लघुकथा: सब्बो बुआ

वंदना मिश्रा


"राम-राम सब्बो बुआ! कैसी हो?" गली से गुजरते हुए मदन ने पूछा।
"ठीकई है भैया! आज राखी है न, तनिक भी फुर्सत नहीं है। आज तो आग लगी है, जरा भी टेम नहीं मिलो।"
सब्बो बुआ बड़बड़ाती हुई पंडित जी के घर पहुँची।
हाथ में पीतल की थाली। उसमें बेतरतीबी से पड़ी हल्दी, रोली, चावल,एक नारियल, एक बड़ी पुड़िया में शक्कर और बड़ी-सी चम-चम करती राखी जिस पर लिखा था प्यारे भैया।
सब्बो बुआ ने आवाज लगाई, "अरे कहाँ हो भैया साब! आओ राखी बँधवाये लो।"
"लो आ गईं जगत बुआ, दुनिया भर के समाचार लेकर। अब बस एक नारियल से पूरे गाँव को राखी बांध आएंगी..." पंडिताईन कड़ाही से पूरी निकालते हुए बोलीं।
"पर नानी, नाना जी की तो कोई बहन नहीं हैं न? " शहर से आई बेटी की बड़ी बेटी ने पूछा।
"अरे, यह तो पूरे गाँव की बहन हैं। क्योंकि मायका भी यहीं है और ससुराल भी।"
"मतलब?"
"बचपन से अकेली हैं, माँ-बाप बचपन में ही चल बसे। सभी गाँव वालों ने मिल कर यहीं शादी कर दी। तुम्‍हारे नाना जी ने भाई की सारी रस्में अदा की, तब से ही यह उन्हें राखी बाँधती आई हैं।"

सब्‍बो की आवाज सुनकर पंडित जी भी आकर सामने कुर्सी पर बैठ गए। सब्बो बुआ अपनी थाली उठाकर सिर पर पल्लू डाल, उत्साह से उठीं और खूब प्रेम से पंडित जी को टीका लगाया। चमचमाती झबरी बाली राखी कलाई पर बाँधी और थोड़ी-सी शक्कर खिला दी।
नाना जी को शक्कर खाता देख बच्चे हँसने लगे। नानी जी ने आँख दिखाई तो बच्चे चुप हो गए।
पंडित जी ने बीस रुपए का नोट निकाल थाली में रख बुआ के पैर छुए।
"खुश रहो भैया, खूब लम्बी उमर होए मेरे भाई की, भोले बाबा लाज राखियो मेरे भैय्या जी की।" ऐसी कितनी ही दुआएँ देती हुई, सब्बो चलने को खड़ी हुई।
पंडिताईन बोलीं "अरे, सब्बो! कुछ खा कर जाना।"

"नहीं भाभी, तुम तो जानत हो जब तक सबे राखी नही बाँधू तब तक अन्न का एक दाना मुँह में न रखूँ। अभी जाऊँ हल्कू भैय्या जी को भी बाँधनी है।"

सब्बो बुआ ने बच्चों के हाथ में दस-दस रुपए रखे और बोलीं, "रखो बुआ हूँ तुमरी माँ की।"

राखी के पाँच महीने बाद अचानक पंडित जी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। घर में शोक की लहर दौड़ गई। सभी फूट-फूट कर रो रहे थे।

सब्बो बुआ भी दहाड़े मार-मार कर रोते हुए बोल रही थीं, "अरे मेरी राखी सूनी होई गई रे, भगवान तूने कई करो जो।"

धीरे-धीरे अंतिम क्रियाकर्म के बाद सब चले गये, सब्बो बुआ अब भी दरवाजे के बाहर बैठी हुई अपलक आकाश को देखे जा रही थीं, आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। बीच-बीच में वे फफककर रो उठती थीं।

अंत्‍येष्टि से लौटे लोग बाहर बैठे थे। उनमें से किसी ने लगभग डाँटते हुए कहा, "ऐ बाई? चल जा यहाँ से। यह गमी का घर है। आज कुछ नहीं मिलेगा यहाँ।"

सब्बो तो जैसे बेसुध थीं। शायद उन्‍होंने कुछ सुना ही नहीं। वह फिर बोला, " अरे सुना नहीं। बोला न मौत हुई है यहाँ, जाओ इधर से।"

तभी कोई और बोला "दे दे यार दस-बीस रुपए। ये टले यहाँ से। इन लोगों को किसी के दुःख-दर्द से कोई सरोकार नहीं होता।"
दरवाजे पर हो रहे शोर को सुनकर पंडिताइन बाहर निकल आईं। वहाँ बैठी सब्‍बो बुआ को देखकर वे चौंकी। सब्‍बो बुआ ने उन्‍हें देखा तो उनका दुख: फिर से उमड़ आया और वे दोनों गले लगकर फफक-फफककर रो पड़ीं।

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