मीरा का काव्य

डॉ. रूपा चारी

असोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, ज्ञान प्रबोधिनी मंडल, श्री मल्लिकार्जुन और श्री चेतन मंजु देसाई महाविद्यालय, काणकोण गोवा
चलभाष: +91 985 015 2578


 आज इक्कीसवीं शती में हम विविध विमर्शों की चर्चा करते हैं। नारी  विमर्श के मंच पर स्त्रियों के साहस और प्रगतिशीलता के विस्तृत रुप में  आयाम खुलते हैं। 15 वीं शती के राठोड वंश की कन्या ने अनेक कटु  आरोपों का सामना करते हुए अपने इष्ट की प्राप्ति के लिए स्वयं को  ‘जोगिन’ में परिवर्तित किया। परिवार और समाज का विरोध करने और इष्ट  भक्ति में रममाण होने के लिए अपने अनोखे व्यक्तित्व का साक्षात्कार करवाया। मीरा ने श्रीकृष्ण भगवान के कई रूपों का साक्षात्कार किया है।  भगवान मीरा के लिए प्रिय, सखा, पति और उद्धारक भी है। मीरा का काव्य जीवन संघर्ष का रहा है।

 मीराबाई का जन्म 1498 ई. से 1504 ई. के बीच राजस्थान के मेड़ता राज्य के कुकड़ी  गांव में हुआ था। इनके पिता रतनसिंह और पितामह दूदा सिंह थे। बचपन में भगवान श्रीक़ृष्ण की मूर्ति के प्रति मीरा की ललक बहुत थी। वह मूर्ति की पूजा अर्चा में इतनी डूब गयी कि सहज भाव से गा उठी –
   पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
   वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु किरपाकर अपनायो।
   जनम जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायो॥

 1516 ई. में मीरा का विवाह मेवाड़ के शासक राणा सांगा के ज्येष्ठ  पुत्र भोजराज के साथ हुआ। राजकुमार भोजराज अपनी पत्नी मीरा की भक्ति भावना को उदार ह्रदय से देखते थे। मीरा अपने दिव्य प्रेम की  अभिव्यक्ति करती थी –
   हेरी मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय।
   सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
   गगन मण्डल मेँ सेज पिया की, किस बिध मिलना होय।
   घायल की गति घायल जानै, की जिन लाई होय।
   जौहर की गति जौहर जानै, की जिन जौहर होय।
   दरद की मारी बन-बन डोलूं, बेद मिला नहिं कोय।
   मीरां की प्रभु पीर मिटैगी, जब बैद सांवलिया होय।

1523 ई. में भोजराज की मृत्यु हुई। उसके बाद पिता और  ससुर की भी मृत्यु हुई। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का मानना है की मीरा की मां का निधन, पितामह, पिता, श्वसुर और पति की मृत्यु, गृह कलह ने  मीरा के भीतर विरक्ति का भाव भर दिया। वह श्रीक़ृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने आनंद मग्न होकर नाचती और गाती थी। अनुश्रुतियां बताती हैं कि मीरा बचपन से ही कृष्ण की मूर्ति को अपने साथ रखती थी। ससुराल में भी पूजा करती थी। मैनेजर पाण्डेय के कथन के अनुसार ‘ मीरा को  अपने ह्रदय के विवेक की रक्षा के लिए जिस अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा, उससे भक्तिकाल ले किसी दूसरे कवि को नहीं। कबीर, जायसी और सूर के  सामने चुनौतियां और कठिनाइयां भाव जगत की थी। मीरा के सामने भाव  जगत से अधिक भौतिक जगत की सीधे पारिवारिक और सामाजिक जीवन  की चुनौतियां और कठिनाइयां थी। एक स्त्री, वह भी मेड़ता के राठौर राजपूत कुल की बेटी और मेवाड़ के महाराणा परिवार की बहू, ऊपर से विधवा। यही था मीरा का अपना लोक। उसके धर्म और उसमें स्त्री की स्थिति का अनुमान किया जा सकता है। लेकिन उसके विरुद्ध की कल्पना भी कठिन है। मीरा ने उसके विरुद्ध खुला विद्रोह किया। उस विद्रोह का साक्षी है उनका जीवन और काव्य।’1

 मीरा साधु संगति और कृष्ण प्रेम में इतना राम गई थी कि मानो वह लौकिक संसार से अलग हो गई थी। मीरा की सखी ऊदा चाहती थी कि  मीरा राज परिवार के नियमों का पालन करें जिसका जिक्र मीरा के काव्य में  आया है। लेकिन मीरा ने उसकी किसी बात को नहीं सुना और कहा कि  कृष्ण प्रेम की बात चाहे जगत से छिपी हो पर साधुओं से नहीं छिपी है।  साधु संगति ही मेरे लिए सब कुछ है। मैं राणा का कुछ भी नहीं सुनुंगी। मेरे  स्वामी सिर्फ गिरिधर है। मीरा का कथन है –
   म्हारी बात जगत सू छानी, साधा सूं नहीं छानी री।
   साधू माता-पिता कुल मेरे, साधू निरमले ज्ञानी री।
   राणा ने समझायो बाई, ऊदा मैं तो एक न मानी री।
   मीरा के प्रभु गिरधर नागर संतन हाथ बिकानी री ॥

 इस काल में नारियां पूर्णरूप से पिता, पति या पुत्र पर आश्रित हुआ करती थी। घर के प्रमुख की अनुमति के बिना नारी घर के बाहर नहीं निकल सकती थी। मीरा विवाह के बाद चित्तौड़ के राणा सांगा की पुत्रवधू बनी और शीघ्र ही वैधव्य को प्राप्त हुई। देखा जाए तो यह काल अत्यंत कठिन अवस्था का था। मध्ययुग में मीरा एक ऐसी नारी है जिसने सामाजिक रूढ़ियों और पारिवारिक मान्यताओं को तिलांजलि दी थी। मीरा ने अपनी स्वतन्त्रता का मार्ग स्वयं प्रशस्त किया। पति के देहांत के बाद स्त्री सती जाना पसंद करती  थी और सामाजिक प्रशंसा की पात्र होती थी। लेकिन मीरा ने ऐसा कुछ नहीं  किया बल्कि भगवान को ही अपना पति मान लिया। मीरा ने साधुओं के  संग बैठकर अलौकिक आनंद की प्राप्ति की।
म्हारा री गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
 भाया छांड़यां बांधा छांड़यां, छाड़यां सगां सूयां।
    साधा संग बैठ –बैठ लोक लाज खूंया।

 मीरा ने परिस्थिति का विरोध किया और लोकलाज की परवाह न कर  अपने गिरिधर गोपाल की आराधना की। रीति-रिवाजों के बंधन में न  जकड़कर अपने इच्छा के अनुसार जीवन जीया। मीरा के काव्य में जीवन का  दर्द है, यातना है सामंती समाज के प्रति विद्रोह है, नारी के स्वाधीनता-  संघर्ष का प्रमाण है। मीरा को कठिन परिस्थिति में गिरिधर पर इतना  भरोसा है कि वह सत्ता को ललकारती है। मीरा का मानना है कि अगर  राजवंश नाराज हो गया तो मुझे राज दरबार से निकाल लेगा लेकिन भगवान  रूठ गया तो ठिकाना पाना कठिन हो जाएगा। मीरा को राजपरिवार,  राजसत्ता और समाज की व्यवस्थाओं से उलझना पड़ा और इस संघर्ष में  उसने हार नहीं मानी। एक बात यहां महत्वपूर्ण है कि जब तक मीरा  राजदरबार में गिरिधर की पूजा करती थी तब किसी को आपत्ति नहीं थी। राणा सांगा का विरोध तब खड़ा हो गया जब मीरा अत्यंत स्वछंद भावना से साधु संतों की मंडली में जाकर मिलने लगी। राज परिवार को यह  स्वछ्न्द्ता अखरने लगी। लेकिन मीरा ने किसी की परवाह न किए बिना  अपनी भक्ति का प्रवाह अखंड रूप में रखा। मीरा निर्भय होकर कहती है
   सीसोदयो रूठयो म्हारो कोई कर लेसी।
   म्हें तो गुण गोविंद के गास्यां हो माई
   राणो जी रूठयां बारो देस रखासी
   हरि रूठयां कुम्हलास्यां हो माई

 भक्तिकाल में मीरा ने सामाजिक रूढ़ियों और पारिवारिक मान्यताओं  का विरोध कर स्वतन्त्रता का वरण किया। वह न राजा भोजराज के शव के  साथ सती गयी न ही विधवाओं की तरह समाज से दूर रही। राणा सांगा की  परवाह न करते हुए समाज में घुलना मिलना चालू रहा, संतों के साथ  नाचती गाती रही और दिन रात ईश्वर भक्ति में रही। खुले रूप से परदा  प्रथा का विरोध किया। नारी का विद्रोह मीरा के काव्य में प्रकट होता है।  गिरिधर को उन्होंने अपना लिया था -
मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई
छाडि दई कुल की कानि कहा करि है कोई
संतन ढिग बैठि –बैठि, लोकलाज खोई

लेकिन जब विक्रमादित्य राजा बन गए तब मीरा के हर कृति की आलोचना होने लगी। मीरा को जान से मारने के लिए अनेक प्रयत्न होने लगे। तब मीरा कह उठी –
नहिं भावै थारो देसड़ लीजो रंगरूडो।
थारा देसा में राणा साध नहीं छे, लोग बसे सब कूड़ो।
गहणा गांठी राजा हम सब त्यागा-त्यागा कर रो चूड़ो।
काजल कीठी हम सब त्यागो, त्यागो है बांधन जूडो।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, वर पायौ छै रूड़ो।

 अर्थात राजा, तुम्हारा देश लिए रहना। मुझे सुंदर वर मिल गया है। मुझे किसी भौतिक श्रुंगार की आवश्यकता नहीं है। मैंने जूड़ा बांधना भी छोड़ दिया है और मुझे किसी आभूषण की आवश्यकता नहीं है। मैं यह स्थान त्याग रही हम क्योंकि तुम्हारे देश में साधु सज्जन नहीं रह गए।

 मीरा के काव्य में अभूतपूर्व दृढ़ता है, आत्मशक्ति है। अज्ञात सत्ता के प्रति अटूट प्रेम, भक्ति है। प्रेम में मांसल भाव नहीं है। इस प्रेम में तन्मयता है, समर्पण है और अनन्यता है। मीरा की विरहभक्ति अत्यंत मार्मिक है। मीरा की विरह वेदना में प्रतीक्षा उच्च कोटि की है। तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों ने मीरा को प्रभावित किया। उसके काव्य में मानवीय और सहानुभूति के स्वर निकलते है।

  मीरा ने विनय के पद बहुत कम लिखे हैं, जिसमें असीम दया और करुणा मिलती है। मीरा अपने गिरिधर की कृपा आकर्षित करने के लिए कहती है –
तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी,
भव सागर में बही जात हूं, काढ़ो तो थारो मरजी।
यौ संसार सगो नहीं कोई, साँचा सगा रघुबर जी॥

 मीरा भगवान की कृपा के लिए बेचैन है। वह कठिन से कठिन पथ पर चलने के लिए तैयार है।
मीरा मगन भई हरि के गुन गाय।
सांप पिटारा राणा भेज्या, मीरा हाथ दियो जाय।
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गइ पाय।
जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन्ह बनाय।
न्हाय धोय जब पीवण लागी, हो अमर अंचाय।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाय।
साँझ भई मीरा सोवण लागी,मानो फूल बिछाय।
मीरा के प्रभु सदा सहाई, राखे विघन हटाय।
भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाय।

 मीरा का किसी धर्म या संप्रदाय से कोई संबंध नहीं था। उसका सारा जीवन मनाओ कृष्णमय हुआ था। कृष्ण के गुणगान में ही अपना जीवन बिता दिया था। जब राणा सांगा ने अत्यधिक विरोध किया तब मीरा वृंदावन चली गई। अटूट भक्ति के कारण मीरा के मन:पटल पर श्रीक़ृष्ण की छबि अंकित हो गई थी। श्रीकृष्ण भक्ति में उसका अन्तर्मन इतना दृढ़ था कि वह कुल –कलह तथा राजदंड से भयभीत न हो पाई।

 मीरा ने गिरिधर गोपाल का पति रूप में, एकनिष्ठ भाव से साक्षात्कार कर लिया है:
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
छाँडि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।
संतान ढिग बैठि-बैठि लोकलाज खोई ॥
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेल बोई।
अब तो बेल फैलि गई, आणंद फल होई ॥

कुल की कानि –कुल की मर्यादा छोडकर और संतों के साथ बैठकर मीरा ने आनंद प्राप्त किया। मीरा ने लोक लाज छोडकर कृष्ण की बेल को आंसुओं से सींचा। संतों की संगति से बेल पल्लवित हुई उस बेल में फल लगने से आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ।

 मीरा के पदों में भक्ति अपने चरम उत्कर्ष पर है। मीरा की वाणी ज्वाला बनाकर फूट पड़ी है।
दरस विन दूखण लागे नैन।
जब से तुम बिछरे हो स्वामी कबहु न पायो चैन।
सब सुणत मोरे छतिया कांपे मीठे –मीठे बैन।
विरह व्यथा कासे कहुं सजनी बह गई करवत ऐन ॥
 जब मीरा हरि की आवाज़ा सूनती है तब वह गा उठती है –
सुनी री मैंने हरि आवन की आवाज।
महल चढि-चढ़ि जोऊं मेरी सजनी कब आवे महाराज।
दादुर मोर पपईया बोले कोइल मधुरे साज।
उमंग्यो इंदु चहु दिसि बरसै दामिणी छोड़ी लाज।
धरती रूप नवा नवा धरिया इंद्रा मिलन के काज।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी वेग मिलो महाराज ॥

 लौकिक से अलौकिक सत्ता की ओर उन्मुख होना रहस्यवाद है। मीरा ने अपनी भक्ति में नवधा भक्ति का समावेश किया है। संतों के बीच बैठकर हरि की चर्चा सुनने में उन्हें सर्वाधिक आनंद आता है।
  कुंजन –कुंजन फिरयां सांवरा, सबद सुण्यां मुरली कां।
  मीरा रे प्रभु गिरिधर नागर, भजन बिना नर फीकां॥

 मीरा कीर्तन के बिना नहीं रह सकती थी। प्रभु के कीर्तन को वह मृत्यु-पाश से रक्षा का उपाय मानती है।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हरख-हरख जस गायो।
विरह में डूबी मीरा प्रभु का निरंतर स्मरण करती है।
रमैया –बिन नींद आवै।
नींद न आवै विरह सतावे, प्रेम की आंच ढुलावै।

 मीरा ने अनेक पद रचे हैं जिसमें वह प्रभु के चरणों में समर्पित होने की इच्छा प्रकट करती है। मन, वचन और कर्म से वह प्रभु के चरणों में लीन होना चाहती है।
म्हारां लगां लगण सिरि चरणा री।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सरणारी।

 भगवान की मूर्ति पर जब पुष्प अथवा फल चढ़ाए जाते हैं तब उसे अर्चन कहलाया जाता है।
मीरा हरि की हाथ बिकाणी, जणम जणम की दासी
मीरा सरण गहां चरणारी, लाज रखा महाराज।

 भगवान को अपना स्वामी व स्वयम को उनका सेवक जानकर पूजा करना इस भाव को दास्य भक्ति कहते है। मीरा ने स्वयम की सत्ता को नकारा है।
मीरा के प्रभु हरि अविनाशी,
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी।

 मीरा के ग्रंथों में निम्नलिखित का नाम लिया जाता है। कुछ रचनाएँ विवादों के घेरे में फंसी हुई है।
1) नरसीजो रो मोहेरो
2) गीत गोविंद –टीका
3) राग गोविंद
4) सोरठा के पद
5) मीराबी मलार
6) गर्वांगीत
7) स्फुट पद

 मीरा की रचनाएँ गेय हैं और गेय पद स्वत: पूर्ण होते हैं। गेय पदों की अंतिम पंक्ति में अपना नामोल्लेख किया जाता है। मीरा ने इस पद्धति को अपनाया है। जैसे – ‘...मीरा रे प्रभु अरजी म्हारी…। इन गेय पदों में भावनाओं का प्रकटीकरण होता है। मीराबाई का जीवन संघर्षमय रहा जिसकी चर्चा शुरुआत में की है। गेय पदों में भावनाओं का प्रकटीकरण रहता हैं। मीरा ने गिरिधर के भावजगत में डुबकियां लगाई है। जहां एक ओर मर्यादा थी, सामाजिक बंधन और निंदा का सामना करना था, वहां मीरा ने संघर्ष कर भावजगत में लीन होना खुद के लिए सफलतम मान लिया।
पग बांध घुंघरिया नाची री।
लोग कहै मीरा भयी बावरी, सासू कहै कुलनासी री।
बिष रो प्यालो राणा भेज्यो, पीवै मीरा हांसी री।
तन मन वारूं हरि चरण में, दरसण अमरित पास्यां री।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर, थारी सरना आस्यां री ॥

 मीरा के पदों में भावों की एकता है, तीव्र रागात्मकता है, निजीपन और आत्मनिवेदन है। पदों में है भावनाओं की प्रामाणिकता और सच्चापन। मीरा के पदों में संगीत के विभिन्न रागों का प्रयोग हुआ है। गायन की सुविधा से छंदों में परिवर्तन हुआ है। सवैया, दोहा, उपमान, कुंडल आदि सभी छंदों का प्रयोग हुआ हैं। यह पद गुजराती, ब्रजभाषा और राजस्थानी भाषा में रचे हैं। मीरा के पदों में अलंकारों का बहुत कम प्रयोग हुआ है।

मीरा के पद मध्ययुग में लोकप्रिय थे और आज भी है इस बात को नकारा नहीं जा सकता है। प्रतिरोध की भाव भूमि पर श्रीकृष्ण की प्रेम अर्चना में ह्रदय से सहज भावाभिव्यक्ति की। प्रतिरोधात्मक शक्तियों से संघर्ष करते हुए पदों के माध्यम से नवीन आशा, आस्था और उत्साह का संचार किया। मीरा काव्य का की प्रासंगिकता आज भी है और भविष्य में भी रहेगी।


टिप्पणी
1. भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य (2001) –पृ .21

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