काव्य: एम जोशी हिमानी

एम जोशी हिमानी
गाँव की लड़की

गाँव उसकी आत्मा में
इस कदर धंस गया है कि
शहर की चकाचौंध भी
उसे कभीे अपने अंधेरे गाँव से
निकाल नहीं पाई है
वह गाँव की लड़की बड़ी
बेढब सी है
खाती है शहर का
ओढ़ती है शहर को
फिर भी गाती है
गाँव को
उसके गमले में लगा
पीपल बरगद का मनमोहक पौधा
जब पंखे की हवा में
हरहराता है
और उसके बैठक में
एक सम्मोहन सा पैदा करता है
वह गाँव की लड़की
खो जाती है
चालीस साल पहले के
अपने गाँव में
और झूलने लगती है
अपने आँगन में खड़े
बुजुर्ग बरगद की
मजबूत बाहों में पड़े
लकड़ी की पाटी के
उस चिकने झूले में
अब किसी गाँव में
उसका कुछ नहीं है
सिवाय यादों के
वह बेटी थी
इसलिए किसी
खसरा-खतौनी में
उसका जिक्र भी नहीं है
शहर में ब्याही
वह गाँव की लड़की
अपनी साँसों में
बसाई है अब तक
सभी पेड़ों को
सभी बावड़ी तालाबों
और बहते झरनों को
सभी जड़-चेतनों को
वह गाँव की लड़की
बहुत खुदगर्ज है
केवल अपनी देह को
शहर में लाई है
आत्मा अपनी
बचपन के उसी गाँव में
कहीं छोड़ आई है।
***


उम्मीदों की डाली

यह करोना कब तक
जिंदा रहेगा?
इक दिन खत्म
हो ही जायेगा
जैसे हो जाता है
युग कोई
जैसे टूट जाता है
दु:स्वप्न कोई
लेकिन दे जायेगा यह
जख़्म कई
न मिटने वाले दाग
अनगिनत
इंसान अब किसी का
हाथ न पकड़ेगा
और न दिल ही मिलायेगा
न भरने वाली खाई
यह करोना
हमेशा के लिए
खोद जायेगा
विष की बेल यह
यूँ ही नहीं उगी है
कहीं मिली होगी
खाद इसको
पानी भी
भरपूर कहीं
कई बरगदों को
ढहाया है इसने
कई नस्लों को काटा है
मानवता के अस्तित्व पर
भयानक प्रहार किया है
उम्मीदों की डाली
फिर भी हरी है
विषैली जड़ों में
मट्ठा डालने की
जुगत जारी है।

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