विज्ञापन की दुनिया और हिंदी

आस्था दीपाली

तृतीय वर्ष बी.ए हिंदी (प्रतिष्ठा), लेडी श्री राम कॉलेज फ़ॉर विमन
ईमेल-aasthadeepali909@gmail.com
दूरभाष +91 805 161 4565


आज के युग को अगर विज्ञापन का युग कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी। आज विज्ञापन सर्वव्यापी अवधारणा के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। व्यक्ति का जन्म से लेकर मृत्यु तक विज्ञापन से निरंतर सरोकार रहता है. खाने-पीने, रहन-सहन, पहनने-ओढने, घर-द्वार से लेकर धर्म, राजनीति आदि समाज के हर क्षेत्र में विज्ञापन ने अपना  स्थान बना लिया है। शिक्षा के प्रचार व औद्योगिकीकरण के प्रभाव के कारण आज व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह गया है।  उसकी प्रत्येक गतिविधि का  निर्णय अब विज्ञापन करने लगा है। जैसे आप क्या खायेंगे, कैसे घर में रहेंगे, क्या पढ़ेंगे, कहाँ नौकरी करेंगे, किससे विवाह करेंगे आदि इन सबका निर्णय करने में विज्ञापन की अहम भूमिका है। 
विज्ञापन अब न केवल सूचना एवं संचार का एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आया है, बल्कि उसने मानवीय गतिविधि के हर क्षेत्र में जन-मानस को गहराई से प्रभावित भी किया है। विज्ञापन हमारे सामाजिक, आर्थिक एवं व्यक्तिगत जीवन से इतनी घनिष्ठता से जुड़ गए है कि बिना विज्ञापन जीवन अधूरा-सा लगने लगता है। आज व्यक्ति सुबह से रात्रि तक अपने को विज्ञापनों से घिरा महसूस करता है, जैसे-
                                           "ठंडा मतलब कोका कोला"
                                          "दो बूंद ज़िन्दगी की-पोलियो"

विज्ञापन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक प्रगति व विकास का आईना बन रहे हैं। इस प्रकार विज्ञापन सार्थक सूचनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रभावी उपकरण है। विज्ञापन उपभोक्ता का ध्यान किसी वस्तु, विचार या सेवा की ओर आकर्षण करने का कार्य करता है। लेकिन विज्ञापन का स्वरूप व्यक्ति या परिस्तिथि के अनुसार बदलता भी रहता है। एक गृहिणी के लिए विज्ञापन उसकी पारिवारिक खरीददारी के बारे में सूचना देने का माध्यम है, एक निर्माता या खुदरा व्यापारी के लिए विज्ञापन हज़ारों-लाखों ग्राहकों से एक साथ बातचीत करने का एक साधन है। एक समाज-सेवी संस्था के लिए विज्ञापन एक विचार को प्रोत्साहित करने का माध्यम है तो सरकार के लिए विज्ञापन उसके नीति-नियमों को सामान्य-जन तक पहुँचाने का माध्यम है। इसी कारण विज्ञापन की परिभाषा में भेद दिखाई देता है। 

विज्ञापन की परिभाषा

          विज्ञापन शब्द 'ज्ञापन' जिसका अर्थ है सूचना या जानकारी देना के पूर्व 'वि' उपसर्ग जोड़ना बना है जिसका अर्थ है किसी वस्तु की विशेष जानकारी देना। विज्ञापन अंग्रेज़ी के एडवरटाइजिंग शब्द का हिंदी रूपांतर है जो लैटिन भाषा के 'एडवर्टर' से गृहीत है जिसका अर्थ है 'टु-टर्न-टु' यानी किसी ओर मुड़ना अर्थात किसी के प्रति या किसी वस्तु की ओर आकर्षित होना या करना। विज्ञान के सार्वभौतिक प्रभाव के परिणामस्वरूप हम यह तो जानते हैं कि विज्ञापन उत्पादकों द्वारा तैयार उत्पादों की जानकारी ग्राहकों या उपभोक्ताओं तक पहुँचा कर उन्हें सही वस्तु खरीदने में मदद करता है किन्तु उंसी समुचित परिभाषा प्रस्तुत करना इतना सरल कार्य नहीं है फिर भी इसे समझना आवश्यक है। हिंदी शब्द सागर में विज्ञापन को स्पष्ट करते हुए लिखा है- "जिसके द्वारा कोई बात लोगों को बतलाई जाती है वह सूचना/पत्र/इश्तेहार/बिक्री आदि के माल या किसी बात की सूचना जो सब लोगों को विशेषतः सामयिक पत्रों के द्वारा दी जाती है। "
  द लंदन इंस्टिट्यूट ऑफ प्रैक्टिशनर्स ऑफ एडवरटाइजिंग के अनुसार "विज्ञापन को किसी उत्पाद विचार तथा सेवा के विक्रय का सर्वाधिक उत्प्रेरक संदेश माना है, जो काम से काम खर्च में उपभोक्ताओं तक अपना संदेश पहुँचाता है। "
  राष्ट्रीय विज्ञापनदाता एवं प्रकाशन सूचना संघ के अनुसार-
"विज्ञापनों को उत्पाद या सेवा को बिक्री के रूप में परिभाषित किया है। "

विज्ञापन की पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक काल में चित्रो द्वारा, चिन्हों द्वारा, डुग-डुगी बजाकर मानव अपने विचारों की अभिव्यक्ति करता था जो उस समय के अनुसार किसी न किसी रूप में 'विज्ञापन कला' का ही स्वरूप थे। वैश्विक दृष्टि पर विज्ञापनों का एक इतिहास है लेकिन भारतीय विज्ञापन का इतिहास उससे भी अधिक पुराना है जो हमारे लिए गर्व की बात है। विज्ञापन की परिकल्पना और उद्भव का श्रेय प्राचीन भारत को दिया जाता है। आज से डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व माना जाता है कि संसार का पहला विज्ञापन भारत में रचा गया। यह विज्ञापन भारतीय बुनकर व्यापारी संघ द्वारा प्राचीन गुप्तकालीन दशपुर में मध्य प्रदेश के एक सूर्य मंदिर की दीवारों में लगवाया गया था। वह विज्ञापन काव्यबद्ध रूप में इस प्रकार था:-
                           "तास्क्य कांयु पचितोSपि सुवर्ण हार
                           ताम्बूल पुष्प विविध्ना समल क्रो पि। 
                           नारी जान प्रिय मुपैति न तावदेस्या
                           यावन्न पट्टमय वस्त्र युगानि निधत्ते। । 
            
सन् 1622 में दो अंग्रेज़, निकोल्स खो और थॉमस आरखर ने पहली समाचार पत्रिका 'द वीकली न्यूज़' प्रकाशित की, इसमे कुछ विज्ञापन छपे। युरोपीयन इतिहासकार फ्रैंक प्रेस्बे के अनुसार 1625 में 'मर्क्युरिक्स ब्रिटिनिस्ट' में पहला विज्ञापन छपा। भारत में पहला साप्ताहिक समाचार पत्र 1780 में कलकत्ता में जेम्स हिकी द्वारा 'बंगाल गज़ट' के नाम से प्रकशित किया गया। इसने अपने पहले ही अंक में विज्ञापन प्रकाशित किये। 
विज्ञापन कला आज जिस विकसित रूप में दिखाई पड़ती है इसका आरम्भ छपाई के अविष्कार के साथ माना जा सकता है । अतः मुद्रण कला को विज्ञापन के विकास के आधार माना जा सकता है क्योंकि मुद्रण कला के विकास के बाद पत्र-पत्रिकाओं, पोस्टरों आदि के माध्यम से विज्ञापन आगे बढ़ा है। 
विज्ञापन अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। मूलतः यह अर्थव्यवस्था की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है किन्तु सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों से भी इसका गहरा संबंध है। 
विज्ञापन समाज में आर्थिक प्रक्रिया का अकाट्य अंग बन गया है। वह उपभोक्ता से उत्पाद को जोड़े रहता है। समय के साथ-साथ कई बदलाव आये। एक ही वस्तु या उत्पाद अलग अलग कंपनियाँ बनाने लगी। अब इस बात की ज़रूरत होने लगी और औरों की तुलना में अपने उत्पाद को कैसे बेहतर साबित किया जाए। विज्ञापन में तुलनात्मक की आवाज़ आने लगी-'सबसे बेहतर-सबसे उत्तम'। अब विज्ञापन की प्रक्रिया सूचना की बजाए बिक्री बढ़ाने की ओर मुड़ने लगी तथा विज्ञापन एक कुशल सेल्समैन की तरह उपभोक्ताओं को रिझाने लगा। जैसे जैसे ब्रांड की अवधारणा मज़बूत होने लगी वैसे ही विज्ञापन की ज़िम्मेदारी बढ़ने लगी की वह ब्रांड की अलग पहचान बनाये जैसे-
"अपनी शान, पड़ोसी की जले जान"के सुनते ही आप पहचान जाएंगे की यह ओनिडा की आवाज़ है। 
"ये प्यास बड़ी"-पेप्सी
"ममता का नया नाम"-जॉन्सन्स बेबी पॉउडर
"पूर्ण पुरुष की पहचान"-रेमंडस

अतः अब अपनी विश्वनीयता बनाये रखने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियों ने फिल्मी सितारे, क्रिकेटर, आदि को टेलीविज़न सिनेमा और मोबाइल के अपने उत्पाद के प्रचार के लिए उतारा। विज्ञापन में कई तरह की शैलियों और चित्रों का प्रयोग किया जाने लगा। चित्रकथा के साथ संवादशैली का उदाहरण स्वदेशी कॉटन मिल्स कंपनी के विज्ञापन में देखा जा सकता है। 
इस तरह आजादी के बाद विज्ञापन उद्योग को महत्वपूर्ण समझ कर सरकारी स्तर पर उसके लिए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अन्तगर्त 'विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय' नाम से एक अलग विभाग खोल दिया। इस विभाग के माध्यम से सरकारी पक्षों, योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी लोगों तक पहुँचाई जाती है। 
वर्तमान समय में विज्ञापन के अनेक रूप हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं। विज्ञापन के इन प्रकारों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है। 
● अनुनय विज्ञापन
● सूचनाप्रद विज्ञापन
● सांस्थानिक विज्ञापन
● औधोगिक विज्ञापन
● वित्तीय विज्ञापन
● वर्गीकृत विज्ञापन
● अन्य विज्ञापन

विज्ञापन और भाषा

विज्ञापन का स्वरूप व्यावसायिक और रचनात्मक दोनों ही है। व्यावसायिक उद्देश्यों को वहन करते हुए भी अपनी संरचना और प्रस्तुति में विज्ञापन सृजनात्मक माध्यम है। उसका संबंध लोगों के सपनों, आशाओं, रूचियों और आवश्यकताओं से है। इसलिए विज्ञापन की संरचना के लिए विशिष्ट रचनात्मक प्रतिभा चाहिए जो भाव और भाषा की क्षमताओं को संचार तकनीक से प्रभावशाली ढंग से जोड़ सके । विज्ञापन और भाषा का दिलचस्प रिश्ता है। उसकी भाषा में ऐसा लचीलापन है कि गतिशीलता और संभावना की अनचीन्ही परते दिखाई पड़ती है। विज्ञापन-भाषा अपने निश्चित सीमांतों को तोड़कर नित नए मुहावरों में ढलती है जैसे कवि अपनी कविता में शब्द की अनेक अर्थ-व्यंजनाएँ निर्मित करता है वैसे ही विज्ञापन भी अपने मूल संदेश को सपनों का जामा पहनाकर शब्दों की गलियों से हम तक पहुँचता है। यह भाषा केवल शब्दों की अर्थ-क्रिया से ही नहीं बँधी, यह मीडिया की विशिष्ट प्रकृति से भी जुड़ी है। विज्ञापन कभी मनोरंजन शैली में होता है तो कभी काव्यात्मक। वह कभी सुझाव देता है तो कभी चेतावनी। विज्ञापन की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो उपभोक्ता की ज़ुबान पे चढ़ जाए और जिसका विश्लेषण वह कर सके। उत्पाद का जिस तरह का भाव उपभोक्ता को दिखाना होता है भाषा उसी ढंग की रची जाती है। जैसे:-
●आत्मविश्वास-  जब चाहे नया दमकता चेहरा पाएं
●विश्वसनीयता-  ज़िन्दगी के साथ भी ज़िन्दगी के बाद भी
●काव्यात्मकता-  संडे हो या मंडे रोज़ खाये अंडे
●सुझाव-  गर्मी की थकान मिटाता है - रुह आफ़ज़ा
●तुलनात्मक-  इसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद क्यों?
●विशेषण-  भीनी -भीनी सुगंधयुक्त आलीशान धुलाई
●विशेषणों की आवृति-  अनोखा प्रिंट, अनोखे रंग, अनोखे डिज़ाइन
●अलंकार-  क्रीम -सी कोमल
●चेतावनी-  ध्यान से , क्योंकि आपका जीवन अनमोल है

विज्ञापन की भाषा और हिंदी 

वैज्ञानिक दृष्टि से देश मे विज्ञापन 1900 ई. शताब्दी से शुरू हुआ। इस सदी तक खड़ी बोली हिंदी अपने स्थापित होने के लिए संघर्षित थी। उसके अनेक शब्दों, रूपों में ब्रज छाई हुई थी। व्याकरण की दृष्टि से भी अभी हिंदी अनगढ़ थी। उसे एकरूपता, शुद्धता एवं व्यवस्था प्रदान करने का कार्य आरंभ ही हुआ था। 1875 ई. के 'भारत मित्र' में प्रकाशित एक विज्ञापन से तत्कालीन विज्ञापन का स्वरूप उभर के सामने आ जायेगा..

"पुराने बुखार की दवाई बहोत बढ़िया, बुखार वाले के बिगर खिलाये मालूम नहीं होगा, बहोत जल्दी निरोग होगा। "व्याकरणिक व्यवस्था का भी इसमें ध्यान नही दिया गया। इसका एक महत्त्वपूर्ण दोष इसका संक्षिप्त न होना भी है। 
जैसा कि हम जानते है, विज्ञापन का क्षेत्र पूरी तरह से व्यावसायिक है। उसका कार्य तथा उपयोगिता व्यवसायिक लाभ से ही संबन्धित है। इसकी भाषा व्यवसायिक पुट लिये रहती है। इसमें उत्पाद ऐसी भाषा को प्रस्तुत करता है जो उपभोक्ता सहज आकर्षित कर सके और उसके उत्पाद को खरीदने के लिए उपभोक्ता को बाध्य कर दे। उपभोक्ता की सामाजिक पृष्ठभूमि को सामने रखकर ही विज्ञापन की भाषा निर्मित होती है। उदाहरण के लिए डिग्जाम शूटिंग शर्टिंग के उत्पाद की भाषा अंग्रेजी है क्योंकि यह उत्पाद आम जनजीवन की पहुंच से बाहर है। दूसरी तरफ एक बहुराष्ट्रीय शीतल पेय कंपनी का विज्ञापन 'यही है राइट च्वायस बेबी' जिसमें हिंदी वाक्य में अंग्रेजी शब्द सहज आराम से खप गये। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन की भाषा अलग होती है। हिंदी भारत में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली तथा समझने वाली भाषा है। इस अर्थ में विज्ञापन के माध्यम के रूप में सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी भाषा है। विज्ञापन के विषय अथवा उत्पादित वस्तुओं के गुण तथा उसकी प्रस्तुति के आधार पर उसकी आन्तरिक एवं बाह्य आवश्यकताओं के अनुरुप भाषा की जरुरत होती है। आज हिन्दी विज्ञापन की आवश्यकता के अनुरूप नया रूप ग्रहण कर रही है। विज्ञापन के अनुसार हिन्दी भाषा में नित-नये प्रयोग हो रहे है। इससे भाषा का विकास हो रहा है और हिन्दी मात्र पुस्तकों की भाषा न होकर नए समय और समाज की जीवंत भाषा बनती जा रही है। 
                            प्रत्येक भाषा की अपनी भाषा संस्कृति होती है। उसकी शब्दावली, वाक्य रचना, मुहावरे आदि विशेष होते है। हिन्दी का भी अपना भाषा संस्कार है। विज्ञापन के वर्तमान रूप में पारंपारिकता के त्याग तथा आधुनिकता के स्वीकार की स्थिती देखी जा सकती है। उसमें केवल उत्पादक, उत्पादित वस्तु और उपभोक्ता ही नहीं आता, बल्कि जनसंचार के सभी माध्यम और यातायत के साधन भी आते हैं, ये सभी विज्ञापन के प्रसार में सहायक होते है। 
                हिन्दी के क्रियापदों के प्रयोग से विज्ञापनों में आधिक कह देने की क्षमता पैदा होती है। बिकाऊ है, जरुरत है, चाहते हो, आते हैं, जाते हैं, आइए जैसे शब्दों के प्रयोग से विज्ञापनों की अर्थवत्ता बढ़ती है। पत्र-पत्रिकाआें जैसे मुद्रित विज्ञापनों में प्रयोग की जानेवाली हिन्दी-शब्दावली माध्यम के परिवर्तन के साथ बदल जाती है। रेडियों में जहाँ ध्वन्यात्मक शब्दों का महत्व होता है वहीं टेलिविजन तथा सिनेमा में दृश्यात्मक क्रियापदों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि मुद्रित रूप में ठंढी के दिनों में त्वचा को मुलायम रखने के लिए ’बोरोलीन लगाइए' जैसा विज्ञापन छपता है तो रेडियो के लिए - 'ठंढी की खुश्की दूर करे बोरोलीन' जैसे शब्द प्रयोग किए जाएँगे, लेकिन दूरदर्शन और दृश्य-श्रव्य माध्यमों में दृश्यात्मक पदों जैसे ’देखा आपने? जाना आपने ?' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। 
                
◆ अलंकरण -
विज्ञापन की भाषा में अलंकरण की साथर्कता निर्विवाद है। अलंकार को कविता की व्याख्या में विश्लेषण कविता के रूप में अर्थ स्तरों को उजागर करता है। अलंकारों को केवल कविता तक सीमित रखना उनकी शक्ति को अनदेखा करना है। अलंकरण की प्रक्रिया को पद्य-गद्य दोनों ही जगह शब्द-अर्थ के प्रेरक के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। विज्ञापन में कुछ इनके प्रयोगों को समझने के लिए लोकप्रिय अलंकारों को समझना ज़रूरी है। अलंकारों के निम्न भाग है-

1.शब्दालंकार- शब्दालंकारों का उद्देश्य शब्दों में चमत्कार पैदा करना है। इसमें अनुप्रास, पुनरुक्ति और यमक अधिक लोकप्रिय है। 
●अनुप्रास-
अनुप्रास अलंकार में किसी वर्ण, शब्द या वाक्यांश की आवृति होती है। यह भाषा को श्रुति मधुर बनाता है। तभी तो इस वाक्य पर ज़ोर रहा है। 
   जैसे- "ये दिल मांगे मोर"

●पुनरुक्ति-
इसमें अपनी बात को दोहरा कर कहा जाता है। 
   जैसे- "खाये जाओ, खाये जाओ
            यूनाइटेड के गुण गए जाओ"
पुनरुक्ति से उत्पाद की निरंतरता के साथ उसकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता भी बढ़ती है। पुनरुक्ति भी विज्ञापन को यादगार बनाने में विशेष सहायक होती है। 
●यमक-
एक ही शब्द को जब एक से अधिक बार अलग-अलग अर्थ में प्रयोग किया जाए तक यमक होता है। यहाँ पर इंटरनेट बैंकिंग की अपील के लियर लाइन और ऑनलाइन के लाइन को अलग-अलग अर्थ में रखा गया है। 
     "सबको ख़बर दे, सबकी ख़बर ले"-जनसत्ता

2.अर्थालंकार-अर्थालंकार अर्थ-सौंदर्य की व्यंजना करते हैं। इसमें उपमा और रूपक विज्ञान कॉपी लेखकोंके अधिक प्रिय हैं। 
●उपमा- इन विज्ञापन में उत्पाद को अक्सर किसी अन्य उटाड, वस्तु या भाव के समान बताया जाता है या उससे उसकी तुलना की जाती है। जैसे-
    "आप भी पाइये रेशम-सी कोमल त्वचा" - विवेल सोप
●रूपक-
विज्ञापन में रूपक के प्रयोग से अभिव्यक्ति और सशक्त हो जाती है। यह अभेद की स्तिथि है। उत्पाद को किसी ओर के समान न कहकर दूसरे नाम से पुकारा जाता है जिससे उसकी विशेषताएँ अपने आप स्पष्ट हो जाती है। इस अलंकार में प्रस्तुत पर अप्रस्तुत का आरोप किया जाता है। जैसे-
      "मच्छरों का यमराज"-ऑल आउट
 अत्युक्ति एवं अतिश्योक्ति ऐसे अलंकार है जहाँ प्रस्तुति में अतिरंजना के द्वारा चमत्कार पैदा किया जाता है। यहाँ बता को इस प्रकार बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है कि वह कभी विश्वसनीयता की सीमा को भी पार कर जाता है। क्योंकि इस विज्ञापन की अवधारणा अतिशय कथन पर आधारित होती है। इन विज्ञापनो में जो दावे किये जाते हैं वे अतिरंजना पूर्ण होते है। (कपड़ो की धुलाई, खूबसूरती और गाड़ी की माइलेज आदि)
      "दर्द मिटाये चुटकी में" - हिमानी फ़ास्ट रिलीफ
●मानवीकरण-
विज्ञापन अमानवीय उत्पाद में मानवीय भावनाओं को पैदा करता है जब उसे मानवीय भंगिमाओं, एहसास और भावनाओं से उसके अचार-व्यवहार को जोड़ दिया जाए तो मानवीकरण का सौंदर्य उत्पन्न होता है। जैसे-
"क्या आपके बाल भी हँसते खिलखिलाते हैं?"-आयुर हर्बल शैम्पू



◆ तुकांतता-
तुकांतता एक तरह का अनुप्रास है इसे अंतयानुप्रास भी कहते है जब पंक्तियों के अंत में एक जैसी ध्वनि पैदा होती है तो उसे तुकांतता कहते हैं यह अंत की समध्वनि बार-बार एक गूंज की तरह मन में बजती रहती ही। तुकांतता का विज्ञापन-संदेश तथा स्लोगनों में विशेष महत्व है। तुकांतता पंक्तियों को स्मरणीय बनाते हुए उन्हें संगीत में भी ढालती है। इस तुक का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है कई बार केवल पहली व आखरी दो पंक्तियों में ही तुक मिलता दिखाई देता है। सारे विज्ञापन में सपाटबयानी ही दिखता है। जैसे-
"हल्दी के उबटन से तेरा शगुन
हल्दी में समाय है सारे ही गुण" - विको टर्मरिक

◆ समानांतरता-
समानांतरता विज्ञापन की भाषा का संबंध समध्वनि, अक्षर, शब्द या वाक्यांश की आवृत्ति से है जो इसकी भाषा को आकर्षक एवं प्रभावशाली बनाती है। यह तुक, अनुप्रास, पुनरावृत्ति के निकट होते हुए भी उनका प्रतिरूप नहीं है और यह भी आवश्यक नहीं कि जो ध्वनि के स्तर पर जो आवृत्ति हो वह अनुप्रास की भाँति साथ-साथ हो। इस प्रकार शब्दों की आवृत्ति को दो समान या दो विरोधी अर्थ संप्रेषित करने टुकड़ो को साथ रखकर की जाती है। जैसे-
   ●ध्वनि समानांतरता-
   "कैच का कोई मैच नहीं" - कैच मसाले
   ●आक्षरिक समानांतरता-
   "जगाइए बालों का नया रंग
   खूबसूरत कॉपर्स के संग" - गार्नियर
   ●शाब्दिक समानांतरता-
   "असली आंवला, डाबर आंवला" - डाबर आँवला
   ●वाक्यपरक समानांतरता-
   "साठ साल का जवान" - झंडू केसरी जीवन

 ◆ विचलन-
विचलन भी रचनात्मकआकर्षण का दूसरा अवयव है। विज्ञापन की भाषा कोई नियम नहीं लागु होता है उसके प्रयोग में आज़ादी ही आज़ादी रहती है। इस स्वतंत्र प्रयोग से उपभोक्ता का ध्यान उसकी ओर रहता है। विचलन भाषा भी समानांतरता के समान ध्वनि, शब्द एक वाक्य के स्तर पर हो सकती है। यह निम्न प्रकार की होती है-
●शब्द स्तरीय विचलन-
   शब्द स्तरीय विचलन अक्सर नए शब्दों के निर्माण में देखे जा सकते हैं। जैसे-
   "रिन की चमकार"
इसमें एक नया शब्द चमकार लिया गया है जो चमक और चमत्कार के बीच है इस शब्द से रिन की सफेदी पर अधिक ज़ोर देकर प्रतिष्ठित किया है। 
●ध्वनिपरक विचलन-
   जब भाषा के ध्वनि के परिवर्तन से अर्थ-चमत्कार उत्पन्न किया जाए। कभी ध्वनि के विचलन से अर्थ में बदलाव आये तथा कभी ध्वनि के विचलन से सौंदर्य पैदा हो। जैसे-
   "आह से आहा तक" - मूव क्रीम
 ●वाक्य स्तरीय विचलन-
   काफ़ी पदक्रम कभी संरचना की दृष्टि से वाक्यों को बदलकर उन्हें नए अर्थ-संदर्भ दिए जाते हैं। ऐसे में वाक्यगत भाषिक विचलन विज्ञापन की भाषा को अधिक चुस्त एवं चुटीला बनाता है। वैसे तो वाक्यों में एक-न-एक क्रिया का होना ज़रूरी है परंतु विज्ञापन की भाषा क्रिया का प्रयोग काम पाया जाता है। ज़्यादातर विज्ञापन स्लोगन वाक्यों में क्रिया नहीं पाई जाती है। जैसे-
   "शुद्ध सौम्य लक्स, फ़िल्मी सितारों का सौंदर्य साबुन" - लक्स साबुन

◆ मुहावरे और लोकोक्तियाँ-
मुहावरे और लोकोक्तियों के द्वारा विस्तृत अर्थ संदर्भो का संक्षेप में कह सकते हैं लोकभाषा के प्रयोग में लोकोक्तियों का अधिक प्रयोग होता है विज्ञापनों में मुहावरों का अधिक प्रयोग होता है विज्ञापन की भाषा में मुहावरों की अभिव्यक्ति खूब सुनाई देती है। जैसे-
"डर के आगे जीत है" - माउंटेन ड्यू

◆ भाषा संकर-
हिंदी विज्ञापन में शब्द चयन तथा वाक्य-संरचना दोनों दृष्टियों से अंग्रेज़ का बेझिझक प्रयोग हो रहा है। इनमे सिर्फ अंग्रेजी के ही नही पंजाबी, उर्दू, तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द भी ग्रहण किये जाते हैं। भाषा की शुद्धता के आग्रह ही इस पर चिंता जताते हैं परंतु विज्ञापन का लक्ष्य सम्प्रेषण और सिर्फ़ सम्प्रेषण है। उसके लिए अन्य भाषा से शब्द लेना भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा की शब्द-संपदा को समृद्ध करता है। जैसे-
"गन्ने देखते विच टमाटर किस तरह"-यारों के टशन
भाषा-संकर की मुख्यतः दो स्तिथियाँ दिखती है एक जहाँ, एक ही लाइन में एक भाषा के साथ दूसरी भाषा के शब्द या वाक्य शामिल हो जाते हैं इसे भाषाशास्त्र में कोड मिश्रण कहा जाता है। कोड मिश्रण में एक भाषा की भाषिक इकाइयाँ दूसरी भाषिक इकाइयों में स्थानान्तरित हो जाती है। इससे एक नए भाषा कोड का जन्म होता है। इससे बाज़ार को जो प्रोत्साहन मिला उससे विज्ञापनों में हिंदी-अंग्रेज़ी का कोई मिश्रण काफी लोकप्रिय हुआ है। जैसे-
"हीरो हौंडा धक-धक गो" - हीरो हौंडा


निष्कर्ष

इस तरह यह कहा जा सकता है कि विज्ञापन जो कि अब किसी वस्तु की ब्रांड बन गयी है, उसकी भाषा भी इस बहुभाषिक देश में कई चरणों से होकर गुजरी है और आज लचीली, रोचक और ध्यान आकर्षित करने वाली भाषा बनकर उभरी है। विज्ञापन का कार्य ही है उत्पाद को संप्रेषित भाषा में अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक पहुँचाना। आज विज्ञापन दाता अपने टारगेट उपभोक्ताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष भाषा प्रयोगों द्वारा आसानी से दिलो दिमाग पर दस्तक देने में सफल हुए हैं। 


संदर्भ

1. शर्मा, कुमुद. विज्ञापन की दुनिया. नई दिल्ली:प्रतिभा प्रतिष्ठान, 2006
2.पंत, एन सी.जनसंपर्क विज्ञापन एवं प्रसार माध्यम.नई दिल्ली:तक्षशिला प्रकाशन 2004
3.पातंजलि, प्रेमचंद.आधुनिक विज्ञापन.नई दिल्ली:वाणी प्रकाशन 1997
4.सेठी, डॉ रेखा.विज्ञापन डॉट कॉम.नई दिल्ली:वाणी प्रकाशन 2012
5.पाण्डेय, विज्ञापन और हिंदी भाषा.नोएडा:मानसरोवर प्रकाशन 2017

2 comments :

  1. बहुत ही जानकारी भरा आलेख
    बधाई
    आस्था

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति ।

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