दो कविताएँ: सुनील कुमार

प्रभारी (हिंदी विभाग), राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जोशीमठ, (चमोली), उत्तराखंड।

नदी की जलधारा कहती है

नदी की जलधारा चुपचाप शांत होकर बहती है
सदियों से, हम से कहती है
तुम भी बहो, मगर शालीनता के किनारों पर
देखो मेरे जल में जीवित मछलियों को
ये बहती हैं कभी धारा के साथ
कभी धारा के विरूद्ध
पर ठहरती नहीं कभी भी
और जो ठहर जाती हैं
वो फ़िर फँस जाती हैं किसी भंवर के मोहपाश में
या फ़िर किसी शातिर शिकारी की निग़ाह में
मैं बहती हूँ इसलिए जिंदा हूँ
तुम भी बहो विचारों की धारा में
तर्क वितर्क करो
जानो कहाँ से निकले हम
कहाँ तक जाना है हमें
मैं हर भाषा, संस्कृति के साथ चलती हूँ
तुम भी चलो
अवरोधक ठीक नहीं
ये मैला करता है मेरी जल की धारा को
और तुम्हारी अंतर चेतना को भी
चेतना को जाग्रत करो, विज्ञान और तकनीक की भाषा में
खुद को अभिव्यक्त करो
अहंकार की भाषा कुरूप है
कभी कभी मौन की भाषा भी सभ्य लगती है
मैं भी अक्सर मौन में ही बहती हूँ
और जब आन पड़ती है तो फ़िर तोड़ देती हूँ मौन अपना
फ़िर उजाड़ देती हूँ अपनी सिंचित सभ्यता को भी
तुम भी स्वाभिमान से जीना सीखो
लेकिन उदार बनो
हर जीवित को जीवित भी होना चाहिए
मुर्दा शांति ठीक नहीं है
जो नेस्तनाबूत कर देती है
मानव, समाज और सभ्यता को भी
संघर्ष की राह चुनो तुम
मैं भी चट्टानों से टकराई फ़िर मैंने अपनी धारा बनाई
बहती रही अपने अंतिम लक्ष्य तक
तुम भी बहते रहो विचारों की धारा में
अनंत ब्रह्मांड की सीमाओं से मीलों आगे।
***


कुछ तो बात है, कुछ तो हालात हैं

वे आजकल चुप रहते हैं
बिल्कुल मौन रहते हैं
अपने आंगन में बैठकर अपनी बूढ़ी नजरों से
ताकते रहते हैं सड़क पर हर आने जाने वालों को
देखते रहते हैं एक टक होकर
मायूसी की निगाह से
बुरे से बुरे दौर में
जो कहते थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा
जो हमेशा शांत होकर धैर्य से बंधे रहे
अब न जाने क्यों कभी कभी विचलित हो जाते हैं
उम्र का पड़ाव भी हो सकता है
कहीं ऐसा तो नहीं
न्याय व्यवस्था से चकनाचूर हो गए हैं
आदर्श शायद बिखरने लगे हैं
रिश्ते नाते सब खोखले लग रहे हैं
कहीं ऐसा तो नहीं कि सबका मूल्यांकन पूर्ण कर लिया
और जान लिया कौन कहाँ कितने गहरे पानी में
कहीं हम तो लापरवाह साबित हो गए
उन्हें समझने में
जिनका जीवन बीत गया हमें समझने में
कुछ चोट तो लगी है उन्हें, शायद शब्दों की
शब्दों की चोट धारदार हथियार से भी गहरा जख्म करती है
अब जान गया हूँ मैं, ऐसी ही बात है, ऐसे ही हालात हैं
जहाँ आज वे खड़े हैं, एक रोज़ मुझे भी गुजरना
ऐसी ही बात से, ऐसे ही हालात से।
***

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