कहानी: गठरी

शुभम राठौर

एम ए (हिंदी), प्रथम सेमेस्टर (शासकीय महाराणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाडरवारा) में अध्ययनरत

                चार घण्टे से कमरे में बंद रहने से मन ऊब गया और मैं हाथ में अर्थशास्त्र की पुस्तक लेकर सड़क के किनारे आकर बैठ गया। चारों तरफ बनी बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच लेटी हुई सड़क, काली होते हुए भी खंभे पर लगे स्ट्रीट लाइट के कारण चमक रही थी। सामने देखा, उद्यान में नीम के कुछ पेड़ों के नीचे लोगों के बैठने के लिए तीन बेंचेंक रखी थीं, लेकिन बगीचे में कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आ रहा था। दाईं ओर, सड़क की दूसरी ओर बने मंदिर के प्रवेश द्वार पर ताला लगा था। पुजारी नौ बजे ही मंदिर के दरवाजे बंद करके चला जाता है लेकिन मंदिर में जल रहे दीपक की रोशनी के कारण भगवान की मूर्ति को यहीं से देखा जा सकता है। 

              मन में अचानक सवाल आया - इस रास्ते पर तो रात के ग्यारह बजे तक आवाजाही रहती है, तो फिर आज क्यों इतना सन्नाटा छाया है! तभी अचानक ठंडी हवा का एक झोंका आकर कान में बुदबुदाया, "जनाब अभी हम निकले हैं इस काली रात की सैर करने, इसलिए सब अपने घरों में जाकर बैठ गए हैं। उसके कान में कहने से मुझे भी पता चला, आज ठंड ज्यादा है।" 

              रास्ता पूरी तरह निर्जन नहीं था, एक-दो लोगों को आते-जाते देखा जा सकता था। फुल्की वाला भी अपने ठेले को ढकेलते हुए, तेजी से प्रस्थान कर रहा था। तभी एक युवक अपनी बहुमंजिला इमारत से नीचे आया, पर्याप्त गर्म कपड़े पहने हुए, अपना वजन कम करने के लिए, एक तरफ से दूसरी तरफ चलने लगा।

               रात के दस ही बजे थे अभी, लेकिन आसमान से ठंड का कहर बरस रहा था। इस कड़ाके की ठंड के बावजूद मैंने सोचा घुटन और बदबू भरे अपने कमरे में जाने से अच्छा है, कुछ देर और इसी स्ट्रीट लाइट की रोशनी में अर्थशास्त्र का अध्ययन कर लिया जाए। पुस्तक में ध्यान लगाया ही था, कि किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। दाईं ओर देखा तो पता चला, लगभग छब्बीस वर्षीय हट्टा-कट्टा युवक अपने कुत्ते के साथ था। शरीर पर कपड़ों का सुरक्षा कवच पहने हुए, ऐसा लग रहा था, मानो ठंड से युद्ध करने निकला हो। एक हाथ में कुत्ते का पट्टा पकड़े हुए, दूसरे हाथ को मस्ती में झुलाता हुआ वह  इसी ओर चला आ रहा था।

               उसका कुत्ता मोहल्ले में घूमने वाले आवारा कुत्तों का राजा लग रहा था और ये कुपोषण के शिकार आवारा कुत्ते, जिनकी खाल के बाद खुजली की वजह से झड़ गए हैं, उसकी प्रजा लग रहे थे, जो इस कड़ाके की ठंड के बावजूद आजादी से घूम रहे थे।

              मंदिर के सामने आते ही युवक ने, मंदिर के पट बंद होने के बाद भी, अपने दोनों हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया। पट्टा हाथ से छूटते ही कुत्ता मंदिर के बाहर बैठे एक आवारा कुत्ते के पास जाकर भौंकने लगा। उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वह आवारा कुत्ते के हाल-चाल पूछ रहा हो, कि जनाब कैसे हैं आप? आज कुछ भोजन-पानी मिला या खाली पेट ही सो रहे हो?

             उस बड़े बाल वाले विलायती कुत्ते के भय से पास में ही, मंदिर के बाहर सो रहा बूढ़ा व्यक्ति उठकर मंदिर की दीवार से चिपक कर खड़ा हो गया। अत्यंत काले और कमज़ोर उस व्यक्ति के शरीर पर कपड़े इतने कम थे कि उसकी हड्डियों को यहीं से गिना जा सकता था। उसका पूरा शरीर सूखी हुई लकड़ी की तरह लग रहा था। उसके मैले और उलझे हुए बालों से स्पष्ट था, कि वह कई दिन से नहाया नहीं था। घुटने कुछ आगे की तरफ मुड़े हुए, पेट पीठ में धँसा हुआ, ठंड और भय से कांपते शरीर को अपने दुर्बल पैरों के सहारे लिए खड़ा हुआ दाँत किटकिटा रहा था। उसके चेहरे पर खामोशी की लकीरें  खिची हुई थीं।

          वह युवक अपने कुत्ते को चूम कर उसके शरीर को अपने हाथों से सहलाते हुए बिस्किट खिलाने लगा। तभी युवक की दृष्टि अपनी तरफ टकटकी लगाकर देख रहे उस बूढ़े से की ओर गई जिसका सारा ध्यान बिस्किट की ओर था। युवक चिल्लाया, "अरे तमीज नहीं है क्या? दूर हट। ऐसे क्या देख रहा है?" उस कृशकाय का शरीर दोबारा काँप उठा और सहसा उसकी आँखें भर आयीं।  नींद के कारण झूलते हुए उसके शरीर में अब इतनी ऊर्जा न थी कि वह कहीं और जा सके, इसलिए भगवान का नाम लेकर वहीं बैठ गया। युवक अपने कुत्ते के साथ, मेरे होकर अपने हाथों को उसी मस्ती में झुलाते हुए आँखों से ओझल हो गया।

             रात गहरा रही थी। वह मोटा व्यक्ति भी अपनी बहुमंजिला इमारत में जा चुका था। मोहल्ले की इमारतों की खिड़कियों से आने वाला उजाला भी अब नहीं आ रहा था। लगता है सभी सो गए हैं और आसमान के सभी तारे जाकर इस निद्रामग्न संसार को निहार रहे हैं। मैं उस बूढ़े की उठती-गिरती साँसों को एकटक देखते-देखते कहीं खो गया। जब दोबारा ध्यान उसी तरफ गया तो देखा कि अब उसकी साँसें कुछ थम सी रही थीं। शायद वह सो गया था।

            चारों तरफ गहरी शांति थी। घना कोहरा था। स्ट्रीट लाइट की रोशनी में अब धीरे-धीरे सब कुछ धुंधला दिख रहा था। अब मेरी आँखें भी और देर तक खुली रहना नहीं चाहती थीं। मैं पुस्तक उठाकर कमरे में चला गया। सोने से पहले मन में विचार आया, 'पटले पर रखी पुराने कपड़ों की गठरी से कुछ कपड़े निकालकर कल उसे दे दूंगा।' अगली शाम कॉलेज से आकर जब गठरी खोली तो देखा कि उसमें एक पुरानी चादर रखी हुई थी। पुस्तक और चादर लेकर मैं उसी खंभे के नीचे जाकर बैठ गया।

            लंबे समय तक हर ओर खोजने के बाद भी जब वह बूढ़ा नहीं आया तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने मंदिर के पुजारी से पूंछा, "आज वह व्यक्ति नहीं आया, जो कल रात यहीं सो गया था?"

पुजारी ने कहा, "नहीं। अब कैसे आएगा?"
"क्यों, क्या हुआ?"
"वह तो गया।"
"कहाँ? कैसे?"

"मुझे तो सड़क पर  झाड़ू लगाने वाले ने बताया था कि सुबह मंदिर के बाहर एक व्यक्ति मूर्छित पड़ा था। जब उसने एंबुलेंस बुलाई तो पता चला कि उसकी मृत्यु हो गई थी। फिर पुलिस भी आई और ले गए उसे एंबुलेंस में।" पुजारी ने गहरी साँस खींचकर कहा।

               मैं स्तब्ध रह गया। ऐसा कैसे हो सकता है! वह प्रभु के द्वार पर था। क्या भगवान ने उसे बुलाया नहीं होगा, कि आओ इस ठंड में अंदर आओ? लेकिन बुलाता भी कैसे? अगर हमने उसे कभी सोते हुए नहीं देखा, तो जागते हुए भी तो नहीं देखा। क्या वह व्यक्ति खुद नहीं जा सकता था? कैसे जाता! ताला जो लगा था दरवाजे पर।

              सो गया वह वही, उस धूल-मिट्टी की सेज पर, बिना कुछ ओढ़े हुए। 

        वह तो चला गया और अब कभी नहीं आएगा लौटकर, लेकिन पता नहीं क्यों? अब उस जगह पर पढ़ने में मन नहीं लगता है। ध्यान बार-बार उसी ओर चला जाता है और आँखों के सामने उस रात का दृश्य आ जाता है और मुझसे पूछता है, "क्या मैं उसी रात नहीं खोल सका, वह पुराने कपड़ों की गठरी?"

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।