काव्य: शालीन सिंह

डॉ शालीन सिंह शाहजहाँपुर के स्वामी शुकदेवानंद महाविद्यालय में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष हैं। अंग्रेजी में चार दर्जन से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन, तथा हिंदी व अंग्रेजी में अनेक पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। महाश्वेता चतुर्वेदी की आंग्ल कविताओं पर आधारित शोध ग्रन्थ वैदिक विस्डम इन महाश्वेतास पोयट्री उनकी नवीनतम कृति है।


1. कविता
सचमुच कुछ नही हैं
न पर्दे के पीछे न आगे

बस आँखों में चुभती हुई किरकिरी है
साँसों के
उतार चढ़ाव के बीच फँसी हुई ज़िंदगी
के न आगे कोई होगा
न पीछे पकड़ पाने वाला

एक ही लम्हा है
जमी हुई आँखों पर और
एक अदद
मुट्ठी से फिसलती रेत..


कई मौके आते हैं
साँस पूरी तरह निकलेने से पहले
खुद को बचा लेने के
या खुद को
डुबा लेने के....
आदमी न डूब पाता है
न ही उतरा पाता है
आदमी उहापोह में है
पचड़ों में पड़ा हुआ
दौड़ता भागता
लेकिन कहीं किसी तरह भी न पहुँचता
निष्कर्ष पर
कैसे भी
किसी पर भी...

कुछ नहीं है सचमुच
जो न दिखता है
न पकड़ आता है
न वह है
न मैं हूँ
जो कोई नही है
वो सही में भी
खुद में
कुछ होने जैसा
वास्तव में रखता है?
अगर होने में होता तो उसे
आज हो
जाना चाहिए था
जो नहीं हुआ
उसे होने देने की
कोई भी कोशिश अर्थहीन
होगी...

आदमी हर उस कोशिश में
जो असल में उसे समय से
पहले कर लेनी चाहिये थी
समय निकलने के बाद की
स्थिति में ही करता है

हर उस कोशिश को करने के लिए
प्रयासरत होता जाता है, जो उसे
यूँ ही सब छूट जाने वाली
चीजों की श्रेणी में आती है...

आँकड़ों की माने
तो तीन चौथाई
अब भी रोटी कपड़े मकान में फँसा है
और अगर खुद भी देखें तो लगेगा

एक चौथाई का भी तीन चौथाई
धर्म दर्शन और अध्यात्म में रत है
वह कितना गहरे पैठे है
यह अभी आँकड़ो ने नही बताया


गौर से देखें तो लगता तो नही पर
आदमी घोषित खूब करता है
अपनी सत्यता, प्रामाणिकता और
उसकी तात्कालिकता…

बाकी बचे हैं, उनके
लिए निराशा है, थपेड़े है, तूफान है
झंझावात है
जिसमे में फँसे रहना वो नियति मान बैठे हैं
जिससे बाहर निकल आएंगे वो
कभी, रोज़ रोज़ उसी पहाड़ पर
अपनी पीठ पर लादे हुए
बड़ा सा पत्थर
सिसिफस* की तरह
फिर उसे नीचे लुढ़क कर
गिरता देखने के लिए
अभिशप्त वह...
बस इतनी सी ही कहानी है
बगैर टाइटल की...

*सिसिफस- एक ग्रीक मिथक।



2. उदासी

उदासी
नही होती मोहताज़ ग़म की
न खुशी के पूरा न हो पाने की
उदासी खुद में मुकम्मल होती है

उदासी के अपने मौसम होते हैं
लम्बे रातों जैसे
उदासी के अपने बयान होते है
चुप्पी के कागज़ों पर
नींबू की स्याही से लिखे
जो दिखते नही
पर आग के नज़दीक आते ही
चमक उठते हैं
उदासी माथे पर पसीने की बूंद जैसी
चमक उठती है
फिर बड़ी देर तक जमा रहती है
सूखने के इंतज़ार में.....

उदास आदमी
अंदर ही अंदर काटता रहता है
खुद को,
छील कर
वो अपनी ही
बहुत सारी परतें
उतार लेता है
फिर जब कच्ची नरम खाल
दिखने लगती है
उस पर भी उदासी के नाखून
खून की बूंदे उभार देते हैं
उदास मंज़र
खत्म होने का नाम नही लेता

आदमी बीच समंदर में
लाइटहाउस पर बस उदासी
की लालटेनें जलाता रहता है

अपने जैसे और भी
भटके उदास लोगों
रास्ता दिखाने की कोशिश
में लगा रहता है।
उदास आदमी
चुप रहता है
देर तलक

उदास आदमी
उधेड़ता रहता है
अपने ही आत्म को।

उदास आदमी
बस आँख होता है
कान होता है
नाक होता है उदास आदमी
बस एक अदद
जुबान नही होता उदास आदमी



3. जरूरी नहीं

जरूरी नहीं होता
किसी के प्रेम
के प्रत्युत्तर में
आप प्रेम के प्रति
वैसी ही अभिव्यक्ति दें
आप चुप रह सकते है
भरे हुए
रह सकते हैं आप
कृतज्ञता से
उस प्रेम में उमड़े सौंदर्य
के प्रति
विस्मित भी रह सकते हैं आप

जरूरी नहीं
हर खूबसूरत चीज़
पर मालकियत की जाये
उसे दूर से भी
मन में धरोहर की तरह
संजोया जा सकता है
सहज हुआ जा सकता
ऐसे क्षणों में
ये भी जरूरी नही होता
हर वह चीज़
जिसे आपकी नज़र
में जहाँ नहीं होना चाहिए
अगर वह वहाँ है
तो उसे हटाया जाए
गौर किये जाने पर
उसकी अर्थवत्ता
आगे-पीछे सिद्ध हो सकती है

प्रकृति के अपने ही यम नियम हो सकते हैं
अपना ही वैशिष्ट्य भी
अपना ही गणित भी हो सकता है
अपने जोड़ घटाने गुणा भाग सब अपना
अपने ही कायदे कानून भी.....

जरूरी नही वो जो सब
हमने आँका है, जाँचा है परखा है
वही सब यथार्थ है
सितारों के आगे और भी जहाँ
होने की कल्पना
न केवल
स्पेस देगी सोचने को
दूसरों के अस्तित्व को भी
हमारे अस्तित्व जैसा ही
सत्य मानने जैसा ही अर्थवान बनाएगी
जरूरी नहीं बहुत कुछ
जिसे हम जरूरी नहीं समझते
वह गैरजरूरी हो...



4. माँओं के याद आने पर

नही मरती है माँ
मर ही नही सकती
कौन मारेगा उसे
वह जो अजन्मा है वह
वह जो जन्मा नही
वह क्या मारेगा
मरेंगे सब जीने वाले
मरेंगे सब जो जन्मे हैं
माँ नहीं जन्मती
माँ जन्माती है

ईश्वर मर सकता है
मर सकती है नदी
मर सकते हैं तूफान सुनामी समुन्द्र
ऑक्सीजन मर सकती है
मर सकती है कार्बन मोनो ऑक्साइड
मर खप सकते जहर
न्यूक्लियर बम फाँसियाँ
गोले तोपें चोटें पीड़ाएँ
राजा रंक फकीर
सब कोई मर सकते है

नहीं मरते आख्यान
माँओं के
संततियाँ धारे रहती हैं
नावों की तरह वक्षों पर

यूँ जैसे कोई टिकटी
एक कंधे से दूसरे कंधे
पर हस्तांतरित होती रहे
माँ हस्तांतरित होती है
अमरता में,

यूँ जैसे दूर किसी चिड़िया
में किसी राक्षस की जान रहा करती थी
अमरता की जान
अमरता शब्द के अंदर के
छुपे म शब्द में है
वही म शब्द जिसे
उसके शिशु ने
पैदा होते ही
उचारा होगा
भूख और पीड़ा
के समवेत स्वर में..,

फिर किसी रोज़ वही
सम्बंध जो गर्भनाल के
कटने से कट गया होगा
एक जीवन का दूसरे जीवन
से विलग होने पर
माँ के शिशु के जन्म देने पर

बहुत गहरे से फिर जुड़ गया होगा
बार बार उसी शिशु के
जीवन के थपेड़ो से थककर
माँ की गोद में चिपक जाने पर
उसके बहुत सादे से लम्स से…

फिर एक बार वो गर्भनाल से
टूटा मरासिम
बहुत गहरे से जुड़ गया होगा
जब माँ आई होगी याद
अकेले अंधेरे बन्द कमरे में...

3 comments :

  1. बस एक अदद
    जुबान नही होता उदास आदमी।


    माँ हस्तांतरित होती है
    अमरता में.....

    अद्भुत पंक्तियाँ

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  2. रमाकांत कस्तुरेFebruary 1, 2020 at 11:18 PM

    शालीनजी, भावविभोर कर दिया इन कविताओंने!खास कर 'माँओं के याद आने पर'... आपकी इस भाउकता को ऐसेही जतन करें. धन्यवाद!

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