रही और शाम होते–होते उनके मोबाईल में इस बात के मैसेज धड़ाधड़ आने लगे कि दान आ रहे हैं।
अगली सुबह वनिता राव अलसायी सी थीं। फिर भी कई जगह फोन करती रहीं। उनके पति ने कहा, “अब बस भी करो,बहुत हो गयी तुम्हारी देशभक्ति। किसको फोन कर रही हो?”
वनिता राव ने कहा, “दुकानदार को फोन कर रही थी कि आकर घर की खिड़कियों के पर्दे और सोफे का कवर बदल दे,पुराने लग रहे हैं। तीन बजे के बाद मुझे ब्यूटी पार्लर जाना है कल मेरा कॉम्पलेक्सन खराब हो गया धूल,धूप में।” कहते हुए वनिता राव ने अपने पति को शरारत से आँख मारी।
वनिता राव ने पॉपकॉर्न खाते हुए एक गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया “मेरे देश की धरती।”
पति को वनिता के चेहरे में शहीदों के माँस के लोथड़े नजर आने लगे। उसने  वनिता राव की तरफ घृणा से देखा और कहा,  “पापकॉर्न देशभक्ति।”
***

कर्फ्यू 

शहर में कर्फ्यू लगा था। मिसेज शुक्ला परेशान थीं। बच्ची का ऑपरेशन हुआ था होठों का। वे कुछ भी खा नहीं पा रही थी। सिर्फ चम्मच या स्ट्रॉ से कुछ पी पाती थी। सुबह से शाम हुई, शाम से रात और फिर अगली सुबह आ गयी। बेटी रिनी का आहार समाप्त हो चुका था। सुबह से बच्ची सिर्फ पानी पर गुजारा कर रही थी। सिंगल मदर मिसेज शुक्ला बेबस थीं।
आधे घण्टे के लिये कर्फ्यू खुला तो लोग ऐसे टूट पड़े खाने-पीने के सामान पर जैसे भूखी चील गोश्त पर झपट्टा मारती है। मिसेज शुक्ला हाथ में रुपए लिये खड़ी रह गईं मगर बच्ची के लिए दूध की दो बोतलें हासिल ना कर सकीं।
थोड़ी देर बाद मिसेज शुक्ला के दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजे पर दारू भट्ठी का मालिक भट्टू खड़ा था। उसे देखते ही मिसेज शुक्ला की त्योरियाँ चढ़ गईं, वे चिल्‍लायीं, कहा ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की। जाओ वरना पुलिस बुलाऊँगी।”
भट्टू ने दूध की दो बोतल उनके दरवाजे पर रख दी और वहाँ से चुपचाप चला गया। मिसेज शुक्ला कुछ बोलतीं, समझ पातीं, इससे पहले रिनी ने दूध की बोतलें उठा लीं।
पड़ोस में भट्टू की देसी दारू की भट्ठी थी जिसमें मिसेज शुक्ला बहुत चिढ़ती थीं। दारूबाज आते शाम को तो झूमते-इतराते कई बार गिरते-पड़ते भी थे। कई बार दारूबाज आपस मे गाली-गलौज भी करते थे। मिसेज शुक्ला को इस बात से बहुत हकतल्फ़ी थी। उन्होंने कई बार पुलिस से शिकायत की, और भट्टू कई बार जेल भी गया। लेकिन बाहर निकल कर वो फिर वही सब धंधा करने लगता। कर्फ्यू में भी शराब के तलबगार आते रहे थे। शराब हर कानून की बन्दिश से लोहा लेती है हालात कैसे भी हों ?
रिनी को दूध पिलाने के बाद मिसेज शुक्ला खुद से जूझती हुई भट्टू के दरवाजे पर पहुँचीं। उसके दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा भट्टू ने खोला। मिसेज शुक्ला ने झेंपते हुए पूछा, “तुम्हारे घर में तो कोई दूध पीता नहीं, तुम्हें दूध कहाँ से मिला? खैर शुक्रिया, ये लो दूध के पैसे।”
भट्टू ने सर्द स्वर में कहा, “शराब की बोतलों के बदले दूध की बोतलें मिली। दारू मेरी रोजी है। आपने मेरे बच्चों के पेट पर लात मारी। एक बार नहीं, कई-कई बार। मैं बच्चे की भूख और तड़प समझ सकता हूँ। जैसे मेरी औलाद वैसे आपकी।”
मिसेज शुक्ला ने सौ-सौ के दो नोट भट्टू की तरफ बढ़ाये तो उसने धीमे से कहा- “मैं शराब बेचता हूँ, दूध नहीं।”
मिसेज शुक्ला ने कुछ कहना चाहा। लेकिन तब तक दरवाजा बंद हो चुका था।

6 comments :

  1. बहुत उम्दा लघुकथाएं। साधुवाद!

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  2. बेहतरीन लघुकथाएं। दोनों ने अपने अपने अंदाज़ में सोचने पर विवश कर दिया। बहुत बधाई

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  3. मार्मिक कथाएं।बहुत अच्छा।

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  4. दिल को छू जाने वाली संदेशयुक्त खूबसूरत लघुकथाएं
    धन्यवाद।

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  5. सुंदर मर्मस्पर्शी संदेश युक्त लघुकथाएं। धन्यवाद

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  6. Artificial देशभक्ति की हवा निकाल दी आपने
    - मयंक मुसाफ़िर

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