काव्य: विमलेश शर्मा

1. पिया बावरी

कोई जोगिन थी
या थी बुत बनी अहल्या
जो जन्मों की यात्रा करते-करते
एक दुरुह चक्कर पर जा पहुँची थी

वह भूल गई थी गंतव्य अपना
या कि जो था मंतव्य मन का!
मन बुत था
और ‘वो’ बुर्ज पर ठहरा था
उसने जाने कितने सजदे किए
कितने कलमे पढ़ें
और कितनी प्रार्थनाएँ आँखों की कलसी से बहा दी
सुना है तभी कभी सरस्वती बहा करती थी यहाँ!
‘वो’ खड़ा रहा
अचल
अटल
अचेष्ट !
पर उसे निहारती आँखें भाविक थी
पनीली होने के कारण
दूर से चमकीली नज़र आती थी
पर थी तो पथराई!
उन सजल दीपों के समक्ष
उमगते शृंगार थे
हुलसती मुद्राएँ थीं
रास की मादकता थी
सोम की मदिरता थी
और यों सभी भोग थे
अनगिनत राग थे
नर्तन, अर्चन और दिप-दिप उजास था!
पर उसे चमकीली चीज़ें कहाँ सुहाती थी
सो उसने श्याम को चुना
जो मूर्तिवत् था
पर था मुखर ...सभी रंगों में !
भाविक भाषा लिए वो चलती रही
दैहिक वासना को ओढ़ाती बिछाती थिर रही
और ‘वो’ मोहन !
वेश बदल-बदल उसे छलता रहा!
वो कहती रही
“माई री मैं तो लियो री गोविंदो मोल।”
बिसूरती रही कि
“ना ना !
जिसे तुम अध्यात्म कहते हो
वो मेरे लिए पीर की मज़ार है
यह मुक्ति नहीं आत्मा का अमिट बंधन है।”
सांसारिक बंधन से पार उतरते ही मुक्ति
पर जिसमें यह मन बूड़ा
वो तो रंगा अमिट कुसुंभी
उसका कहन कहन मात्र कहाँ था
वह थी अनुगूँज
जो कभी सीता के कंठों में बसी
कभी राधा की टीस बन उभरी
तो कभी कान्ह पुकारने पर भई बावरी
सोचा है कभी
कि क्या सीता, राधा, मीरा निरी संज्ञाएँ थीं?
.... वे मिट्टी से बनी
किसी मानिनी का अक्स थीं
जो मिट कर
नाना रूप धरती रही
तुम सदा उसे बावरी कह
भूलते रहे
उसका मन परीक्षित करते रहे
और वो दमकती रही
धूल में गंध बन रमी रही
मोती बन आँखों में
राग बन लोक-उच्छ्वासों में पगी रही
वह पीर-पीर बुनती रही
वह पोर-पोर उगती रही!
जानते हो
सीता, राधा, मीरा का अंत
इसी भूल के कारण मिट्टी में बदा है
उसी धूसर नींव पर
तुम्हारा दीप्त आज खड़ा है
इतिहास दियरा-सा बुद-बुद जलता है
और वहीं बाती में कोई रिस-रिस रीतता है!


2. बुत औ ईश्वर

इंसान में भगवान् बसता है’
यह कथन यों सत्य का अतिरेक है
पर बार-बार दोहराया गया इसे सूत्र-वाक्य की ही तरह
क्योंकि
‘मानवता देवत्व से किंचित् साम्य रखती है ‘
पर इस मूर्त -अमूर्त के बीच
दुनिया सदैव अनेक भ्रम रचती रही
किसी ने कोमल भाव अँजुरी में भरे
और किसी ने मायावी नमस्कार की अनेक मुद्राएँ

अंतर महीन था
भेद दृष्टि-दृष्टि का था!
इंसान का इंसान बने रहना उतना ही दुर्लभ है
जितना कि किसी अहाते में मौन गूँजते
अजान और घंटाध्वनि
के समवेत पर विह्वल स्वर
इंसान देवत्व की प्रक्रिया में टूटता है
और देवत्व से विलग होने की प्रक्रिया में
किसी विलोम भाव से जुड़ता है
ईश्वर बनने की प्रक्रिया में
बहुत कुछ दरकता है उसके भीतर
कई चोटें होती है उसकी अस्मिता पर
कई बार कुचले जातें हैं कोमल ज़ज्बात भी
ताप की प्रतिक्रिया में
वह सजल बनता है
कभी नमी आँखों में सहेजता है
तो कभी छलका कर
क्रूरता का अभिषेक करता है
बनने बिगड़ने की इस अंतहीन प्रक्रिया में
वह भगवान् बना इंसान
खंडित हो अंतत: बिखर जाता है
दु:खद है
यह बिखरन किसी इतिहास में दर्ज़ नहीं होती
इतिहास सदैव कंगूरों का उपासक रहा है
और पगडंडियाँ यों ही बनती-बिगड़ती रही हैं
दोनों शाश्वत हैं
दोनों में वैषम्य है
स्यात्
“अर्थ का और अर्थतंत्र का।”


3. यात्रा-अयात्रा

एक शऊर जीने का
एक ढंग कहन का
एक दर्शन दृष्टि का!!!
होना था यह सब ‘एक’ यहाँ
पर...
जीने-जीने में
कहन- कहन में
देखने-देखने में
कितना अंतर होता है!
है न!
मन रच रहा था
जीवन में, शब्दों में
कामायनी-सी मानसरोवर-सृष्टि
और समष्टि उलझा रही थी
उसे
निज कुंतल-वर्जना-व्यष्टि में
उलझनें सुलझें
इसलिए ज़रूरी रहा
कम सुनना
कम देखना
और बहुत गुनना यहाँ
चलना पर थमना
थम कर थामना
और फिर चल देना
अनिवार्य जीवन-क्रियाएँ रहीं
क़दम बढ़ते रहें
मन अजपे-जाप में उलझा रहा
कचनार पर मन टिका रहा
रेत में दृष्टि धँसी रही
आँसू आसमाँ में उगते रहे
बस्स...!
हर जन्म योंही चलता रहा!!!


4.  मन मनका मन काफ़िर

 हर रोज एक सवेरा होता है
मानती हूँ
महसूसती हूँ
शिद्दत से
इसीलिए भोर के प्रथम पहर
उस अलसायी बेला में
ख़ुद को ख़ुद से ही ढाँप कर
चंद बिखरे ख़्वाब समेटकर
निकल आती हूँ
उस कुछ उजले कुछ स्याह आसमान तले
वहाँ धुँध का संसार है
अधैर्य व्याप्त है
कुछ तारे प्रतीक्षारत हैं
आशा भरी टकटकी लगाए
आलिंगन करने उस ऊष्म कनी का
मिटाकर स्व अस्तित्व को
सोचती हूँ शायद यही सवेरा है
जहाँ स्व को मिटाकर पर को आरोपित कर दिया जाता है

यह आरोपण?
नव्य और भव्य के स्वागत हेतु
जड़ को चैतन्य करने हेतु
जीवन के सातत्य हेतु
आदि से उत्तर आधुनिक होने हेतु
और निश्चय ही इसी महनीय उद्देश्य को पूर्ण करने
वह अदृश्य शक्ति
एक सेतु की भांति
रात और दिन के बीच
काल के माथे पर
उगा देती है सिंदूरी उजास का टीका
उसी अलसाय़े आकाश में
जहां शैथिल्य था
शिथिल आशाएँ थीं
भ्रांत भावनाएँ थीं
और था अधैर्य !
मैं समेट लेती हूँ तत्क्षण
अपने हिस्से का उजास
और मल लेती हूँ कुछ धूप
ठण्डी हुई हथेलियों में
जिससे बनी रहे ऊष्मा
ओस की उन बूँदों के बीच
और चलता रहे जीवन अपनी गति से... शाश्वत!

5. प्रत्युत्तर

  “शब्द तो आत्मा के सच्चे मोती हैं
उन्हें बिछलने से तुम रोक पाओगे
ग़लतफ़हमी है तुम्हारी !!!”
एक स्त्री ने यों ही कुछ कहा था कभी
और उसकी आवाज़ को मौन कर दिया गया
पर दूर बियाबान में एक कोयल कूकती है अब भी!
शायद तभी कुछ औचक आवाज़ों से
मैं अब भी चौंक जाती हूँ
कि कूक न जाने कब हूक में बदल जाए
याद है मुझे
दूर रेगिस्तान में
किसी मरवण ने भी कभी देखे थे सुंदर ख़्वाब
रची थी एक निष्कलुष ख़्वाहिश
पर तुम्हारे अमानुष को जागता देख
वह बुत बन गई थी
और ढुलका दिए थे चंद आँसू आँचल पर
पता है?
आसमाँ मुस्कुरा उठा था
उसकी इस लाचारी पर
यह सोचकर कि ये जुगनु
उस तलाई में भी तो झलकेंगे
जहाँ केवल नमक का समन्दर है
“प्रकृति सहायक होती है
और कुछ मनुष्य कितने क्रूर!”
बात साधारण-सी थी
पर जानने में सदियाँ गुज़र गई!
जाने कितने लिपिचित्र रह जाएँगे
रेत के टीलों पर
कितनी आवाज़ें
और कितने रुदन
अरावली की इस घेरेबंदी में
रह रहकर गूँजेंगे
जो जन्मों जन्मों तक
तुम्हारे ही कृत्यों के चलते
तुम्हारी आत्मा पर छाले से पड़े रह जाएँगे
और यहाँ इस दीवार पर...
छूट जाएँगे कुछ तथ्य
कुछ निशान
कुछ जज़्बात
जिन्हें तुम खोज कर भी नहीं खोज पाओगे !

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