सम्पादकीय: तमसो मा ज्योतिर्गमय 🪔🪔🪔

अनुराग शर्मा
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साल की सबसे अंधेरी रात में*
दीप इक जलता हुआ बस हाथ में
लेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी

एक चंदा का ही तो अवकाश है 
आकाश में तारों का भी तो वास है 
और जगमग दीप हम रख दें कई

बन्द कर खाते बुरी बातों के हम
भूल कर के घाव उन घातों के हम
समझें सभी तकरार को बीती हुई

कड़वाहटों को छोड़ कर पीछे कहीं
अपना-पराया भूल कर झगड़े सभी
प्रेम की गढ़ लें इमारत इक नई
(* कार्तिक अमावस्या)

यह पंक्तियाँ लिखे जाते समय अमेरिका में हैलोवीन का पर्व मनाया जा रहा है। भारतवंशी समुदाय अभी दीवाली पर्व मनाकर चुका है। पर्व और त्योहार तो संसारभर में मनाये जाते हैं लेकिन अभाव में भाव उत्पन्न करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। अमावस्या की रात्रि को प्रकाशपर्व मनाना इसका एक उदाहरण है। सेतु का नवीन अंक आपके जीवन में प्रकाश और उल्लास की कामना के साथ प्रस्तुत है।

46 रचनाओं के इस अंक में स्थायी स्तम्भ, आलेख, समीक्षा, व 22 कवियों की कविताओं के साथ इंद्रधनुषी छटा बिखेरती छह कहानियाँ भी सम्मिलित हैं। आशा है यह अंक आपको पसंद आयेगा।

आपका

4 comments :

  1. प्रिय सम्पादक महोदय सेतु का प्रत्येक अंक स्तरीय -पठनीय -रोचक और हृद्य्स्पर्ही होता है | आपकी 'ज्योतिर्मय ' रचना पढकर ऐसा लगा कि जैसे कोई शान्ति का दूत विश्व को जाग्रत कर रहा है | बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ - श्याम त्रिपाठी -हिन्दी चेतना

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    1. श्याम जी, आपका एक-एक शब्द मूल्यवान है। हार्दिक आभार!
      -अनुराग

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  2. बहुत प्रेरणादायी सम्पादिकीय
    पत्रिका की सभी रचनाएं बेहतरीन हैं।मेरी रचनाओं को जगह देने हेतु सस्नेह आभार
    🙏🙏

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