कविताएँ: अनुपमा मिश्रा

जिजीविषा

औरत जी लेती है हर हाल में
वह छुपा लेती है
आँखों में तैरते हुए आँसू को
एक कृत्रिम स्मित के पीछे,
और चोट को ढँक देती है
आँचल के कोने से।
वह सहेजती रहती है
घर, आँगन, दरवाजे और खिड़कियाँ
और बन्द कर देती है
आलमारी में दबाकर
इच्छाएँ अपनी।
वह निभा जाती है
हर रिश्ता,
कुछ कच्चा, कुछ पक्का
शोख गहरा या हल्का,
सास, ननद, भाई, पिता।
औरत स्वप्न को जीवित रखती है
अपनी पलकों के कोरों में,
जी लेती है उन्हें,
किसी सखी सहेली,
हँसी, ठिठोली,
बहन, बेटी में।
वह मरने नहीं देती माँ को कभी,
जीती रहती है उसकी आत्मा बनकर,
उसके शरीर के बाद ।
***

तुम्हारे आने से

कविताएँ कलियाँ हैं अनगिनत
जो तुम्हारे आने से प्रस्फुटित होती हैं,
शाब्दिक प्रेम
वास्तविक रूप लेकर
प्रत्यक्षदर्शी बन जाता है
तुम्हारे आने से।
संगीत स्वर, लय, छंद
अधिक मर्मस्पर्शी और
हृदयस्पर्शी प्रतीत होते हैं
तुम्हारे आने से।
मुख की मलिनता
सुंदरता में बदल जाती है,
नेत्र अधिक दैदीप्यमान हो जाते हैं
तुम्हारे आने से।
***

यादों की लालटेन

और कोहरे की छाई धुंध,
काली रात में ठिठुरती यादें।
जिस किस्से पर नज़र पड़ी,
वो आसमान में चमक गया
जैसे वह सितारा चमकता है,
उत्तर दिशा में, कहलाता है ध्रुव तारा,
और जिसे बिसराती रही मैं
वो मंद सा पड़कर
टिमटिमाता रहा कहीं,
इंसान बस याद बन गया ।
***

खेत में उगा फूल

हँसा, खिला, खिलखिलाया,
रहा गुमान में ऐंठता
अपनी रंगत, बनावट और
पंखुड़ियों की कसावट पर,
इतराता रहा सुनकर प्रशंसा अपनी।
बीते दिन जब दो चार और
जला वो धूप में और
सहे सर्द हवाओं के थपेड़े,
बीती रात के तूफान में
जब झुक गयी डाली,
पंखुड़ियाँ झरीं पहले
फिर गिर पड़ा वहीं नीचे
जिसके ऊपर स्थापित होने का
गर्व पालता रहा वह,
अब समझा ज़िन्दगी को
जब बना मिट्टी संग, मिट्टी वह।

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