पुस्तक समीक्षा उसके हिस्से की धूप (उपन्यास), लेखिका: डाॅ.उषा यादव

समीक्षक:  दिनेश पाठक ‘शशि’  

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पुस्तक- उसके हिस्से की धूप (उपन्यास)
ISBN : 978.81.7138.423.5
लेखिका- उषा यादव
पृष्ठ-240,
प्रकाशन वर्ष-2018
प्रकाशक-सामयिक  प्रकाशन, नई दिल्ली-2
मूल्य-500 रुपये

कन्या-जन्म पर संकुचित सोच की त्रासद स्थितियों का वर्णन करता उपन्यास: उसके हिस्से की धूप

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साधिकार लेखनी चलाने वाली, प्रखर चिंतक, शिक्षाविद् एवं विदुषी, साहित्यकार डाॅ. उषा यादव का उपन्यास ‘‘उसके हिस्से की धूप’’ एक ऐसा उपन्यास है जो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ वाले देश में कन्या जाति के प्रति मनुष्य की भयानक कुत्सित सोच को उजागर करता हुआ समस्त मानव जाति को आयना दिखाने का कार्य करता प्रतीत होता है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत सरकार द्वारा सम्मानित इस उपन्यास की मुख्य पात्र मास्टर हरीसिंह की छठवे नम्बर पर जन्मी पुत्री विन्द्रा है। जिसे हरीसिंह ने गर्भ में ही नष्ट करने का बहुत प्रयास किया था किन्तु अपनी पत्नी सुनीता की हठधर्मी के कारण नष्ट न कर सका था।

मास्टर हरीसिंह की पत्नी सुनीता के गर्भ से जब एक के बाद एक पाँच कन्याओं ने जन्म ले लिया तो छठवें  भ्रूड-परीक्षण की योजना मास्टर हरीसिंह के मन में कुलबुलाने लगी। उसने मन ही मन एक योजना बनाई और अपनी पत्नी सुनीता को उसके स्वास्थ्य परीक्षण और आगरा घुमाने के बहाने पिनाहट कस्बे के एक डाॅक्टर के पास ले गया जिसका धन्धा ही कन्या-भ्रूड. को नष्ट करने का था।

डाॅक्टर के क्लीनिक में तैनात चतुर सिस्टर ने गर्भ में कन्या होने पर वर्फी और पुत्र होने पर पेड़ा का कोडवर्ड बना रखा था। सुनीता तुरन्त ही सब समझ गई। भ्रूड़ परीक्षण के बाद जब मास्टर हरीसिंह ने गर्भपात कराना चाहा तो सुनीता के मस्तिष्क में कुछ दिन पहले आगरा की एक संस्था -‘‘सखी’’ जिसने महिलाओं और बच्चों से जुड़ी जानकारी देते हुए एक फिल्म भी दिखाई थी , की  बातें कौंध गईं। वह गर्भपात न कराने पर अड़ गई-
‘‘मेरी कोख की बच्ची को कोई नहीं मार सकता।यह मेरा फैसला है और अब इस बारे में किसी को एक शब्द भी और कहने की जरूरत नहीं है।’’ (पृष्ठ-52)

जब वृंदा तीन वर्ष की हो गई तो मास्टर हरीसिंह के दिमाग में फिर से एक नई योजना कुलबुलाने लगी। वर्षा न होने के कारण गाँव की तीन कन्याओं को तप करने के लिए बैठाया जा रहा था। हरीसिंह ने वृंदा को भी तप पर बैठाने का विचार बनाया ताकि वर्षा होने पर सबसे कम उम्र की होने के कारण वृंदा के देवीय चमत्कारों  की अखबारों में चर्चा होगी। वही हुआ भी और हरीसिंह के मन मुताविक योजना को भावभूमि मिल गई।

वृंदा को उस तप के नाम पर कितनी पीड़ादायक स्थिति से गुजरना पड़ा इसको नजर अंदाज करते हुए अब उसने वृंदा के देवी रूप को पुख्ता करने और उसे भुनाने की पूर्ण योजना की रूपरेखा अपने दिमाग में  तैयार कर ली। अब उसने वृंदा कों देवी के रूप में अपने घर में अवतरण की अफवाह पूरे गाँव में फैलाने के लिए कहना शुरू किया कि मेरी पत्नी को अभी एक माह का गर्भ है लेकिन मेरी बेटी वृंदा ने कहा है कि इस बार उसके बेटा ही होगा। यद्यपि माँ सुनीता को अपने पति हरीसिंह की इन कुटिल चालों से काफी तकलीफ होती है और वह सोचती है-
‘‘बेचारी मासूम बच्ची आखिर अपने किस अपराध की वजह से कभी तप पर बैठा दी जाती है और कभी भविष्यवक्ता बना दी जाती है। उस अबोध को तो घर में किसी नये सदस्य के कुछ माह बाद आने का संज्ञान नहीं है। सिर्फ खेलने-खाने-सोने तक जिस बच्ची की गति-मति सीमित है, उसे नयी और अनजान पथरीली-कंकरीली राहों पर दौड़ा देना क्या किसी बाप की इंसानियत कही जायेगी?’’ (पृष्ठ-75)

‘‘मुझे लगता है कि तुम उस बच्ची के बचपन को असमय खत्म कर दोगे। वह देवी बने, चढ़ावा चढ़े, घर में सम्पदा आए, सिर्फ यही स्वार्थ इस वक्त तुम्हारे मन में है।’’ (पृष्ठ-77)

लेकिन अपढ़-गंवार होने के नाते हरीसिंह का विरोध करने में वह अपने को विवश भी महसूस करती है और रो पड़ती है-

‘‘उस पर रहम खाओ मास्टर जी। उसे भी आम बच्चियों की तरह खेलने-खाने और पढ़ने-लिखने का हक दो। अभी तक जो हुआ सो हुआ। अब गाँव में किसी के सामने उसके देवी होने की चर्चा मत करना।’’(पृष्ठ-77)
लेकिन हरीसिंह पर तो जुनून सवार है। अपनी प्लानिंग के अनुसार वह रातों-रात धनाड्य बन जाना चाहता है। वह भी अपनी उस बेटी के माध्यम से जिसे जन्म से आज तक हरीसिंह ने रत्तीभर भी प्यार नहीं दिया बल्कि घृणा की दृष्टि से ही देखता रहा।

हरीसिंह ने साम,दाम,दण्ड और भेद चारों तरीके अपनाकर  वृंदा को देवी के रूप में परिवर्तित करने का काम शुरू कर दिया। वह किसी न किसी बहाने से उसे एकान्त जंगल में ले जाता और उससे - ‘मैं देवी हूँ’ कहलवाने का अभ्यास कराना शुरू कर दिया। न कहने पर उसे बेरहमी से पीटने में भी गुरेज नहीं करता। -
‘‘कोमल गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ते हुए उत्तेजित कंठ से चीखा- बोलती क्यों नहीं? बता कौन है तू?’’(पृष्ठ-83)

‘‘अगले दिन फिर खेतों को पार करके निर्जन स्थान पर पहुँचकर यही पढ़ाई चली। यह क्रम तब तक चलता रहा, जब तक वृंदा ने ‘देवत्व’ के मुकुट को अपने सिर पर धारण न कर लिया। इस पाठ को सीखने में उसने कई बार थप्पड़ खाये, गाालियाँ सुनीं और यह धमकी भी गले के नीचे उतारी,- अगली दफा सही नहीं बोली तो गंड़ासे से चार टुकड़ों में काटकर, यहीं जंगल में फैंककर, घर चला जाऊंगा।’’ (पृष्ठ-85)
और इस सत्यवाचन के तहत बच्ची ने पिता का सिखाया पाठ हृदयंगम कर लिया। ‘कौन है तू?’ पूछने पर यंत्रवत् बोलने लगी,-‘मैं देवी हूँ।’ (पृष्ठ-85)

अपने इस कुचक्र में हरीसिंह ने ग्राम प्रधान राधामाधव को भी शामिल कर लिया। संयोगवश कुछ घटनाएँ ऐसी घटित हुईं जो हरीसिंह के पक्ष में गईं। पहली घटना- हरीसिंह द्वारा यह प्रचारित करना कि वृंदा ने कहा है कि इस बार उसके भाई का जन्म होगा। सच हो गई।

दूसरी घटना - ग्राम प्रधान द्वारा अपने कुरूप बेटे के बारे में यह पूछे जाने पर कि कल जो लड़की वाले उसके लड़के को देखने आ रहे हैं, वह शादी तय होगी या नहीं? और वृंदा द्वारा ‘विवाह तय हो जायेगा’ कहा जाना, सत्य निकल जाना।

तीसरी घटना एक बस का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना। चाौथी घटना एक बकरी का खो जाना। आदि..आदि।
विदुषी डाॅ.उषा यादव ने पूरे उपन्यास को सम सामयिक परिवेश से जोड़ते हुए बड़े ही तथ्यपरक उदाहरणों के साथ आगे बढ़ाया है।

उन्होंने ग्राम्य परिवेश की स्थितियों के वर्णन में लिखा हैं कि  ‘‘इक्कीसवीं सदी की पदचाप के बाद भी अमरपुरा में जर्जर रूढ़ियों और अंधविश्वास के प्रति लोगों की आस्था कायम थी। तभी तो विंदो का देवत्व स्वीकार करने में किसी को उज्र न हुआ था।’’ (पृष्ठ-87)

किसी तरह धन बटोरने के उददेश्य से गाॅम प्रधान के साथ मिलकर हरीसिंह ने अपनी बेटी वृंदा को एक मंदिर में देवी के रूप में स्थापित करने की पूर्ण योजना बना ली। ग्राम प्रधान राधामाधव ने गाँव के दुर्गा मंदिर का जीर्णोद्धार कराके भव्य मंदिर बनवा दिया। साथ ही देवी मंदिर से जोड़कर वृंदा के रहने-सोने आदि के लिए कमरे आदि बनवा दिए।

वृंदा का बालमन स्कूल में पढ़ने, परियों की कहानियाँ सुनने और हमउम्र सहेलियों के साथ खेलने को मचलता। पर अपने पिता के भय ने उसे पत्थर की मूर्ति बना डाला। सुनीता की ममता वृंदा की यह हालत देख-देखकर खूब सिसकती। माँ की ममता का पूर्ण रूप और विवशता का बहुत ही हृदय विदारक रूप मानव मन की पारखी डाॅ. उषा यादव जी ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-
‘‘ उसका जी चाहा कि बिंदो को झिंझोड़कर कहे,-‘तू पत्थर क्यों हो गई बेटी? मैंने तो हाड़-मास की गुलगोधनी बेटी जन्मी थी। उसके इस तरह पत्थर में तब्दील हो जाने की हालत मै झेल न सकूंगी। तू मेरी जीती-जागती बच्ची बन कर ही रह, बिंदो। पत्थर न बन।’’ (पृष्ठ-112)

टेसू और झांझी गाती लड़कियों को देखकर भी बिंदो को भावशून्य देखकर सुनीता से नहीं रहा गया। ‘‘सुनीता ने उसे झिंझोड़ दिया,-‘ तू बच्ची नहीं है क्या, बूढ़ी हो गई क्या? तेरा बचपन कहाँ चला गया लाड़ो? मैं फांसी के फंदे पर झूल जाऊंगी, अगर तू ऐसी बुत सी खड़ी रहेगी।’’

‘मैं क्या करूँ माँ?-वृंदा की आँखों से अगले ही पल सावन-भादों की झडी लग गई। (पृष्ठ-118)
चैत्र की नवरात्र में वृंदा को देवी मंदिर में बैठाने की पूर्ण तैयारी कर ली गई। आस-पास और दूर-दूर तक के इलाकों में इस बात का खूब प्रचार किया गया ताकि अधिक से अधिक चढ़ावा आये। और हरीसिंह की यह चाल पूर्ण रूप से सफल हो गई। चढ़ावे को देखकर वह गदगद हो उठा। दूसरी ओर भूख-प्यास और थकान को दबाये पूरे दिन मंदिर में बैठी अपनी पुत्री वृंदा की हालत देख-देखकर माँ सुनीता का हृदय रोता रहा।

‘‘यह बाप है या कसाई? इसे जिबह होते मेमने की देह का गोश्त तो दिख रहा है, उसकी मर्मांतक चीखें नहीं सुनाई पड़ रही है। ऐसे हृदयहीन शख्स के सामने वह अपनी बेटी के कलेजे के जख्म से रिसता लहू दिखाकर भी क्या पायेगी?’’ (पृष्ठ-145)

नवरात्र में वृंदा मैया के नाम पर खूब चढ़ावा चढ़ा। हरीसिंह का मनचाहा हुआ देखकर वह गदगद हो उठा लेकिन वृंदा का दिल रो उठा। पूरे दिन मंदिर में बैठे-बैठे वृंदा के पैर अकड़ गये। भूखी-प्यासी वह निरीह अवस्था में अपने पिता हरीसिेह के क्रोध को याद कर, बैठी रहती। उसका मन घर जाने को करता । वह पिता से मनुहार करती कि अब वह तुम्हारी हर बात मानेगी, स्कूल जाने के लिए भी नहीं कहेगी, किसी बच्चे के साथ झगड़ा भी नहीं करेगी, खेलने भी नहीं जायेगी बस अब घर ले चलो। लेकिन हरीसिंह का दिल नहीं पसीजा। अलमारी के अन्दर बढ़ते जा रहे नोटों की गड्डियों के आगे उसे अपनी पुत्री की पीड़ा नजर नहीं आ रही थी। हरीसिंह उसे समझाता कि यह मंदिर ही अब तुम्हारा घर है।

इस प्रकार चार वर्ष बीत गये। तमाम यातनाओं और वर्जनाओं को सहन करते हुए मंदिर में बैठे-बैठे वृंदा के दोनों पैर कमजोर हो गये और अब वह खड़े होने की स्थिति में भी नहीं रही तो सुनीता ने उसे डाॅक्टर को दिखाने की प्रार्थना की लेकिन हरीसिंह की कुटिलता ने साफ मना कर दिया।

‘‘कहा न, उसे एक आम बच्ची की तरह किसी चिकित्सक के पास ले जाना मुझे मंजूर नहीं है।’’
‘इस तरह तो वह मर जायेगी’
‘‘तो मर जाये, लेकिन जब तक जिएगी, देवी की तरह जिएगी और जब मरेगी तो कहा जायेगा कि देवी ने स्वेच्छा से देवलोक प्रस्थान किया है।’’-हरीसिंह एक शातिर खिलाड़ी की तरह बोला। (पृष्ठ-168)

दिनेश पाठक ‘शशि’
वृंदा के पैर कमजोर हो जाने पर उसके भविष्य की कल्पनाकर चिंता तो हरीसिंह को भी हुई पर दूसरे ही क्षण हरीसिंह के कुटिल दिमाग में एक और योजना ने जन्म लिया। उसने ऐसी हालत होने पर वृंदा को तालाव में डुबोकर मारने की योजना बनाई और वृंदा की इस हत्या को भी धार्मिक रूप देकर उसे पूरी तरह भुनाने के लिए उसने वृंदा को ही मानसिक रूप से तैयार किया कि अब वह यानि ‘‘वृंदा मैया’’ स्वेच्छा से अपने लोक को वापस जाना चाहती हैं क्योंकि पृथ्वीलोक पर अब उनका रहने का समय पूरा हो चुका है।

रूढ़िग्रस्त समाज को धर्म के नाम पर किस तरह लूटा जा सकता है और आदमी कुटिलता की किस हद तक जा सकता है,  डाॅ.उषा यादव जी द्वारा इस मनोविज्ञान को उजागर करने का पूर्ण प्रयास इस उपन्यास में हुआ है-
‘‘यह मरणासन्न बालिका ज्यादा दिन जीवित न रहेगी। जब इसे देवी रूप में जग जाहिर कर दिया है तो एक आम बच्ची की तरह हारी-बीमारी में दवा-दारू नहीं कराई जा सकती। ऐसे में कुछ दिनों में मरना इसकी नियति है तो उस मौत को और जल्दी बुलाकर........ऐसे में क्यों न इसे गन्ने की तरह पेरकर, बूंद-बूंद जीवनी रस निचोड़कर इसकी मौत को भी उत्सवी रंग दे दिया जाए। यदि इसे जस की तस छोड़ दिया जाएगा तो भी सालभर से ज्यादा न जिएगी, पर वह मौत एक सामान्य मौत कहलाएगी और अंतिम संस्कार के बाद लोग इसके नाम को भी भूल जाएंगे। हाँ, वृंदा मैया की स्वेच्छा से जल समाधि लेने की खबर जरूर हंगामा मचा देगी। हजारों भक्तों की उपस्थिति में मैया की जल समाधि लोगों को विगलित कर देगी और वे इसकी समाधि बनाकर, उसपर संगमरमर की मूर्ति खड़ी करके सालों साल श्रद्धा-भाजन बनाए रखेंगे। (पृष्ठ-182)

उसे लगा, यदि यह लड़की कुछ दिनों में अपनी मौत मरी, तो इसके खत्म होने के साथ ही मंदिर की कमाई बंद हो जाएगी। ... यदि वृंदा के समाधि स्थल से स्थायी आमदनी पाना चाहता है, तो...उस हालत में मंदिर से होने वाली सारी आय हमेशा उसके घर पहुंचती रहेगी।  (पृष्ठ-182)

उपन्यास को चरम पर ले जाते हुए डाॅ. उषा यादव जी ने हरीसिंह की योजना का विस्तृत खाका खींचा है। वृंदा मैया की जल समाधि की तिथि की घोषणा कर दी जाती हैं। अमरपुरा गाँव के उस मंदिर के आस-पास दूर-दूर के गाँवों के लोग इकट्ठे होते है। उम्मीद से अधिक बड़ा मेला लगता है। मेले में बाल, युवा, वृद्ध और युवती, स्त्रियों आदि सभी की दैनन्दिन जरूरत की चीजों की दुकान लग जाती हैं। एक कवि भी वृंदा चालीसा लिखकर ख्याति प्राप्त करने के लिए अपनी कविताएँ सुनाने लगते हैं। जल समाधि वाले दिन वहाँ की पुलिस को भ्रमित करने और वहाँ से दूर रखने के लिए हरीसिेह के शातिर दिमाग ने ग्राम प्रधान के माध्यम से उस रात एक होटल में अच्छी दावत का प्रबन्ध करवा दिया है।

लेकिन हरीसिंह की इस योजना के बारे में पता चलते ही एक माँ के हृदय की पीड़ा और उथल-पुथल का बड़ा ही मार्मिक चित्रण विद्वान लेखिका ने किया है। सुनीता के हृदय में कचोट उठती है। वह सोचती है कि यदि ‘सखी’ संस्था वाले एक-दो बार गाँव आकर महिलाओं को और सचेत करते तो कितना अच्छा होता। उसे नारी-अधिकारों की और अधिक जानकारी मिलती और वह भी ऐसे समय में स्वयं कुछ कदम बिना किसी सहारे के उठाने में समर्थ हो जाती।

माँ की ममता सुनीता को हिम्मत प्रदान करती है और वह भी अपने मन में कुछ निर्णय लेती है। जल समाधि की पूर्व रात्रि में चैत्र कृष्णपक्ष की अंधेरी रात में वह छुपते-छुपाते निकल पड़ती है और सांची मोड़ पुलिस चाौकी पहुँचने का प्रयास करती है। एक व्यक्ति से पुलिस चैकी का रास्ता पूछती है। यहाँ लेखिका ने पुलिस की वास्तविक स्थिति का खाका खींचते हुए उस व्यक्ति के मुँह से कहलवाया है-
‘‘देखो तुम एक भले घर की औरत दिखाई देती हो। यदि पुलिस चैाकी की तलाश भी है, तो सुबह आना। इस वक्त पुलिस वालों के बीच पहुंचकर क्या करोगी?’’(पृष्ठ-217)

फिर भी वह पुलिस चैाकी पहुँच ही जाती है।
‘‘हिन्दी नहीं समझती हो क्या? कह दिया न भीतर कोई नहीं है। सुबह दस बजे से पहले कोई आयेगा भी नहीं। टेलीफोन का रिसीवर मैं हटा आया हूँ, ताकि किसी का फोन पर कोई सम्पर्क न हो सके।’-सिपाही ने बताया।
‘लेकिन ड्यूटी पर किसी को तो होना ही चाहिए था।’-सुनीता रुआंसी होकर बोली।
‘फिजूल जिरह मत करो।’ सिपाही ने नाखुशी दिखाई-‘अमरपुरा के ग्राम प्रधान की तरफ से होटल में आज यहाँ के सारे पुलिसकर्मियों की दावत है। जश्न का पूरा इंतजाम है तो यहाँ कौन बेवकूफ मौजूद होगा? मैं भी ताला बंद करके सीधा वहीं खाना खाने पहुँच रहा हूँ।’’ (पृष्ठ-219)

निराश सुनीता पिनाहट कस्बे के पुलिस थाने जाने की योजना बनाती है किन्तु वह तो अकेली घर से एक कदम भी कभी नहीं निकली।वह विचार मग्न अंधेरी रात में सड़क पर पैदल-पैदल चल रही है। ठण्ड की रात में किसी आटो या किसी वाहन के मिलने की भी सम्भावना नहीं है। लेकिन-
‘‘ईश सहाय करे तबही जब आप सहाय करे नर अपनी।’’ अचानक एक कार के सामने कुचलने से वह बच जाती है। कार में सवार युगल जो पिनाहट ही जा रहा था, उसकी पीड़ा सुनकर द्रवित होकर उसे पिनाहट पुलिस थाने पर छोड़ देता है। वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित इंसपेक्टर उसकी सारी बात को ध्यान से सुनता है और स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए तुरन्त एक्शन लेता है। परिणामतः जल समाधि से पूर्व पिनाहट की पुलिस अमरपुरा पहुँचकर हरीसिंह और ग्राम प्रधान को हथकड़ी लगा देती है। डाॅक्टर्स की टीम वृंदा का चैकअप करती है और उसके शीघ्र ही ठीक हो जाने की आशा व्यक्त करती है।

इस प्रकार ‘‘उसके हिस्से की धूप’’ उपन्यास के माध्यम से विदुषी लेखिका डाॅ.उषा यादव जी ने ग्रामीण इलाकों में अभी भी व्याप्त अंध विश्वास, रूढ़िवादिता, अशिक्षा के कारण दुष्परिणाम झेलती नारी की स्थिति, नारी-शिक्षा एवं जागरण की आवश्यकता और उनके अधिकारों  तथा नारी सशक्तीकरण और जागरूकता हेतु सखी जैसी संस्थाओं की आवश्यकता, पुलिस की स्थिति, कन्या-भ्रूण के प्रति अभी भी व्याप्त घातक विचारधारा आदि का विस्तृत उल्लेख करते हुए समाज को एक आयना दिखाने का और एक दृष्टि प्रदान करने का महती कार्य किया है।

उपन्यास में शिल्प की कसावट और प्रयुक्त भाषा-शैली ऐसी है कि पाठक पूरा उपन्यास पढ़ लेने के बाद ही छोड़ता है। पूरे उपन्यास में घटनाक्रम इस तरह पिरोये हुए हैं कि पाठक की जिज्ञासा पढ़ने के प्रति निरन्तर बढ़ती ही जाती है।

उपन्यास का मुद्रण त्रुटिहीन और प्रयुक्त कागज स्तरीय है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास का भरपूर स्वागत होगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

7 comments :

  1. बहुत अच्छी समीक्षा है. काफी जानकारी मिली.

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  2. डॉ० दिनेश पाठक शशि की समीक्षा अत्यंत सारगर्भित है। विवेच्य उपन्यास 'उसके हिस्से की धूप' की विशेषताओं को उजागर करने वाली है। डॉ० शशि के इस सराहनीय प्रयास को बधाई।

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  3. बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है डॉ0 दिनेश पाठक जी ने। डॉ0 उषा यादव जी का यह उपन्यास समाज की सच्चाई के बहुत निकट से जुड़ा है। इसे पढ़कर ऐसा लगता है दुनिया बदल रही है लेकिन हमारी सोच आज भी पहले जैसी है ।ये भ्रम में डूबी भावना कब बदलेंगी । उसके हिस्से की धूप पढ़कर लोगों को यह बात सोचने पर अवश्य मजबूर होना पड़ेगा।

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  4. आदरणीय डॉ, दिनेश पाठक 'शशि'जी के द्वारा "उसके हिस्से की धूप"उपन्यास की समीक्षा बहुत ही उत्कृष्ट विचारों से समग्रहीत है। उपन्यास के एक-एक बिन्दु पर स्पष्ट एवं निष्पक्ष समीक्षा की है। आदरणीया डॉ,ऊषा यादव की सामाजिक रूढ़ियों अंधविश्वासों के कुचक्रो से बाहर निकलने के प्रयास भी सफलतापूर्वक स्पष्ट कर अपनी अन्तर्भावनाऔं को उजागर किया है। सादर धन्यवाद। राम सिंह 'साद'

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  5. आदरणीय डॉ दिनेश पाठक'शशि' जी के द्वारा रचित यह समीक्षा उत्कृष्टता के उच्चतम सोपान को छूती है। वर्तमान समय में कृतियों की औचित्यपूर्ण समीक्षा करने वाले समीक्षक कम ही हैं। ऐसे समय में आदरणीय डॉ दिनेश पाठक'शशि' जी का नाम एक निरपेक्ष आदर्श समीक्षक के रूप में उभरता है। मैं स्वयं उन्हें व कृतिकार डॉ उषा यादव को इस सुंदर समीक्षा हेतु हार्दिक बधाई देता हूं।
    अनंत शुभकामनाएं।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    संपादक- सम्यक्

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  6. उत्तम पुस्तक की उत्तम समीक्षा।
    हार्दिक बधाई।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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