कहानी: तुम, मैं और बोलता सन्‍नाटा

अंजली खेर

चलभाष: +91 942 581 0540; पता: सी-206, जीवन विहार अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड भोपाल- 462 003 मध्य प्रदेश


ड्राइंगरूम से आती पेपर-मैग्‍जीन पटकने की फटर-फटर आवाज़ से कुसुम की नींद टूट जाती हैं। लगता है चार बज गये हैं, इनके चाय पीने का समय हो चला होगा। मुँह से कुछ बोल नहीं सकते, न खुद ही एक कप चाय बनाकर पी सकते हैं। अरे पता हैं कि अब मैं 18-20 साल की नहीं रहीं कि दौड़-दौड़ कर काम करूँ। तबियत भी पहले की तरह नहीं चलती, उपर से ये घुटनों का दर्द, आहहहहह कहते हुए कुसुम ने बिस्‍तर से उठने की कवायद की। उठते-उठते घड़ी पर नज़र पड़ी तो देखा सवा चार हो गया था। चार बजे के आगे काँटा बढ़ा नहीं कि साहब की हलचल शुरू हो जाती हैं। चाय की तलब तो देखो कि 10-15 मिनट भी धीरज नहीं रख सकते हैं एकाध दिन। सोचते-सोचते कुसुम दर्द से कराहते हुए किचन की ओर जाती हैं। 
कुसुम के आने की आहट के साथ ही पति आनंद ने हाथ में पकड़े समाचार पत्र को सेंटर टेबल पर रख दिया और आराम-कुर्सी में बैठ खुद को झुलाने लगे। 
किचन में कुसुम ने गैस पर पतीले में चाय चढ़ाई। आनंद को चाय में काली मिर्च और लौंग पसंद हैं, ये बात कुसुम पिछले चालीस सालों से जानती हैं और इसीलिए किचन में ये दोनों चीजें खत्‍म होने के पहले ही मंगवाकर रख ली जाती थी। 
खौलती चाय को चम्‍मच से हिलाकर कुसुम ने गैस बंद की और दो कप में चाय छानकर ट्रे में रखकर ले आई। आराम कुर्सी पर आँखें बंद किये आनंद के सामने ट्रे लेकर प्रश्‍नवाचक नजरों से निहारती रही, “एखाद दिन चाय देर से मिले तो कोई आफत थोड़े ही आ पड़ती हैं, पर नहीं इनको तो मिलिट्रीमैन की तरह अनुशासन चाहिए, सुबह सात और शाम चार बजे बस। दूसरों से अपेक्षाओं का अंत नहीं, पर कभी खुद ने दूसरों के बारे में भी सोचा हैं। बड़े हिटलर बनते हैं- सोचते हुए कुसुम ने ट्रे में शुगर फ्री क्‍यूब्‍स के साथ रखी चम्‍मच उठाकर चाय के कप पर टकराकर हल्‍के से टन्‍ननन की आवाज की। 
आहट आते ही आनंद ने आँखें खोली, चाय का कप उठाते हुए कुसुम की ओर नजरें उठाकर देखा तो वो भौंहें तरेरकर दीवार की ओर ताक रही थी, “इनके तो नाक पर ही गुस्‍सा बना रहता हैं हमेशा। दो रोटी, साधी पीली दाल और चाय ही तो समय पर चाहिए होती है। कौन सा पंच पकवान बनाने को बोलता हूँ? अरे खाना बनाने वाली बाई रखने को कहता हूँ तो कहती हैं कि थोड़ा काम करती रहूँगी तो हाथ-पैर चलते रहेंगे वरना तो बिस्‍तर पर ही पड़ जाऊंगी। फिर जब समय पर खाना-चाय मांगता हूँ तो इनकी तबियत ही नहीं चलती हैं। चित भी मेरा-पट भी मेरा। इनको खुश रखने के लिए क्‍या करूँ, समझ ही नहीं आता। सोचते-सोचते आनंद ने जैसे ही कप से चाय का बड़ा सा सिप लिया तो गरमा-गरम चाय से उसका मुँह ही जल गया। हड़बड़ी में कप से थोड़ी सी चाय छलक गयी। बस जरा सा हिले-डुले नहीं कि दूसरों के दस काम बढ़ाना तो इनकी आदत ही हैं। इतनी भी क्‍या जल्‍दी थी कि एक बार में ही पूरा कप चाय एकसाथ मुँह में उड़ेल ली - दाँत भींचते हुए कुसुम मन ही मन बोल उठी गुस्‍से से आँखें तरेरते हुए आनंद ने एक-एक कर 5 शुगर फ्री क्‍यूब्‍स कप में डाली, “चालीस सालों से साथ रह रही है, इसे पता हैं कि मुझे मीठी चाय पसंद हैं। पर नहीं, मैडम जी को तो वही करना हैं जो मुझे पसंद नहीं। एक चम्‍मच शक्‍कर ज्‍यादा डाल देगी तो शायद घर का बजट बिगड़ जायेगा।” 
4-6 चम्‍मच शक्‍कर और मैं ही डाल देती हूँ। मजे से पी लेना शीरा वाली चाय, फिर बेहोश पड़े रहना। शुगर की बीमारी हैं फिर भी जीभ पर कोई कंट्रोल ही नहीं हैं। अभी बीमार पडेंगे और डॉक्‍टर मुझे डाटेंगे कि ध्‍यान नहीं रख सकती अपने पति का? अरे 4-6 साल के छोटे बच्‍चे हैं कि अपने भले-बुरे की समझ ही नहीं-कुसुम का गुस्‍सा सातवें आसमान पर था।
छठी शुगर क्‍यूब कप में डालने का मन बनाते हुए हिम्‍मत जुटाकर गर्दन उठाई ही थी कि देखा कुसुम आँखों से अंगारे बरसाते हुए आनंद की ओर एकटक गुस्‍से से निहार रही थी सो हड़बड़ाकर चम्‍मच में रखा क्‍यूब वापस ट्रे में रख चाय का कप उठाकर अनंद धीरे-धीरे चाय पीने लगे। 
मुझे पता हैं कि तुम्‍हें मेरी बहुत फिक्र रहती हैं, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि मुझे सांस लेने के लिए भी तुमसे आज्ञा लेनी पड़े, अरे कभी-कभार तो अपने मन की कर लेने दिया करों-आनंद ने आँखों से ही बाण छोड़े। अपनी पूरी जिंदगी इनके, इनके मां-पापा और अपने दोनों बच्‍चों की सेवा में लगा दी मैंने। दौड़-दौड़कर सबको गरमागरम खाना देती, सबकी जरूरतों का ध्‍यान रखती। दस काम अच्‍छे करती, पर एक भी काम बिगड़ता तो पहले किये दसों काम बेकार... और मैं बुरी की बुरी, सास जब चाहे ताने देती, पर मज़ाल हैं कभी पति ने माँ के सामने मेरा पक्ष लिया हो, चाहे मेरी कोई गलती भी न हो। ऐसी भी क्‍या जिंदगी हैं, लानत हैं इस पर –कुसुम की आँखों की पोरें नम हो चली थी। 
तुमने अपना सारा जीवन मेरे नाम कर दिया। पर क्‍या हमारे बीच इतनी दूरिया थी, कि अपने दिल की बात खुलकर कहने के काबिल भी न समझा मुझे। तुम अच्‍छी तरह जानती हो, बिन कहें किसी के मन की बात समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं हैं। तुम तो मेरी जिंदगी ही हो, तुम्‍हारा पति ही हूँ मैं, कोई दुश्‍मन तो नहीं, कुछ कहकर तो देखती, यदि मैं नहीं मानता तब फिर गुस्‍सा होती तो कोई बात नहीं। बेशक खुद से ज्‍यादा तुमको प्‍यार किया हैं मैंने, बस मुझे आते-जाते प्‍यार जताने की आदत नहीं, और तुमने मेरी इस आदत के चलते बेगाना मानकर नाराजगी में मुझे खुदगर्ज समझ, अपनी दुनिया को खुद तक ही समेट लिया और हमारे बीच विचारों का आदान-प्रदान समाप्‍तप्राय हो गया था। 
क्‍यों, आखिर हर बात तुमको बोलकर ही क्‍यों बताई जानी चाहिये थी? क्‍या मुझे किसी ने मेरी जिम्‍मेदारियों का ज्ञान दिया था? क्‍या मैंने बच्‍चों को पालना या बड़े-बुजुर्गों की तीमारदारी और टाइम मैंनेजमेंट की क्‍लासेस शादी के पहले ही ले रखी थी? नहीं ना, 17 साल में तुमसे ब्‍याह कर तुम्‍हारे घर आई। बिना किसी के कहे, एक-एक कर न जाने कितनी ही जिम्‍मेदारियाँ अपने नाजुक कंधों पर थामकर उन्‍हें शिद्दत से निभाया। कुछ कहने के पहले ही हाथों-हाथ सबकी डिमांड पूरी की, फिर क्‍यों नहीं मेरे बिन कहें ही मेरी जरूरतों को आप एक बार भी समझ पाये? आखिर आपकी ही खातिर तो मैंने अपना पीहर छोड़ा, मेरे माता-पिता का दिया हुआ अपना नाम भी बदल दिया था न मैंने। मेरी अपनी कोई पहचान ही कहाँ शेष रही। मुझे पेंटिंग का शौक था, पढ़ने-पढ़ाने और गाने का भी शौक था। पर यह सोचकर कि छोटी सी आमदनी में इतने खर्चे समेट पाना मुश्किल हैं, सो अपनी तमन्‍नाओं को ताबूत में तालाबंद कर दिल की इतनी गहराइयों में दफ़न कर दिया था मैंने कि वे भूले-भटके भी वापस कभी भी दस्‍तक न दे सकें। 
कुसुम और आनंद दोनों ने ही बुझे मन से चाय का कप सेंटर टेबल पर रखा ही था कि उपर रहने वाले नवदंपत्ति किरायेदार के लड़ाई-झगड़े की आवाज़ तेज होती हुई उनके दरवाजे तक आ पहुंची। हड़बड़ाकर लड़खड़ाते हुए कुसुम दरवाजा खोलने के लिए आहिस्‍ते-आहिस्‍ते उठने का उपक्रम कर ही रही थी कि उसके घुटनों के दर्द को समझते हुए खुद आनंद उठे और दरवाजा खोला! देखा सामने नितीश और निधि खड़े थे। कुसुम को देखते ही निधि अंदर आई पीछे-पीछे नितीश भी आनंद के साथ अंदर सोफे पर आ बैठा। निधि कुसुम की गोद में सिर रखकर जार-जार रोते हुए बोली कि वो अब नितीश के साथ नहीं रहेगी, घर छोड कर चली जायेगी, कोई बात नहीं करेगी उससे। 
कुसुम ने उसके सिर पर हाथ फहराया और बोली-तुम दोनों में किस बात को लेकर झड़प हुई हैं निधि। बेशक रिश्‍तों में प्‍यार बनाएँ रखने के लिए थोड़ा राग-रूसवा जरूरी हैं। जिस तरह नमक और शक्‍कर का तालमेल ही किसी वस्‍तु का स्‍वाद बढ़ाता हैं, पर यदि नमक ज्‍यादा पड़ जाये तो कितना ही सुस्‍वादु भोजन गले के नीचे नहीं उतरता। ठीक उसी तरह प्‍यार की जगह यदि तकरार जरूरत से ज्‍यादा बढ़ जाये तो पति-पत्‍नी के बीच कभी भी न मिटने वाली दूरिया बढ़ती जाती हैं। 
पास बैठे नितीश का हाथ थामते हुए आनंद ने कहा, “बच्‍चों, हर बार खुद ठोकर खाकर सबक सीखने से बेहतर हैं दूसरों से सीख लेकर अपने जीवन के व्‍यवधानों को कम करते जाने में भलाई हैं।” 
“नितीश और निधि तुम दोनों ही एक बात गांठ बांध लो कि गुस्‍सा थोड़े समय के लिए ठीक हैं, पर ज्‍यादा समय रहने से बात करने की संभावनाएँ खत्‍म हो जाती हैं और फिर पति-पत्‍नी के बीच सिर्फ सन्‍नाटा ही बोलता हैं, ये अनुभव के बोल हैं, समझ सको तो समझो” कुसुम ने अंतस की भावनाओं को उडेलते हुए कहा। 
निधि मुस्‍कुराते हुए बोली, “अंकल-आंटी, एक बात कहूँ कि हम दोनों में कोई झगड़ा हुआ ही नहीं हैं।” “फिर ये सब क्‍या था?” आनंद ने पूछा।
“वो तो हमने आप दोनों के बीच की दूरियों को मिटाने के लिए ड्रामा किया था” नितीश बोला आनंद और कुसुम एक-दूसरे की ओर प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह से देखते रह गये। फिर निधि और नितीश ने उन दोनों को पास बिठाकर एक-दूजे का हाथ थमाते हुए कहा कि अंकल-आंटी, हमें बहुत अच्‍छी तरह पता हैं आप दोनों एक-दूसरे को बेइंतहा प्‍यार करते हो, एक-दूसरे की फिक्र भी बहुत करते हो, फिर जो बीत गई वो बात गई सोचकर बीती दुखद यादों को ढ़ोकर भला अपना आज क्‍यों खराब करना? अभी आप दोनों ही तो कह रहे हो न कि पति-पत्‍नी को प्‍यार से हँसी-खुशी रहना चाहिए, तो सब कुछ जानते समझते हुए भी आप दोनों क्‍यों एक-दूसरे से कटे-कटे रहते हो।
“बेटा, घर की चारदीवारी की बात जगजाहिर करते खराब तो बहुत लग रहा हैं, पर हमारे लिए तुम दोनों हमारे बच्‍चों जैसे ही हो, इसीलिए दिल की बात कह रही हूँ कि अपनी भूख-प्‍यास की परवाह न करते हुए पूरे परिवार की नि:स्‍वार्थ सेवा करने वाली पत्‍नी के लिए पति के दो मीठे प्‍यार के बोल जादूई घुटी का काम कर जाते हैं, यदि पति गाहे-बगाहे बस इतना ही कह दें कि थक गई हो ना, तुम लेटो मैं खाना खुद ले लूंगा, या - तुम्‍हारा सर दुख रहा है न, जाओ आराम करो आज बच्‍चों को होमवर्क मैं करा दूंगा, या - माँ की बेवजह गुस्‍सा करने की आदत सी हैं, मुझे पता हैं गलती तुम्‍हारी नहीं थी’’ या पत्‍नी का सिर अपने कंधे पर रख सहलाते हुए पति इतना कहे कि - आज तुमने बहुत काम किया कल सुबह तुम आराम से उठना, मैं तुम्‍हारे लिए बेड टी बनाऊंगा, हम साथ चाय पीयेंगे, भले ही वो चाय न बनाये, पर सबकी किस्‍मत में ऐसा प्‍यार करने वाला पति कहाँ होता हैं...” कहते-कहते कुसुम आँखों की कोर आँसुओं से नम हो चली थी। “मैं मानता हूँ कि मुझसे ये सारी गलतियाँ हुई हैं, पर मैं तो यही समझता रहा हूँ कि पति-पत्‍नी का तो प्‍यार एक-दूसरे के लिए अनमोल होता ही हैं, इसमें जाहिर करने वाली क्‍या बात हैं? और फिर मैं अपने परिवार, बच्‍चों की जरूरतों और घर मे सुख-साधन जुटाने के लिए ही तो खटता था, इसमें पत्‍नी को हर सुविधा देना ही तो उसके प्रति प्रेम का इज़हार हैं न मेरा। पर यह भी सच हैं कि सबकी सोच एक-सी नहीं रहती। जो बातें एक के लिए प्रमुख प्राथमिकता हो, हो सकता हैं वह दूसरे के लिए एकदम गौण निकले। हम दोनों के बीच भी इन्‍ही विचारों या यही शीत युद्ध चलता रहा हैं। नतीज़ा आप दोनों से छिपा नहीं...” कहते हुए आनंद मुरझा सा गया। 
“कोई बात नहीं अंकल-आंटी, जाने दीजिये। पुरानी टीस देने वाली बातों को कुरेदने से जख्‍म गहरे और ताजे ही होंगे और दर्द भी असह्य होगा, तो क्‍यों न दिल को दुखाने वाली बातों को भूलकर नये जीवन की शुरूआत करें?” नितीश बोला। 
“पर बेटा दिल में भरा गुबार यूँ पल भर में खत्‍म तो हो नहीं सकता ना, बहुत समय लगेगा, हो सकता हैं दूसरा जनम लेना पड़े” कुसुम बोली। “आंटी, ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब हमारी सोच पर निर्भर करता हैं। चाहे आप दोनों को एक-दूसरे से लाख शिकवे-शिकायतें हो, पर अब आप दोनों के बीच मीडियेटरशिप करने के लिए घर में न तो बच्‍चे हैं, न ही व्‍यस्‍त रहने के लिए घर में ढ़ेरों काम। आखिरकार उम्र के दूसरे पड़ाव पर पति-पत्‍नी ही एक-दूसरे का सच्‍चा और नि:स्‍वार्थ सहारा होते हैं। हर शिकायत के पीछे एक-दूसरे से लिए असीम प्रेमभाव छिपा रहता हैं, क्‍योंकि पति-पत्‍नी एक दूसरे से असीम प्रेम करते हैं। कुछ गलत कह रही हूँ क्‍या मैं?” निधि पूछने लगी। “हाँ बेटा, ये बात तो तुमने सोलह आने सच कही, इनकी फिक्र के चलते मैं अपने भाइयों के घर भी कभी नहीं जाती” कुसुम बोली।
“मुझे भी तुम्‍हारी आंटी की चिंता रहती हैं क्‍योंकि उसको ऑर्थराइटिस हैं, इसीलिए तो वो तीसरी मंजिल वाला फ्लेट छोड़कर अपना घर बनवाकर नीचे के पोर्शन में रहने लगे न”आनंद बोले। 
“एक बात बताइये कि यदि आपके बच्‍चे आपसे कुछ कहते तो आप उनकी हर बात मानते ना, हम भी आपके बच्‍चे जैसे ही हैं और आपको भी आज हमारी बात माननी होगी” नि‍तीश बोला 
“क्‍यों नहीं बेटा, बोलो क्‍या कहते हो?” आनंद बोले। 
“हम लोगों के पास आप दोनों के लिए एक बहुत ही अच्‍छा प्‍लान हैं, वैसे हमने पहले ही इसकी पूरी जानकारी इकट्ठा कर ली हैं, आपको बता दें कि मात्र एक-डेढ़ किलोमीटर दूर पर वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए क्‍लब बना हुआ हैं, शहर भर के 70-80 वरिष्‍ठ नागरिक उसमें सम्मिलित हैं। हर महीने मीटिंग होती हैं, तरह-तरह के दिलचस्‍प खेल खिलवाये जाते हैं, सबके जन्‍मदिन और शादी की सा‍लगिरह धूमधाम से मनाये जाते हैं”नितीश ने बताया।
“साथ ही, क्‍लब के सदस्‍य अपने-अपने हिसाब से अनाथ बच्‍चों की मदद करने के लिए सहयोग किया करते हैं, कोई वहाँ जाकर अपने मनपसंद विषय पढ़ाते हैं, तो कोई बच्‍चों का साल भर का पढ़ाई का खर्चा देता हैं, कोई ड्राइंग-पेंटिंग सिखाता हैं और कोर्इे खाने-पीने की वस्‍तुएँ देकर समय-समय पर जरूरतमंद बच्‍चों की सेवा करते हैं” निधि ने जोड़ा। ” ... और हाँ, ये लोग बीच-बीच में शहर के पास वाली जगहों पर जाकर पिकनिक भी मनाया करते है। बस एक बार सदस्‍यता लेकर, प्रतिवर्ष न्‍यूनतम राशि का शुल्‍क जमा करना होता हैं”नितीश बोला। 
“वाह बेटा, इसमें तो बच्‍चों को पढ़ाने और ड्राइंग सिखाने का मेरा शौक भी पूरा हो जाएगा पर मेरे घुटनों का दर्द और तुम्‍हारे अंकल की शुगर का क्‍या होगा?” कुसुम ने चिंता व्‍यक्‍त करते हुए कहा।
“कोई नहीं आंटी, क्‍लब के सभी सदस्‍य आपके ही हमउम्र हैं और स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याएँ भी लगभग एक सी ही होंगी, समस्‍याएँ आएंगी तो उसका समाधान भी कैसे न कैसे निकल ही आएगा। आखिर इस क्‍लब का उद्देश्‍य ही बुजुर्गों को स्‍वस्‍थ और अलमस्‍त रखने का हैं। आप एक बार क्‍लब ज्‍वाइन करें तो सबके साथ रहते हुए ये छोटी मोटी समस्‍याएँ और बीमारियाँ चुटकियों में यूं छू मंतर हो जाएँगी, और रही बात जाने-आने की तो आजकल घर-बैठे मोबाइल से बुक कर टैक्‍सी मिनटों में बुलाने की सुविधा हैं ही।”नितीश बोला।
“रही बात बाकी के दिनों की, तो हमारे भोपाल में भारत भवन, शहीद भवन और रवींद्र भवन में आये दिन नाटक और गाने वगैरे के कार्यक्रम होते रहते हैं, आप अपनी सुविधानुसार और इच्‍छा से जब चाहे थियेटर जा सकते हैं और फिल्‍मों के बजाय डेढ़ घंटे का नाटक देखना या लता-रफी और किशोर दर के गाने नये गायकों की आवाज में सुनना अपने आप में रोमांचकारी होता हैं, है न अंकल” निधि ने खुश होते हुए बताया।
  “तुम दोनों सही कह रहे हो, खाली दिमाग, शैतान का घर। सेवानिवृत्‍त होने तक हर परिवार के बच्‍चे कभी पढ़ाई के सिलसिले में, तो कभी नौकरी के लिए दूसरे शहरों में चले जाते हैं। आ-जाकर सभी माता-पिता को एक समय ऐसे ही अकेलेपन का सामना करना ही होता हैं। समझदारी इसी में हैं कि रिटायर्ड होने के पहले ही खुद को अच्‍छे, रचनात्‍मक कामों में व्‍यस्‍त रख्‍ने की प्‍लानिंग पहले से ही कर लेनी चाहिए। पर कोई बात नहीं, देर से ही सही, अच्‍छे समय की शुरूआत तो हुई” आनंद ने सहमति प्रकट करते हुए कहा।
“सच, खाने-पीने का काम तो अब न के बराबर ही हैं, फिर घर से बाहर निकलेंगे तो अलमारियों में महीनों से बंद पड़े कपड़ों को जरा हवा भी लगेगी और जाम हो चले हाथ पैरों के जोड़ भी खुलने लगेंगे” कुसुम के चेहरे पर प्रसन्‍नता की रेखाएँ उभरने लगीं। 
“हाँ, फिर हमारे जमाने के पुराने भूले-बसरे गाने सुनकर मन भी खुश हो जाएगा और नाटक देखकर बातें करने के नित नये विषय भी तो मिलेंगे” आनंद ने बात बढ़ाते हुए कहा।
“ये हुई न बात, और आते-जाते बीच रास्‍ते में न्‍यू मार्केट में थोड़ी बहुत शॉपिंग या टॉप एँड टाउन पर अपनी मनपसंद आइसक्रीम खा सकते हैं, या कभी कभार साथ-साथ बाहर चौपाटी का लुत्‍फ़ उठा सकते हैं”निधि हँसी। 
“और दशहरा मैदान में मेला लगे तो साथ बैठकर झूला झूलने के मजे़ भी ले सकते हैं” नितीश बोल पड़ा। 
“बच्‍चों, छक कर गोलगप्‍पे खाने की तमन्‍ना बरसों से हैं, पुदीने वाले और जलजीरे के तीखे पानी के बाद आखिर में इमली की खटमीठी चटनी वाली गुपचुप खाने का मजा ही कुछ और हैं” कुसुम की अंतस की भावनाएँ जाग्रत होने लगी। 
“अरे भई मेरी भी तो सुनो, मुझे तो वो रंग-बिरंगा बर्फ का गोला खाना बहुत अच्‍छा लगता है, बच्‍चों की जिद में हमारे अरमान भी पूरे हो जाया करते थे, पर अब तो वे सात समुंदर पार बस गये हैं” आनंद चहक उठे।
“तो कोई बात नहीं, अब अंकल-आंटी आप दोनों अपने मन की ख्‍वाहिशों को पूरा करने की जिद आपस में एक-दूसरे से खुले दिल से कर सकते हो, बिना किसी रोकटोक या शर्म-लिहाज के। तो चलो आज तय हुआ कि बीती ताहि, बिसार कर अपनी जिंदगी के हर दिन हर लम्‍हे को खुशनुमा यादों से गुलज़ार बनाया जाएगा” निधि बोली।
“बच्‍चों, तुम दोनों ने हमारे सूने आशियाने को खुशियों से दो-चार कर दिया हैं, और हमारे जीवन में खुशियों के इंद्रधनुषी रंग सजा दिये हैं। हम वादा करते हैं कि अपनी जिंदगी का पूरा आनंद लेंगे” आनंद बोले। 
“भई खुश रहेंगे तभी तो दूसरों में भी खुशियाँ बाटेंगे” कुसुम ने स्‍वर में स्‍वर मिलाया।
“अंकल-आंटी हम दोनों भी वादा करते हैं कि अपनी गृहस्‍थी की खुशियों को छोटी-छोटी गलतफहमियों और संवादहीनता के घुन से समाप्‍त नहीं होने देंगे” निधि अैर नितीश समवेत स्‍वर में बोले।
निधि बोल पड़ी कि चलो इसी बात पर एक कप चाय हो जाये।  
“अरे क्‍यों नहीं, चलो नितीश हम दोनों मिलकर निधि और कुसुम के लिए तुलसी चाय बनाकर लाते हैं” आनंद बोल पड़े।

9 comments :

  1. वाह जी वाह क्या बात है,अप्रतिम अंजलि जी,नमन वंदन है आपका

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  2. Bahut badiya .very inspiring story .

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  3. जीवन के एक अहम पहलू को उकेरती शानदार कहानी।उत्कृष्ट लेखन के लिए लेखिका साधुवाद की पात्र है।हर पंक्ति ने मन को छू लिया।अद्भुत मर्मस्पर्शी लेखन के लिए हार्दिक बधाई।

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    1. आत्मीय आभार,, आदरणीय

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