कहानी: वह बारिश...

वागीशा शर्मा

महिला सशक्तिकरण की तमाम योजनाओं में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाली देवी अपने मुहल्ले में अपनी समझदारी के लिए काफ़ी मशहूर है। हर किसी की मदद के लिए सदा तैयार रहने वाली वह देवी आज भी एक स्थाई नौकरी की तलाश में भटक रही है। पिता के साये के बिना, इज्ज़त से जिंदगी जी पाने की कोशिशों के दौरान मिली चोटों ने देवी को काफी निर्भीक और बेबाक़ बना दिया है। उसकी यही बेबाक़ी शायद उसकी हर नौकरी में बाधा बन कर खड़ी हो जाती है। आज फिर से उसे एक स्थाई नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाना है पर बारिश है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही। दिमागी असन्तुलन खो चुकने के बाद भी बारिश का आतंक पूनो के जेहन में ऐसा बैठा है कि वह देवी को इस घनघोर बारिश में एक कदम भी घर से बाहर नहीं रखने देना चाहती। ऐसी बारिश ही तो थी उस दिन भी... सारा घटनाक्रम एक बार फिर से ताज़ा हो कर देवी के सामने आ खड़ा हुआ। मात्र पाँच बरस की नन्ही जान और दिशाहीन भविष्य... ।
पिता यानि मनखू के एक-दो सब्ज़ी के खेत हैं और वही उसकी जिंदगी का सहारा हैं। फ़सल की कमाई से मिले रुपये एक सिरहाने के कवर में सँजो कर रख लिए जाते हैं। घर में यही एकमात्र सिरहाना है और वह भी सन्दूक में सँजोया रहता है। ऐसा हो भी क्यों ना क्योंकि वह कोई साधारण सिरहाना थोड़े ही है वह तो मनखू की तिजोरी है। तिजोरी भी ऐसी जो अधिक समय तो धन-निर्गमन की ही साक्षी बनी रहती है। थोड़े-बहुत रुपयों का आगमन तो सिर्फ छह मास में एकाध बार ही फसल के समय होता है बाकी समय तो वह धनागमन की आस में बोर ही होती रहती है।
फिर भी मनखू खुश है क्योंकि उसे बहुत ही समझदार पूनो मिली है जो गृहस्थी जमाने में बहुत कुशल है। उसके छोटे-छोटे सब्जी के खेतों में से जो भी बन पड़ता है उसी से वह अच्छे से घर चला लेती है। मनखू भी उसे पूरा आदर व सम्मान देता है। इस गरीबी में भी खुश रहता है। मनखू भाँति-भाँति की सब्जियाँ बीजता है ताकि खेत का कोई भी कोना खाली न रहे और आमदनी बढ़ाई जा सकी। ऐसा वह करे भी क्यों ना क्योंकि उसके आँगन की महक ‘देवी’ को जो उसे पढ़ाना है। गोद में डालते ही मनखू ने जो कहा की मेरे घर देवी आई है सो बेटी का नाम ही देवी पड़ गया।
मनखू तो बिन बाप के बड़ा हुआ है। छोटी उम्र की विधवा माँ ने जो-जो कष्ट उठाए उन्हें मनखू ने होश संभालते से ही महसूस किया है। स्वर्गीय पिता के आमों के बाग़, खेतों की फसलें किस तरह एक क्षण में पराए कर दिये गए और उन्हें एक-एक निवाले के लिए तरसाया गया, यह मनखू ने बख़ूबी देखा और समझा है। बहू और पोते पर छाया बनी विधवा दादी अपने बुढ़ापे की समस्याओं से कैसे जूझती रही इसका प्रत्यक्षदर्शी भी तो मनखू रहा है। इन सभी दुखों का एक ही कारण मनखू को सदा समझ में आया है और वह है माँ व दादी का निरक्षर होना। नहीं तो क्या मजाल किसी की कि आमों के ढेरों पेड़ों के बाग़ अगले दस सालों के लिए किसी और को बेच दिये जाएँ और वह भी निरक्षर माँ से झूठ बता कर, अँगूठा लगवाकर! इन सब अनुभवों के चलते मनखू अपनी प्यारी गुड़िया सी देवी को बहुत अधिक पढ़ाने की जुगत में दिन-रात लगा रहता है।
हर बारिश से पुष्पित-पल्लवित होती सब्ज़ी की फ़सल उसे संकल्प-पूर्ति के कुछ और पास ले जाती दिखाई देती है। उसका सपना है कि वह देवी को एक बढ़िया से स्कूल में पढ़ाए ताकि उसका भविष्य सँवर जाए और अपनी माँ व दादी की तरह के दुखों से वह अपने कलेजे के टुकड़े को बचा कर रख सके।
टमाटर के एक महीने पहले लगाए बीजों की पौध को बड़े यत्नों से उसने पूरे खेत में लगाया था। मेंड़ खाली न जाये अतः वहाँ करेला व घीया भी लगाया। पूरी मेहनत और लगन से हर दिन सुबह से शाम तक खेतों की निगरानी भी की ताकि कोई पशु अन्दर घुस कर उसके अरमानों का गला न घोंट दे। कड़ी धूप में सिंचाई, निराई, बुवाई सभी में उसकी पूनो ने भी उसका भरपूर साथ दिया।
इस बार जनवरी में बार-बार थोड़ी-थोड़ी बारिश आते रहने से सभी पौधे जल्द ही लहलहा उठे थे इसलिए  मनखू और पूनो भी भविष्य की योजनाओं को उड़ान देने लगे थे। वे सोचते भी क्यों ना, अब देवी भी तो पाँच की हो चली थी। छह फरवरी को वह हल्की-हल्की मनभावनी वर्षा कुछ तेज हो गई और देखते-देखते ओला-वृष्टि में बदल गई। एक अनहोनी की आहट को दिल में दबाये मनखू और पूनो ने बारिश और ओलों की मार खाकर भी, चोटों की परवाह किए बिना, खेत के कुछ हिस्से को किसी तरह पक्षी-जाल से ढक लिया। पर वरुण देवता तो जैसे अपने ख़जाने खोल चुके थे। एक-एक ओले का पौधों पर गिरना मानों दोनों के कलेजे पर वार करना था। दो-एक घण्टे कहर बरपाने के बाद बारिश कुछ थमी तो खेत के नज़ारे ने मनखू को अश्रूपूरित तो किया ही, साथ ही उसके दिलोदिमाग में एक बवंडर मचा दिया। जिन पौधों को जाल में छुपाया था वे तो फिर भी कुछ हद तक बच गए पर बाकी पौधे तो मानों रौंद कर पानी में डुबो दिये गए थे। छोटी-छोटी घीयाएँ ओलों के तीखे आघातों से क्षत-विक्षत हो चुकी थीं। करेले की बेलें तो हवा के झोंकों से मानो गायब ही हो गई थीं। इस तबाही के साथ मनखू की सारी योजनाएँ भी मानो पानी में डूब गई थीं। क्या अब कभी वह अपनी देवी के लिए कोई सपना देख पाएगा? किसान की पूरी छह मास की पूंजी रूपी फसल लगभग मटियामेट हो चुकी थी। क्या उसकी देवी भी उसकी माँ व दादी के तरह ही निरक्षर रह जाएगी? अपने कलेजे के टुकड़े के लिए ऐसे संघर्षपूर्ण जीवन की कल्पना भी मनखू को सिहरा देने के लिए काफी थी।
पर वाह रे नारी शक्ति! अतीव कठिन परिस्थितियों में भी आशा की किरण ढूँढ पाना तो मानो पूनो का स्वभाव ही था। तभी तो वह एक कुशल साथिन थी। विपरीत परिस्थितियों में भी चट्टान की तरह खड़े रहना ही तो उसने सीखा था। उसने कुछ खड़े पौधों की तरफ मनखू का ध्यान आकर्षित करते हुए पूरा ब्योरा सुना दिया कि कहाँ-कहाँ बचत करके इस नुकसान की भरपाई हम कर सकते हैं और अपनी चाँद सी गुड़िया के लिए वही स्वप्न साकार कर सकते है जो हम आज तक बुनते आए हैं। उस सारे विवरण में पूनो का अपना ही सुख-त्याग मूर्धन्य था। 
पत्नी के अविचल निश्चय ने मनखू को फिर से उठने की हिम्मत दी और एक बार फिर मनखू अपनी देवी के लिए समर्पित होकर खेत को संभालने में व्यस्त हो गया। किस पौधे को कहाँ से काट दिया जाए, कहाँ के पत्ते हटा कर पौधे को नया जीवन दिया जाए, किस जगह पर कुछ जल्दी तैयार होने वाले नए पौधे लगा दिये जाएँ, आदि-आदि। समय बढ़े-बढ़े घाव भर देता है। मनखू के भी ओला-वृष्टि से बने शारीरिक व मानसिक दोनों ही प्रकार के घाव भर चले थे।
पर शायद देवी की किस्मत में कुछ और ही था। ख़ुदा को कुछ और ही मंज़ूर था। ठीक 35 दिन बाद एक बार फिर वरुण देवता पृथ्वी पर कहर बरसाने पहुँच गए। बात रात की थी। घुप्प अंधेरे में केवल बारिश और ओलों के शोर के सिवा कुछ दिखाई और सुनाई देता ही न था। मनखू का दिल एक बार फिर काँप उठा। उठकर खेत में जाने लगा तो पूनो ने किसी अनहोनी की आशंका से रास्ता रोक लिया। पर मनखू की आँखों में नींद कहाँ। रात का एक-एक पल सैंकड़ों दिनों के बराबर लग रहा था क्योंकि 35 दिन पुराने खेत का दृश्य रह रहकर मनखू के सामने नाच रहा था। अपनी बेटी के भविष्य के एक बार फिर डूब जाने की चिंता उसे सताये जा रही थी।
सुबह सवेरे सूरज की पहली किरण के साथ ही पूनो को बिना बताए ही वह खेत पर जा पहुँचा। पर, क्या वहाँ कभी खेत था? पौधों से टूट कर गिरे छोटे-छोटे क्षत-विक्षत टमाटर मानों मनखू के टूटे हृदय के हजारों टुकड़े थे। मनखू उस उजड़े दृश्य को देखकर भगवान को कोसे बिना नहीं रह पाया। एक-के बाद एक लगी ठोकर मनखू को हिला गई और वह चकरा कर ज़मीन पर गिर पड़ा। किस्मत का खेल तो अभी और भयानक था। जहाँ मनखू गिरा वहाँ कोई नुकीला पत्थर भी रहा होगा जिसने गिरने के साथ ही मनखू के सिर में गहरा घाव कर दिया। जब तक किसी की नज़र उस पर पड़ती तब तक अति रक्तस्राव के चलते वह दुनिया से ही कूच कर गया था। पूनो, जो 35 दिन पहले एक अविचल चट्टान बन कर पति के गिरते मनोबल को संभालने में कामयाब सिद्ध हुई थी वही आज एक निर्जीव पत्थर बनी बैठी थी। और देवी, एक बार फिर अपने पिता की ही तरह एक बिन बाप की बेटी बन कर संघर्ष पूर्ण जीवन जीने के लिए दुनिया में अकेली रह गई थी क्योंकि इस सदमे ने उसकी माँ को भी मात्र एक मिट्टी का लौंदा बना कर छोड़ दिया था जिसमें हाड़-माँस तो था पर दिमाग का संतुलन तो शायद मनखू की चिता में ही जल गया था।

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