कहानी: भोर का तारा

हिमांशु पाठक

ए-36, जज-फार्म, छोटी मुखानी, हल्द्वानी-263139, जिला-नैनीताल, उत्तराखण्ड

* 1 *

दिन ढलने की तैयारी कर रहा है। सूरज दादा दिनभर की यात्रा समाप्त कर घर लौटने की तैयारी कर रहे हैं। क्या पशु-पक्षी और क्या मनुष्य सभी अपने-अपने घरों लौट रहे हैं, दिन भर की कार्यालय की भागदौड़ से निपट अपने-अपने घरों को, अपनों के पास लौटने को आतुर, पर इन सब में अगर सुबह-शाम के आने-जाने से कोई अप्रभावित था तो वो थे तिवारीजी। उनकी सुबह भी अपने घर में बीतती और शाम भी, वह भी नितांत अकेले। बड़ी सी हवेली में तिवारीजी अकेले ही रहते हैं। रोज की तरह आज भी तिवारी जी बरामदे में बैठे हुए अखबार पढ़ रहे थे, तभी उनकी नजर बाहर को चली गयी तो देखा, बाहर अंधेरा छाने लगा था। तिवारीजी मरे मन से उठकर अंदर जाने लगे, कमरे में छाये हुए अंधकार को दूर करने के लिए।

 इतनी बड़ी हवेली में तिवारीजी अकेले ही रहते हैं। पर हमेशा ऐसा नहीं था एक समय ऐसी थी जब पंद्रह कमरों की ये हवेली भी छोटी पड़ जाती थी। कभी तिवारीजी का भी लंबा-चौड़ा कुनबा हुआ करता था। आज यह हवेली तिवारीजी को मानो काटने को आती है। या तो इस घर की दीवारें तिवारी जी से बातें करतीं हैं या फिर दीवारों पर टंगी हुई शान्त तस्वीरें, विशेषकर तब जब गर्मियों की दोपहर में तिवारी जी घर में अकेले बैठे होते हैं।

 तिवारी घर के अंदर बिजली जलाने को उठे तभी उनका शान्त फोन भी शोर करने लगता है। तिवारीजी बिजली जलाने के बाद फोन के पास जाते हुए फोन का रिसीवर उठाते हुए कपकपाती आवाज से बोले, "हेलो!"
दूसरी ओर से फोन पर आवाज आयी,"दादू! मैं हूँ संचयिता।"
तिवारी जी, “अरे संचियता, कैसी है मेरी प्यारी बिटिया"?
"मैं अच्छी हूँ दादू"। 
"आप कैसे हैं दादू?” दूसरी ओर से संचयिता बोल उठी।
"अच्छा दादू हम अगले महीने भारत आ रहे हैं।आपके पास तीन महीने के लिये।हम सब आपके साथ रहेंगे दादू आपके पास"। (संचयिता ने तिवारीजी को बताया)
तिवारी जी का मुरझाया चेहरा कुछ इस तरह खिल उठा मानो जैसे सुखे पौधे को ढेर सारा जल मिलने के बाद वो खिल उठता है।
 तिवारीजी अतीत की गहराइयों में जाकर संचयिता का बचपन याद करने लगे कि कैसे संचयिता तुतलाती आवाज से तिवारी जी को दादू कहकर बुलाती थी।
खैर फोन में दूसरी ओर से आवाज आती है, "हैलो दादू! आप मुझे सुन रहे हैं कहा खो गये थे दादू? हमारी याद आ रही थी दादू?" तिवारीजी और संचयिता में काफी देर तक बाते करते रहे उसके बाद उन्होंने फोन रख दिया और चले गये दिया बत्ती करने। 
 तिवारी जी संध्या-वंदन से निवृत्त होकर अपने शाम के भोजन की तैयारी में रसोई में वापस आ गये। आटा गूँथने के बाद तिवारीजी ने लौकी काट कर गैस में एक ओर सब्जी रख दी और दूसरे चूल्हे में रोटी बनाने लगे।
नब्बे साल की उम्र में भी तिवारी जी अपना काम स्वयं ही करते। रोज-रोज किससे कहें खाना बनाने के लिये।
पड़ोसियों का अहसान भी कब तक लिया जाये हालाकि तिवारीजी के पड़ोसी भी अच्छे हैं इसमें कोई शक नहीं वो तिवारी जी की सहायता को हर पल खुशी-खुशी तैयार रहते पर तिवारी जी ही किसी को परेशान करना नहीं चाहते। खैर तिवारी जी भोजन कर अपने बिस्तर में चले गये और पहुँच गये बीते वक्त की सैर में।
 

* 2 * 

आज घर में रौनक छायी हुई है। घर में नवकन्या का पदार्पण जो हुआ है। जिसका आज नामकरण-संस्कार है पूरे घर के साथ पूरे मुहल्ले में रौनक छायी हुई है आज सभी मुहल्ले वासियों का भोजन तिवारीजी के घर पर ही जो है। बच्ची का नाम संचयिता रखा गया है।

 संचयिता पूरे परिवार की लाड़ली थी। एक तो घर की सबसे छोटी और दूसरा काफी लंबे अंतराल के बाद एक नन्ही परी का पदार्पण।हर कोई उसको खिलाने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते, मगर जब वह तिवारीजी की गोद से हटे तो न। तिवारीजी सुबह-शाम उसको अपने साथ ही खिलाते, नहलाते-धुलाते, उसकी नेपी बदलते यहाँ तक कि वह अपनी माँ के पास भी केवल दूध पीने तक जाती।

 समय के साथ-साथ संचयिता भी बड़ी होने लगी थी।उसकी नन्ही-नन्ही किलकारियाँ अब पूरे घर में गूंजने लगी थी। अब वह अपने नन्हे-नन्हे पाँवों से चलती तो उसकी पायल की छम छम की आवाज से पूरा घर आनन्दित होता। तिवारीजी तो संचयिता के पीछे-पीछे ही दौड़ते रहते।

 संचयिता जब स्कूल जाने लगी तो उसको स्कूल से लाने-लेजाने की जिम्मेदारी तिवारीजी की होती,जिसे तिवारीजी बखूबी निभा रहे थे। संचयिता दादू के पास ही रहती। संचयिता अब बारहवीं की पढ़ाई की पढ़ाई कर रही थी, मगर अब भी तिवारी जी ही संचयिता को स्कूल ले जाते और स्कूल से वापस घर लाते। संचयिता की सखियाँ हालांकि संचयिता को तिवारी जी के द्वारा स्कूल लाने लेजाने पर मजाक भी बनातीं तो भी संचयिता को कोई फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता, वह अपने दोस्तों से कहती दादू तो मेरे बेस्ट फ्रेंड है और तिवारीजी भी उस पर हँस देते। बारहवी की पढ़ाई पूरी होने के बाद संचयिता शहर में डाँक्टरी की पढ़ाई करने के लिए चली गई।


* 3 *

आज फिर से तिवारीजी के घर में चहल पहल छायी हुई है संचयिता की शादी जो है। तिवारीजी सुबह से ही सपरिवार शादी की तैयारी में लगे हुए हैं। संचयिता के मम्मी-पापा अपनी बेटी को निहारते हुए सोच रहे हैं कब बिटिया छोटी से इतनी बड़ी हो गयी कि आज इसको विदा करने का समय भी आ गया है।ये सोच-सोचकर वो भावुक हुए जा रहे हैं।

 तिवारीजी ने पूरे घर की व्यवस्था अपने हाथों में ले रखी है। हर छोटी-बड़ी बातों का ध्यान रखे हुए हैं तिवारीजी सजावट से लेकर भोजन तक की व्यवस्था हो या फिर मेहमानों की आवाभगत की व्यवस्था हो। तिवारीजी एक पाँव पर खड़े होकर सारी व्यवस्थाओं को बखूबी निभा रहे हैं।

 शाम का समय है बारात दरवाजे पर आकर खड़ी है। तिवारीजी अपने ईष्ट-मित्रों के साथ बारात का स्वागत कर रहे हैं। भोजन पानी से निवृत हो बाराती रात्रि विश्राम के लिए जनवासे की ओर प्रस्थान कर चुके हैं।
 
सुबह-सुबह ही संचयिता अपने पति के साथ तिवारी जी का घर छोड़ ससुराल चली गयी।


* 4 *

 संचयिता अपने ससुराल से मायके आई थी। उसको अपनी आगे की मेडिकल शिक्षा के लिए उसे अगले महीने अमेरिका जाना था, सपरिवार। इसलिए कुछ दिनों के लिए वह अपने मायके आई हुई थी। 

 कुछ दिन अपने मायके में गुजारने के पश्चात जब वह मायके से ससुराल लौट रही थी। उसको ससुराल तक छोड़ने उसके मम्मी पापा कार से चले गये।

 तिवारीजी बाहर दालान में बैठकर अखबार के पन्नों को उलट-पलट रहे थे। तभी टेलिफोन की आवाज सुनकर तिवारीजी अंदर गये, टेलिफोन के संदेश ने तिवारीजी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। फोन पुलिस स्टेशन से था - संचयिता के माता-पिता की कार, रास्ते में, घर वापसी के समय दुर्घटनाग्रस्त हो गयी, जिसमें दोनों की ही मृत्यु हो गयी थी। जिस भतीजे को तिवारीजी ने कभी अपने हाथों से पाला था, उसकी गृहस्थी सजायी थी, उसी भतीजे व उसकी बहू का अंतिम संस्कार अपने ही हाथों से करना पड़ा, इससे ज्यादा पीड़ादायक स्थिति तिवारीजी के लिए और क्या होती?


* 5 *

अमेरिका में संचयिता अपने पति व बच्चों के साथ भारत आने की तैयारी कर रही है। आँफिस से घर के आने के बाद वो हर शाम, अपने पति संजीव व दो प्यारे बच्चों, संजना और संचित के साथ खरीददारी करने निकल जाती और बाजार से खुब खरीददारी कर घर लौटती।

असल में संचयिता का पति भी डॉक्टर है और दोनों एक ही अस्पताल मे साथ-साथ काम करते हैं। संजना, संचयिता की बड़ी बिटिया है जो बारहवीं में पढ़ रही है व बेटा संचित छठी कक्षा में पढ़ रहा है। दिसम्बर में ये सभी लोग तीन महीने के लिये भारत आ रहे हैं करीब दस साल बाद।

 करीब रात के दस बजे संचयिता अपने पति व बच्चों के साथ सामान लगाने में व्यस्त हैं। तिवारीजी के लिए लिया हुआ नया कोट सामान में रखते समय संचयिता अतीत के पथ पर सुनहरी यादों के साथ सैर पर निकल जाती है।
अचानक अपने कंधे पर हाथ के स्पर्श से वह चौंक जाती है। तभी संजीव बोल उठते हैं,"क्या हुआ संचयिता "?,"दादू की याद आ रही है ?," हम जल्द ही जाने वाले हैं न भारत,दादू से मिलने,फिर तुम ढेर सारी बातें करना दादू से"। संचयिता आँखों से ढुलकते आँसुओं को पोछते हुए मुस्कुराकर फिर से समान लगाना शुरू कर देती है। संचयिता के बच्चे भी वहीँ कमरे में बैठकर संचयिता व संजीव के बीच की बातें सुन रहे होते हैं। संजना कहती है, "माँ! आप व बाबूजी हमें दादू के बारे में बातचीत करते रहते हैं। आप लोगो की बातों से लगता भी है कि दादू बहुत ही अच्छे हैं। माँ हम दादू के बारे में और भी बहुत कुछ जानना चाहते हैं उनके बारे में हमें विस्तार से बताईये न"।
 बच्चों को दादू के बारे में बताते हुए संचयिता वापस अतीत के पथ पर चली जाती है।


* 6 *

लाहौर की एक गली में तिवारीजी के पिताजी अपने मित्रों के साथ गपशप में व्यस्त हैं तभी तिवारी जी के जन्म की खुशखबरी उनको प्राप्त होती हैं। खबर सुनकर खुश होते वे घर की ओर को चल दिये।
 
सन उन्नीस सौ चालीस चल रहा है स्वतंत्रता की लड़ाई में लोग जोर-शोर से जुटे हैं। हर ओर स्वतंत्रता आन्दोलन की बयार बह रही है। हर कोई देश की स्वतंत्रता के लिए अपना तन मन और धन न्योछावर करने के लिए आतुर है। जगह-जगह धरना-प्रदर्शन चल रहे हैं। लोग एक सुर में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा रहे हैं तिवारीजी के पिताजी भी स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़चढ़ कर लगे हुए हैं कि बार जेल गये, कितनी बार लाठियाँ खाई और न जाने कितनी यातनाऐं जेल में रह कर सहे। अंततः उनकी मेहनत रंग लायी।

देखते-देखते देश स्वतंत्र भी हो गया, परन्तु साथ ही साथ देश का विभाजन भी। तिवारीजी के पिताजी सपरिवार लाहौर छोड़ भारत वापस आ रहे थे, तभी दंगाइयों की भीड़ ने पूरे परिवार को घेर लिया। परिवार को बचाते-बचाते तिवारीजी के पिताजी भीड़ का शिकार हो गये। तिवारीजी की माताजी अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते-करते परिवार को भारत ला रही थी कि तभी वो, तिवारीजी के एक भाई व एक बहन भी दंगे की भेंट चढ़ गये।  तिवारीजी अब सिर्फ तीन भाई व दो बहनें ही रह गये थे। सात साल के तिवारीजी अपने बचे हुए भाई-बहनों के साथ अनाथ हो गये, मगर तिवारीजी ने हार मानने के बजाय संघर्ष करना उचित समझा और अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल का दायित्व अपने छोटे से कंधे में ले लिया। शुरू-शुरू में तो तिवारीजी ने छोटी सी नौकरी करनी शुरू कर दी, मगर धीरे-धीरे उन्होंने अपना स्वयं का कारोबार शुरू कर दिया। तिवारीजी ने अपनी मेहनत से अपने कारोबार को आगे बढ़ाया।

 तिवारीजी के बाद के भाई - जो संचयिता के पिताजी हुए - का अपना कारोबार था व छोटे वाले सरकारी कार्यालय में अच्छे ओहदे पर कार्यरत थे।

 तिवारीजी की बहनें जो स्वयं भी एक सरकारी संस्थान में अच्छे पद पर कार्यरत थे व उनके पति भी। 
सभी तिवारीजी का आदर दिल से करते थे क्योँकि तिवारीजी ने उनके लिए अपना सब कुछ त्याग जो दिया था। तिवारीजी स्वयं न तो शिक्षा ले पाये, न ही बचपन जी पाये, जवानी भाई-बहनों के पालन पोषण में झोंक दी और बुढ़ापा भी अकेला ही गुजर रहा है। सभी भाई-बहनों की गृहस्थी सजायी पर स्वयं अविवाहित ही रहें,और आज भी अपने भाई-बहनों के बाद उनके बच्चों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन बड़ी ही तन्मयता से कर रहे हैं। जिनमें से एक मैं भी हूँ,संचयिता बोल पड़ी।
 
"जब इतना भरा- पूरा परिवार है तो फिर दादू आज अकेले इतनी बड़ी हवेली में क्यों रहते हैं माँ। जबकि आप बता रही हैं कि दादू को सभी भाई-बहन व उनके बच्चे सम्मान देते हैं" अचानक रुँआसी सी संजना बोल पड़ी।
 संचयिता की आँखों में आँसुओं की धारा बह चली शायद वह अपनी भावनाओं को रोक ना सकी। सुबकते हुए संचयिता बोली, "आज दादू का हम लोगों के सिवाय और कोई नहीं है। दादू को भोर के तारे की तरह एक-एक कर सब छोड़ कर चले गये। न जाने दादू के सीने में कितने जख्म छिपे हैं "।

 सभी की आँखे नम थी बस संचयिता फिर अतीत के पथ पर चल रही थी शब्दों व स्मृतियों के द्वारा।

 तिवारी जी ने सभी भाई बहनों की गृहस्थी जमा दी थी,अब वो सब अपने-अपने कारोबार में व्यस्त थे। एक दिन एक खबर ने तिवारीजी को झंकझोर दिया जब एक सड़क हादसे में तिवारीजी की छोटी बहन का निधन सपरिवार हो गया था। तिवारीजी अभी उस सदमे से उभर ही पाते कि साल भर के अंदर दूसरी बहन का निधन गंभीर बीमारी से होगया।बहन की मृत्यु के बाद बहन के पति व बच्चों ने तिवारीजी से दूरी सी बना ली थी।

 तिवारीजी अब उम्र से कहीँ ज्यादा ही नजर आने लगे थे गमों ने उनकों अंदर तक झकझोर कर जो रख दिया था।
 तिवारीजी के दोनों भाई उनकी पूरी देखभाल करते थे व उनका पूरा ध्यान रखते तिवारीजी के मँझले भाई की कोई संतान नहीं थी। उनका अपना कारोबार था।

 सन उन्नीस सौ चौरासी में एक-दो दिसंबर को शहर में दंगे हो गये सिखों के साथ जगह-जगह मार पीट होने लगी उनकी दुकानें जलाई जाने लगी। तभी तिवारीजी के मँझले भाई की जहाँ दुकान थी उनके ऊपर एक सिख परिवार भी रहता था तिवारीजी के मँझले भाई जब उनकी सुरक्षा के लिये ऊपर मकान में गये तो उस सिख परिवार ने तिवारीजी के मँझले भाई को खौलती हुई तेल की कड़ाही में जिन्दा फेंक दिया और वे उस कड़ाही में तब तक तड़पते रहे, जब तक कि उनके प्राण-पखेरू न उड़ गये। इस तरह से तिवारीजी के मँझले भाई का अंतिम संस्कार भी तिवारीजी ने अपने हाथों से करा। इस सदमे से मँझले भाई की पत्नी का निधन भी हृदयाघात से हो गया। इस तरह दादू के साथ अब मम्मी, पापा और मैं ही रह गयी थी। क्योंकि हमारे दादाजी यानी की तिवारीजी के छोटे भाई व दादी यानी कि दादू की बहू भी गंभीर बीमारी से ग्रसित होकर काल के ग्रास बन गये थे और फिर एक दिन मुझको छोड़ कर जब मम्मी पापा घर को लौट रहे थे तो रास्ते में उनकी कार बस से टकरा कर नीचे गहराई में गिर गयी वो भी दादू को राम भरोसे छोड़ कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। हम लोग सपरिवार अमेरिका आ गये, इस तरह दादू अकेले रह गये वहाँ भारत में। 

 संचयिता व उसका परिवार दादू की दुःखमय कहानी से द्रवित हो गया था। तिवारीजी के लिए उनके मन में सम्मान का भाव और अधिक बढ़ जो गया था। कैसे महान व्यक्तित्वम् के स्वामी हुए तिवारीजी, जो आज के समय में बहुत ही दुर्लभ हैं। और ये उन सब का सौभाग्य कि ऐसी महान विभूति उनके ज्येष्ठ जो थे।अब सबको प्रतीक्षा थी कि कब वो समय आये जब वो भारत जाएँ और उस महान विभूति के दर्शन कर उनकी चरण-रज से अपने मस्तिष्क का तिलक करें।

 कहते है न कि प्रतीक्षा का फल भी मीठा होता है। अंततोगत्वा वह समय भी निकट ही आ गया जब संचयिता समेत सपरिवार भारत आने के लिए विमान में बैठ चुके थे।


* 7 *

इधर भारत में तिवारीजी के दिन भी काटे नहीं कट रहे थे। जब तक समय दूर था तब तक तो उनको आने की प्रतीक्षाभर थी पर जैसे-जैसे समय नजदीक आने लगा था उनका धैर्य भी जवाब दिये जा रहा था। एक-एक दिन उन्हें सदियों समान लग रहे थे और एक-एक पल उन्हें वर्षों के समान लग रहे थे। तिवारीजी हर रोज सुबह उठते और तारीख देखते और स्वयं से ही बुदबुदाने लगते, "यह समय भी कम्बख्त बीतता ही नही"। मगर समय तो अपनी गति के अनुसार ही चलेगा। जबसे संचयिता ने उन्हें भारत आने की सूचना दी थी, तबसे तिवारीजी एक-एक दिन और एक-एक पल बच्चों के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तिवारी जी अपने सामर्थ्य के अनुसार बच्चों के स्वागत की तैयारी में लगे हुऐ थे। तिवारी जी की आँखों मे बच्चों के आगमन की सूचना मात्र से ही अलग सी चमक नजर आ रही थी। काफी समय के बाद फिर से एक बार हवेली चहकने वाली जो थी। अभी तक तो तिवारी जी के पदचाप या सांसों की ध्वनि ही हवेली में सुनाई देती हैं। चलों अब एक बार फिर से बच्चों के कोलाहल से हवेली फिर चहकेगी। 
तिवारी जी का समय अब बच्चों के आने की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो रहा था। अंततः बच्चों के आने की तिथि भी नजदीक आ पहुँची थी।

 कल सुबह ही संचयिता का परिवार अमेरिका से निकल चुका था। आज करीब सुबह आठ बजे विमान भारत में दिल्ली इंदिरा गाँधी एयरपोर्ट में उतर जायेगा और करीब शाम के तीन बजे तक संचयिता, सपरिवार तिवारीजी के पास होगी। 

 इधर तिवारी जी सुबह से ही संचयिता का परिवार सहित स्वागत की तैयारी में लगे हुए हैं। तिवारी जी रातभर सोए ही कहाँ हैं। पूरी रात तो उन्होंने करवटें बदल-बदल कर जो गुजारी है। सुबह होते ही तिवारी जी नहा-धोकर पूजा-पाठ से निवृत हो तैयार होकर बाजार को निकल गये,कुछ आवश्यकीय खरीददारी करने को। उनकी निगाहें रह-रहकर घड़ी की सुईयों की तरफ जा रहा है। जो है कि कम्बख्त खिसकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। तिवारीजी भी घड़ी को देखकर झुँझलाने लगे हैं। पर समय है कि शनैः-शनेः आगे को बढ़ रहा है। ज्यों-ज्यों समय आगे को बढ़ रहा है तिवारीजी की व्यग्रता भी तेजी से बढ़ती जा रही है। आज तिवारी जी का मन बच्चों की तरह उतावला हुआ जा रहा है। तिवारीजी बाजार का लगभग सारा काम निपटा चुके हैं। अब वो अपने हाथों से भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यंजन बना रहे हैं और इस काम में उनके पड़ोसी तिवारी जी की सहायता कर रहे हैं। उनको भी संचयिता के आने की प्रतीक्षा जो हो रही है। 

 दोपहर के करीब दो बजे रहे हैं। तिवारीजी आगे का समय काटने के लिए थोड़ी देर टीवी लगा लेते हैं। टीवी पर समाचार आ रहे होते हैं। तिवारी जी समाचार सुनते हैं, सुबह से जो खबर सुनने को फुरसत नहीं मिली है। अभी टीवी में मुख्य समाचार आ रहे है। अभी-अभी समाचार प्राप्त हुआ है कि अमेरिका से आने वाला विमान जो सुबह आठ बजे दिल्ली में उतरने वाला था अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अभी तक यात्रियों के बारे में कोई खबर नहीं हैं। ये वही विमान था, जिसमें संचयिता अपने बच्चों सहित आ रही थी। तिवारी जी पर तो मानों बिजली सी गिर पड़ी हो,तिवारी जी के पड़ोसी बहुत अच्छे हैं। ये खबर सुनने के बाद वे भी दुःखी हो उठे थे। एक पड़ोसी ने आनन-फानन में टीवी पर चल रहे पूछताछ के लिये नम्बरों में से एक नम्बर पर फोन कर संचयिता व उनकी परिवार के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि विमान में स्थित कोई भी यात्री जीवित नहीं बचा। सब के सब विमान हादसे के शिकार हो गये। तिवारीजी की तो मानो सारी खुशियाँ इस उम्र तक आते-आते खत्म सी हो गयी थी।
 दूसरे दिन तिवारीजी के लेंडलाईन नम्बर पर एक फोन आया,तिवारी ने फोन उठाते हुए कहा,”हैलो!”
सामने से फोन में दूसरी ओर से आवाज आई, ”मैं इण्डियन एयरलाइंस से बोल रही हूँ। मुझे ये बताते हुए बहुत अफसोस हो रहा है कि आपके परिजन विमान हादसे के शिकार हो गये हैं। अतः महोदय आपको उनकी पहचान करने के लिए दिल्ली में इंदिरा गाँधी एयरपोर्ट में आना होगा।“ यह कहकर फोन कट गया
 दूसरे दिन तिवारी जी अपने एक पड़ोसी के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गये।


* 8 *

दिल्ली पहुँचते ही तिवारी जी और उनके साथ आए पड़ोसी, तिवारी जी को लेकर सबसे पहले अपने एक परिचित मोहन जोशी के घर गये जो बड़े ही शालीन थे। उनको तिवारी जी के साथ हुए हादसे की जानकारी उनके पड़ोसी द्वारा पहले से ही हो गयी थी। उन्होंने तिवारीजी व उनके पड़ोसी रामदत्त पाण्डेजी को पहले आराम करने को कहा, फिर उन्होंने अपने एक परिचित को फोन पर पूरी वार्ता विस्तार से कर उनसे मिलने का समय माँगा। इसके बाद उन्होंने तिवारीजी और रामदत्त जी को थोड़ा-बहुत चाय नाश्ता करवाया हालांकि तिवारी जी ने तो चाय-नाश्ता करने से इनकार कर दिया, क्योंकि इस समय उनकी मनःस्थिति ऐसी थी कि उनसे चाय-नाश्ते को कहना कठिन था पर जोशीजी ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए तिवारी जी को चाय-नाश्ता करवा ही दिया। 

 तिवारीजी, रामदत्तजी और जोशीजी तीनों ही जोशीजी के परिचित से मिलने चल दिये, जो एयरपोर्ट में अधिकारी हैं। तीनों उन अधिकारी के कार्यालय में पहुँच गए। वो महोदय जोशीजी के ही प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने तीनों को पहले बैठाया। फिर अपने एक अधीनस्थ को बुलवाकर तिवारी जी को उस स्थान में ले गये जहाँ उनकों अपने परिजनों के शवों की शिनाख्त करनी थी,तिवारी जी ने संचयिता, उसके पति व बच्चों की शिनाख्त कर ली थी। उन अधिकारी महोदय ने सारी सरकारी औपचारिकताओं को पूर्ण करने के बाद, संचयिता सहित उसके पूरे परिवार के शवों को तिवारी जी के सुपुर्द कर दिया। तिवारी जी की इच्छा के अनुसार शवों का अंतिम संस्कार दिल्ली में ही कर दिया गया। इसके बाद तिवारी जी व रामदत्त जी रात की गाड़ी से दिल्ली से घर लौट आए।


* 9 *

रात ढल रही थी, सुबह होने को थी सभी तारे एक-एक कर आसमान से विलुप्त होने लगे थे। अरुणोदय होने को तैयार था, केवल एक तारा आसमान में चमक रहा था, वो था भोर का तारा। तिवारी जी उस भोर के तारे को एकटक देखते हुए रामदत्त जी से बोले,”पाण्डे जी इस भोर के तारे को देख रहे हैं आप?" रामदत्त जी कभी तिवारी जी को कभी भोर के तारे को देख रहे थे। तिवारी जी थे कि बोलते ही जा रहे थे,”पाण्डे जी आज मेरी दशा भी इस भोर के तारे की तरह हो गयी है एक-एक कर सब मुझे ऐसे छोड़ कर चले गये जैसे इस भोर के तारे को इसके अपनें। देखो पाण्डे जी अरुणोदय हो गया। लगता है कि अब इस भोर के तारे का समय भी पूरा हो गया।अब ये भी आसमान से विलुप्त जो होने जा रहा है"। 

“पाण्डे जी आपकी सहायता के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।“

 पाण्डे जी भोर के तारे को एकटक देख रहे थे। भोर का तारा भी धीरे-धीरे आसमान से विलुप्त होने जा रहा था। पाण्डे जी, तिवारी जी के साथ अपने घर पहुँच गये थे। पाण्डे जी ने कहा, ”तिवारीजी चलिये घर आ गया”। पर तिवारी जी शान्त थे। पाण्डे जी ने जैसे ही उन्हें हाथ से हिलाया, तिवारी जी एक तरफ को ढुलक गये, और उधर भोर का तारा भी आसमान से विलुप्त हो गया। सूरज पूर्व दिशा से उदय हो रहा था।


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