सुमन वाटिका: अंबुजा मलखेड़कर के प्रेरक बालगीत

समीक्षा: धन्यकुमार जिनपाल बिराजदार


कोई भी सजग के साहित्यकार समाज की समस्याओं से अवगत होते हुए अंधेरे में प्रकाश फैलाने का काम करते हुए समाज को ऊर्जा से संपन्न करता है। समकालीन साहित्यकार समसामयिक घटनाओं, चिंताओं, चुनौतियों को देखते हुए अपनी कलम द्वारा दिग्दर्शन की भूमिका निभाता रहता है। शायद इसीलिए काव्य प्रयोजन में 'व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये' कहा गया है। एक ओर कोई भी रचनाकार जानकारी और जागरूकता के साथ ज्ञानात्मक स्तर तक पहुँचता है और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समकालीन परिदृश्य का अंकन करता है। इस दृष्टि से डॉ. अंबुजा मलखेड़कर ने 'माँ शारदा' शीर्षक कविता में "कर जोड़ करुँ प्रार्थना, देना मुझे तुम सद्भावना" कहते हुए अभिवादन करने के साथ-साथ ऋषि-मुनियों, साधु-संतों के पावन स्पर्श से पुनीत भूमि कर्नाटक की वंदना करती हैं। कृष्णा, भीमा, शरावती जैसी नदियों के महिमा गान के साथ-साथ कर्नाटक के महत्त्वपूर्ण त्योहार 'विजयादशमी' का वर्णन शीर्षक कविता में निहित है।

अंबुजा मलखेड़कर
 भारत संतों की भूमि है, 'संत' का अर्थ शांत, संन्यासी, महात्मा, ईश्वर भक्त होता है, फिर भी समाज की अशुभ प्रवृत्तियों को दूर कर शुभ प्रवृत्तियों को वृद्धिंगत करने वाले पुरंदर दास, कनक दास, गिरियम्मा, महात्मा बसवेश्वर, अक्क महादेवी, शिशुनाल शरीफ जी के जीवन, सामाजिक तथा साहित्यिक कार्य पर प्रकाश डाला है। इन संतों एवं शरणों की महिमा हिंदी प्रदेश में पहुँचाने का एक सपना अपने आप में सांस्कृतिक विरासत का परिचय देना है।

 समाज को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु एक ओर शस्त्र तो दूसरी ओर शास्त्र की भी आवश्यकता है। अतः स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले वीर सपूतों कित्तूर चेन्नम्मा, रानी अब्बक्का, संगुली रायण्णा के जीवन तथा कार्य पर काव्य सृजन करते हुए ओबव्वा, केलदी चेन्नम्मा, दान चिंतामणि, अतिमब्बे जैसे वीरों को सरल-सुगम भाषा में अभिव्यक्त किया है।

धन्यकुमार बिराजदार

 एक ओर कर्नाटक के वीरों, संतों के जीवन पर आधारित कविता का सृजन है तो दूसरी ओर भारत के सर्वश्रेष्ठ अभियंता भारतरत्न सर श्री विश्वेश्वरैया को -

 "समय के परिचालक, ईमानदारी के सफल प्रणेता,
 नवभारत के विश्वकर्मा प्रौद्योगिकी नेता"

के रूप में देखते हुए दूसरी ओर-

 "ठुमरी, भजन, खयाल, सोरठा
 अद्भुत उनका गायन
 फिल्म, रेडियो के महारथी
 कर्नाटक के अनमोल रतन"

कहते हुए भीमसेन जोशी जी के प्रति अपार आदर व्यक्त किया है। कवयित्री की विशेषता यह है कि एक ही समय विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए एकेंद्रिय जीव से पंचेंद्रिय जीव तक सभी के प्रति आदर बनाए रखती हैं। प्रकृति में प्रत्येक का अस्तित्व महत्त्वपूर्ण है, साहित्य में भी 'अस्तित्ववादी सिद्धांत' में इसका विचार होता है, शायद इसीलिए-

 "लेकिन आज दुखी हूँ
 मेरा ठिकाना नहीं जग में
 काट दिए सब पेड़ मनुज ने
 जाऊँगी कहाँ अब मैं।"

कहने वाली 'गिलहरी' की वेदना कविता में है तथा पेड़ों की महत्ता जानते हुए अपना पूरा जीवन पेड़ों के संवर्धन हेतु बिताने वाली 'वृक्ष माता तिमक्का' शीर्षक कविता है।

 वर्तमान समय विज्ञान-तकनीकी, 4जी, 5जी का युग है, परंतु मोबाइल में खोया मानव 'पुस्तकालय' तथा उसमें निहित आत्मीयता, संस्कृति भूलता नजर आ रहा है, लेकिन कवयित्री की चिंता मानवता की रक्षा करना है। उपर्युक्त विभिन्न भावों को स्पर्श करता काव्य संग्रह 'सुमन वाटिका' स्तुत्य है। मैं कवयित्री डॉ. अंबुजा मलखेड़कर जी के संघर्षमय जीवन को कविताओं में तलाशता रहता हूँ। प्रस्तुत 'सुमन वाटिका' राष्ट्रभक्ति निर्माण करने तथा पर्यावरण के प्रति संवेदना निर्माण करने में योगदान देती है। काव्य संग्रह में कर्नाटक के सुधारक, वैज्ञानिक तथा राष्ट्रभक्त हस्तियों पर कलम चलाते हुए राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा को अभिव्यक्ति दी है। पुस्तक की भाषा सहज, सुगम तथा सरल होने के कारण पाठक ऊबने से दूर रहेंगे। अपनी गुणवत्ता के कारण 'सुमन वाटिका' पाठकों के हृदय में अपना स्थान जरूर बनाएगी यही कामना करते हुए लेखिका की कलम को बधाई देता हूँ।
65 कासार सोसाइटी, आई.एम.एस. के पास,
जुले सोलापुर, सोलापुर, महाराष्ट्र 413004
चलभाष: +91 942 333 0737
ईमेल: djbirajdar@gmail.com

2 comments :

  1. बहुत ही सुंदर समीक्षा हार्दिक आभार सर।

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  2. सुंदर गीतों की रचना के लिए बहन डॉ अंबुजा मलखेड़कर जी व उत्तम समीक्षा हेतु भाई धन्य कुमार जी विराजदार को अनंत हार्दिक बधाइयां एवं शुभकामनाएं।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी

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