लघुकथाएँ: भावना सक्सैना

1. हित-अहित

मेहरा गर्दन ऊँची किए निदेशक के सामने खड़ा था।
“मेहरा जी आपको रिपोर्ट बदलनी होगी।”
“क्षमा करें सर, यह मेरी नहीं टीम की रिपोर्ट है”
“टीम आपकी है, उसे आश्वस्त करना आपकी जिम्मेदारी है”
“मैं सही को गलत करने के लिए आश्वस्त नहीं कर सकता।”
“इसमें कुछ गलत नहीं है, आप जानते हैं। आधी राशि का भुगतान हो चुका है। इस रिपोर्ट से शेष भुगतान रुक जाएगा।”
“यह तो भली बात है, सरकार का पैसा बचेगा”
“आप समझ नहीं रहे हैं। ऑडिट में इस बात की शाबाशी नहीं दी जाएगी कि आधा पैसा बचाया, वहाँ यह पूछा जाएगा कि आधा क्यों दिया गया था।”
“सर, तो क्या एक गलती को छिपाने के लिए दूसरी गलती की जाए?”
“गलत सही, कुछ नहीं जानता मैं, उच्चाधिकारी यही चाहते हैं कि इस स्थिति से जल्द से जल्द निपटा जाए” आवाज़ में तल्खी बढ़ गयी थी।
“मैं क्षमा चाहता हूँ, मैं रिपोर्ट बदलने में असमर्थ हूँ, आप दूसरी जाँच कमेटी बिठा लें।”
“यह तो अपने लिए और मुसीबत बुलाना होगा, हमसे पूछा जाएगा कि अपनी ही चुनी टीम पर दोबारा दूसरी टीम क्यों गठित की गई, इसका सीधा अर्थ होगा कुछ घपलेबाजी है”
“...”
"अच्छा आपको एक मौका और देते हैं, आप वह रिपोर्ट न बदलें, अब लिख दीजिए जो त्रुटियाँ थी वह ठीक कर दी गयी हैं।"
"ऐसा हो तो नहीं पाएगा"
"आपको करना नहीं लिखना भर है, समझने की कोशिश कीजिये मेरे ऊपर भी दबाव है।"
"आपको अपने दबाव कैसे झेलने हैं, यह आप तय करें।"
“आप जानते हैं, आप अपना अहित कर रहे हैं।”
“मेरा सबसे बड़ा अहित तब होगा जब मैं आइना देखने लायक न रहूँ।
….
कुछ माह पश्चात मेहरा का दूसरे कार्यालय में प्रतिनियुक्ति के लिए साक्षात्कार था। वह प्रसन्न लौटा था। सभी को उम्मीद थी चयन उसी का होगा...
...
परिणाम अपेक्षानुरूप न था।
कार्यालय में सब हैरान थे कि सबसे सशक्त प्रोफाइल  औऱ बेहतरीन रिकॉर्ड होने के बावजूद मेहरा का चयन प्रतिनियुक्ति पद पर नहीं हुआ... उस पर भी गज़ब यह था कि मेहरा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
...
मेहरा को कोई हैरानी न थी। वह परिणाम पहले से जानता था, क्योंकि साक्षात्कार में बोर्ड सदस्य के रूप में निदेशक महोदय विराजमान थे।
परिणाम आने के बाद निदेशक ने मेहरा को बुलवाया, उम्मीद थी कि वह शर्मिंदा व दुखी होकर आएगा। मेहरा आया और मुस्कुराता हुआ सामने खड़ा रहा... उसके चेहरे पर सुकून था।
निदेशक के चेहरे पर खीज थी...
***


2. प्रतिशत


कुछ महीनों से वह बहुत परेशान था... जब से कम्पनियों ने नई ऑनलाइन खरीद प्रणाली शुरू की थी उससे लिए जाने वाले उपकरणों की सप्लाई लगभग बंद हो चुकी थी। अच्छे भले चलते व्यवसाय को बैठता देख उसकी नींद उड़ गई थी। गोदाम में स्टॉक बहुत था और उसे डर था कि ऐसा ही चलता रहा तो उसके पास पड़े अधिकांश उपकरण आउटडेटेड हो जाएंगे। कंप्यूटर उपकरण यूँ भी बड़ी तेज़ी से उन्नत होते रहते हैं।
क्रय मूल्य पर उपकरण प्रदर्शित कर देने के दस दिन बाद भी उसके पास कोई आर्डर नहीं था।
वह हमेशा उसूलों पर चला था... अंततः देर तलक चली अंदरूनी जद्दोजहद के बाद परिवार का सोचते हुए आज अपने सम्मान से समझौता कर वह उस कम्पनी मैनेजर के पास पहुंचा जिससे एक समय पर बहुत अच्छे सम्बन्ध थे और वहाँ अधिकांश उपकरण उससे खरीदे जाते थे। शायद मिलने से कुछ पता चले।
“सर मैं समझ नहीं पा रहा कि क्रय मूल्य पर दाम रखने के बाद भी आप मुझसे समान क्यों नहीं खरीद रहे। क्या मुझसे कोई भूल हुई है?”
“अरे नहीं-नहीं, ऐसा क्यों सोचते हैं आप। आप तो जानते ही हैं नियमानुसार हमें सबसे कम दाम वाला माल ही खरीदना होता है। कहीं और इससे कम दाम पर उपलब्ध है, बस इसीलिए आपसे नहीं खरीद पा रहे, मजबूरी है।”
“लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?  कोई भी घाटे से तो सामान नहीं बेच सकता। सप्लायर मुनाफा न भी ले, तो खरीद मूल्य से कम पर तो नहीं बेच सकता”।
“हमने खरीदा है...
लो ये माल की डिलीवरी आ गयी है, अपने  आप देख लो।“
“सर लेकिन जिस उपकरण की मैं बात कर रहा हूँ यह वह नहीं है। जिस मॉडल का आपने क्रय आदेश जारी किया है यह उससे पहले का मॉडल है। कोटेशन और आर्डर वर्जन 7 का है और सप्लाई वर्जन 6 हुआ है। इसे तो अब कोई नहीं खरीदता।
हाँ तो, भई काम तो वैसा ही करेगा…
यह उससे धीमा चलता है।
अरे हमारे यहाँ जिन्हें इस पर काम करना है वह भी धीमी रफ्तार से ही करते हैं, इसलिए उन्हें फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन!
अरे लेकिन-वेकिन क्या, समझने की कोशिश कीजिए आप, यह तो आपके और हमारे बीच की समझ है। व्यापार के गुर हैं। आप बहुत भोले हैं, नहीं सीखेंगे तो जी नहीं पाएँगे।
आप सलाह दें मैं क्या करूँ।
"आप पुराने मित्र हैं इसलिए बताता हूँ... आपको निचले मॉडल का दाम कोट करना है और वही सप्लाई करना है, बस स्पेसिफिकेशन नए मॉडल के देने होंगे। बाकी प्रतिशत आपको रामपाल समझा देगा।
अगली सुबह उसने अखबार वाले को पुकारा... “भाई अबसे रोजगार समाचार भी डाल दिया करना।"
वह अपना प्रतिशत तय कर चुका था।

4 comments :

  1. सामयिक विषयों पर सशक्त लघुकथाएँ।

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  2. सामयिक विषयों पर सशक्त लघुकथाएँ।

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  3. सामयिक विषयों पर सशक्त लघुकथाएँ।

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  4. दोनों लघुकथाएँ ही बहुत बढ़िया भावना जी !

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