साक्षात्कार: दिविक रमेश

दिविक रमेश
जहाँ से जो उपयोगी और उचित मिले उसे अपनाना चाहिए, ऐसा मैं समझता हूँ। पाश्चात्य संस्कृति भी मनुष्यों की ही है। मनुष्यों में, हर स्तर पर, आदान-प्रदान चलता ही है।
(भारत के प्रख्यात बाल साहित्यकार श्री दिविक रमेश से दिनेश पाठक 'शशि' की साहित्य-वार्ता)

दिनेश पाठक: आपके जीवन का वह कौन सा वाकया था जिसने आपको लेखन की तरफ मोड़ दिया। आपकी पहली रचना कौन सी थी?

दिविक रमेश: मुझे दिल्ली स्थित अपने गाँव किराड़ी से दिल्ली शहर के करौल बाग के देवनगर में आना पड़ा था। कक्षा पाँच के बाद आगे की पढ़ाई के लिए। अपने नाना-नानी के घर रहने के लिए। अपने माँ-पिता और बहनों (छोटा भाई बाद में हुआ था) की याद आना स्वाभाविक था। नान-नानी बहुत प्यार करते थे। नाना जी का छोटा पुस्तकालय था। उन दिनों अखबारों में भी बच्चों के लिए साहित्य छपता था। मुझे पढ़ने को यह सब मिला। ऐसे परिवेश में न जाने कब स्वत: ही मैंने कहानी और कविता लिखना शुरु कर दिया था। तब मेरी आयु लगभगा 14 वर्ष के आसपास रही होगी। कविता की तो याद नहीं लेकिन मेरी पहली कहानी अनोखी रात थी। बड़ा होने के बाद, मेरी ठीकठाक कही जानेवाली कविता कलकत्ता ( कोलकोता) की पत्रिका मणिमय में प्रकाशित हुई थी। मई, 1970 में। शीर्षक था एक सूत्र। पिताजी हरियाणवी के लोक गायक थे। शायद उनस एभी जन्मजात संस्कार मिलें होंगे। गाँव जाने पर दादा जी से भी अनेक धार्मिक-पौराणिक कहानियाँ सुनने को मिलती थीं।

दिनेश पाठक ‘शशि’
दिनेश पाठक: अपनी जीवन यात्रा का संक्षिप्त परिचय दीजिए। आपके कृतित्व की संक्षिप्त रूपरेखा तथा उल्लेखनीय कार्य?

दिविक रमेश: मेरा जन्म स्थान दिल्ली में नांगलोई के पास किराड़ी गाँव है जो हरियाणा की सीमा पर बसा हुआ है। 28 अगस्त, 1946 को हुआ था। यूँ स्कूल में प्रवेश दिलाते समय मेरा जन्म दिन 6 फरवरी, 1946 दर्ज कराया गया। अत: रिकार्ड में यह दूसरा ही मिलेगा। हाँ, घर-परिवार के लिए पहला वाला ही है।

उस समय गाँव में बिताए थोड़े वर्षों में से कुछ की ही थोड़ी-बहुत याद बची है। उसी के आधार पर कहूँ तो तब मेरा गाँव सचमुच का गाँव होता था- बिना सड़क वाला, बिना बिजली और सरकारी पानी वाला। बस पकड़ने के लिए नांगलोई तक पैदल चलकर आने वाला। चौपाल में या पेड़ों के नीचे प्राइमरी शिक्षा की सुविधा रखने वाला। दूर-दूर तक खेतों-खलिहानों वाला। गाँव के घरों से लगते हुए ही खेत शुरु हो जाते थे। किराड़ और मंगोथर जोहड़-तालाबों वाला। छोटी झीलनुमा एक गून वाला। कच्ची राहियों वाला। नहर और धान्नों(नहर से खेत तक लाए छोटे नाले) वाला। बाग-बगीचे वाला। कुओं से पानी पिलाने वाला। भूतों वाले कुओं, पीपल और खास स्थानों वाला। माँ के द्वारा सुबह-सुबह चक्की में पीसे गए अन्न की उन्हीं के हाथों से मिट्टी के चूल्हे में बनायी गई रोटी और दाल-साग खिलाने वाला। जाति-भेद से परे दादा-दादी, चाचा, ताऊ, बुआ, भाभी, जीजी आदि रिश्तों वाला। इत्यादि। तब गेहूँ, बाजरा, ज्वार, चना, सरसों आदि की फसलें विशेष रूप से होती थी। बाद में जाकर टिंडे आदि की सब्जियाँ भी। हमारे घर हमेशा भैंस या गाय रहती थी। बिजली नहीं थी। दीए के प्रकाश में ही सब काम करने होते थे। घर में शौचालय नहीं थे। खेतों में ही जाना पड़ता था। गाँव के अन्दर और गाँव के बाहर हमारे दो घर थे। अन्दर वाला घर छोटी ईंटों का तिमंजला मजबूत मकान था जो, मैं ने सुना था, मेरे पड़दादा ने बनवाया था। वे पैसे वाले माने जाते थे। बाहर वाला घर हेली (हवेली) के नाम से प्रसिद्ध था। चाचा-ताऊ समेत हमारा संयुक्त परिवार था लेकिन मेरी याद में अलग-अलग चूल्हे हो गए थे। हमारी कुछ खेती की जमीन थी-किराड़ी में भी और हरियाणे में बहादुरगढ़ के पास कसार गाँव में। प्रारम्भ में मेरे पिता जी खेती का काम देखते थे। ताऊ जी स्टेशन मास्टर थे और चाचा जी अपना पंडिताई का काम करते थे। मेरा पारम्परिक ब्राह्मण परिवार जरूर था लेकिन जाति-पाति का कोई खास व्यवधान नहीं था। विशेष रूप से बताना चाहूँगा कि भले ही मैं ब्राह्मण परिवार से था लेकिन हमें छूआछूत नहीं सिखायी गई थी। मेरे दादा जी शास्त्रों के ज्ञाता थे और ज्योतिषी भी। कल्याण पत्रिका के नियमित पाठक थे। गीता प्रेस की अन्य पुस्तकें भी पढ़े थे। खूब मान्यता थी उनकी, दूर दराज के गाँवों तक में। दादाजी के साथ कई बार, भोजन के लिए, दूसरे गाँवों में भी जाने का अवसर मिला। बहुत इज्जत थी उनकी। नियमित सैर करना, दातुन करना, स्नान करना आदि उनकी दिनचर्या में था। वे सुबह-शाम पूजा (संध्या) करते थे और हम बच्चों को प्रसाद दिया करते थे। किशमिश आदि।बहुत अच्छा लगता था। वे हमें पौराणिक और नैतिक कहानियाँ भी सुनाया करते थे। यह सिलसिला काफी देर तक चला।इस दिशा में बहुत कुछ उन्हीं से मिला। बदले में हम दादा जी के हाथ-पांव और कमर दबाते थे। दादा जी की एक बात मुझे कभी नहीं भूलती। हमारे गाँव में भूत-प्रेतों की बातें अक्सर सुनने में आती थीं।उनसे बचने के उपाय भी। हम डरते भी थे। खासकर रात में सुनसान जगह से निकलते वक्त तो काफी डर लगता था। पता चला कि दादा जी के पास भी भूत भगाने का कोई मंत्र है। एक बार दादाजी से जब अपना डर साझा किया तो उन्होंने कहा, "भूत-वूत कुछ नहीं होता। भ (भय) से भूत होता है।" बस यह बात गाँठ बंध गई। मेरे पिता जी (जिन्हें मैं चाचा कहता था) कम पढ़े-लिखे थे। शायद चौथी कक्षा तक पढ़े थे और बाद में उन्हें दादा जी ने खेती का काम सौंप दिया था। लेकिन उन्हें गाना (रागिनी आदि) गाने का बहुत शौक था। रागिनी गाते-गाते, पैदल चलते-चलते न जाने कितनी दूर निकल जाते थे।संगीत की समझ थी।वे लोक नाट्य और लोक गीतों के बेहद शौकीन थे। अच्छे लोक गायक थे। हरियाणवी के। याददाश्त बहुत अच्छी थी। मुझे बहुत प्यार करते थे। नि:संदेह उनका कला-प्रेम मेरे लिए भी सहज प्रेरणादाई रहा होगा। मैं संरक्षित बालक था। मैं तब अपनी तीन बहनों ( एक बहन पहली माँ से थीं जो सबसे बड़ी थीं और हम सब उनको जीजी कहते थे और जो हमें बहुत प्यार करती थीं) के बीच इकलौता बेटा था। छोटा भाई काफी बाद में हुआ था। एक समय में आकर उन्हें उनके अनुभव ने सिखा दिया था कि पढ़ना बहुत जरूरी होता है। अत: वह हमेशा मुझे पढ़ने के लिए कहते रहते थे। दीये की रोशनी में मुझे पढ़ने को कहते और खुद भी जगते रहते। पढ़ना, और और पढ़ना मुझे संस्कार में सबसे अधिक उन्हीं से मिला था। पिता जी की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर थी। उन्होंने दर्जी का काम भी सीखा था-आजीविका के लिए। प्रारम्भ में दादा जी को उनका गाना-नाचना अच्छा नहीं लगता था। मेरी माँ दिल्ली शहर से थीं। उन्हें दिल्ली वाली भी कहा जाता था। हालांकि हरियाणवी देहाती जीवन शैली में भी वे रच-बस गयी थीं।वे बहुत ही मेहनती थीं। चक्की चलाना, दूर कुएँ से पानी लाना, खेतों से घरेलू पशुओं के लिए चारा लाना, गोबर पाथना आदि सब काम कुशलता के साथ कर लिया करती थीं।

पाँचवीं कक्षा तक मैं गाँव के प्राइमरी स्कूल में ही पढ़ा था। उन दिनों स्कूल में सफाई के भी नम्बर मिला करते थे और उसमें मैं हमेशा प्रथम आता था। इसके पीछे दिल्ली वाली मेरी माँ का विशेष हाथ था। मेरे पिता के एक अंतरंग मित्र होते थे –पटवारी चाचा जी। वे हमारे यहाँ आया करते थे और ठहरते भी थे। वे चिराग दिल्ली के थे। मुझे बहुत प्यार करते थे। उनसे भी साफ-सुथरा रहने का गुण आया था। गाँव का स्कूल चौपाल में लगता था। बारात आती तो हमें वृक्षों के नीचे पढ़ाया जाता। बारिश आती तो छुट्टी हो जाती। पाँचवी कक्षा पास करने के बाद मुझे आगे की पढ़ाई के लिए नाना-नानी के घर भेज दिया गया। यहीं से जीवन में एक बड़ा बदलाव भी शुरु हुआ। मेरे नाना-मामा का घर-निवास दिल्ली शहर के करोल बाग के देवनगर में होता था। इसके बाद मैं हमेशा के लिए शहर का ही खोकर रह गया।

संक्षेप में बताऊँ तो 11वीं कक्षा के बाद कॉलिज की पढ़ाई के लिए मुझे काम करना पड़ा। दिन मैं नौकरी करता रहा और शाम के महाविद्यालय में पढ़ता रहा। रचनात्मक लेखन भी होता रहा। एम.ए. (हिंदी) में प्रथम श्रेणी आई तो दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महाविद्यालय में प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति हो गई। विवाह हुआ। प्राचार्य के पद से सेवानिकृत्त हुआ। बीच में भारत सरकार की ओर से दक्षिण कोरिया में अतिथि प्रोफेसर के रूप में पढ़ाने का अवसर भी मिला।


दिनेश पाठक: आप कौन-कौन सी विधाओं में लेखन कार्य करते हैं?

दिविक रमेश: कविता, कहानी, काव्य-नाटक, आलोचना, अनुवाद और बाल साहित्य (कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण)


दिनेश पाठक: अपनी प्रकाशित पुस्तकों के बारे में बताइये? आपको अपनी कृतियों में सर्वाधिक श्रेष्ठ कौन सी कृति लगती है? और आजकल आप क्या लिख रहे हैं?

दिविक रमेश: भले ही लिखने की गति थोड़ी धीमी हुई है लेकिन लिख सभी विधाओं में रहा हूँ। जल्दी ही मेरा नया कविता संग्रह और साक्षात्कारों की पुस्तकें प्रकाशित होंगी। कोरियाई कवि किम सोवल की कविताओं के अनुवाद की पुस्तक भी तैयार है। बाल साहित्य में बाल कविताओं, बाल कहानियों, बाल संस्मरणॉं और बाल नाटकों की पुस्तकें भी आने वाली हैं। मेरी चुनी हुई कविताओं की एक पुस्तक ‘पचास कविताएँ’ भी छप चली है। समीक्षात्मक /आलोचनात्मक काम भी चलता ही तहता है। कुछ पहले ‘पढ़ते-समझते’ और ‘बाल साहित्य’ प्रकाशित हुई थीं।


दिनेश पाठक: आपको प्राप्त पुरस्कार और सम्मान के बारे में बताइये? आप अब तक के अपने लेखन में महत्वपूर्ण उपलब्धियों पर प्रकाश डालें?

दिविक रमेश: पुरस्कार/सम्मान तो, कह सकता हूँ कि काफी मिल चुके हैं। कविता, अनुवाद, बाला साहित्य आदि सभी क्षेत्रों में। प्रमुख पुरस्कार/सम्मान इस प्रकार हैं:

दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यिक कृति पुरस्कार, 1983 (2) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, 1984 (3 )गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1997 (4) एनसीईआरटी का राष्ट्रीय बाल-साहित्य पुरस्कार, 1988 (पाँच)दिल्ली हिंदी अकादमी का बाल-साहित्य पुरस्कार, 1990 (6)अखिल भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर का सम्मान, 1991 (7) राष्ट्रीय नेहरू बाल साहित्य अवार्ड, बालकन-जी-बारी इंटरनेशनल, 1992 (8)इंडो- एशियन लिटरेरी क्लब, नई दिल्ली का सम्मान, 199पाँच, (9) प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, 2002 (10)कोरियाई दूतावास से प्रशंसा-पत्र, 2001 (11)भारतीय विद्या संस्थान, ट्रिनिडाड एँड टोबेगो द्वारा गौरव सम्मान, 2002 (12)दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, 2003 (13)शासी निकाय एवं स्टाफ काउंसिल, मोतीलाल नेहरू कालेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा भाषा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया, 2003 (14)इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक स्टडीज द्वारा शिक्षा रत्न अवार्ड, 2004, (1पाँच)अनुवाद के लिए भारतीय अनुवाद परिषद का द्विवागीश पुरस्कार (2009),(16) भारतीय स्तर का श्रीमती रतन शर्मा बाल-साहित्य पुरस्कार, 2009(101 बाल कविताओं पर), (17) उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (उत्तर प्रदेश सरकार) का सर्वोच्च बाल साहित्य पुरस्कार - साहित्य भारती सम्मान (2013), (18) श्री गोपीराम गोयल सृजन कुंज पुरस्कार-2016 (श्रीगंगानगर), (19) साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 2018 (बालसाहित्य)।

इसके अतिरिक्त आज मेरी रचनाएँ स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं। म्र्ती कृतियों पर शोध हो चुके हैं और हो रहे हैं। मेरी कविताओं को देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संग्रहों में स्थान मिला है। इनमें से कुछ अत्यंत उल्लेखनीय इस प्रकार हैं: 1. इंडिया पोयट्री टुडे (आई.सी.सी.आर.), 198पाँच, 2. न्यू लैटर (यू.एस.ए.) स्प्रिंग/समर, 1982, 3. लोटस (एफ्रो-एशियन राइटिंग्ज, ट्युनिस 'Tunis') वाल्यूमःपाँच6, 198पाँच, 4. इंडियन लिटरेचर (Special number of Indian Poetry Today), साहित्य अकादमी, जनवरी/अप्रैल, 1980, पाँच. Natural Modernism (peace through poetry world congress of poets), 1997, कोरिया, 6. हिन्दी के श्रेष्ठ बाल-गीत (संपादकः श्री जयप्रकाश भारती), 1987, 7. आठवें दशक की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएँ (संपादकः हरिवंशराय बच्चन)। 8. भारतीय कविता संचयन( सम्पादक: विश्वनाथ प्रसाद तिवारी), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली(2012)। अनेक देशों जैसे जापान, कोरिया, बैंकाक, हाँगकांग, सिंगापोर, इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, पोर्ट ऑफ स्पेन, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, आबू धाबी आदि की साहित्यिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक यात्राएँ करने का अवसर मिला है। सबसे ज्यादा मुझे अपने पाठकों का अपार स्नेह एवं आदर मिला है और मिल रहा है।

अनेक देशों जैसे जापान, कोरिया, बैंकाक, हाँगकांग, सिंगापोर, इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, पोर्ट ऑफ स्पेन, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, आबू धाबी आदि की साहित्यिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक यात्राएँ करने का अवसर मिल चुका है।


दिनेश पाठक: घर में आपको किस प्रकार का सहयोग मिलता है?

दिविक रमेश: घर में मुझे पूरा सहयोग मिलता है। मेरे लेखन को महत्त्व दिया जाता है। उसके लिए समय और परिवेश दिया जाता है। अब तो मेरी बेटी दिशा ग्रोवर भी एक चर्चित रचनाकार बन गई है।


दिनेश पाठक: आपने प्रतिनिधि बाल कविता संचयन का संपादन कर एक श्रमसाध्य और ऐतिहासिक महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया है। आप कैसा महसूस करते हैं?

दिविक रमेश: मुझे बेहद खुशी और संतोष है कि इस कृति को प्राय: महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। जल्दी ही इसे 6 खण्डों में प्रकाशित किया जाएगा ताकि बच्चों को एक-एक खण्ड के रूप में पढ़ने में सुविधा रहे।


दिनेश पाठक: वर्तमान में लिखा जा रहा बाल साहित्य बालमन से कितना दूर है कितना पास। कितना पहुँच पा रहा है वह बच्चों तक।

दिविक रमेश: आज हिंदी में उत्कृष्ट बाल साहित्य लिखा जा रहा है। यह बात अलग है कि पुराने ढर्रे का और औसत दर्जे का भी लेखन काफी हो रहा है। आज के उत्कृष्ट बाल साहित्य में बाल मनोविज्ञान की गहरी झलक और वेज्ञानिक दृष्टि की उपस्थिति सहज ही देखी जा सकती है। बालक को मित्र मानकर लिखा जा रहा है। उपदेश शैली को छोड़कर, समझ साझा करने की पद्धति को अपनाया जा रहा है। नि:संदेह बालसाहित्य पढ़ा जा रहा है। लेकिन अभी काफी अपेक्षित है। अच्छी बात यह है कि धीरे-धीरे यह समझ भी विकसित हो रही है कि बालसाहित्य केवल बच्चों के लिए नहीं बल्कि हर आयु के वर्ग के लिए होता है।


दिनेश पाठक: बच्चों को कैसे जोड़ा जाए बाल साहित्य से?

दिविक रमेश: बड़ों को भी यह प्रमाणित करना होगा कि वे बालसाहित्य को महत्त्वपूर्ण भी मानते हैं और पढ़ते भी हैं। बालसाहित्य को बच्चों के हाथों की पहुँच में लाने का हर प्रयत्न करना होगा। सृजन और प्रस्तुति के रूप में उसे बच्चों के आकर्षण के दायरे में लाना होगा। ऐसा होने लगा है लेकिन बहुत कम।


दिनेश पाठक: शिक्षा की बढ़ती व्यवसायिकता में बाल साहित्य की स्थिति कैसी है?

दिविक रमेश: देखिए व्यावसायिकता या बाजारवाद तो आज हर क्षेत्र में है। इसकी चुनौतियों को स्वीकारा करते हुए ही तो बाला साहित्यकारों और बाल हितैषियों को गतिशील रहना है। बाजार में जाना है लेकिन बाजारवाद से टकराना है, उससे समझौता नहीं करना है।


दिनेश पाठक: बच्चों के चहुमुखी विकास में वर्तमान बाल साहित्य की स्थिति?

दिविक रमेश: बालसाहित्य का योगदान नि:संदेह सिद्ध है। इसके महत्त्व को अधिक से अधिक समझने की जरूरत है।


दिनेश पाठक: टी.वी., इण्टरनेट बच्चों के कितने हितकारी?

दिविक रमेश: प्रश्न हितकारी से अधिक आवश्यकता का है। आज के बच्चे के लिए ये भी जरूरी हैं लेकिन उपयोग की दृष्टि से संतुलित रूप में। सहयोगी के रूप में।


दिनेश पाठक: बच्चों में राष्ट्रप्रेम की स्थिति कैसी है? बाल साहित्यकार का इसमें क्या योगदान है?

दिविक रमेश: आज का बालसाहित्यकार इस क्षेत्र में अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। बालसाहित्यकार के लिए राष्ट्रप्रेम केवल नारा नहीं है बल्कि संस्कार है। राष्ट्रप्रेम का अर्थ मनुष्यता का हनन या अभाव नहीं होता। बालसाहित्य आज के बालक को मनुष्यता की बेहतरीन राह पर अग्रसित करता है जिसका एक पड़ाव राष्ट्रप्रेम भी है।


दिनेश पाठक: पाष्चात्य संस्कृति बाल साहित्य के लिए कितनी उपयोगी है?

दिविक रमेश: जहाँ से जो उपयोगी और उचित मिले उसे अपनाना चाहिए, ऐसा मैं समझता हूँ। पाश्चात्य संस्कृति भी मनुष्यों की ही है। मनुष्यों में, हर स्तर पर, आदान-प्रदान चलता ही है।


दिनेश पाठक: बाल साहित्य में आलोचनात्मक लेखन की स्थिति पर आपके विचार?

दिविक रमेश: यह क्षेत्र, सच कहूँ तो बालसाहित्य की दुखती रग है। कायदे से बहुत काम होना अभी बाकी है। मेरी तो यह अपेक्षा है कि बालसाहित्य को बड़ों के साहित्य के आलोचक भी समकक्ष महत्त्व देना सीखें। वैसे बड़ों के साहित्य के क्षेत्र में भी आज आलोचना की स्थिति, अपवाद छोड़ दें तो, दयनीय ही है।


दिनेश पाठक: आपकी नजर में एक लेखक के लिए कौन-कौन सी बातें ध्यातव्य हैं।

दिविक रमेश: संवेदनशीलता, दृष्टि सम्पन्नता, मनुष्यता के प्रति प्रतिबद्धता।


दिनेश पाठक: प्रकाशक और लेखक के सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?

दिविक रमेश: लेखक को स्वीकार करके चलना चाहिए कि प्रकाशक अंतत: व्यवसायी है। आप और आपका लेखन उसके लिए यदि फायदे का सौदा नहीं हैं तो उसके सामने आप रिरियाते रहेंगे और यदि आप और आपका लेखन फायदे के सौदे हैं तो प्रकाशक आपकी जी-हजूरी करेगा। हाँ सरकारी प्रकाशको (नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग, साहित्य अकादेमी आदि) की स्थिति एक हद तक अलग है। यहाँ कम से कम , रॉयल्टी के लिए धक्के भी नहीं खाने पड़ते और वह देर-सवेर मिलती भी है।


दिनेश पाठक: हिन्दी के उन्नयन के लिए आपने कई देषों की अनेक यात्राएँँ की हैं आपके विचार से हिंदी की वैश्विक स्थिति क्या है?

दिविक रमेश: विश्व-पटल पर हिंदी की उपस्थिति को लेकर गर्व भी कर सकते हैं बावजूद कुछ छिटपुट चिन्ताओं के। हिन्दी के गढ़ माने जाने वाले देशों जैसे रूस और जर्मनी में हिन्दी के पठन-पाठन और उसके विस्तार पर आघात भी पहुँचा है। कुछ पहले ब्रिटेन के एक स्थापित विश्वविद्यालय में हिन्दी के पठन-पाठन को लेकर जो हुआ वह काफ़ी तकलीफ़देह था। लेकिन सच्चाई यह भी है, और यह कम महत्वपूर्ण भी नहीं है, कि भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रभावशाली आगमन और उससे उपजे भारतीय बाज़ार के दबाव ने हिन्दी की ओर बाहर और भीतर दोनों ही लोगों का न केवल अधिक ध्यान आकृष्ट किया है बल्कि उसकी उपयोगिता को सिद्ध करते हुए उसके अन्यान्य रूपों के विस्तार को भी संभव किया है। और यह क्रम बढ़ता ही जा रहा है। विश्व के स्तर पर हिन्दी के वेबजालों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है।मीडिया और प्रोपेगेण्डा साहित्य से लेकर वार्तालापी हिन्दी (व्यावहारिक हिन्दी) की दिशा में तो जैसे विस्फोट सा हुआ है। हिन्दी चैनेलों की पहुँच उन देशों तक भी पहुँच चुकी है जहाँ पहले इस दृष्टि से भयंकर उजाड़ था। जैसे दक्षिण कोरिया। मार्च, 2010 में आई.सी. सी.आर, नई दिल्ली के सभागार में अफ़गानिस्तान में हिन्दी सीखने वाले विद्यार्थियों से मिलकर और हिन्दी पर उनकी पकड़ देखकर बहुत गर्व हुआ था।अब तो देश के बाहर न केवल अनुवाद के माध्यम से बल्कि रचनात्मक लेखन के द्वारा भी हिन्दी अग्रसित हो रही है। इस प्रसंग में इतना अवश्य जोड़ना चाहूँगा कि देश में एक उचित योजना के तहत हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को उपलब्ध कराना होगा ताकि वह सब हिन्दी के माध्यम से विदेशों में पहुँचाया जा सके। विदेश के संदर्भ में हिंदी को ही भारत की भाषा के रूप में निर्विवाद रूप से स्वीकृति दिलानी होगी बिना किसी अन्य भारतीय भाषा के प्रति पूर्वाग्रही हुए। अच्छी बात यह है कि बिना हिन्दीतर भारतीय भाषाओं का गला दबाए इस दिशा में कुछ काम चल निकला है।

एक शोध के अनुसार, 'आज 137 देशों में हिन्दी भाषा समग्रता से विद्यमान है इन देशों में हिन्दी एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है तथा विश्व के लगभग 1पाँच0 विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन और शोध की लम्बी परम्परा की व्यवस्था है।’ (हिन्दी का वैश्विक स्वरूप, रेखा रानी, साहित्य यात्रा, अप्रॆल-जून-,201पाँच)| एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढाई जा रही है। एक मत के अनुसार भारत से बाहर जिन देशों में हिन्दी का बोलने, लिखने-पढने तथा अध्ययन और अध्यापन की दृष्टि से प्रयोग होता है, उन्हें हम इन वर्गों में बांट सकते हैं - 1. जहाँ भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे - पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्याँमार, श्रीलंका और मालदीव आदि। 2. भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान आदि। 3. जहाँ हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढाया जाता है जैसे अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के देश। 4. अरब और अन्य इस्लामी देश, जैसे- संयुक्त अरब अमरीरात (दुबई) अफगानिस्तान, कतर, मिस्र, उजबेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि। कुछ और देश हैं, जहाँ भारतीयों को जबरन बसाया गया था, जैसे मॉरिशस, फिजी, त्रिनीडाड और टुबेगो आदि।

आज पूरे विश्व में मूल भारतवंशी अथवा प्रवासी भारतीय हिन्दी की बढ़ोतरी में कई प्रकार से गतिशील हैं। वे साहित्य रच रहे हैं जिसे भारत के विश्वविद्यालय तक अपने पाठ्यक्रमों में रखकर उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं। अनेक संस्थाएँ उनके योगादन के लिए उन्हें पुरस्कृत भी कर रही हैं। इंग्लैंड में तो गीतांजलि आदि अनेक संस्थाएँ हैं जो निरंतर हिन्दी संबंधी कार्यक्रम करती रहती हैं। कम ही सही लेकिन बहुत से प्रवासी भारतीय ऐसे भी हैं जो विदेशी भाषाओं के माहौल में भी अपने बच्चों को हिन्दी पढ़ाने के लिए व्यवस्था करते नजर आते हैं। जानकारी यह भी मिली है कि यूरोप में हिन्दी सीखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति, योग, शास्त्रीय संगीत और नृत्य को बेहतर तरीके से समझने के लिए यूरोप का एक बड़ा वर्ग हिंदी प्रेमी बन रहा है।

ग्लोबल होती दुनिया ने हिन्दी के विकास में काफी योगदान किया है जो जारी है।


दिनेश पाठक: नये लोग जो साहित्य के क्षेत्र में आना चाहते हैं उनके लिए क्या कहेंगे?

दिविक रमेश: कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर फूँके आपनौ, चले हमारे साथ ॥

साहित्य में यह समझ जरूरी है कि साहित्य का आकाश होता है लेकिन वह उपजता है धरती से ही। अनेक बाधाएँ आती हैं, रचनाकार को हर हाल अपनी सृजनशीलता के लिए बढ़ते रहना होता है। रचना हो और होती रहे, यही रचनाकार का सर्वोपरि ध्येय होता है।


दिनेश पाठक: वर्तमान समय में साहित्यिक पत्रिकाओं के योगदान पर प्रकाश डालें?

दिविक रमेश: साहित्यिक पत्रिकाएँ साहित्य की तात्कालिक वाहक और प्रसारक होती हैं।वे मूल्याँकन का भी अवसर देती हैं। अत: उनका योगदान रचनाकार और पाठक अर्थात पूरे समाज के लिए नि:संदेह सिद्ध है। बहुत सी साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने गुटबाजी के मारे संपादकों के कारण (जिनमें प्राय: स्वयं रचनाकार ही हुआ करते हैं), वैसा योगदान नहीं भी दे पातीं, जैसा उनसे अपेक्षित होता है। खैर्।


दिनेश पाठक: साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के योगदान के बारे में आप क्या कहेंगे?

दिविक रमेश: संस्थाएँ भी अच्छी-बुरी दोनों प्रकार की हैं। कुछ बस अनुदानों के चक्कर में रहती हैं।


दिनेश पाठक: आपके बाल साहित्य रचनाकर्म की षुरूआत से वर्तमान समय तक में आप बाल साहित्य में क्या परिवर्तन देखते हैं?

दिविक रमेश: आज का बालसाहित्य बच्चों को केवल उनके कर्तव्य सीखाने वाला उपदेशक नहीं रह गया है बल्कि वह बच्चे के होने को स्वीकार करते हुए उनके अधिकारों का पाठ बन रहा है। वह उनकी आवाज हो रहा है। दूसरे आज के बालसाहित्यकार अपनी रचनाधर्मिता में विषयवादी न होकर विषय के कलात्मक अनुभव के रूप में योगदान कर रहे हैं। वे वैज्ञनिक दृष्टि से सम्पन्न हैं। कल्पना के वैभव को भी स्वीकार की बुनियाद पर सजाता है। इस संब्नंध में मैंने विस्तार से लिखा है। मेरी दो पुस्तकें हैं – हिंदी बाल साहित्य: कुछ पड़ाव और बाल साहित्य।


दिनेश पाठक: कोई अन्य बात जो आप साहित्यकारों से साझा करना चाहेंगे?

दिविक रमेश: कुछ खास नहीं। बस इतना भर कि साहित्य से बस प्रेम और बस प्रेम करते रहें।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।