समीक्षा: अनुभूतिपरक आत्मिक अभिव्यक्ति को शब्दों में उड़ेलती कविताएँ

लाजपत राय गर्ग
कृति:           साथी हैं संवाद मेरे
कवि:           ज्ञानप्रकाश 'पीयूष'
विधा:           कविता-संग्रह
प्रकाशक:      बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन वर्ष: 2019
मूल्य:           200/- (सजिल्द)

   
समीक्षक: लाजपत राय गर्ग

      'सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला' पुरस्कार से सम्मानित काव्य-कृति "अर्चना के उजाले" के रचयिता प्रतिष्ठित कवि, प्रबुद्ध समालोचक एवं सेवानिवृत्त सर्वप्रिय शिक्षाविद ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' के द्वितीय कविता-संग्रह "साथी हैं संवाद मेरे" (महाकवि गोपालदास 'नीरज' सम्मान के लिये चयनित) की कविताओं का मूल स्वर स्वयं कवि के शब्दों में 'अनुभूतिपरक आत्मिक अभिव्यक्ति' है तथा इनका 'अभिप्रेत मानव जीवन में सत्यं, शिवं, सुंदरं की अवधारणा को अधिष्ठित कर सनातन मानवीय मूल्यों का अभिसिंचन करना' है। कवि का यही मनोरथ 'सच्ची कविता' के रूप में प्रकट होता है - 'सोये को जगाती / पत्थर को पानी बनाती / आग पानी में लगाती / सच्ची कविता' (पृ.131)।

        बहुत-से लेखकों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ काले करने पर भी अपनी बात पूरी तरह से न कह पाने की कसक कचोटती रहती है, किन्तु ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' की कलम में तो ऐसी अद्भुत क्षमता है कि वे अपने अन्तर्मन के भावों को चन्द शब्दों में ही इतनी दक्षता के साथ कह जाते हैं कि पाठक उनके कलात्मक कौशल से अभिभूत हो उठता है।  छिद्रान्वेषण की मानवीय प्रवृत्ति को कवि ने कितने कम शब्दों में कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है, देखते ही बनता है - 'लोगों की नजर / पड़ती नहीं क्यों? / उजालों पर / ढूंढ लाते तत्काल वे / अंधेरे औरों के' (पृ.112)। कवि का जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक है। कवि ने इसे  'आत्म कथ्य' में स्वीकारा है और प्रस्तुत संग्रह की कविताएं इसका साक्षात् प्रमाण हैं। वह सदैव 'उजालों' की बात करता है, 'अंधेरों' की नहीं। 'अंधेरों' का जिक्र उनसे दूर रहने, छुटकारा पाने के लिये ही होता है - 'उजाले / तुम बड़े निराले / मिला सान्निध्य / जब से तुम्हारा / पड़ गए अंधेरे पर ताले' (पृ.18)। कर्मरत रहते हुए भी उसे आभास होता है - 'विगत हुई रात /......तमस की सघनता विलुप्त / पोर-पोर  नहाया सृष्टि का / रोशनी में' (पृ.20)। यदि मैं कहूँ कि ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' 'उजालों का कवि' है, तो किसी को एतराज़ न होगा।

       इस संग्रह की 97 कविताओं के पठन उपरान्त कोई भी पाठक प्रो. रूप देवगुण के इस कथन से असहमत नहीं हो सकता कि 'ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' के कविता-संग्रह 'साथी हैं संवाद मेरे' में सब कुछ है - भावनाओं के बादल, विचारों का नदी-प्रवाह, कल्पना का असीमित व्योम, अलंकारों के झिलमिलाते सितारे तथा भाषा-शैली का प्राकृतिक स्रोत....।'

       मानव-जीवन में 'संवाद' का कितना महत्त्व है, का उत्कृष्ट व्याख्यान है शीर्षक कविता - 'साथी हैं संवाद मेरे'। कवि बताता है - 'संवाद हैं / मेरे साथी / अंधे की सी लाठी / रूठों को मनाते / बिछुड़ों से हैं मिलाते / हरते जीवन का खालीपन / खुशियों से / भर देते दामन' (पृ. 25)। 'संवाद' पर ही पांच और कविताएं हैं, जिनमें बताया गया है कि संवाद से 'दूध का दूध / और पानी का पानी होता' है तथा 'दो तन, मन एक होते।' और संवाद न होने से 'तनाव में जीना / हर पल मरना'......'मन दुश्चिंताओं से / घिरा रहता / कुछ भी अच्छा नहीं लगता'। सही मायनों में जीवन-दर्शन का निचोड़ हैं संवाद। पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय, सभी स्तरों पर संवाद की महत्ता स्वयं-सिद्ध है।

      प्रकृति का मानवीकरण करते हुए कवि वृक्ष, कूप, सरिता के उदात्त स्वभाव द्वारा  'जीवन का मर्म' (पृ.37) समझाते हुए कहता है - 'परोपकार ही धर्म है / जीवन का सच्चा मर्म है।' विकास के नाम पर प्रकृति के शोषण / अनुचित दोहन के दुष्परिणामों की ओर इंगित करता हुआ कवि कहता है - 'ज़िन्दा हैं पेड़ तो / पृथ्वी पर जीवन / सुरक्षित है' (पृ.40), क्योंकि 'पत्तों के झड़ते ही / उड़ जाते हैं ये (पंछी भी) / नील अनंत व्योम में।' यदि प्रकृति पक्षियों के रहने लायक भी नहीं रही तो मानव कैसे ज़िन्दा रहेगा? प्राणी ही नहीं, 'वृक्षों से रहित' पृथ्वी को देखकर तो 'बरसने की इच्छा लेकर' आई मेघमाला भी लौट जाती है। प्रकृति को यदि अपने स्वरूप में रहने दिया जाये तो 'सुरभित है उपवन / हर्षित जन मन / भौरों की गुनगुन / समीर की सरगम / है मस्ती का आलम / सुन्दर है जीवन' (पृ.48)।

      प्रात: उठने पर 'पत्तियों और फूलों पर / माणिक्य-मोती की / बिछी हुई थी / नायाब चादर /' (पृ.74) और ऋतुओं के भिन्न-भिन्न रंग-रूप देखकर कवि धन्यवाद करने लगता है 'उस सृजनहार का / जिसने इन्हें बनाया' (पृ.75)।

      कवि ने पारिवारिक रिश्तों की गरिमा को महिमामंडित भी किया है और व्याख्यायित भी। 'माँ क्या / भगवान से भी बड़ी है / हर संकट में लगता / पास में खड़ी है' (पृ.85) और 'पिता' की छवि समाज में सामान्यतः कठोर व्यक्ति के रूप में बनी हुई है, जिसके व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष को कवि ने इस तरह उभारा है - 'नारियल से / कठोर पिता / अंदर से तरल हैं / पुष्टिकर रस से / भरे हैं / भावों की / उज्ज्वल गिरी से सम्पन्न / बड़े सरल हैं' (पृ.89)। भाई 'दांयी  भुजा' है तो 'बहिन / पवित्र प्यार की / डोरी है' जो 'रखती है / परिवार को / जोड़ कर।' बेटी को कवि 'सृष्टि का / अनुपम उपहार' मानता है और कहता है - 'तुम हो मेरी / अनन्या / तुम सम कोई / अन्य ना' (पृ.95)। 'कमाल की शख्सियत' (पृ.96) में नारी के बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की विभिन्न अवस्थाओं में अवस्थानुसार स्वयं को ढाल लेने की क्षमता तथा उनका चित्रण वाकई ही कमाल का है।

        किसान तथा कोयला-खदानों के श्रमिकों की दुर्दशा, वीरों की शहादत, बुजुर्गों तथा दिव्यांगों की समाज में स्थिति को लेकर जो भावाभिव्यंजना की है, वह संवेदनशील कवि-हृदय से निसृत भाव हैं। बुजुर्गों को कवि घर-आंगन का गहना मानता है और कहता है - 'दिव्यांग अशक्त नहीं होते / संकीर्ण सोच रखते हैं जो / अशक्त वही हैं होते' (पृ.129)।

       ये कविताएँ केवल 'सर्वोत्तम शब्दों का / सर्वोत्तम अनुक्रम' ही नहीं हैं, अपितु इनमें है 'आत्म-संवेदन का / स्वत: स्फूर्त उद्वेलन / आत्म-मंथन का सार / अनुभव का दिव्य निखार' (पृ.53)। इनमें भावों की सरस्वती प्रवाहित है तथा चिंतन की प्रौढ़ता उपलब्ध है। इस अनुपम कृति से साहित्य-जगत् समृद्ध हुआ है। सुधीजन इसके पाठ / श्रवण से रसास्वादन तथा आनन्द की अनुभूति करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। श्री ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।