कोविड-19 महामारी: राज्य एवं श्रमिकों के मानवाधिकार

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।



श्रम की अपनी गरिमा है। बिना श्रम के अगर कोई भी अर्जन करता है तो उसे मूल्यगत अर्जन नहीं कहते हैं। दुनिया में जो श्रम की पूंजी है उसी पर यह सभ्यता चल रही है। चाहे वह श्रम किसी भी तरह से किये जाते हों। इन श्रम से उन लोगों को छूट दी गई है जो बहुत ही ज्यादा शरीर से कमजोर और असहाय हैं। श्रम की पूंजी का ज़िक्र राज्य करते हैं लेकिन दबी जुबान से जबकि किसी भी राज्य का अस्तित्व श्रम पर टिका हुआ होता है, यह एक सच्चाई है। श्रम करने वाले लोगों के श्रम की कीमत राज्य समुचित मात्रा में देते भी नहीं यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके एवज में राज्यों की प्रवृत्तियाँ श्रमिकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर भी प्रश्नांकित होती रही हैं।
आज पूरी दुनिया कोविड-19 जैसी महामारी से जूझ रही है। लगभग सभी देश कोविड-19 से असहाय से प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे समय में अगर सबसे ज्यादा संकट में कोई है तो वह है श्रमिक। विश्व के अविकसित, विकासशील और गरीब देश अपने श्रमिकों को लेकर बहुत ही परेशान हैं। उनके यहाँ श्रमिकों के कामकाज को लेकर चिंता है और साथ ही पूंजी के टूटने से बेरोजगारी में जो बढ़ोतरी हुई है उसकी खाईं पाट पाने की भी चिंता है। राज्यों की इस कोरोना महामारी ने पोल खोल कर रख दी। बड़ी-बड़ी रिपोर्ट्स में अच्छी-अच्छी तस्वीरों के साथ अपनी प्रशंसा में तैयार व प्रस्तुत आंकड़े जो प्रकट किए जा रहे थे उसके पीछे का सच तो सामने आता ही नहीं था। अपनी वाहवाही में पढ़े जाने वाले कसीदे इस महामारी के आने से निश्चितरूप से इस प्रकार उभरकर सामने आये हैं कि आने वाले समय में जो रिपोर्ट्स आएँगी उस पर भी जनता का विश्वास नहीं बन सकेगा। असत्य के बल पर दुनिया को चलाने वाले राष्ट्र और उनके नेतृत्त्वकर्ताओं ने क्या अब तक सिर्फ श्रमिक वर्ग से हमेशा झूठ बोला, प्रश्न अब यह भी उठ रहे हैं।
आईएलओ का अनुमान है कि श्रमिकों की आमदनी में 3।4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक की क्षति हो सकती है और साथ ही ढाई करोड़ से अधिक लोग बेरोज़गार हो सकते हैं। हालांकि, अब तो ये भी लग रहा है कि ये संख्या भी कम करके आंकी गई है। आज कार्यस्थलों से लेकर, उद्यमों, राष्ट्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं तक इस महामारी के परिणामों का सही आकलन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है और सरकार व कामकाजी दुनिया के अग्रणी नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच सामाजिक संवाद से ही यह संभव है। इस महामारी ने हमारे श्रम बाज़ारों की दुर्व्यवस्था को बुरी तरीक़े से उजागर किया है। कर्मचारियों की संख्या घटाई जा रही है। अनेक व्यवसाय खत्म होने की स्थिति में हैं,  प्रायः रोज़गार ख़त्म होने की बारी पहले उनकी आती है जिनके रोज़गार पहले से ही अनिश्चित या ठेके पर आधारित होते हैं।
राज्यों को अब अगर हमें लंबे समय तक रहने वाली आर्थिक मंदी से बचना है, तो अभूतपूर्व और विस्तारवादी आर्थिक और वित्तीय नीतियाँ अपनानी होंगी। राज्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोगों की जेब में सीधे कम से कम अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए धन उपलब्ध हों। जब हमारी सरकारें संक्रमण के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रही है, सरकारें लाखों लोगों की सुरक्षा के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होगी जो हर दिन हमारे लिए ख़ुद के स्वास्थ्य को जोखिम में डालते हैं। टैक्नॉलॉजी की मदद से कुछ लोग अपना काम कर पा रहे हैं और कुछ नौकरी देने वाले निकाय भी अपना व्यवसाय चला पा रहे हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में श्रमिकों को अपनी अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ संतुलन बनाए रखने का अवसर मिलना चाहिए। इनमें महिलाओं, बच्चों, बुज़ुर्गों की देखभाल करना जैसी ज़िम्मेदारियाँ शामिल होनी चाहिए।
कोविड 19 जैसी वैश्विक स्वास्थ्य आपदा से निपटने के लिए हमें देश स्तर के उपाय और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर द्विपक्षीय/बहुपक्षीय कार्रवाई पर निर्भर रहना पद सकता है। आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि दुनिया भर में असंगठित क्षेत्र के 1।6 अरब श्रमिकों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। लगभग 43 करोड़ से ज्यादा उद्यम सीधे प्रभावित हैं, जिसमें खुदरा और उत्पादन वाले क्षेत्र शामिल हैं। 21 अप्रैल 2020 को जारी एक अन्य आईएलओ स्टेटमेंट में कहा जा रहा है विश्वव्यापी महामारी कोविड 19 के कारण अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में कर्मचारियों व नियोक्ताओं पर हानिकारक असर हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कोविड-19 संकट से सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों पर असर को एक नई कड़ी के तहत समझने का प्रयास किया है, साथ ही विभिन्न देशों में महामारी के दंश को कम करने के लिए किए गए उपाय भी सामने रखे हैं। अब इन रिपोर्ट्स से होकर गुजरने में बहुत डॉ लगता है क्योंकि असुरक्षा की भावना अब राज्यों में होने लगी है श्रमिक तो बहुत दूर की चीज हैं।
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि कोविड-19 महामारी सिर्फ़ एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा नहीं है बल्कि एक मानवीय, आर्थिक और सामाजिक संकट है,और यह तेज़ी से मानवाधिकारों का संकट भी बनता जा रहा है। उन्होंने वैश्विक स्वास्थ्य आपदा से निपटने के उपायों में मानवाधिकारों की अहमियत को रेखांकित करते हुए मानव कल्याण और मानवाधिकारों को सर्वोपरि रखने को कहा है। प्रवासी कामगारों पर यूएन समिति के प्रमुख कान उन्वेर और प्रवासियों के मानवाधिकारों पर विशेष रिपोर्टियर फ़िलिपे गोन्ज़ालेज़ मोरालेस का कथन है कि विश्व भर में प्रवासी कामगारों के श्रम अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना होगा और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए उपाय करने होंगे। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि कोरोनावायरस के कारण आर्थिक व्यवधानों का असर प्रवासियों द्वारा अपने देश में परिवारों को भेजी जाने वाली रक़म पर भी पड़ा है और उसमें गिरावट दर्ज की गई है। इससे प्रवासियों के परिवारों का जीवन-यापन भी प्रभावित हुआ है क्योंकि अक्सर ऐसी रक़म उनकी आय का एकमात्र स्रोत होती है। यह आवाजें हमें चौकन्ना कर रही हैं।
प्रवासी दुनिया भर में फ़िलहाल सीमाओं पर फँसे हुए हैं- एशिया, अफ़्रीका, अमेरिका और योरोप में समुद्री किनारों पर फंसे हुए हैं। देश के भीतर लॉकडाउन लगाने के बाद न जाने कितने प्रवासी अपने एक राज्य से दूसरे राज्य जाने के लिए बहुत ही त्रासदी सी महसूस किये हैं। पुलिस का बर्ताव इन श्रमिकों के लिए बहुत हिंसक रहे। इन श्रमिकों को भोजन नहीं मिले। दवाओं के आभाव में मर गए। पैदल चले। अपनों को खोया। सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं से मर गए। इससे राज्यों के प्रति इन श्रमिकों का विश्वास टूटा है और अपने नागरिक होने पर भी उन्हें संदेह हुआ है। अब आने वाले समय में राज्यों को ऐसी कार्रवाई का खाका तैयार करते समय जिसमें किसी महामारी कालसमय में समस्याओं से निपटने की नीतियाँ तैयार करनी हो तो लैंगिक ज़रूरतों, आयु और विविधता के साथ-साथ स्वास्थ्य पर अधिकार को समाहित करना होगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो श्रमिकों के लिए भविष्य नहीं हैं। मजबूरियों में श्रमिक अपने पेट पालन के लिए और परिवार की रक्षा के लिए श्रम तो करेंगे लेकिन वे अपने भविष्य के प्रति सशंकित रहेंगे। गुटेरेश ने चेतावनी दी थी पिछले दिनों कि, "कुछ देशों में बढ़ते नस्ली-राष्ट्रवाद, लोकवाद और तानाशाही और मानवाधिकारों को दबाने की कोशिश की वजह से इस संकट में महामारी से अलग उद्देश्यों के लिए दमनकारी कदम उठाने का बहाना मिल सकता है।" सचाई यह है कि यह होने जा रहा है। दुनिया के बहुत से राष्ट्र अपनी कमियों को छुपाने के लिए ऐसे समस्याओं को जन्म देंगे और इससे अराजकता, अशांति एवं संघर्ष की बढ़ोतरी होगी। गुटेरेश ने कहा कि सरकारों को "पारदर्शी, प्रतिक्रियाशील और जवाबदेह" होना चाहिए और उन्होंने जोर दिया कि मीडिया की आजादी, सिविल सोसाइटी संगठन, निजी क्षेत्र और "सिविक स्पेस" जरूरी हैं। यदि यह आज़ादी नहीं रही तो इसमें दो मत नहीं कि अभी कोरोना महामारी के समय और बाद की पड़ताल सरकारी आंकड़ों के आधार पर जो आयेंगे वे किस प्रकार होंगे, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। विश्व के कई नेताओं ने कोविड-19 के संक्रमणकाल में जनता को बचाने के लिए इमरजेंसी शक्तियां अपने हाथों में ले ली हैं। लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इन शक्तियों के दुरुपयोग के मामले उठा रहे हैं। वेनेजुएला में कोविड-19 के बारे में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार डार्विन्संस रोजस को जेल में डाल दिया गया। कंबोडिया में सरकार के 17 आलोचकों को जेल की सजा हुई। इसी तरह थाईलैंड में एक व्हिसल-ब्लोअर को जेल में डाला गया। दुनिया के बहुत से देशों में स्वतंत्र अध्येता, पत्रकार और प्रतिक्रियावादियों के साथ जुर्म राज्यों द्वारा किये जा रहे हैं। इन कार्यवाहियों से मुद्दे न खत्म होंगे न ही समस्याओं का निपटारा होगा लेकिन नई समस्याएं ज़रूर जन्म ले लेंगी। श्रमिकों के बारे में चिंता करने वाले दुनिया के करुणा को अगर समझ रहे हैं और अपनी प्रतिक्रया दे रहे हैं तो उन्हें दमन करने का हक राज्यों को नहीं है लेकिन ऐसा ही हो रहा है।
भारत में लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर जैसे-तैसे अपने घरों की तरफ लौट रहे हैं और अब सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट को देखकर खुद से संज्ञान लिया है और केंद्र सरकार और राज्यों से जवाब दाखिल करने को कहा है। जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल और एमआर शाह की बेंच ने 28 मई तक इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। बेंच ने यह भी कहा, "प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में आज भी सड़कों, राजमार्गों, रेलवे स्टेशनों और राज्य की सीमाओं पर फंसे हुए हैं। उन्हें केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत पर्याप्त परिवहन व्यवस्था, शेल्टर और बिना शुल्क के भोजन-पानी उपलब्ध कराएं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लॉकडाउन की स्थिति में समाज के इसी वर्ग को सबसे ज्यादा मदद की जरूरत है। भारत के 80 फीसदी से अधिक श्रमिक असंगठित क्षेत्र में नियोजित हैं, और इनमें एक तिहाई आकस्मिक मजदूर हैं। अतः यह ज़रूरी है कि सरकार सेवाओं का वितरण सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करे। सरकार को फंसे हुए प्रवासी कामगारों की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए। पूरे देश में  राज्य सरकारों को तुरंत सबसे ज्यादा जरूरतमंदों के लिए, शारीरिक दूरी सुनिश्चित करने के उपाय करते हुए आश्रय और सामुदायिक रसोई का इंतजाम करना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि भारत क्या दुनिया के तमाम देश अपने नागरिकों को सुरक्षा और गरिमा देने में नाकाम रहे हैं। इससे राज्यों और उनके नेतृत्व की किरकिरी हुई है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम दुनिया में एसडीजी-2030 के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहे थे। अब इस महामारी के प्रभाव ने हमारे सतत विकास लक्ष्य को भी प्रभावित किया है। इस प्रभाव से निश्चित रूप से संयुक्त राष्ट्र का एक नई दुनिया के सत्रह सूत्रीय विकास का लक्ष्य सम्भव होगा या नहीं, यह आने वाला समय बताएगा। यदि दुनिया के सभी राष्ट्र अपने आर्थिक अभिवृद्धि को बढ़ा सकेंगे और संतुलित वातावरण व अनुकूल परिस्थितियों  का निर्माण कर सकेंगे तो ही सब कुछ संभव है अन्यथा हम कुछ नई चुनौतियों के साथ अपनी प्रगति को देख सकेंगे।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश) 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

4 comments :

  1. सर,आपने विश्व स्तर पर श्रमिकों की वर्तमान और भावी स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है। भारत सहित विश्व संस्थाओं को श्रमिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय नीति तैयार कर इसका सख्त अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए।

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  2. बहुत बहुत बधाई कन्हैया जी ।

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  3. आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद मित्रों. अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराते रहें. जून अंक में एक नए विषय पर आप पढ़ सकते हैं.

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