कहानी: मैसेज बॉक्स

- रमाकांत शर्मा

अब तो शुभकामना संदेश केवल मोबाइल पर प्राप्त होते हैं। कुछ पुराने दोस्त नियमित रूप से तो कुछ रिश्तेदार भूले-भटके कभी-कभी “गुड मॉर्निंग” जैसे शुभकामना संदेश भेजते रहते हैं। सुबह-सुबह उनके मैसेज़ पढ़ने और उनका उत्तर देने के लिए व्हाट्सएप खोलना मेरी एक आदत सी बन गई है। लोगों से जुड़े रहने का यही तो एक साधन बच रहा है, वरना तो ज़िंदगी की इस भागम-भाग में किसे फुरसत है लोगों का हाल पूछने और उन्हें हर सुबह याद करने का।

आज चाय के बाद मैंने मैसेज़ पढ़ने शुरू किये हैं। वही लोग हैं जो रोजाना नियम से अपनी शुभकामनाएँ भेजते रहते हैं। मैं एक-एक कर मैसेज़ खोलता जा रहा हूँ और उन्हें उत्तर भी देता जा रहा हूँ। अंत तक आते-आते ठिठक गया हूँ – यह संदेश किसका है? भेजने वाले का नाम कुछ जाना-पहचाना लग रहा है – ‘संजना’। दिमाग पर थोड़ा जोर डालते ही उस नाम से जुड़ा एक चेहरा तेजी से जेहन में उभर आया है। यह तो वही संजना है जो करीब आठ साल पहले कानपुर ऑफिस में मेरे साथ काम करती थी। ट्रांसफर के बाद मैं वह शहर छोड़कर इस शहर में आ गया था और तबसे उससे कोई संपर्क नहीं था।

हम दोनों ने उस ऑफिस में साथ काम किया था, पर उस रिज़र्व रहने वाली लड़की से बहुत कम संवाद हो पाता था। वह सचमुच बहुत सुंदर थी और उसका साथ पाने के लिए कई लोग लाइन में लगे रहते, पर वह किसी को भी घास नहीं डालती थी। आठ साल के लंबे समयाँतराल के बाद आज व्हाट्सएप पर उसका मैसेज पाकर मैं अचंभित था। इन आठ सालों में मेरा मोबाइल नंबर नहीं बदला था, इसलिए संदेश भेजने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई होगी, लिखा था –

“कैसे हैं आप? सुप्रभात” – संजना

मैंने यंत्रवत उसका उत्तर दे दिया था – “अच्छा हूँ, आप कैसी हैं? इतने दिन बाद आपने याद किया, अच्छा लगा।”

“बहुत दिन से सोच रही थी आपसे संपर्क करूँ। पर यही सोच कर रह जाती थी कि आप पता नहीं पहचानेंगे भी या नहीं।”

“हाँ, कुछ क्षण तो लगे समझने में, साथ काम करते थे, तब भी हमारे बीच संवाद ही कितना था? पर भूलने जैसी कोई बात नहीं।”

“मैं ऐसी ही हूँ। खुल कर किसी से बात करने में मुझे संकोच होता है। इसीलिए मैंने आपको फोन नहीं किया, लिख कर बात करने में मैं सहज रहती हूँ।”

“मतलब, आप कभी फोन नहीं करेंगी और मैं भी आपको फोन नहीं करूँ।”

“यह आप-आप क्या लगा रखी है? छोटी हूँ आपसे। “तुम” कह सकते हो मुझे। हाँ, कभी मन करेगा तो फोन भी करूंगी।”

“ठीक है, यह तो बताओ, इतने दिन बाद अचानक तुमने मुझे याद कैसे किया?”

“याद करने के लिए कोई बहाना चाहिए क्या? बस लगा, इतना लंबा गैप हो गया है। आपने तो कभी याद किया नहीं, चलो मैं ही कर लेती हूँ।” 

“गुड, अच्छा किया। संपर्क में रहेंगे हम, ठीक है।”

“ठीक है।”

दूसरे दिन से हर दिन सुबह-सुबह उसका “गुड मार्निंग” मैसेज़ आने लगा। मैं भी उसका जवाब तुरंत दे देता। किसी दिन उसका मैसेज़ नहीं होता तो अटपटा लगता। बाद में वह मैसेज़ न भेज पाने का कारण भी लिख डालती। कभी मैं व्यस्त होता और जवाब न दे पाता तो वह चिंता प्रकट करती – “कहाँ हैं आप? सुबह से शाम हो गई आपने कोई उत्तर ही नहीं दिया।” 

धीरे-धीरे गुड मार्निंग जैसे संदेशों के साथ-साथ ऐसे अन्य संदेशों का भी आदान-प्रदान होने लगा जो ज्यादातर खुशहाल जीवन जीने के तरीकों से भरे होते थे। ऐसे ही किसी संदेश की वह प्रशंसा करती और मेरी सुरुचि की तारीफ भी करती। मैं भी इसमें पीछे नहीं रहता।

एक दिन उसने जो संदेश फारवर्ड किया वह था – “अच्छी किताबें और अच्छे लोग तुरंत समझ में नहीं आते, उन्हें पढ़ना पड़ता है। आपका दिन शुभ हो।”

मैंने लिखा था – “अति सुंदर, थैंक्स फॉर गुड विशेज़ एँड लवली मैसेज़। पर क्या यह सही नहीं है कि कुछ पेज पढ़ने पर ही असलियत सामने आ जाती है?”

उसने तुरंत उत्तर दिया – “मेरी समझ में ना किताब आती है और ना लोग।”

“अपना खुद का मैसेज़ देखो, पढ़ना पड़ता है। बंद किताब और लोग कैसे समझ में आएँगे?”

“मुझसे पूरी किताब पढ़ी नहीं जाती और ना ही लोग। कवर देख कर किताब पढ़ने और सूरत देखकर संपर्क बनाने का मन तो करता है, पर अकसर ना तो किताबों के पृष्ठ खोल पाती हूँ और ना ही लोगों के मन।” 

“चलो, ऐसा करो कोई किताब पूरी पढ़ो और उसे कितना समझा, मुझे बताओ।”

“ठीक है... आप कहते हैं तो... कोई किताब बताइये।”

“कोई सी भी किताब उठा लो। पढ़ना शुरू तो करो।”

“अच्छा, मैं कोशिश करती हूँ।”

उसके बाद कई दिन तक उसका कोई मैसेज नहीं आया और ना ही उसने मेरे मैसेजेस का कोई जवाब ही दिया। मैं रोज ही यह सोच कर मैसेज बॉक्स खोलता कि आज तो उसने कोई मैसेज भेजा होगा, पर मायूसी ही हाथ लगती।

उस दिन आशा के विपरीत पहला ही मैसेज उसका था – “मैंने किताब पूरी पढ़ ली है।”

“कौन सी किताब?”

“नाम में क्या रखा है? आपकी सलाह मान कर जो भी पहली किताब हाथ लगी, पढ़नी शुरू कर दी। आपने ठीक कहा था कि कुछ पृष्ठ पढ़ने के बाद ही यह लगने लगता है कि इसे पूरा पढ़ा जाए या नहीं। मुझे भी लगने लगा था कि बेकार ही अपना टाइम बरबाद कर रही हूँ। पर, जैसे-जैसे पढ़ती गई इंटरेस्ट आता गया और जब किताब खत्म हुई तो समझ में आया कि किताब वास्तव में बहुत अच्छी है।” 

“देखा, मैंने ठीक कहा था ना कि पढ़ना शुरू तो करो।”

“हाँ, पर यह भी सही है कि जब तक आप पूरा पढ़ें नहीं किताब समझ में नहीं आती। बहुत अच्छी किताब को भी हम कुछ पृष्ठ पढ़ने के बाद उठा कर रख सकते हैं। किताब समझनी हो तो उसे शुरू से अंत तक पढ़ना जरूरी है”।

“अच्छे लोगों को भी तो पढ़ना पड़ता है।”

“ बुरे लोग भी तो बिना पढ़े समझ में नहीं आते।”

“हूँ... सही कह रही हो। अच्छा, किताब पढ़ डाली, अब किसी व्यक्ति को भी पढ़ डालो।”

“व्यक्ति को पढ़ना किताब को पढ़ने जैसा आसान है क्या?”

“कभी कोशिश की तुमने?”

“हाँ ... न... हाँ, पता नहीं।”

“यह क्या बात हुई, खैर पढ़कर देखो... फिर बताना अपना निष्कर्ष।”

दूसरे दिन गुड मॉर्निंग के मैसेज़ के साथ उसने एक मैसेज और फॉरवर्ड किया था - 

“दोस्त, किताब, रास्ता और सोच गलत हों तो गुमराह कर देते हैं और सही हों तो जीवन बना देते हैं, सुप्रभात।”

“बहुत अच्छा मैसेज है। किसी दोस्त, किताब, रास्ते या फिर सोच ने गुमराह तो नहीं किया?”

“मैंने पहले ही बताया था कि किताब पढ़ने में मन नहीं लगता था, रास्ता कोई सामने था नहीं, दोस्त कभी बना नहीं पाई और सोच... सोचती तो बहुत हूँ, पर कोई दिशा तय नहीं कर पाई।”

“मुझमें तुम्हें दोस्त नजर आता है?”

“हाँ, अब आने लगा है।”

“पहले नजर नहीं आता था?”

“कहा ना, अब आने लगा है।”

“तो, इस दोस्त ने गुमराह तो नहीं किया तुम्हें?”

“आप मानते हो कि आप गलत दोस्त हो?”

“यह तो तुम्हें तय करना है।”

“किताब अच्छी है या बुरी, यह तय करने के लिए उसे पढ़ना पड़ता है, है ना?”

“तुम क्या कहना चाह रही हो, मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ, कोई अच्छा है या बुरा यह तय करने के लिए उसे भी किताब की तरह पढ़ना पड़ता है, यही ना?”

“बिलकुल। अच्छा मैं कल शाम को चार बजे आपको फोन करूं, चलेगा?”

“तो मन करा तुम्हारा फोन करने के लिए?”

जवाब में उसने मुस्कराती हुई इमोजी की तस्वीर भेज दी।

इतने दिन तक हम सिर्फ चैट करते रहे थे। पहली बार वह मुझे फोन करने वाली थी। मैं दूसरे दिन सुबह से ही शाम के चार बजने का इंतजार करने लगा।

छुट्टी का दिन था। ठीक चार बजे घंटी बजी। मैंने फोन उठा कर ‘हलो’ किया ही था कि उधर से आवाज आई – “हलो, मैं बोल रही हूँ।”

“हाँ, बोलो संजना। तुम्हारी आवाज बिलकुल नहीं बदली है।”

“मेरी आवाज ही पहचान है... गर याद रहे” -  उसके हंसने की आवाज आई।

“वो तो ठीक है, पर तुम बहुत बदल गई हो। वह छुईमुई अपने में डूबी ज्यादातर खामोश रहने वाली लड़की और यह खुद फोन करके मुझसे बात करने वाली संजना।”

“अच्छा नहीं लगा आपको?”

“नहीं... नहीं, ऐसी बात नहीं है।”

वह फिर हंसी थी – “आप ठीक कह रहे हैं। इस आठ साल के लंबे अर्से में इतने सारे अनुभवों से गुजरी हूँ कि थोड़ा बदलाव तो आया है मुझमें। पर, आज भी मैं हर किसी के साथ खुल कर हँस बोल नहीं पाती।”

“इसका मतलब मैं भाग्यशाली हूँ?”

“कुछ क्षण वह चुप रही फिर गंभीर आवाज में बोली – “अब तक शादी नहीं की ना आपने?”

“नहीं की।”

“जानती हूँ, कोई खास कारण?”

“बिलकुल नहीं, बस यूं समझ लो कि अभी तक सोचा नहीं। तुमने की शादी?”

 “नहीं। कोई मिला नहीं अभी तक।”

“अरे, अट्ठाइस साल की हो गई होगी तुम, अब तक कोई नहीं मिला?”

“आप भी तो मुझसे दो वर्ष बड़े हैं, खैर... जाने दो। किसी के भी साथ जिंदगी बिताने के पक्ष में मैं कभी नहीं रही। जिसके साथ पूरी ज़िंदगी बितानी हो, उसके साथ जिंदगी बिताने का मन तो करे।”

“तो लोगों को पूरा पढ़ना शुरू करो ना, कोई ना कोई तो ऐसा मिलेगा ही।”

“सच बताऊं, लोगों को पढ़ती ही रही हूँ मैं।” 

“अच्छा, तुम तो कह रही थीं कि मेरी समझ में ना किताब आती है और ना लोग।”

“कोई पढ़ने के बाद ही यह कह सकता है। बिना पढ़े तो कोई यह कह नहीं सकता कि मुझे समझ में नहीं आता।”

“तुम्हारी बात में दम है।”

“जितने लोगों ने मुझमें रुचि दिखाई मैंने उन्हें पढ़ने की कोशिश की, पर उनमें ना कोई दोस्त नजर आया, ना सही राह मिली और ना ही कोई दिशा तय हो पाई।”

“अच्छा एक बात पूछूँ, इतने वर्ष बाद तुम्हें मेरी याद कैसे आई।”

“किसी की याद आना क्या कोई गुनाह है?”

“मैंने ऐसा कब कहा?”

“अच्छा, अब मैं फोन रखती हूँ। हो सका तो ऑफिस के बाद कल फिर फोन करूंगी” – यह कह कर उसने वाकई फोन रख दिया। मुझे वह एक पहेली सी लगने लगी और दिमाग उसे पढ़ने, समझने में उलझ कर रह गया।

दूसरे दिन सुबह जब मैं मैसेज देखने बैठा तो सबसे ऊपर उसी का मैसेज़ था – “समझ ज्ञान से ज्यादा गहरी होती है, बहुत से लोग आपको जानते हैं... पर कुछ ही हैं जो आपको समझते हैं। गुड मॉर्निंग।”

मैंने तुरंत ही जवाब लिखा – “वेरी गुड मॉर्निंग। मैं तुम्हें जानता हूँ, पर समझ नहीं पाया हूँ। तुम्हारे फोन का इंतजार रहेगा।”

उसका जवाब भी तुरंत आया – “क्यों क्या कभी मुझे किताब की तरह पढ़ने की कोशिश नहीं की?”

“बंद किताब को कोई कैसे पढ़ सकता है।”

“अच्छा? शाम को फोन करती हूँ।”

मैं उसके बारे में सोचने लगा था। वह मुझे अच्छी तो लगती थी। पर, इतने सारे स्मार्ट लोग उसके आसपास नजर आते थे कि वह घेरा तोड़ने की मैं साधारण सा लड़का कल्पना भी नहीं कर पाया था।

शाम को उसके फोन का इंतजार किया, पर फोन नहीं आया। मैंने सोचा शायद समय नहीं निकाल पाई होगी। दूसरे और तीसरे दिन भी जब उसका फोन नहीं आया तो थोड़ी चिंता होने लगी। मुझे लगा, उसका हाल-चाल पूछना चाहिए। 

दो-तीन घंटी बजने के बाद ही उसने फोन उठा लिया। उसके हलो करते ही मैंने पूछा – “क्या हुआ तुम तो उसी दिन फोन करने वाली थीं?”

“कुछ भी नहीं। सोचा बार-बार आपको फोन करके क्यों परेशान करूं?”

“यह भी कोई बात हुई? तुमने कहा था कि फोन करोगी, इसलिए इंतजार करता रहा, फिर दिन पर दिन निकलते गए तो चिंता होने लगी।”

“अच्छा, आपको चिंता हुई मेरी?” 

“हाँ, हुई। नहीं होनी चाहिए थी?” 

“देखना चाहती थी कि मेरी चिंता होती है क्या आपको और क्या आप मुझे फोन करते हैं?”

“तुम मुझे पढ़ने की कोशिश कर रही हो?”

“आप भी तो मुझे पढ़ने-समझने की कोशिश कर रहे हैं, नहीं?”

“हाँ, एक पहेली सामने आ खड़ी हुई है, उसे बूझना तो चाहता हूँ।”

“ चलिए, पहेली बूझने के लिए अता-पता देती हूँ आपको। मैंने आठ साल तक जब-जब ज़िंदगी में आगे कदम बढ़ाने चाहे, आपका चेहरा सामने आता रहा। एक आप ही थे जिसकी आंखों में मुझे भूख नहीं, निश्छलता नजर आई थी। सोचा था, कभी ये निश्छल आंखें मेरी आंखों में झांक कर कुछ अनकहा कहेंगी। पर, इस बंद किताब के पन्ने पलटने के लिए आप आगे आते या फिर किताब के पन्ने फड़फड़ा कर आपके सामने खुद खुल जाते, अचानक आपका ट्रांसफर हो गया और फिर सबकुछ स्थिर होकर रह गया। सुन रहे हो ना?”

“हाँ, सुन रहा हूँ। बोलती रहो।”

“यहाँ से जाने के बाद हमारा आपस में संपर्क रहने का कोई कारण था ना बहाना। अभी कुछ दिन पहले ही मुझे मालूम हुआ कि आपने अभी तक शादी नहीं की है। बस, किताब पढ़ने के लिए मैंने खुद आपके सामने रख दी।”

“हूँ, मुझे पढ़ना भी तो शुरू कर दिया तुमने?”

“हाँ, यह तो जानना ही था कि आपकी ज़िंदगी में मेरी कोई जगह है भी या नहीं?”

“क्या लगा तुम्हें?”

“इस विश्वास को बल मिला कि आपमें एक ऐसा दोस्त है जो मुझे कभी गुमराह नहीं करेगा। मैं अब कोई पहेली नहीं खुली किताब हूँ आपके सामने। आप अपना निर्णय निस्संकोच सुना सकते हैं। अनुकूल नहीं होगा, तब भी बुरा नहीं लगेगा।”

“सोचने का मौका दो मुझे।”

“अचानक यह सब आपके सामने आ गया है। सोचने का मौका तो मिलना ही चाहिए। बस, गुमराह मत करना दोस्त। स्पष्ट बता देना” - यह कह कर उसने फोन रख दिया।

मैं रात भर सोचता रहा। कानपुर के दिनों से लेकर संजना के मैसेज, मेरे खुद के मैसेज और फिर हमारी फोन पर बातचीत मन ही मन में कई बार दोहराता रहा। नींद बड़ी मुश्किल से आई। सुबह उठते ही मैंने मैसेज बॉक्स खोला तो सबसे ऊपर मेरे एक दोस्त का मैसेज था। अकसर मैं मैसेज पढ़कर और उसका जवाब देकर अगला मैसेज़ खोल लेता हूँ, पर उस मैसेज़ में ऐसा कुछ था जिसने मुझे रोके रखा। मैं बार-बार उसे पढ़ रहा था – “उसने एक ही बार कहा दोस्त हूँ, फिर मैंने कभी नहीं कहा...व्यस्त हूँ।”

मैं संजना को जो जवाब देना चाहता था, वह मिल गया था। मैंने यह मैसेज़ तुरंत ही उसे फॉरवर्ड कर दिया।

उसके जवाब का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा – “दोस्त के लिए व्यस्त नहीं हो यह जानकर अच्छा लगा। मेरे मम्मी-पापा से मिलने कब आ रहे हो?”

“बहुत जल्दी। तुमसे मिलने और तुम्हें देखने की भी जल्दी है। चाहता हूँ बस जल्दी से हम उस रिश्ते में बंध जाएँ जो दोस्ती से बढ़कर है।”

मैं मैसेज बॉक्स बंद कर ही रहा था कि उस पर एक मैसेज़ चमकने लगा –

“उलझे जो कभी रिश्ता हमसे 

तो तुम सुलझा लेना, क्योंकि

तुम्हारे हाथ में भी तो

रिश्ते का एक सिरा होगा।”

मैंने देखा, यह मैसेज संजना का नहीं था। किसी दोस्त ने फॉरवर्ड किया था। पर, जिस दिशा में हमने अपने कदम बढ़ा दिए थे, उसे बनाए रखने के लिए यह बहुत सशक्त संदेश दे रहा था। मेरे चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई। मैंने यह मैसेज़ संजना को फॉरवर्ड किया और बिना उसके उत्तर का इंतजार किए मैसेज बॉक्स बंद कर उठ गया। मुझे अपने मम्मी-पापा को भी सबकुछ बताना था जो न जाने कब से मेरे किसी ऐसे फैसले की राह देख रहे थे और कानपुर जाने के लिए बहुत सी तैयारियाँ भी तो करनी थीं।


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