‘अन्वेषण’ उपन्यास में चित्रित राजनैतिक यथार्थ

बर्नाली नाथ

शोधार्थी, हिंदी विभाग
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
चलभाष 7002218601
ईमेल - barnalinath001@gmail.com 

      अखिलेश के सन 1992 में प्रकाशित पहले उपन्यास ‘अन्वेषण’ को बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान कहा जा सकता है। बेरोजगारी केंद्रित यह उपन्यास आज भी इसलिए प्रासंगिक है कि आज के समय में भी बेरोजगारी का कोई हल नहीं निकला है। बेरोजगारी की समस्या अब बहुआयामी एवं व्यापक होती जा रही है। बेरोजगारी को समझने-समझाने का एक सटीक सरलीकरण इस उपन्यास में मिलता है। यह उपन्यास मुख्यत: बेरोजगारी की समस्या को हमारे सम्मुख प्रस्तुत कर देते हैं। उपन्यास का सम्बंध हमारे समाज की उस विडंबना से सम्बंधित है जिसके हजारों-लाखों बेरोजगार शिकार इससे जूझ रहे हैं। एक सम्भावना सम्पन्न नवयुवक के मानसपटल में बेरोजगारी का दंश कैसे घेर कर लेता है इसका सांगोपांग विश्लेषण इस उपन्यास में देखने को मिलता है। यह उपन्यास उस अन्यायी और अनाचारी व्यवस्था से संघर्ष करने का भी एक संदेश देता है जो शोषण और दमन पर टिकी हुई है, जहाँ प्रतिभासम्पन्न हाथों को काम नहीं मिल पाता है। यह उपन्यास वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर भी प्रहार करता है कि कैसे शिक्षा व्यवस्था सिर्फ बेरोजगारों का फौज उत्पाद करता है। उपन्यास का शीर्षक ‘अन्वेषण’ एक बेरोजगार युवा के अंतर्मन के भावों का अन्वेषण है।

बर्नाली नाथ

      अखिलेश की विचारधारा जनपक्षधर वैचारिकी से भरपूर है। बेरोजगार युवकों की व्यथा, मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष, पारिवारिक सम्बन्धों के ताने-बाने, राजनीति, प्रेम-सम्बन्ध, बदलते समय के परिवर्तन, सामाजिक बदलाव आदि पहलू उनके इस उपन्यास में अनेक स्तरों पर मौजूद है।

हमारे सत्ताधारी यह बखान करने में कभी पीछे नहीं हटते कि उन्होंने युवा शक्ति को पहचाना है। सब राजनैतिक दल यही दावा करते हैं कि उन्होंने युवा वर्ग को अपने शीर्ष नेतृत्व पर जगह दी है। युवाओं की समस्याओं पर गम्भीर विवेचना तथा योजनाएँ बनायी है तथा रोजगार के लिए चर्चा-परिचर्चा के तहत क्षमता पर आने में आवंटन के लिए योजनाएँ बनाई हैं। लेकिन हकीकत में ये दावे तथा घोषणाएँ खोखली होती हैं। युवा वर्ग हर किसी के निशाने पर होता है चाहे वह समाज हो, व्यवस्था हो, राजनीति हो या मीडिया, सभी अपनी रोटियाँ सेंकना चाहते हैं। चिल्ला चिल्ला के नियंता होने का दम्भ भरने वाले ही दरअसल युवाओं का गला घोंटने वाले होते हैं। ऐसे में ‘अन्वेषण’ उपन्यास इस समूची व्यवस्था तथा सत्ताधारियों पर अनेक सवाल खड़े करता है। युवा वर्ग को रोजगार चाहिए, और रोजगार के लिए वह माँग सरकार से ही करेगी। लेकिन यहीं पर राजनीति होती है। ‘अन्वेषण’ उपन्यास बेरोजगारी  के लिए किसी पर भी प्रत्यक्ष आरोप न लगाते हुए भी हमें यह सोचने पर मजबूर जरूर कर देता है कि युवाओं की समस्यायों को क्यों नजरंदाज कर दिया जा रहा है, क्यों सरकार नवयुवकों को रोजगार मुहैया नहीं करवा पा रही हैं। 

अखिलेश
              युवा मन उत्साह और उमंगों से भरा रहता है। लेकिन बेरोजगारी ने उत्साह और उमंग के स्थान पर शून्य भर दिया है। एक शिक्षित बेरोजगार युवा के लिए इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि उसकी नौकरी पाने की उम्र खतम होने वाली है और उसकी अभी तक कोई नौकरी नहीं लगी है। उपन्यास का मुख्य पात्र वाचक (जैसे कि उपन्यास में मुख्य पात्र का कोई नाम नहीं दिया गया है, यह उपन्यास एक वाचक के आत्मकथ्य के रूप में है) बेरोजगार है उसकी नौकरी पाने की सम्भावना का यह अंतिम वर्ष चल रहा था। लेकिन उसे यह भी पता है कि उसकी नौकरी पाने की उम्र का आखिरी साल वास्तव में उसकी नौकरी पाने की उम्र का पहला साल था। वह कटाक्ष के साथ कहता है कि उसकी नौकरी पाने की उम्र के शुरुआत का पहला दिन ही उसके अंत होने का अंतिम दिन था। शुरू होने से पहले ही अंत के एहसास का अनुभव होना कितना भयावह है। यह एक युवा मन की संभावनाओं पर समय तथा व्यवस्था की मार है। आगे वह युवक यह भी व्यंग्य करता है कि - “हालाँकि नौकरी कभी भी पाई जा सकती है और कभी नहीं पाई जा सकती है। फिलहाल, कानूनन यह मेरी नौकरी पाने की उम्र का आखिरी साल था। अब मेरी नौकरी न पाने की उम्र का पहला साल था।”  हमारी व्यवस्था पर यह एक प्रश्न है कि नौकरी पाने और देने की प्रथा में क्या क्या उलझनें हैं या फिर कहें कि रोजगार कौन देता है या यह कैसे प्राप्त होता है। क्या सही मायने में सिर्फ प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति को सरकारी रोजगार प्राप्त होता है या उसमें भ्रष्टाचार प्रथा भी शामिल है? क्या व्यवस्था का अनुपालान होता है? बाजारीकरण की दुनिया में भले ही नगर महानगरों में, कस्बे शहरों में, और गाँव कस्बों में तब्दील हो रहे हो लेकिन बेरोजगारी वैसे की वैसे ही है। देश में बेरोजगारी की गति विकास की गति से बहुत ज्यादा तेज है। विकास से जुड़ी तमाम प्रश्नों तथा विसंगतियों को उपन्यास के उस अंश में देखा जा सकता है जहाँ युवक अपने कस्बे के उसके जैसे ही बेरोजगार दोस्तों से संवाद करता है। उस संवाद में युवक पहले दुविधा में होता है कि उसके दोस्तों की हालत भी उसके जैसे ही होगा तो उनसे क्या पूछा जाए! वह अपने कस्बे के विकास के बारे में दोस्तों से मुखातिब होता है और इसके उत्तर में उसके दोस्त उसे वही आइना दिखाता है जिस आइने के साथ वह भी जी रहा है - “और बतलाओ। इस कस्बे में क्या-क्या परिवर्तन हो रहे हैं? यह कितना नया हो सका और कितना पुरानी ही है? ... तुमने कस्बे के बारे में जो सवाल किया है, वही तुमसे इलाहाबाद के बारे में करूँ, तो क्या तुम जवाब दे सकोगे? मुझे पसीना आ गया। बिलकुल निरुत्तर था। लग रहा था, साँस रुक जाएगी। किसी तरह कह सका, नहीं।”  यह संवाद बेचैन कर देने वाला है। अगर इस बेचैनी को विकास और बेरोजगारी के समानुपातिक दर पर रखा जाए तो इन बेरोजगारों के पीड़ा और यन्त्रणा के यथार्थ से रूबरू हुआ जा सकता है। इन बेरोजगारों की नौकरी पाने की उम्र भी खत्म होने वाली है। लेकिन जब रोजगार मिलने की उम्र से अब तक के इतने दिन जो वे शर्मसार, व्यर्थ तथा निरर्थक जिंदगी जीने को मजबूर थे उसके लिए कौन उत्तरदायी है? बेरोजगारी के बोझ को झेलते हुए वाचक के मित्र का यह सवाल बहुत ही तार्किक तथा समय उपयोगी और वाजिब है - “पर एक बात बताओ, हमारे जो इतने साल बरबाद हुए, उसे कौन वापस करेगा? इन वर्षों में हमने जिंदगी को जिंदगी नहीं जाना। हमने नहीं जाना कि सुख क्या होता है? हमने नहीं जाना - सुकून क्या है। उस समय को फिर से कोई वापस देगा? वे दिन जब हम अपने आदमी होने को सबसे ज्यादा शिद्दत से महसूस कर सकते थे? लोगों के सामने उसे सिद्ध कर सकते थे - वे दिन बेमतलब के बीत गए। वह वक्त हमें फिर मिल सकता है? यदि ब्रह्मा या यमराज जो भी हों, कहें - हमारी उम्र दस वर्ष बढ़ गई तो भी बात बन नहीं सकती। हमारे खराब हुए वर्ष यौवन के वर्ष हैं, दान दिए वर्ष तब के होंगे जब कोई मृत्यु का इंतजार करता है, जिंदगी का नहीं।”  ये सवाल रोजगार की बुनियादी धरातल को दर्शाते हैं। क्या सच में कोई इनके इन खराब होते हुए वर्षों को वापस कर सकते हैं? इनके हिस्से की खुशियाँ प्राप्त करवा सकते हैं? ये सवाल किससे किया जाना चाहिए? 

              बेरोजगारी क्यों है? या फिर रोजगार है तो ये उपयुक्त प्रार्थी को प्राप्त क्यों नहीं हो पाता है? इसका जवाब भी राघव द्वारा उपन्यास में दिया गया है - “तुम या मैं या तुम्हारे और मेरे जैसे बहुत से नवयुवकों के बीते हुए कल में कोई तैयारशुदा फसल नहीं होती और जब जवान होकर हम फसल उगाने लायक होते हैं। हाथ-पाँव-दिमाग़ के रूप में हमारे पास हल-फावड़े-बीज होते हैं तो धूप-जल-खुराक नहीं मिलती। हालाँकि ये बिकाऊ हैं और कोई भी इनको खरीद सकता है पर हममें खरीद सकने की सामर्थ्य नहीं। क्योंकि हमारे बीते हुए कल में सुखों की कोई तैयारशुदा फसल नहीं होती। हमारे पास धन नहीं होता। हमारे पास शक्ति नहीं होती। हमारे पास कुछ भी नहीं होता।”  अखिलेश ने यहाँ उपन्यास के पात्र राघव द्वारा व्यंजनाओं के साथ प्रतीकात्मक भाषा में अभिव्यक्ति की खतरा उठाया है। साथ ही भ्रष्टाचार प्रथा को भी खूब उकेरा है। नवयुवकों के पास हल-फावड़े-बीज रूपी ज्ञान तथा प्रतिभा तो है लेकिन उस प्रतिभा तथा ज्ञान को प्रयुक्त करने के लिए उन्हें धूप-जल-खुराक रूपी कोई संसाधन यानी रोजगार नहीं मिल पाती है। रोजगार बिकाऊ तो है तथा पैसे हो तो इसे कोई भी खरीद सकता है, लेकिन इसे खरीद पाने के लिए हिंदुस्तान की गरीब आबादी आर्थिक रूप से समर्थ नहीं हैं। चाहे कोई मेधावी हो या नहीं, पैसे देकर रोजगार खरीद सकता है। शेष, नौकरी खरीदने में असमर्थ वही नौजवान हैं जो पढ़ाई-लिखाई में मेधावी तथा प्रतिभावान थे, वे किताब और कलम की शक्ति पर विश्वास करते थे - “हमारे हाथ में किताबें और कलमें थीं। लड़ाईवाले झंडे थे। हमारे दिमाग में ज्ञान था। खतरनाक नारे थे। हमारे हृदय में प्यार का समंदर था। हमारे हृदय में क्रोध का ज्वालामुखी था।”  लेकिन वे ही अब हालातों से मजबूर है तथा अवसाद ग्रस्त है। व्यवस्था से लड़ पाने के सारे रास्ते बंद हैं। इसी कारण वाचक युवक और राघव का एक दूसरे से यह कहना ताज्जुब की बात नहीं है कि वे वह फसल है जो फल देने लायक तो है लेकिन फल देने के समय में ही उन्हें कोई रोग लग गया है अर्थात जो अपनी प्रतिभाओं के साथ पूर्ण तरीके से आगे तो बढ़ गए हैं लेकिन उसके आगे का रास्ता अवरूद्ध है - “तुम इन दिनों उस पौधे की तरह हो गए हो, जो पूरी ताकत से उग रहा हो और तभी उसे कोई रोग लग जाए।”      

          उपन्यास में वाचक द्वारा राघव से पूछा जाना कि वे लोग अब तक सुख से वंचित क्यों है? तथा उनके गुनाह क्या है? इसके जवाब में राघव हमें हमारे यथार्थ से रूबरू कराता है - “होता यह है कि हिंदुस्तान में अधिसंख्य लोग जब सुख की शक्ल पहचानने की आँखें पाने की उम्र में पहुँचते हैं, तो पाते हैं कि उनके चारों तरफ दुखों की सुरंगें बिछी होती हैं। वे तकलीफों की उस अँधेरी जेल में होते हैं जिसकी नंगी और सुन्न कर देनेवाली दीवारों और फर्श पर सिर्फ सिर पटका जा सकता है। नतीजा यह होता है, सुखद क्षण महज़ दुःख को तीखा और चमकदार बनाने के काम में इस्तेमाल हो जाते हैं, बस।”  यह जवाब अपने आप में हमारे देश की अवस्था को सिद्ध करता है। आजादी के इतने सालों बाद भी हम देशवासियों में से कुछ गिने-चुनों को छोड़कर शेष की अवस्था में सुधार नहीं हो पाया है। तो फिर इन पढ़े-लिखे युवाओं का भविष्य क्या है? जो लोग अभी पढ़ाई-लिखाई कर रहे उनके भविष्य पर भी सवाल उठ रहा है। वाचक अनायास ही नहीं कहते - “ये इतने सारे लड़के-लड़कियाँ पढ़ रहे हैं। कितना दिलचस्प और भयावह है इनके भविष्य के बारे में सोचना! पढ़ाई के बाद लड़कों का क्या होता है? पढ़ाई के बाद लड़कियों का क्या होता है?” लड़का हो या लड़की दोनों के सामने बेरोजगारी के चलते विभिन्न त्रासद परिस्थितियाँ खड़ी है। यह सोचने वाली बात है कि रोज-रोज बेरोजगारों की फौज पैदा हो रही हैं! 

        उपन्यास में राघव एकमात्र एक ऐसा प्रतीक है जो इन अन्यायों के विरुद्ध सार्थक हस्तक्षेप है। व्यवस्था से लड़ने के लिए वह आंदोलन करवाता है तथा जुलूस निकलवाता है। वह किसानों के लिए लड़ाई करता है। मज़दूरों की मजूरी बढ़ाने के लिए शासन व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ता है। आततायी पुलिसकर्मियों और समाज के बड़े लोग समझे जाने वाले शोषक तबकों के खिलाफ राघव खड़ा होता है। सक्षम सत्ताधारी वर्ग उसे तबाह कर देना चाहता है। उस पर गोलियाँ भी चलती है लेकिन वह किसी तरह बच जाता है। जनता के इन आंदोलनों को दबाने तथा कुचलने वाले विनीता के पति सुरेन्द्र जैसे प्रशासनिक अधिकारियों पर राघव हमला भी करता है। लेकिन समाज के तथाकथित ताकतवर कहे जाने वाले लोग और सत्ताधारी आपस में मिले हुए हैं और वे राघव द्वारा किए जाने वाले जनांदोलनों को हमेशा दबाने तथा कुचलने की कोशिश करते रहते हैं जिसका कारण वे यह बताते हैं कि लोकतंत्र के कुछ कायदे-कानून होते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र सभी के लिए समान अवसर प्रदान करता है। खतरे में पड़े हुए लोकतंत्र की एक उदाहरण उपन्यास में उद्धृत है। विनीता के जरिए शासक वर्ग की क्रूरता की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह हुआ है - “खैर अब पता चलेगा। एक तरफ उस एरिया के ताकतवर लोग उसकी जान के प्यासे हैं, दूसरी तरफ पुलिस उसका एनकाउंटर करने के लिए आमादा। ये भी अपने दुश्मन को छोड़ते नहीं हैं कभी।”  राघव के इन संघर्षों ने वाचक युवक के अंतर्मन में छुपा हुआ क्रोध, दुःख, निराशा तथा सभी क्षोभों को एकत्रित किया है तथा उसके भीतर की आग को हवा दिया है। राघव का विप्लव है वाचक युवक को अपनी खोई हुई ताकत वापस याद दिलाता है। अब वह युवक भी नई उमंगों के साथ व्यवस्था से लोहा लेने के लिए तैयार हो उठा है। युवक की सुरेन्द्र के साथ हाथापायी होने के परिणामस्वरूप उसे सुरेन्द्र के घर से बाहर फेंक दिया जाता है। अपमान के अथाह सागर में उस समय वह संघर्ष के रास्ते पर चलने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होता है - “सड़क के बगल में तनाव से खिंचा हुआ पड़ा था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। दुख और क्रोध से मैं पिघल रहा था। जैसे बर्फ पिघलती है, वैसे नहीं। जैसे लोहा गलता है, वैसे मैं पिघल रहा था। मैं किसी वृद्ध की तरह उठा। जैसे रोगी वृद्ध उठते हैं, वैसे नहीं। जैसे अनुभवी वृद्ध उठते हैं - अनुभव के फलों से लदे हुए - वैसे मैं उठा और एक गर्भवती स्त्री की तरह चलने लगा।”  राघव की तलाश करना उसके अपने मुक्तिकामी आवेगों को बाहर आने देना है। राघव की तलाश करते हुए उससे मिलाने वाली दिशाएँ तथा उसका राघव के व्यक्तित्व में समाहित होना अंधेरों में उजालों की अन्वेषण करता है - “मैं युद्ध की घोषणा कर चुका था। अब मुझे योद्धाओं के जत्थे में शरीक होना था - एक योद्धा की तरह। ज़रूरी था कि राघव से मिलूँ।”  उपन्यास के अंतिम दो वाक्य - ‘वह मिलेगा ज़रूर’, ‘मैं उसे खोज रहा हूँ’ - इनसे यही प्रतीत होता है कि आशा और संघर्ष दोनों ज़ारी है।

संदर्भ-सूची: 

(अ) आधार-ग्रंथ: 
1. अखिलेश: अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1992.
(आ) सहायक-ग्रंथ: 
2. राजीव कुमार (सम्पादक): कथाकार अखिलेश: सृजन के आयाम, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, 2017. 
(इ) पत्रिका: 
3. पल्लव (सम्पादक), राजीव कुमार (विशेषांक सम्पादक): बनास जन (साहित्य-संस्कृति का संचयन), जनवरी-जून, 2015. 


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।