परत-दर-परत आइना दिखाती कहानियों का संग्रह: अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम (कहानी संग्रह)

लेखक: राजगोपाल सिंह वर्मा
पृष्ठ: 118
मूल्य: ₹ 260.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: सितम्बर 2020
प्रकाशक: शुभदा बुक्स, साहिबाबाद-201005
ISBN: 978-81-945745-8-3
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उपन्यास व कहानी लेखन और पत्रकारिता दोनों ही क्षेत्रों में प्रवीण राजगोपाल सिंह वर्मा की पाँचवी पुस्तक का नाम है -‘अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम’। इससे पूर्व आपकी जीवनी परक सामाजिक उपन्यास -‘बेगम समरू का सच’  तथा ‘360 डिग्री का प्रेम’ का प्रकाशन हो चुका है और दो पुस्तकें -‘दुस्साहसी जॉर्ज थॉमस यानि हाँसी का राजा’ तथा ‘गोरों का दुस्साहस’ अभी प्रकाशन प्रक्रिया में हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र में आपने केन्द्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार ही नहीं उद्योग मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रकाशनों में भी संपादन, प्रकाशन और जनसम्पर्क के दायित्वों का कई वर्ष तक निष्ठापूर्वक निर्वहन किया है।
‘अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियों का समावेश किया गया है। संग्रह की पहली कहानी का शीर्षक है-‘छुटकी’। जैसे दुकानों पर या होटलों पर काम करने वाले छोटे लड़के का कुछ भी नाम हो सब उसे छोटू ही पुकारते हैं वैसे ही माथुर साहब के घर काम करने वाली लड़की भी छुटकी है। गरीब का जब सहारा टूट जाता है तो अन्योन्याश्रित हो जाना उसकी विवशता है। पिता की अनायास मृत्यु ने छुटकी को भी माथुर साहब की कृपा पर आश्रित कर दिया। माथुर साहब की कोठी के एक कोने में रहते हुए वह अपनी माँ और छोटे भाई के साथ सुबह जागने से रात 12 बजे तक कोठी के विभिन्न कार्यों में लगी रहती। ठंड से निमोनिया हुआ तो माथुर साहब ने किसी अच्छे अस्पताल में उसका इलाज कराना भी जरूरी नहीं समझा और सरकारी अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। कहानीकार ने छुटकी के बहाने उन सभी संवेदनहीन धनाढ्यों को निर्वस्त्र कर दिया है जो सम्बन्धों और मानवता को ताक पर रखकर धनोपार्जन को ही सब कुछ समझते हैं और गरीब का शोषण जिनकी नियति बन चुकी है।

‘न जाने क्या कहलाता है यह रिश्ता’ शीर्षक है संग्रह की दूसरी कहानी का। सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण उपलब्धि ही कहिए इसे कि आज अपने मन की रिक्ति को भरने के लिए फेसबुक और मैसेन्जर बहुत सहायक सिद्ध हो रहे हैं। रात्रि दस बजे से प्रातः के तीन-चार बजे तक जैसे नये मित्रों की तलाश का बाजार लगता है और फ्रैंड रिक्वैस्ट एसेप्ट करते ही अधिकांशतः अपने मन के कुत्सित विकारों को क्रियारूप देने में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा लगा देते हैं। इस कार्य में नारी जाति या कहिए कि भ्रमित नवयौवनाएँ भी पीछे नहीं। चालबाजी, फरेब और ब्लैकमेलिंग के द्वारा पैसा ऐंठने का व्यवसाय भी इस माध्यम से अपने पूर्ण यौवन पर है तो कुछ अपने आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति के द्वारा जीवन का सुख तलाशने का प्रयास भी करते नजर आते हैं।

संग्रह की कहानी-‘न जाने क्या कहलाता है यह रिश्ता’  भी एक ऐसी ही नारी की कहानी है जो अपने जीवन की कटुता और स्वपोषित रीतेपन को फेसबुकिया पुरुष मित्रों के माध्यम से भरने का प्रयास करती नजर आती है। 

दिनेश पाठक ‘शशि’
‘‘धीरे-धीरे मैं समझ पा रहा था । उसकी रहस्यमय जिंदगी के एकाकीपन की परतें खुलती जा रही थीं। (पृष्ठ-24)
कहानी की नायिका माधुरी एक विद्यालय में प्रोफेसर है किन्तु प्रेम विवाह के बाद पति द्वारा उसका कविता लिखने का विरोध किया जाना उसे कुंठित करता है जिसकी भावाव्यक्ति यदा-कदा वह फेसबुक के माध्यम से करती है और फेजबुक पर जुड़े अनजाने पुरुष मित्र को अपनी कुंठा के कुछ अंश प्रकट कर, अनजानी मरीचिका में जीती है। 
‘‘कृष से विवाह तो हो गया, पर वह चाहते हुए भी उसके संयुक्त परिवार, पेरैण्ट्स तथा अन्य रिश्तेदारों से तालमेल नहीं बिठा पाई थी।’’(पृष्ठ-30)

इस संग्रह में एक ऐसी भी कहानी है जो पूरी की पूरी पत्र विधा में लिखी गई है। अलग-अलग तारीखों में पति द्वारा पत्नी को लिखे गये नौ पत्र इसमें रखे गये हैं। हर पत्र जीवन का फलसफा कहते हुए। तीन दिसम्बर 2001 के पत्र में पौधों के माध्यम से विदेशों में रह रही वर्तमान युग की संतति के स्वार्थपूर्ण व्यवहार को और माँ के धैर्य को कहानीकार ने परोक्ष रूप से जिस बारीकी से इंगित किया है, वह प्रशंसनीय है।
‘‘न जाने तुम कैसे मैनेज करती हो इन सैकड़ों पौधों को और देखते-देखते कुछ तो पेड़ बनकर पल्लवित हो गये हैं। अब उन्हें न मेरी याद आती है और शायद न तुम्हारी। बहुत आत्मनिर्भर जो हो गये हैं।’’(पृष्ठ-37)
कोर्ट-कचहरी में सालो-साल लटकते रहने वाले मुकद्दमों की पीड़ा का उल्लेख किया गया है संग्रह की कहानी-‘‘मुजरिम हाजिर हो’’ में तो प्रेम का नाटक रचने वाले प्रेम में अंधे होने वालों को कैसी पराजय देते हैं कहानी - ‘‘16 प्रेम पत्र’’ को पढ़कर अनुमान लगाया जा सकता है।
‘‘अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम’’ संग्रह की छठवीं और शीर्षक कहानी है। वर्तमान शिक्षा और संचार क्रान्ति ने नारी जाति की सोच को कितना बदला है जो अब पति-पत्नी के सम्बन्ध को जन्म-जन्मान्तर का रिश्ता न मानकर क्षणिक मौज-मस्ती का साधन समझने और येन-केन-प्रकारेण उसे भुनाने का प्रयास करती नजर आने लगी है। वर्तमान में अपने आप को अति आधुनिक समझने वाले युवक-युवतियों के सामाजिक मर्यादाओं को धता बताते व्यवहार और  अर्थशास्त्र पर आधारित प्रेम प्रस्तावों के यथार्थ का आईना दिखाती नजर आती है यह कहानी ।
‘‘स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसी उन्नत तकनीकों की ईजाद और उनकी व्यापक उपलब्धता से स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों की पुनर्व्याख्या द्रुतगति से सरलीकृत हो गई है।
देखते ही देखते जमाना बदल गया है-पूरा का पूरा, तो प्रेम की जगह व्यापार और बाजारवाद क्यों न हावी हो। देह तो न जाने कब से व्यापार का हिस्सा रही है, पुरातन काल में भी। अब उसका उघड़ा संस्करण सामने आ रहा है।’’(पृष्ठ-71)
‘‘सच है...अपने हिस्से का हिसाब हमें स्वयं ही करना पड़ता है।’’- संग्रह की अगली कहानी ‘‘प्रारब्ध’’ का यह अंतिम वाक्य मनुष्य के जीवन की पूरी पहेली का हल प्रतीत होता है। कहानी के नायक ठाकुर अजय प्रताप सिंह पुलिस विभाग में डिप्टी एस.पी. अपनी कमाई दौलत से आगरा में शानदार कोठी बनवाकर रहते हैं। बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें पद से सेवानिवृत्त हो जाने के बाद संतति का पूर्ववत सम्मान प्राप्त होता हो फिर भी कुछ लोग उसे व्यक्त नहीं करते। ठाकुर साहब भी इसके अपवाद नहीं-
‘‘रिटायरमेंट के बाद अवसाद और घर के लोगों से तालमेल न बैठने के किस्से आम होते हैं लेकिन उनसे मेरी घनिष्ठता में न तो मैंने स्वयं ऐसा कुछ देखा था और न ही उन्होंने कभी मुझसे साझा किया। कभी हल्का सा गुबार भी उनके मन में नहीं दिखा। बावजूद उसके यह भी उतना ही सही था कि कुछ तो था जो कतरा-कतरा उनकी जिंदगी को खा रहा था।’’(पृष्ठ-76)
फिसल जाने के कारण अचानक ठाकुर साहब की मृत्यु उपरान्त उनके बड़े पुत्र का व्यवहार कहानीकार को मानने पर विवश करता है कि-
‘‘संस्कारों का व्यक्ति के साथ ऐसा सम्बन्ध है जैसा जल का जमीन के साथ। व्यक्ति के कुछ संस्कार तो उसके अपने होते हैं। हम जीवन को उसकी गहराई तक जाकर देखते हैं तो बोध होता है कि हर व्यक्ति अंततः संस्कारों का ही एक पुतला है। व्यक्ति एक जन्म का नहीं, जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों का परिणाम है।’’(पृष्ठ-80)
सोशल मीडिया ने स्त्री-पुरुषों को अंतरंग संवाद स्थापित करने का सहज अवसर प्रदान किया है। संग्रह की अगली कहानी-‘‘लॉगआउट’’ में कहानीकार ने फेसबुक जैसी आभासी दुनिया के आभासी रिश्तों और उससे मिलने वाले सुख का बहुत ही गहराई से सटीक वर्णन किया है-
‘‘फेसबुकिया इश्क पड़ोसी के घर में पक रहे खाने के जैसा है, मिलता कुछ नहीं, बस खुशबू छाई रहती है।’’(पृष्ठ-89)
किन्हीं पूर्वाग्रहों के वशीभूत समस्त पुरुष जाति के प्रति नकारात्मक सोच बना लेना और फिर अपने जीवन के खोखलेपन को ढकने के लिए कृत्रिम हँसी और छद्म व्यवहार के सहारे जीवन जीने को विवश होना, कुछ नारियों का स्वभाव बन जाता है। संग्रह की कहानी-‘धूल की परत’  की नायिका दिव्या भी पुरुष जाति के प्रति अनेक पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण आजीवन अविवाहित रहती है और क्लास वन अधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी  सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर अपने आप को व्यस्त रखने का उपक्रम करती रहती है। 
‘‘दूर से हाथ तापने और खुद को जलते हुए महसूस करने में जमीन-आसमान का अन्तर है। ... फिर आदमी को तो बहाना चाहिए... वह कुछ समय तक प्रेम करता है, दया भी दिखा सकता है पर जीवन भर न अपना सकता है और न अपना बनकर रह सकता है। यही मूल फर्क होता है स्त्री और पुरुष के बीच। किसी की दया पर पूरी जिन्दगी जीना पड़े यह मेरे लिए सम्भव नहीं था।(पृष्ठ-104)
किन्तु पुरुष जाति के प्रति अनेक पूर्वाग्रहों के बावजूद गत 35 साल से अपने पुरुष मित्र से जुड़े रहकर, उसके आगमन पर उसकी आवभगत कर दिल में सुकून महसूस करती हैं। क्या यह व्यवहार उनके अन्तर्मन की पुरुष चाहत को प्रकट नहीं करता?
राजगोपाल सिेह वर्मा जी ने दिव्या के रहन-सहन, खान-पान से लेकर उसके जीवन के प्रसंगों और तमाम गतिविधियों को बहुत बारीकी से बुनकर ऐसी समस्त नारियों को आइना दिखाने का प्रयास किया है कहानी ‘धूल की परत’ में।
‘‘ओ....नैंसी  ओ!’’ कहानी संग्रह की आखिरी कहानी है जो नैंसी और विक्टर की प्रेम कहानी होते हुए भी जीवन के खुरदरे यथार्थ का दिग्दर्शन कराती है। कहानी में संवेदना और भावुकता के तंतुओं का पूर्ण समावेश है किन्तु विषम परिस्थितियों में भी जीवन को अपने तरह से जीने की कला का सौन्दर्य गढ़ने में कहानीकार को महारत हासिल है। यह जानते हुए भी कि कैंसर के कारण विक्टर की आयु मात्र दो माह बची है नैंसी विदेश में रह रहे अपने पुत्र-पुत्री को वापस आने के लिए कोई दबाव नहीं बनाती और विक्टर के अल्प जीवन में रस घोलने का हर सम्भव प्रयास करती है।
साहित्यकार जो भी देखता है और अनुभव करता है उसका प्रभाव निश्चित रूप से उसकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। राजगोपाल सिंह वर्मा जी ने भी अपने सघन अनुभव और अनुभूतियों का निचोड़ यहाँ प्रस्तुत किया है। संग्रह के प्राक्थन में डॉ. रवीन्द्र कात्यायन जी ने सच ही लिखा है कि-
‘‘संग्रह की कहानियाँ जीवन की सहज अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों से सहज उद्भूत हैं। ये कहानियाँ रोजमर्रा की बेचैन करने वाली सच्चाइयों, कठोर क्रूरताओं, जरूरतों और सवालों से हमें रूबरू कराती हैं।
संग्रह की प्रत्येक कहानी पाठक को सोचने पर विवश करती है और वर्तमान युग की कुसंगतियों से सचेत भी करती नजर आती है। मुद्रण त्रुटिहीन और आकर्षक है।
हिन्दी साहित्य जगत में कहानी संग्रह ‘अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम’ कहानी संग्रह का भरपूर स्वागत होगा, ऐसा सहज विश्वास है।

3 comments :

  1. उत्तम समीक्षा हेतु आदरणीय डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी के समालोचक व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन।

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  2. विद्वान लेखक ने पूर्णतः उचित लिखा है, 'अर्थशास्त्र नहीं है प्रेम' । सच में प्रेम अपने आप में एक दर्शन शास्त्र है। सुंदर कृति हेतु हार्दिक बधाई।

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  3. आदरणीय श्री दिनेश पाठक शशि जी द्वारा की गई समीक्षा बहुत ही सत्यनिष्ठ उत्तम स्पष्ट निष्पक्ष रूप से की गई है कहानी की सभी बारीकियों को निकाल कर सभी बिंदुओं पर गहनता से विचार प्रस्तुत किए गए हैं सादर सहृदय अभिवादन करते हैं आदरणीय समीक्षक जी को साथ ही विद्वान कहानीकार आदरणीय श्री राम गोपाल वर्मा जी को सादर सहृदय अभिवादन करते हैं। दोनों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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