व्यंग्य: अब मेरे घर में देवता रहते हैं

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

मैं उठते ही टीवी को उठा देता हूँ। हालांकि उसके पहले मैं अपना दिमाग़ ऑन कर चुका होता हूँ, पर मेरा दिमाग़ उन्नीसवीं सदी का मॉडल है, धीरे-धीरे लोड होता है। लोड होते-होते झपकी मार लेता है और इसलिए सारे दिन पत्नी से उलाहने सुनता है। यह तो अच्छा है कि हमारा टीवी बड़ा संस्कारी है, ऑन-डिमांड मनोरंजन करता है। सवेरे संस्कृति रक्षक भजन सुनाता है, फिर संस्कृत में सुप्रभात कार्यक्रम देता है। संस्कृत भगवान और विद्वान आसानी से समझ लेते हैं। उन्हें निबटाने के बाद टीवी देसी हो जाता है, तब तक मैं भी निबट आता हूँ। यह मेरा नित्य कर्म है। आज संस्कृत उद्घोषिका ने धन्य कर दिया। उसने कहा - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः, जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता रहते हैं। क्या मालूम क्यों, मुझे लगता रहा कि मेरे घर में भूत रहते हैं। मैं जहाँ चीजें रखता हूँ वहाँ से गायब हो जाती हैं, कहीं और मिलती हैं। जेब में रखी चिल्लर यूँ ही रहती है, पर सारे नोट गायब हो जाते हैं। 

इतने दिनों मुझे लगता रहा कि भूत को मेरा सेलफोन पसंद है या फिर सेलफोन को ही स्वतः चलने की बीमारी है।  मैं उसे चार्जर पर लगा कर काम में लग जाता हूँ तो वह बिना चार्ज हुए कहीं और चला जाता है, कभी किचन में मिलता है तो कभी वाशिंग मशीन पर। कितना भुलककड़ हो गया हूँ मैं, जिन क्षेत्रों में मुझे नहीं जाना चाहिए वहाँ अपना सुराग छोड़ आता हूँ। मन नहीं मानता कि मैं भुलक्कड़ हो गया हूँ, सेलफोन की अफरातफरी में ज़रूर घरेलू भूत-प्रेतों का हाथ है।

बचपन में दादी ने समझाया था गंदे लोगों के पीछे भूत-प्रेत पड़ जाते हैं। इस डर के मारे मैं रोज सवेरे नहा लेता था। अमेरिकनों को घर में ही भूत लग जाने का भय सताता है, इसलिए जब से मैं अमेरिका आया, रात को सोने से पहले नहाने लगा। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि विदेशों में इतने भूत-पिशाच नहीं रहते। मोक्ष भारत में मिलता है, इसलिए मोक्षप्रार्थी वहीं भटकते हैं। इस मामले में हिंदु-मुस्लिम विचारधारा समान है। भूत, जिन्न बन जाते हैं, अच्छा है जिन्ना नहीं बनते, नहीं तो आदमी के दो टुकड़े कर देते। भूत और जिन्न दोनों अपनी प्रजा को डरा कर रखते हैं। डर के मारे लोग पुण्य करने लग जाते हैं, डर के मारे लोग धर्म और मज़हब की शरण तलाशते हैं। डरा कर नहीं रखो तो आदमी पुलिस और भगवान के आगे भी सिर नहीं झुकाता।

इच्छा तो बहुत रही कि ज़िंदा भूत-प्रेतों को देख आऊँ पर संसद की दर्शक दीर्घा का पास नहीं बटोर सका। द्वारपाल ने मुझे समझाया, अगले चुनाव परिणाम के बाद वे सभी इसी मार्ग से आएँगे; पाँच साल में एक बार शपथ लेने तो वे ज़रूर आते हैं नहीं तो उन्हें वेतन, भत्ता और पेंशन न मिले। तुम शपथ के दिन आ जाना। मैं अब चुनाव का इंतज़ार कर रहा था कि बस एक बार परिष्कृत भूत-प्रेत देख आऊँ।

भारतीय अनपढ़ हों या सुशिक्षित, वह भूत-प्रेत भगाने के नींबू-मिर्ची के टोने-टोटके जानता है, पर घर के भूत ढीठ होते हैं, सस्ते में नहीं भागते। मैंने भूत-प्रेत विशेषज्ञ चिकित्सक से मदद ली। वे मान्य पद्धति से करंट लगाते हैं और भूत-प्रेत हों या न हों उनसे मुक्ति दिला देते हैं। कभी सरकारी या गैर-सरकारी भूत पीछे पड़ जाएँ तो वे गुप्त दान करने की सलाह देते हैं। मेरी समस्या सुन कर उन्होंने कहा कि आदमी कवि बन जाए तो भूत-प्रेत उसे दूर से ही साष्टांग कर लेते हैं, छोटे भूत-प्रेतों में वरिष्ठों को सम्मान देने की परंपरा कायम है।

कवि ही कवि का ध्यान रखते हैं, फिर तुलसी तो ठहरे महाकवि। उनका कवित्त 'हनुमान चालीसा' जब टीवी पर आता है, मैं वॉल्यूम बढ़ा देता हूँ ताकि घर के किसी कोने में दुबकी या खुले आम घूमती बुरी आत्माएँ महाकवि के ऐलान का नोटिस ले सकें। स्वाभाविक जिज्ञासा हुई, तुलसीदासजी ने भूत-पिशाच कहाँ देखे होंगे। मुझे लगता है वे किसी कवि सम्मलेन में अध्यक्षता करने चले गए होंगे और वीर रस के कवि को कविता पाठ करते सुना होगा। ये कवि दहाड़े मारते हुए ऐसा अद्भुत कविता पाठ करते हैं कि ऊँघ रहे सारे श्रोतागण तालियाँ ठोकने लग जाते हैं।  तुलसीदासजी ने अन्यत्र भूत-पलित देखें हों ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता। मंदिरों में बहुतेरे जीवित रावण ही मिलते हैं, राम कहीं नहीं दिखते। आज सवेरे नार्यस्तु वाला संस्कृत श्लोक सुनकर मुझे मतिभ्रम हो रहा था कि जब घर में देवता बसते हैं तो मुझे दिखते क्यों नहीं।

मैं पितृसत्तात्मक संस्कृति में जन्मा इसलिए मैं इसका सम्मान करता आया। जो अयोग्य हो उसकी वाहवाही कर आप अपना मतलब निकाल सकते हो। ऐसा करके मैं ख़ुद को बुद्धिमान मनवाता आया। मानने और मनवाने से पत्थर भी प्रभु हो जाते हैं, पर स्त्री विमर्श के इस कठिन दौर में अपने घर में मुझे भाव नहीं मिला। जो हकीकत जानते हैं वे भाव नहीं देते, धिक्कार देते हैं जैसे तुलसीदासजी को उनकी प्रिया रत्नावली ने धिक्कारा था। मेरे घर में मेरे पड़ोसियों, मित्रों और रिश्तेदारों, सबको अभयदान मिल चुका था, बस मेरे ही ज्ञान चक्षु नहीं खुल रहे थे। आज संस्कृत-उद्घोषिका मुझे परम ज्ञान दे गई। मैंने श्लोक में आए दो शब्दों यत्र और तत्र को बदल कर अपने घर का भाव भर दिया और अपनी सुप्रिया से कहा - अत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते अत्र देवताः। वह उमग रही है, मैं भी उमंगित हूँ, उसे पूजनीय बना कर मैं भी देवता बन गया हूँ।
_________________________________________
ईमेल: dharmtoronto@gmail।com फ़ोन: + 416 225 2415
सम्पर्क: 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।