निशंक का साहित्य और उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


साहित्य की सांस्कृतिक विरासत हमारे साहित्यकारों की सृजनात्मकता पर टिकी होती है। दुनिया का आइना तो साहित्य ही है, और इस बात का हर भारतीय को गर्व है कि हमारे साहित्यकारों की प्रतिबद्धता से उद्भूत भारतीय साहित्य को दुनिया में सराहना समय-समय पर मिली है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक जी के साथ सार्वजनिक जीवन जुड़ा हुआ है लेकिन उनके भीतर बैठे कवि-मन, उनके भीतर बैठे कहानियों और उपन्यासों के प्लाट ही उन्हें महान बनाते हैं और साहित्यकारों में उनके हस्तक्षेप को भी दर्शाते हैं। उनकी एक कविता है-

तोड़ सको तो तोड़ो बंधन, 
जो तुमको जकड़े हैं।
कर्म करो वह कारा तोड़ो, 
जो तुमको पकड़े हैं।

इस कविता पढ़ने पर आपका अंतर्मन स्वयं कहेगा कि कविता में कुछ विशेष है। कविता कुछ कहती है। यह कविता किसी और की नहीं बल्कि निशंक जी की है। वे समय की संवेदना को कुछ ही पंक्तियों में अपनी बात कहते हैं और बाँध लेते हैं एक पाठक के भीतर बैठी चेतना को। तब वह वही सोचता है जो कविता कहती है। वह स्वयं को भूल जाता है। इनकी एक कविता है- "मरे हुए लोग"। इसे पढ़ने पर उनके लेखन की गम्भीरता और समाज के प्रति उनकी दृष्टि का अनुमान हो जाता है - 

मरे हुए लोग 

पीड़ा को देखकर
जो लोग
डरे हुए हैं।
बिना मरे ही,
वे लोग
मरे हुए हैं।
 (जीवन-पथ में, कवितासंग्रह से साभार)

इस प्रकार निशंक जी कि कविता अपने भय-रहित कवि-मन से उद्भूत साहित्य के लिए अनुपम भेंट है। यह वही लिख सकता है जो सच को प्रकट करने का साहस करता है। वह जो महसूस करते हैं उसे अपनी कलम की धार बनाकर लिख देते हैं। उनकी एक कविता है- कह रही है जिंदगी 

बहुत नजदीक मेरे, रह रही है ज़िंदगी।
मैं अनोखी दासता हूँ कह रही है ज़िंदगी।
कुछ हकीकत है अगर
एक बुलबुला है जिंदगी,
बूंद सागर बन स्वयं
हँसाती-रुलाती ज़िंदगी
आज अपनों में पराई सी रही है जिंदगी,
मैं अनोखी दासता हूँ कह रही है ज़िंदगी।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को वातायन अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मान-लाइफटाइम अचीवमेंट

यदि जीवन-जगत के सच को समझना हो तो यह एक सर्जक की उस संवेदना के स्वर हैं, जो यथार्थवाद को अपने से अलग नहीं होने देता। निशंक जी ने अपनी भीतरी द्वंद्व को रखते हुए सबके भीतर हो रहे युद्ध को जिस प्रकार प्रकट किया है वह एक पाठक की अपनी जिंदगी कि जैसे कथा बांची जा रही हो और महसूस कर रहा हो, वैसा प्रतीत होता है।

इसी प्रकार निशंक जी की अन्य विधाओं में जो साहित्य की संवेदना हमें पढ़ने को मिलती हैं।  उनकी सभी रचनाएँ उत्तराखण्ड के जनजीवन, यहाँ के मनुष्य की पीड़ाओं, सुख-दुःख और संघर्षों का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। वह कई तरीके से समाज का परिस्कार करना चाहती हैं और अपने समाज का भला भी। हमें इस प्रकार का मनुष्य तैयार करना चाहती हैं जो समय-समाज-संस्कृति को समझे और राष्ट्रनिर्माण हेतु उसी पीड़ा को समझकर उसे महसूसकर अपनी ऊर्जा लगाए। हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी को पढ़ते हुए मैं अगर उन्हीं के शब्दों में कहूँ तो जगूड़ी जी साहब ने भी लिखा था- 'निशंक' की कविता में सारी खतरनाक और चुनौतीपूर्ण स्थितियों के बावजूद जीवन और दुनिया के प्रति गहरी आत्मीयता का भाव दिखता है- बहुत ही नजदीक मेरे रह रही है जिंदगी/मैं अनोखी दास्ताँ हूँ कह रही है जिंदगी। पहाड़ को कवि ने अपनी कविता में सहिष्णुता का प्रतीक बताया है। अपने विचारों के लिए अनुकूल भावावेग में वे भाषा की परवाह न करने वाले कवि हैं। यद्यपि उन्हें अभी छायावादी कविता के भाषा संस्कार से मुक्त होना है, फिर भी उनमें जीवन और जगत के प्रति बेहद लगाव है जिसे वे अच्छे अर्थों में बदल देने के पक्षधर हैं। 
निशंक जी को वातायन सम्मान, साथ में अनिल जोशी

साहित्य के इस श्रेष्ठ रचनाकार की अन्य विधाओं-उपन्यास, कहानी और यात्रा-वृतांत का भी यदि अवलोकन करें तो निशंक जी आज के अभिनवीकरण के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में मिलते हैं जिनका साहित्य न केवल आज कह रहा है अपितु भविष्य की अनुभूति करके लोगों को सजग कर रहा है। निशंक जी मूल रूप से कवि हैं, लेकिन वह कथाकार और उपन्यासकार हैं। और उन्होंने कई विधाओं में 75 से अधिक पुस्तकों का लेखन कार्य किया है जो व्यापक रूप से कई देशों में अनुवादित हुईं। उनके साहित्य का अनुवाद अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, जर्मन, नेपाली, क्रिओल, स्पेनिश आदि विदेशी भाषाओं सहित तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, संस्कृत, गुजराती, बांग्ला, मराठी आदि अनेक भारतीय भाषाओं में हुआ है। उन रचनाओं पर कई विश्ववियालयों में शोध हुआ। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की दुनिया में, एक कवि का मस्तिष्क अपनी अद्भुत रचनात्मकता को जीवित रखता है, यह कोई निशंक जी से सीख सकता है। पोखरियाल के कहानी संग्रह जस्ट ए डिजायर’ का जर्मन संस्करण ‘न्युरीन वुंस्ख’ एफ्रो एशियन इंस्टीट्यूट, हैम्बर्ग में प्रकाशित हुआ। मॉरीशस स्कूल के पाठ्यक्रम में उनकी ‘स्पर्धा गंगा’ पहल शामिल हुई। वे सक्रिय रूप से विभिन्न सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं जैसे कि `स्वर्ण गंगा’ का अनोखा अभियान, यह किसी से छुपा नहीं है। उनकी कहानियां साहित्य और समाज के उसी अन्योन्याश्रित संबंध को पुष्ट करती हैं और समाज के हित में साहित्य की तरफ से जरूरी सवाल भी उठाती हैं।  यदि सही मायने में देखा जाये तो उनकी सभी रचनाएँ उत्तराखण्ड के जनजीवन, यहाँ के मनुष्य की पीड़ाओं, सुख-दुःख और संघर्षों का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। श्री पोखरियाल जी को साहित्य और प्रशासन के क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिसमें प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के करकमलों द्वारा साहित्य गौरव सम्मान, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा भारत गौरव सम्मान, दुबई सरकार द्वारा गुड गवर्नेंस अवार्ड, मॉरीशस द्वारा ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन द्वारा उत्कृष्ट उपलब्धि पुरस्कार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यूक्रेन में सम्मानित किया जा चुका है। श्री निशंक को नेपाल के "हिमाल गौरव सम्मान" से भी सम्मानित किया गया है। अब तक की पचहत्तर से अधिक पुस्तकों में उनकी नई पुस्तक ‘मानवता के प्रणेता : महर्षि अरविंद’, भारतीय संस्कृति, भारतीय मूल्यों, भारतीय राष्ट्रवाद एवं भारतीय धर्म-दर्शन के प्रति श्रीअरविंद के चिंतन पर आधारित है। इस पुस्तक के माध्यम से निशंक जी ने उनके दर्शन एवं चिंतन को अत्यंत सरल भाषा में देश एवं विश्व की युवा पीढ़ी को अवगत करवाना चाहा है। उनका विश्वास है कि देश को 'ज्ञान आधारित महाशक्ति' बनाने हेतु श्रीअरविंद जी के विचार वाली पुस्तक युवाओं में प्रेरक की भूमिका निभाएंगी। हाल ही में निशंक जी को वातायन अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मान-लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार भी मिला। उन्हें डॉक्टरेट (डी लिट की उपाधि) की मानद उपाधि, ग्राफिक एरा डीम्ड विश्वविद्यालय, उत्तराखंड द्वारा साहित्य के क्षेत्र में प्रदान की गई है।

विविधता में एकता भारत की पहचान है और हमारी संस्कृति में भाषाओं का विशेष महत्व देने वाले निशंक जी संस्कृति और भाषा के साथ इतनी गहनता से जुड़े हुए हैं वह भी अपने सार्वजानिक जीवन को जीते हुए यह बड़ी बात है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संस्कृति और सभ्यता को विस्तार देते हुए लेखन से देश की सभ्यता और संस्कृति को बदला जा सकता है। वह सार्वजनिक जीवन भी भरपूर जीते हुए साहित्य का कोना अपने अंतस में बचाकर रखने वाले व्यक्तित्त्व हैं। उनका सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, शैक्षणिक जीवन से निकला साहित्य न केवल समय-काल-परिस्थिति का एक सम्पूर्ण दस्तावेज़ है अपितु सच्चे मायने में राष्ट्र निर्माण के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण पहल का प्रमाण है, ऐसा मुझे लगता है। 

उनका लेखन सामान्यजन के अनुभवों, संघर्षों, जीवन मूल्यों और आदर्शों से संबंधित है। उनके लेखन में हमेशा गरीबों और शोषितों की अभिव्यक्ति इस प्रकार प्रकट होती है जो जीवन मूल्यों व  भारतीयता के साथ जनोन्मुखी लगती हैं और कुछ सन्देश देना चाहती हैं। लेखक को सदैव अपनी प्रतिबद्धता को कायम रखते हुए धुन का पक्का होना चाहिए। अच्छे कार्य एक न एक दिन अपनी ओर सबका ध्यान खींच ही लेते हैं। निशंक जी की प्रतिबद्धता इस बात का सजीव प्रमाण है। हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की महत्त्वाकांक्षी परिकल्पना पर आधारित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से निशंक जी का सम्मान और बढ़ा है क्योंकि वह इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अभिनवीकरण के रूप में प्रस्तुत कर देश को नई दिशा दे रहे हैं। भाषा और संस्कृति को केंद्र में रखकर बच्चों को मातृभाषा से जोड़ने का प्रयास इस शिक्षा नीति में किया गया है जिससे हमारे युवा अपने करियर में अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचने में सक्षम होंगे। यह शिक्षा नीति आने वाले वर्षों में अपन असर जब दिखाएगी तब लोगों को समझ में आएगा कि इस नई चेतना के साथ कितने श्रम किये गए थे। उनसे साहित्य जगत अपेक्षा करता है कि वे लिखते रहें और साहित्य को और विपुल बनाते हुए भारत को गौरव प्रदान करते रहें क्योंकि हर रचनाकार से यह भारतीय साहित्य उम्मीद रहती है कि उसकी आने वाली कृति और अधिक पाठकों की प्रिय पुस्तक बनेगी। संपूर्णता में देखा जाए तो आज की भागती जिंदगी के बीच निशंक जी की साहित्य साधना उनकी साहित्य के प्रति असीम प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है जो उनकी अपनी पूंजी भी है।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।