पुस्तक समीक्षा: रास्ते इंतजार नहीं करते

समीक्षा: लाजपत राय गर्ग


कृति: रास्ते इंतजार नहीं करते
कवि: राज कुमार निजात
विधा: काव्य-संग्रह
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन वर्ष: 2018,
मूल्य: ₹150/- (सजिल्द)

'दार्शनिकता से ओत-प्रोत निरन्तर मंजिल की ओर बढ़ते चले जाने का संदेश देती कविताएँ'

डॉ. राज कुमार निजात
         लगभग चालीस वर्षों से साहित्य की प्रत्येक विधा में सृजन कर रहे बहु-आयामी प्रतिभा के धनी, निरन्तर साहित्य-साधनारत, हरियाणा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राज कुमार निजात साहित्य-जगत् के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। प्रस्तुत काव्य-संग्रह में संकलित 101 कविताएँ पढ़ने के उपरान्त तथा इनके रचनाकाल को दृष्टिगत रखते हुए सहज में ही कहा जा सकता है कि कवि के मन-मस्तिष्क में भावों और विचारों का बवण्डर-सा उठा हुआ है, जो शब्दों के रूप में अभिव्यक्ति पाकर ही कवि-मन को शान्ति प्रदान करता है। कवि स्वयं स्वीकार करता है -'मैंने इनके सृजन के उपरान्त स्वयं को सहज अनुभव किया है।'

        कवि का मानना है कि कविता मानवीय संवेदनाओं व अनुभूतियों को उद्वेलित कर मनुष्यों को अच्छे-बुरे, गलत-सही में अन्तर कर पाने में समर्थ बनाती है, उसमें नई ऊर्जा, नई शक्ति का संचार करती है और तब
'उनका जीवन
फूलों की भांति खिल जाता है'
...
'कविता के स्वर मुखर हुए
तो दूर-दूर तक
खुशहाली फैल गई
सब कुछ भयमुक्त हो गया'।

        ये कविताएँ कवि के गहन चिंतन, सकारात्मक सोच तथा आशावादी दृष्टिकोण की द्योतक हैं। कवि ने व्यक्तिगत व्यवहार, सामाजिक सरोकार तथा मानवीय-स्तर पर अनेक प्रश्न उठाये हैं और एक सुन्दर व श्रेष्ठ संसार की परिकल्पना की है। कवि का मत है कि 'लेखक जब शब्दों में
कुछ निर्माण करता है'
तो वह रचना
'संस्कृति का कवच'
बन जाती है।

       कवि का विश्वास है कि जीवन की डगर में
'रास्ते नये हैं
तो क्या हुआ
जब तुम उनपर
अपने पाँव धरोगे
तो वे तुम्हारे हो जाएंगे'।

'काश ऐसा हो जाता' कविता में कवि रोजमर्रा की जिन्दगी जीने की अपेक्षा जमीं से आसमाँ तक फैले समस्त ब्राह्मण्ड को मुट्ठी में भर लेना चाहता है। संदेश स्पष्ट है कि व्यक्ति का जीवन में लक्ष्य छुटमुट प्राप्तियों का नहीं अपितु विराट होना चाहिए। साथ ही कवि आगाह करता है-
'सपनों को हकीकत बनाने में
लगता है एक युग
एड़ी-चोटी का पूरा जोर
वरना टूट जाते हैं भुरभुरा कर'

लाजपत राय गर्ग
जीवन में आलस्य नहीं सतत् परिश्रम की आवश्यकता के लिए कवि सचेत करता है-
'कल की प्रतीक्षा मत करना'
...
'सृजन के लिए
एक दिन बहुत होता है'।

          परिवहन और संचार के क्षेत्र में विकास की क्रांति ने दुनिया को एक छोटे से गाँव में बदल दिया है, किन्तु व्यक्तिगत सोच को संकुचित कर दिया है-
'वे (आदमी) न तो अपने
पड़ौस को जानते हैं
न पहचानते हैं
अपने मित्र-सम्बन्धियों को'।

       धरती-माँ की उदारता के प्रति आदमी की अहसान-फरामोशी से कवि व्यथित है-
'धरती के पास हैं
कितने ही खजाने
वह अनमोल दौलत लेने के लिए
धरती कभी भी
इन्कार नहीं करती
किसी को भी
किसी भी क्षण'
किन्तु
'हम तो कभी सोचते भी नहीं
कि माँ का यह ॠण
हम पर है जाने कब से'
और हम गुजार देते हैं
'पूरा जीवन आँखें मूंदे'।

          मानव-जीवन के विभिन्न व्यवहारों तथा कर्मों को बड़े सुन्दर ढंग से परिभाषित किया है, यथा-
'गुनाह...
जीवन में जीवन के
प्रतिकूल किया गया
अनपेक्षित, अनावश्यक कर्म' है।

         कवि ने 'आस्था' को लेकर अपने विचार कई कविताओं में व्यक्त किए हैं, जिनमें परस्पर विरोधाभास झलकता है। कवि की मान्यता है कि
'आस्था व्यक्ति को
सोचने का अवसर नहीं देती'
साथ ही वह कहता है-
'आस्था को कभी
गूंगी, बहरी और अंधी
मत होने देना'

जब आस्था व्यक्ति को सोचने का अवसर नहीं देती, तब ऐसे व्यक्ति से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह अपनी आस्था को गूंगी-बहरी और अंधी होने से रोक पाएगा।

        शीर्षक कविता 'रास्ते इंतज़ार नहीं करते' दोहरा भाव प्रकट करती है। यदि 'रास्ते इंतज़ार नहीं करते
पथिक का'

तो पथिक को भी रास्तों के आमंत्रण का इंतजार किए बिना अपनी यात्रा पर निकल लेना चाहिए क्योंकि
'पथिक का अपना
एक स्वतंत्र धर्म है'।

         कुल मिलाकर कह सकते हैं कि दार्शनिक विचारों का वहन करती हुई होने के बावजूद मुक्त छंद में रचित इन कविताओं की भाषा सरल, सहज, बोधगम्य है, तथा ये लयात्मकता से परिपूर्ण हैं। इसीलिए ये कविताएँ पाठक को सोचने-विचारने के लिए विवश करने के साथ-साथ रसास्वादन तथा आनन्दानुभूति भी प्रदान करती हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि साहित्य-जगत् में इस काव्य-संकलन का भरपूर स्वागत होगा। डॉ. राज कुमार निजात जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

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