अनुवाद: क्वारंटीन (उर्दू कहानी)

राजिंदर सिंह बेदी
फ़िल्म निर्देशक, पटकथा व संवाद लेखक
(1 सितम्बर 1915 - 11 नवम्बर 1984)

- राजिंदर सिंह बेदी


हिमालय के चरणों में लेटे हुए मैदानों पर बिखरकर सब कुछ धुंधला देने वाले कोहरे की तरह प्लेग के भय ने हर ओर अपना अधिकार जमा लिया था। नगर के आबाल-वृद्ध उसका नाम सुन कर काँप उठते थे।

प्लेग तो भयावह था ही, लेकिन क्वारंटीन और भी भयावह थी। लोग प्लेग से उतने भयभीत नहीं थे जितने क्वारंटीन से, और यही कारण था कि स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों को चूहों से बचने के सुझाव वाले जो विशालकाय पोस्टर छपवाकर घर, द्वार और वीथियों पर लगवाये थे, उनपर पहले से लिखे वाक्य “न चूहा न प्लेग” के आगे दो शब्द और जोड़कर “न चूहा न प्लेग, न क्वारंटीन” लिख दिया था।

क्वारंटीन का भय स्वाभाविक था। सेना का डॉक्टर होने के नाते मैं दावे से कहता हूँ कि नगर में जितनी मृत्यु क्वारंटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं, यद्यपि क्वारंटीन कोई रोग नहीं है। क्वारंटीन उस क्षेत्र का नाम है जिसमें प्रशासन संक्रामक रोग के पीड़ितों को स्वस्थ जन से अलग करके रखता है ताकि रोग के प्रसार को रोका जा सके।

यद्यपि क्वारंटीन में डाक्टरों और नर्सों का पूरा प्रबंध था, फिर भी रोगियों के बहुसंख्या में वहाँ आ-जाने पर उनकी पूरी देखभाल नहीं की जा सकती थी। परिजनों से दूर होने से मैंने बहुत से रोगियों को निराश होते देखा। आसपास के लोगों को एक-एक कर मरते देख कर कई तो मृत्यु से पहले ही मर गये। ऐसा भी हुआ कि कोई मामूली रोगी वहाँ आने के कारण महामारी से मारा गया और क्वारंटीन-मृत्यु के कारण उसका अंतिम संस्कार भी क्वारंटीन की बलि चढ़ गया। जहाँ मृतकों को मृत कुत्तों की तरह घसीटकर एक बड़े ढेर में एकत्र किया जाता और धर्म और सम्प्रदाय का विचार किए बिना, पेट्रोल डाल कर सबको जला दिया जाता और शाम के समय जब अस्ताचलगामी सूर्य के अग्निरूप के साथ विशाल ज्वालाएँ उठतीं तो जीवित रोगी यही समझते कि समस्त संसार को आग लग रही है।

रोग से अधिक मृत्यु क्वारंटीन से होने का एक कारण यह भी था कि रोग के लक्षण प्रकट होने पर रोगी के सम्बंधी उन्हें छुपाने लगते, ताकि कहीं रोगी को जबरन क्वारंटीन में न ले जाया जाए। चूँकि हर एक डाक्टर को निर्देश थे कि प्लेग के लक्षण पाते ही तुरंत सूचित करे, इसलिए लोग रोग की चिकित्सा से भी बचते और किसी घर में महामारी के प्रवेश का पता तभी लगता, जब किसी दिन उस घर से अर्थी निकलती।

उन दिनों मैं क्वारंटीन में डाक्टर था। प्लेग का भय मेरे दिल में भी था। शाम को घर आने पर मैं देर तक कारबोलिक साबुन से हाथ धोता और रोगाणु-नाशक द्रव से ग़रारे करता, या फिर पेट को जला देने की हद तक गर्म काफ़ी या ब्रांडी पी लेता। यद्यपि उस कारण मुझे अनिद्रा और आँखें चौंधियाने की शिकायत हो गई थी। कई बार तो रोग के भय से मैंने उलटियाँ कराने वाली दवाएँ खा कर अपना पेट और गला साफ़ किया। जब गर्म-गर्म काफ़ी या ब्रांडी पीने से खट्टी डकारें आतीं और बुख़ार की बड़बड़ाहट होती तो मैं एक बेहोश व्यक्ति जैसे तरह तरह के अनुमान लगाता। गले में ज़रा भी ख़राश होने पर तो मैं समझता कि प्लेग के लक्षण दिखने वाले हैं, ओह, मैं भी इस कष्टकर रोग का शिकार हो जाऊँगा, पहले प्लेग, और फिर क्वारंटीन।

उन्हीं दिनों मेरी गली में सफ़ाई करने वाला मेहतर विलियम भागू मेरे पास आकर बोला, “बाबूजी, ग़ज़ब हो गया। आज एम्बुलेंस मोहल्ले के निकट से इक्कीस रोगी ले गई है।”

“इक्कीस? एम्बूलैंस में?” मैंने आश्चर्य से कहा।

“जी हाँ, पूरे बीस और एक। उन्हें भी कोन्टीन ले जाएँगे, आह, वे बेचारे कभी वापस नहीं आएँगे?”

पूछ्ताछ करने पर मुझे ज्ञात हुआ कि भागू रात के तीन बजे उठकर आधा पाव मदिरा चढ़ा लेता है और फिर निर्देशानुसार मुहल्ले की गलियों में और नालियों में चूना बिखेरना शुरू कर देता है, ताकि कीटाणु फैलने न पाएँ। भागू ने मुझे बताया किया कि रात के तीन बजे उठकर वह बाज़ार में पड़े हुए लावारिस शवों को भी इकट्ठा करता है और फिर अपने मोहल्ले के उन लोगों के छोटे मोटे काम भी कर देता है जो रोग के भय से बाहर नहीं निकलते। भागू तो रोग से ज़रा भी नहीं डरता था। वह कहता था कि अंतकाल आने पर वह कहीं भी चला जाए, बच नहीं सकता।

उन दिनों जब कोई किसी के पास नहीं फटकता था, भागू सर और मुँह पर गमछा बाँधे नितांत गम्भीरता से मानवता की सेवा कर रहा था। सीमित शिक्षा वाला भागू, अपने अनुभवों के आधार पर किसी प्रवक्ता की तरह लोगों को रोग से बचने की तरीके बताता। स्वच्छता, चूना बिखेरने और घर से बाहर न निकलने जैसे सुझाव देता। एक दिन तो मैंने उसे लोगों को मदिरा जमकर पीने की सलाह देते हुई भी देखा। उस दिन जब वह मेरे पास आया तो मैंने पूछा, “भागू तुम्हें प्लेग से डर नहीं लगता?”

“नहीं बाबूजी, जब तक समय नहीं आया है, बाल भी बाँका नहीं होगा। आप इतने बड़े डॉक्टर ठहरे, हज़ारों लोग आपके हाथ से स्वस्थ हुए होंगे लेकिन जब मेरा अंतकाल आयेगा तो आपकी दवा-दारू भी व्यर्थ हो जायेंगे। हाँ बाबूजी, आप बुरा न मानें। मैं स्पष्ट कह रहा हूँ।" फिर वार्ता का रुख बदलते हुए बोला, "कुछ कोन्टीन की कहिए बाबूजी, कोन्टीन की।”

“वहाँ क्वारंटीन में हज़ारों रोगी आ गए हैं। हम यथासंभव उनकी चिकित्सा करते हैं, लेकिन कहाँ तक? मेरे साथी चिकित्साकर्मी ख़ुद भी ज़्यादा देर तक रोगियों के साथ रहने से घबराते हैं। भय से उनके गले और अधर सूखे रहते हैं। फिर तुम्हारी तरह कोई रोगी को मुँह नहीं लगाता। न कोई तुम्हारी तरह इतनी जान मारता है भागू। ईश्वर तुम्हारा भला करे। तुम मानवता की ऐसी गहन सेवा करते हो।”

भागू ने गर्दन झुका दी और गमछे के एक पल्लू को मुँह पर से हटा कर मदिरा के प्रभाव से रक्तिम हुआ मुखड़ा दिखाते हुए बोला, "बाबूजी, मैं किस लायक़ हूँ। मुझसे किसी का भला हो जाए, मेरा ये निकम्मा तन किसी के काम आ जाए, इससे ज़्यादा ख़ुशक़िस्मती और क्या हो सकती है बाबूजी? हमारे मुहल्लों में अक्सर प्रचार के लिए आने वाले बड़े पादरी रेवरेंड मोनित लाम आबे कहते हैं, "प्रभु यीशु यही सिखाता है कि रोगी की सेवा में अपनी जान तक लड़ा दो।”

मैंने भागू की भावना को सराहना चाहा, किंतु भावातिरेक से रुक गया। उसकी आस्था और कर्म की पवित्रता देखकर मुझे ईर्ष्या हुई। मैंने निश्चय किया कि आज से क्वारंटीन में पूरे मन से काम कर के रोगियों को संतुष्ट रखने का प्रयास करूंगा, और उनको आराम पहुँचाने में अपनी जान तक लड़ा दूँगा। लेकिन सोचने और करने में अंतर होता है। क्वारंटीन में पहुँच कर जब मैंने रोगियों की भयानक स्थिति देखी तो मेरी आत्मा लजा गयी और भागू का अनुकरण करने का साहस न हुआ। तो भी उस दिन भागू को अपने साथ ले जाकर मैंने क्वारंटीन में बहुत काम किया। जिन कार्यों के लिये रोगी के निकट जाना पड़ता, वे सब मैंने भागू से कराये और उस ने सहजता से किये। रोग से अधिक मृत्यु के भय से, और उससे अधिक, एक रोगी के रूप में क्वारंटीन में भर्ती होने के भय के कारण मैं रोगियों से दूर ही रहता था।

लेकिन क्या भागू मौत और क्वारंटीन, दोनों से ऊँचा था?

उस दिन क्वारंटीन में लगभग चार-सौ रोगी दाख़िल हुए जिनमें से लगभग ढाई सौ काल के गाल में समा गये। यह भागू का साहस ही था कि मैंने बहुत से रोगियों को स्वस्थ किया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के कमरे में में लगे चार्ट में अब मेरे अधीन रखे रोगियों के स्वास्थ्य की रेखा सर्वोच्च थी। मैं प्रतिदिन किसी न किसी बहाने से उस कमरे में चला जाता और उस रेखा को शत-प्रतिशत की दिशा में बढ़ते देख कर अति-प्रसन्न होता।

एक दिन मैंने कुछ अधिक ही ब्रांडी पी ली। मेरा दिल धक धक कर रहा था। नाड़ी वेगमान घोड़े सी हो गयी और मैं एक जुनूनी की भांति इधर उधर भागने लगा। मुझे आशंका हुई कि प्लेग ने अंततः मुझे प्रभावित कर दिया है और बस अब मेरे गले पर गिलटियाँ उभर आयेंगी। भयातुर हो कर उस दिन मैंने क्वारंटीन से भाग जाना चाहा। जब तक मैं वहाँ रुका, भय से काँपता रहा। उस दिन मैंने केवल दो बार ही भागू को देखा था।

दोपहर को मैंने उसे एक रोगी से लिपटे हुए देखा था। वह प्रेम से रोगी के हाथों को थपक रहा था। रोगी ने अपनी समस्त शक्ति एकत्र करके कहा, “भई ईश्वर का ही सहारा है। इस जगह तो भगवान मेरे दुश्मन को भी न लाये। मेरी दो बेटियाँ..."

भागू ने उसकी बात बीच में काटते हुए कहा, “प्रभु यीशु का धन्यवाद दो भाई, तुम तो बिल्कुल अच्छे दिखाई देते हो।”

“हाँ बंधु, प्रभु की कृपा है, मैं पहले से कुछ अच्छा ही हूँ। अगर मैं क्वारंटीन...”

शब्द उसके मुँह में अटक गये, उसकी नसें खिच गईं, मुँह से कफ़ निकलने लगा, आँखें पथरा गईं। कुछ झटके लेकर वह रोगी, जो एक क्षण पहले सबको, विशेषकर स्वयं को अच्छा दिख रहा था, सदा के लिए शांत हो गया। भागू के अतिरिक्त वहाँ और कौन उसकी मौत पर आँसू बहाता। मित्रों और परिजनों से रहित उस क्वारंटीन में एक भागू ही सबका सम्बंधी था। उसके हृदय में सबकी पीड़ा समायी थी। वह सबके लिये रोता और कुढ़ता था। एक दिन उसने अति विनत होकर स्वयं को समस्त मानवता के पापों के प्रायश्चित के रूप में प्रभु यीशु की सेवा में प्रस्तुत किया।

उसी दिन शाम को भागू दौड़ा-दौड़ा मेरे पास आया। साँस फूली हुई थी और वह पीड़ा से कराह रहा था। बोला, “बाबूजी, ये कोन्टीन तो नर्क है नर्क। पादरी लाबे इसी प्रकार के नर्क के बारे में बताते थे।”

मैंने कहा, “हाँ भाई, ये नर्क से भी बढ़ कर है। मैं तो यहाँ से भाग निकलने की युक्ति सोच रहा हूँ। मेरी तबीयत आज बहुत ख़राब है।”

“बाबूजी इससे बुरी क्या बात हो सकती है, आज एक रोगी जो रोग के भय से बेहोश हो गया था, उसे मृत समझ कर किसी ने लाशों के ढेरों में डाल दिया था। जब पेट्रोल छिड़का गया और आग ने सबको अपनी लपेट में ले लिया, तो मैंने उसे अंगारों में हाथ पाँव मारते देखा। मैंने कूद कर उसे उठा लिया। बाबूजी! वह बहुत बुरी तरह झुलस गया था। उसे बचाते हुए मेरी दायीं बाँह भी बिल्कुल जल गयी है।”

मैंने भागू की भुजा देखी। जली त्वचा पर पीली वसा उभर आयी थी। उसे देखते हुए मेरा मन आद्र हो उठा। मैं ने पूछा, “वह आदमी बच गया न?”

“बाबूजी, वह कोई बहुत भला आदमी था। जिसकी भद्रता और भलमनसाहत से संसार कोई लाभ न उठा सका, इतने कष्ट में भी अपना झुलसा हुआ चेहरा ऊपर उठाकर उसने अपनी मरियल सी निगाह मेरी निगाह में डालते हुए मुझे आभार व्यक्त किया।”

“और बाबूजी...” भागू ने कहा, “उसके कुछ क्षण बाद ही वह इतना तड़पा, इतना तड़पा कि आज तक मैंने किसी रोगी को इस तरह जान तोड़ते नहीं देखा था, और, ... उसके बाद वह मर गया। कितना अच्छा होता जो मैं उसे पहले ही जल जाने देता। उसे आग से निकालकर मैंने उसे अतीव दुख सहने के लिए जीवित भी रखा और फिर वह बचा भी नहीं। अब उन ही जले हुए बाहुओं से मैं फिर उसे उसी ढेर में फेंक आया हूँ।”

इसके बाद भागू कुछ बोल न सका। पीड़ा के स्फुरण के बीच उसने रुकते रुकते कहा, “आप जानते हैं वह किस रोग से मरा? प्लेग से नहीं, वह कोन्टीन से मरा है, कोन्टीन से!”

क्रोध की इस अंतहीन शृंखला में नर्क से तुलना हमें किसी सीमा तक संतोष देती थी, तो भी मनु की संतति का रात भर सुनाई देने वाला प्रलाप कानों में प्रलय बनकर आता रहता। माताओं का प्रलाप, बहनों का रूदन, पत्नियों के शोकगीत, और बच्चों की चीख-पुकार नगर के उस वातावरण में, जहाँ अर्धरात्रि को उल्लू भी बोलने से हिचकिचाते थे, एक अति दुखद दृश्य उत्पन्न करते थे। जब स्वस्थ लोगों के सीनों पर मनों बोझ रहता था, तो सोचिये, उन लोगों की स्थिति कैसी होगी जो घरों में अस्वस्थ पड़े थे और जिन्हें हर द्वार-दीवार से उदासी की पीतिमा टपकती दिखती थी। क्वारंटीन में लाये गये रोगियों को तो निराशा की सीमा से कहीं आगे साक्षात काल दिखाई दे रहा था। वे जीवन से यूँ चिपके हुए थे, जैसे किसी भयंकर झंझावात में कोई किसी वृक्ष की चोटी से चिपका हुआ हो, और पानी की मत्त लहरें बढ़-बढ़कर इस चोटी को भी डुबो देने को आतुर हों।

उस दिन मैं एक अंधविश्वास के कारण ज़रूरी काम का बहाना बनाकर क्वारंटीन भी न गया। यद्यपि घर में रहकर मुझे यह सोचकर घोर क्षोभ होता रहा कि क्या पता वहाँ मेरी सहायता से किसी रोगी को कोई लाभ हो जाता। मगर मेरे मन-मस्तिष्क पर छाये भय ने मुझे बांध रखा था। शाम को सोते समय मुझे सूचना मिली कि उस शाम क्वारंटीन में लगभग पाँच सौ रोगी पहुँचे थे।

मैं खौलती हुई काफ़ी पी कर सोने ही वाला था कि द्वार पर भागू की आवाज़ आई। नौकर ने दरवाज़ा खोला तो भागू हाँफ़ता हुआ अंदर आकर बोला, "बाबू जी, मेरी पत्नी के गले में गिलटियाँ निकल आई हैं, वह रोगी है, भगवान के लिये उसे बचाइये। यदि उसे कुछ हुआ तो हमारा दुधमुँहा बच्चा भी मर जाएगा।"

सहानुभूति जताने के बजाय मैंने क्रोध में कहा, “पहले क्यों नहीं आया? रोग अभी-अभी शुरू हुआ है क्या?”

“सुबह जब मैं कोन्टीन गया तो उसे मामूली बुख़ार था।”

“अच्छा?! वह घर में रोगी थी, फिर भी तुम क्वारंटीन चले गये?”

“जी बाबूजी,“भागू ने काँपते हुए कहा, “वह ठीक सी थी। मुझे लगा कि शायद दूध चढ़ गया है, कोई गम्भीर बात नहीं है। मेरे दोनों भाई तो घर पर ही थे... और सैंकड़ों रोगी कोन्टीन में विवश ...”

“तो तुम अपनी दया और त्याग के सहारे जीवाणुओं को भी घर ले आये न। मैं तुमसे कहता था कि रोगियों के इतने निकट मत रहा करो। देखो, मैं आज इसी कारण वहाँ नहीं गया। इसमें सब दोष तुम्हारा ही है। अब मैं क्या कर सकता हूँ। तुम जैसे वीर को अपनी वीरता का फल भुगतना ही चाहिये। जहाँ नगर में सैंकड़ों रोगी पड़े हैं...”

भागू ने कातर स्वर में कहा, “लेकिन प्रभु यीशु मसीह...”

“चलो हटो, बड़े आए कहीं के! तुमने जान-बूझ कर आग में हाथ डाला। अब उसकी सज़ा मैं भुगतूँ? त्याग ऐसे होता है? इतनी रात गये मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता।”

“लेकिन, पादरी आबे...”

“चलो जाओ, पादरी आबे के कुछ होते!”

भागू सर झुकाए वहाँ से चला गया। उसके जाने के आधे घंटे बाद जब मेरा क्रोध हिरन हुआ तो मुझे अपने कृत्य पर लज्जा आयी। मैं कौन सा बुद्धिमान था जो बाद में पछतावा कर रहा था। मेरा प्रायश्चित यही था कि भागू से क्षमायाचना करते हुए उसकी पत्नी की पूरी गम्भीरता से चिकित्सा करूँ। मैंने जल्दी जल्दी कपड़े पहने और दौड़कर भागू के घर पहुँचा। वहाँ जाकर मैंने देखा कि भागू के दोनों छोटे भाई अपनी भाभी को चारपाई पर लिटाये हुए घर से बाहर ला रहे थे। मैंने भागू से पूछा, "इसे कहाँ ले जा रहे हो?" भागू ने धीरे से जवाब दिया, “कोन्टीन में...”

“तो क्या अब तुम क्वारंटीन को नर्क नहीं मानते भागू?”

“आपने तो आने से मना कर दिया, बाबू जी, और चारा ही क्या है? वहाँ डॉक्टर तो हैं ही, और दूसरे रोगियों के साथ मैं पत्नी का भी ध्यान रख लूंगा।”

“यहीं रख दो चारपाई, अभी तक तुम्हारे दिमाग़ से दूसरे रोगियों का विचार नहीं गया मूर्ख?”

चारपाई अन्दर रख दी गई और मेरे पास जो सर्वश्रेष्ठ दवा थी, वह मैंने भागू की पत्नी को पिलाई और फिर अपने अदृश्य प्रतिद्वंद्वी का सामना करने लगा। भागू की पत्नी ने आँखें खोल दीं।

भागू ने काँपते स्वर में कहा, “आपका एहसान सारी उम्र नहीं भूलूँगा, बाबूजी।”

मैंने कहा, “मैं अपने व्यवहार पर शर्मिंदा हूँ भागू, ईश्वर तुम्हें तुम्हारी समस्त सेवा का फल तुम्हारी पत्नी को नीरोग करके दे।”

लगभग उसी समय मैंने अपने अदृश्य शत्रु को अपने अंतिम शस्त्र का प्रयोग करते देखा। भागू की पत्नी के अधर फूटने लगे। मेरे हाथ में रही उसकी नाड़ी धीमी हो कर कलाई से हटकर कंधों की ओर खिसकने लगी। सामान्यतः मुझसे जीतने वाले मेरे अदृश्य शत्रु ने एक बार फिर मुझे चारों शाने चित्त गिरा दिया। मैंने पश्चात्ताप से सिर झुकाते हुए कहा, "भागू, अभागे भागू! तुम्हें अपने त्याग का यह अजीब फल मिला है, आह!”

भागू फूट फूट कर रोने लगा।

वह दृश्य मर्मभेदक था, जब भागू ने अपने बिलबिलाते हुए बच्चे को उसकी माँ से सदा के लिए अलग करके मुझे अति विनम्रता के साथ वापस लौटा दिया।

मेरा विचार था कि अपने संसार को सूना पाकर भागू अब किसी की चिंता नहीं करेगा। लेकिन अगले ही दिन मैंने उसे अनेक रोगियों की सेवा करते देखा। अपने जीवन की चिंता किये बिना उसने सैकड़ों घरों को अंधेरा होने से बचा लिया। भागू का अनुसरण करते हुए मैंने भी बड़ी लगन से काम किया। क्वारंटीन और रुग्णालय से बचे अपने समय में मैं नगर के निर्धनतम वर्ग के लोगों के घर गया, जिनकी बीमारियों का कारण या तो नालों के किनारे रहना था, या फिर अशौच।
***


अब वातावरण रोग के जीवाणुओं से रहित था। नगर को पूरी तरह धो डाला गया था। चूहों का चिह्न भी नहीं बचा था। सारे नगर में एक-आध रोगी की सूचना आती जिसकी ओर त्वरित ध्यान दिये जाने के कारण रोग की वृद्धि का कोई कारण नहीं रहा। नगर का व्यापार स्वस्थ हुआ, स्कूल, कॉलेज और कार्यालय खुलने लगे।

मैंने अनुभव किया कि बाज़ार से निकलते समय चारों ओर से उंगलियाँ मुझ पर उठतीं। लोग कृतज्ञ दृष्टि से मेरी ओर देखते। पत्र-पत्रिकाओं में प्रशंसक वाक्यों के साथ मेरे चित्र छपे। हर ओर से तालियों की बौछार ने मेरे मन में कुछ गर्व सा उत्पन्न कर दिया।

अंत में एक महान समारोह हुआ जिसमें नगर के बड़े धनिक और डाक्टर बुलाये गए। एक मंत्री ने उस उत्सव की अध्यक्षता की। मैं अध्यक्ष के साथ बिठाया गया, क्योंकि वह समारोह मेरे ही सम्मान में हुआ था। हारों के बोझ से मेरी गर्दन झुकी जाती थी और मेरा व्यक्तित्व बहुत उन्नत मालूम होता था। गर्वीली दृष्टि से मैं कभी उधर देखता कभी इधर। मानवता की असीम सेवा के परिणाम स्वरूप, आभार के भाव से भरपूर एक हज़ार एक रुपये की थैली मुझे दी जा रही थी।”

उपस्थित जन समुदाय ने मेरे साथ मेरे सहकर्मियों की भी प्रशंसा की और कहा कि पिछली महामारी में मेरी निष्ठा और तन्मयता के कारण अगणित जीवन बचे हैं। मैंने न दिन देखा, न रात, अपने अस्तित्व को राष्ट्रीय-अस्तित्व और अपनी पूञ्जी को सामाजिक-धन समझा और रोग के निवास में पहुँच कर मरते हुए रोगियों को स्वास्थ्य-अमृत पिलाया।

पतली सी छड़ी हाथ में लिये मंत्री जी ने मंच के बाईं ओर खड़े होकर जनता का ध्यान उस काली रेखा की ओर दिलाया जो दीवार पर बने नक़्शे में रोग के चरमकाल में भी स्वास्थ्य की ओर उन्नत थी। अंत में उन्होंने नक़्शे में वह दिन भी दिखाया जब मेरी देखरेख में रखे सभी चौव्वन (54) रोगी स्वस्थ हो गये थे अर्थात परिणाम शत-प्रतिशत सफल रहा और वह श्यामरेखा अपने चरम तक पहुँच गयी थी।

इसके बाद मंत्री जी ने अपने भाषण में मेरे साहस को सराहते हुए कहा कि लोग यह जानकर प्रसन्न होंगे कि बख़्शी जी की सेवाओं के लिये उन्हें लैफ़्टीनैंट कर्नल प्रोन्नत किया जा रहा है। हॉल प्रशंसा और शाबाशी के शब्दों के साथ-साथ तालियों से गूँज उठा।

तालियों के शोर के बीच मैंने अपनी गर्वीली गर्दन उठाई। मुख्य अतिथि और गणमान्य व्यक्तियों का आभार व्यक्त करते हुए एक लंबा चौड़ा वक्तव्य दिया जिसमें अन्य बातों के साथ मैंने यह भी बताया कि डाक्टरों के ध्यान का केंद्र रुग्णालय और क्वारंटीन ही नहीं बल्कि दलित-वंचित लोग थे। वे निस्सहाय जन ही इस घातक रोग का शिकार हुए। मैंने अपने साथियों के साथ मिलकर रोग के सही स्थान को तलाश किया और उसे जड़ से उखाड़ फेंकने में जान लड़ा दी। क्वारंटीन और हस्पताल के कार्य के बाद हमने अपनी रातें उन भयानक स्थानों में बितायीं।

उस दिन के समारोह के बाद जब फूल-मालाओं से लदा मैं एक गर्वीले लैफ़्टीनैंट कर्नल के रूप में अपना सर ऊँचा उठाए हुए, लोगों के आभार के एक हज़ार एक रुपये अपनी जेब में डाले हुए घर के निकट पहुँचा, तो मुझे एक ओर से हल्की सी आवाज़ सुनाई दी, “बाबू जी, बहुत बहुत मुबारक हो।”

बधाई देते समय उस व्यक्ति ने पुरानी झाड़ू निकट के गंदे हौदे के ढक्कन पर रखकर अपने चेहरे से गमछा हटा दिया। भागू को सामने देखकर मैं भौंचक्का सा खड़ा रह गया।

“तुम हो भागू भाई?” मैंने कठिनाई से कहा, “संसार तुम्हें नहीं जानता तो न जाने भागू, मैं तो जानता हूँ। तुम्हारा यीशु तो जानता है, पादरी लाम आबे के महान शिष्य, ईश्वर तुम पर कृपा करें!"

उस समय मेरा गला सूख गया। भागू की मरती हुई पत्नी और बच्चे के चित्र मेरी आँखों में आ गये। हार-फूलों के भार से मुझे अपनी गर्दन टूटती हुई मालूम हुई और बटोई के बोझ से मेरी जेब फटने लगी। और इतने सम्मान पाने के बाद भी मैं निरादर सा होकर इस कृतघ्न संसार का शोक करने लगा।

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उर्दू से अनुवाद: अनुराग शर्मा

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