कहानी: प्रेम की अपनी-अपनी परिभाषा

अंजली खेर

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महाशिवरात्रि की छुट्टी थी साथ ही आधुनिक दौर में प्रेम के इज़हार करने का दिन यानि ‘वेलेंटाइन्स डे’ भी। कैसा विचित्र संयोग है, दो अलग-अलग संदेश को प्रसारित करने वाले भक्ति और प्रेम के इजहार के दिन एक साथ, एक ही दिन। जहाँ एक ओर अर्धनारीश्‍वर शिव यह दर्शाते हैं कि स्‍त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं यानि दोनों ही एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, वहीं दूसरी ओर पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता के अंधानुकरण करने वाले आज यानि वेलेंटाइन्‍स डे साल के मात्र एक दिन एक-दूसरे से अपने तथाकथित प्‍यार का इज़हार करने की कवायद में लगे रहते हैं, भले ही बाकी के 364 दिन अपने साथी की भावनाओं को बेदर्दी से रौंद कर सीना ताने घूमते फिरें। सच है, सब के लिए इस गूढ भाव को समझना आसान नहीं, किसी के लिए ढाई आखर का यह शब्‍द अनमोल होता हैं तो किसी के लिए बेमोल। जो दिल से अपने साथी को प्‍यार करे, वह प्रेम-प्रदर्शन के लिए किसी दिन का मोहताज़ नहीं होता।

नींद से कोसों दूर मुँह अंधेरे मन में चलती इसी उधेडबुन में खोई स्‍वाति नन्‍ही विनी को चादर ओढ़ाकर साफ सफाई में लग गई। महीने भर से बंद अलमारी खोली तो देखा अंदर रखी फाइलें धूल से पटी पड़ी थी। दोनों हाथों से फाइलों को उठाकर बाहर निकाल ही रही थी कि फाइलों के बीच रखी डायरी छिटककर गिर पड़ी और उसमें जतन से दबा रखा गुलाबी पत्र हवा में लहरा उठा। 

पत्र को उठाते ही स्‍वाति के दिल पर गहरे घाव पर जमी परतें तीव्रता से उधड़ने सी लगी, बहुत संभालने पर ही उसकी आँखों की कोरों से मोती से बहते आँसू गालों को भी भिगो गये। क्षण भर में ही खुद को संभालकर स्‍वाति ने किचन में जाकर अदरक वाली चाय बनाई और चाय का प्‍याला लेकर बेडरूम में आकर न्‍यूज पेपर पलटने लगी। पर यहाँ भी कौन सी अच्‍छी खबरें आती हैं, रोज वही – कभी भाई ने तो कभी पड़ोसी ने आपसी रंजिश, तो कभी जायदाद की लालच में मर्डर कर दिया तो कभी शक के चलते या तो कभी दूसरे अफेयर के चलते प्रेमिका या पत्‍नी की हत्‍या। मायूस होकर स्‍वाति ने न्‍यूज पेपर फोल्‍ड करके सेंटर टेबल पर वापस रख दिया, यह सोचकर कि शायद प्रत्‍येक रिश्‍ते को निबाहने के लिए त्‍याग और सामंजस्‍य शायद आज के युग में एक परिकल्‍पना मात्र ही शेष है। 

चाय की चुस्कियाँ लेते हुए वह गैलरी में खड़ी होकर अपने अतीत की यादें कुरेदनें लगी। स्‍वाति-आनंद के घर की दीवारें उन दोनों के प्रीत की साक्षी रहीं हैं, बात-बात पर हँसी–ठिठोली, मजाक-मस्‍ती के नाद से घर के कोने-कोने में वीणा की झंकार सी झंकृत होती थी। पर आज स्‍वाति के दिल का दर्द भी उसके चेहरे पर छाई मुस्‍कान की दिव्‍य स्मित रेखा को भी विकीर्ण कर देता है जिस तरह अंदर से रिसती सीलन, लाख कारीगरी से दीवारों पर लगाई पुट्टी या मनभावन डेंटिंग-पेंटिंग को भी उधेड़कर पपड़ीनुमा आकृतियों से तहस-नहस कर कमरे के सौंदर्य को मलिन सा कर देती हैं।   अभी कुछ बरस पहले ही कॉलेज के वार्षिक कार्यक्रम के समय स्‍वाति और आनंद ने देवदास और पारों का किरदार साथ निभाया किया था। कॉलेज का ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था और पिछले सालभर की दोस्‍ती के बाद इस अभिनय ने दोनों के दिलों में एक-दूसरे के प्रति असीम प्रेम के भाव जगा दिये थे। उनकी जोड़ी थी भी बेहद खूबसूरत, सभी कहा करते, ‘भई प्‍यार हो तो स्‍वाति और आनंद जैसा, वरना न हो।’ उन दोनों के प्रेम की परि‍णति सात फेरों और एक-दूसरे का जीवन के हर सुख-दुख में साथ देने के वादे के साथ विवाह के रूप में संपन्‍न हुई। आए दिन सरप्राइज देकर खुश कर देना, मजेदार एक्टिंग करके हँसा-हँसा कर लोट-पोट कर देना, आनंद के इसी प्रेमपूर्णऔर मादक स्‍वभाव ने स्‍वाति के जीवन को रसमय बना दिया था। 

दांपत्‍य जीवन में बंधने का बाद स्‍वाति का जीवन आनंद के इर्द-गिर्द ही बन गया था। आनंद भी स्‍वाति को पलकों पर बिठाकर रखता, उसकी हर ख्‍वाहिश को दिलो-जाँ से पूरी करता। उनके प्‍यार की कली ‘’विनी’’ अगले ही साल उनके घर-आंगन में खिली। विनी की किलकारियों की चहक में मदमस्‍त होकर स्‍वाति और आनंद दीन-दुनिया से बेखबर हो गये। घर-ऑफिस और विनी के साथ समय बिताते 3-4 साल कब निकल गए, पता ही नहीं चला। ऑफिस से आने के बाद स्‍वाति और आनंद रोज विनी को लांग ड्राइव पर लेकर जाते, कभी गर्मागरम भुट्टे तो कभी आइसक्रीम खिलाते। वापसी में सिग्‍नल पर विनी अक्‍सर रंग बिरंगे गुब्‍बारे खरीदने के लिए मचल पड़ती। 

वैसे तो आनंद कंपनी के काम से आए दिन शहर से बाहर जाता-आता था, पर इस बार उसे कंपनी किसी बड़े प्रोजेक्‍ट के लिए दो माह के लिए अमेरिका भेज रही थी। आनंद के कैरियर के लिए अच्‍छे ऑफर की आवश्‍यकता को देखते हुए स्‍वाति ने दिल पर पत्‍थर रखकर आनंद को भेजने के लिए खुद को मन ही मन तैयार कर लिया। उधर आनंद के लिए भी स्‍वाति और विनी को इतने लंबे समय के लिए छोड़ कर जाना बहुत कठिन था, जाते समय कितनी ही देर स्‍वाति और विनी को अपने अंक में भरकर निःशब्द सा खड़ा रहा। 

आनंद को विदा करने के बाद जैसे ही स्‍वाति घर में आई, घर में पसरे सन्‍नाटे में आनंद की भीनी सी खुशबू उसको विचलित सी करने लगी। 
“मम्‍मा, पापा के बिना घर में अच्‍छा नहीं लग रहा है,” विनी बोली “विनी, कोई बात नहीं, पापा जल्‍दी वापस आ जाएंगे, फिर हम सब कहीं बाहर घूमने जाएंगे,” स्‍वाति ने विनी को समझाते हुए कहा। इन दो महीनों में खुद को व्‍यस्‍त रखने के लिए स्‍वाति ने अपने पुराने शौक पेंटिंग को साथी बनाने का फैसला लिया। फिर क्‍या था, घर में स्‍वाति और विनी दोनों मिलकर ड्राइंग-पेंटिंग और कलरिंग में लगी रहती। रोज़ाना शाम को मां-बेटी आनंद से वीडि़यो कॉल पर बातें करती। पर इधर आनंद को जाकर एक महीना बीता ही था कि स्‍वाति ने नोटिस किया कि आनंद ने वीडियो कॉल करना बंद कर दिया था और मोबाइल पर भी ज्‍यादा बात नहीं करता था, यहाँ तक कि कई बार विनी अपने पापा से बात करने मोबाइल हाथ में लेती तो वह फोन काट देता था। यह सोचकर कि आनंद किसी जरूरी मीटिंग में व्‍यस्‍त होगा, स्‍वाति से इस बात पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया। जैसे-तैसे दूसरा माह भी खत्‍म होने को था, 2-3 दिन बाद भी आनंद को वापस आना था, स्‍वाति ने आनंद की वापसी की खुशी में घर का कोना-कोना साफ करके घर जगमग चमका दिया। नई बैडशीट से लेकर आनंद के मनपसंद रूम फ्रेशनर तक सारी चीजें लाकर स्‍वाति और विनी आनंद का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। आखिरकार दोनों का इंतजार खत्‍म हुआ। रविवार की दोपहर 12 बजे आनंद ओला से घर पहुंचा, उसे देखकर विनी दौड़ती हुई गले लग गई, दरवाजे पर खड़ी स्‍वाति की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। देखकर आनंद बोला, “अरे रोने की क्‍या बात हैं, इतना इमोशनल होने की क्‍या जरूरत हैं, अकेले रहने की आदत भी होनी चाहिए। चलो, रोना बंद करके मेरे लिए गर्मागरम चाय बनाओ, मैं नहाकर आता हूँ। 

स्‍वाति अनमनी सी किचन की ओर रवाना हुई। न गले लगाया, न इतने दिन का हाल-चाल पूछा, न अपने सफर के बारे में बताया, न ही विनी को कहा कि उसकी बहुत याद आती थी। हो सकता हैं सफर में थक गया हो, यही सोचते हुए उसने दो कप चाय चढ़ाई। 

“पापा, मेरे लिए अमेरिका से क्‍या गिफ्ट लाये, जल्‍दी बताइए न, मैं बैग खोलकर देखती हूँ” विनी बाथरूम के दरवाजे को हाथ से ठकठकाते हुए बोली। “विनी, मेरे बैग को छूना भी मत, खबरदार जो मेरे बैग को हाथ लगाया!” आनंद बाथरूम से तेज आवाज़ में बोला सुनकर विनी और चाय छानती स्‍वाति के हाथ काँप गये, चाय प्‍लेटफार्म पर गिर गई। आनंद तो कभी भी इतनी जोर से विनी पर कभी नहीं चिल्‍लाया। 
“पापा, प्‍लीज बताओ न, क्‍या लाये मेरे लिए,” विनी प्‍यार से जिद पर अड़ी रही।

जैसे ही आनंद बाथरूम से बाहर आया, स्‍वाति बोली, “आनंद क्‍या हुआ, विनी से इस तरह कैसे बात कर सकते हो तुम, इतने दिन बाद लौटे हो, थोड़ा प्‍यार से बोल सकते थे उससे...” स्‍वाति ने कहा तो आनंद आपे से बाहर हो गया, “अब तुम मुझे समझाओगी मुझे कैसे बात करनी चाहिए, कोई थका-हारा घर लौटा है इतने दिन बाद। वह जिद पर लगी है, “मेरे लिए क्‍या लाये, अरे इतने खिलौने घर में फैले पड़े रहते हैं, फिर भी हर रोज़ कुछ न कुछ चाहिए ही।”

कानों में गर्म तेल सी घोलती खौलती आनंद की आवाज सुन स्‍वाति से सिर पर मानो किसी ने हथौड़े से तेज प्रहार ही कर दिया हो, ‘’पता नहीं आनंद को क्‍या हो गया हैं, जो गैरों जैसा व्‍यवहार कर रहा है” स्‍वाति मन ही मन सोच रही थी। 

“चाय नहीं लाई अभी तक, जल्‍दी करो,” आनंद चिढ़ते हुए बोला आँसुओं के सैलाब को पलकों में समेटते स्‍वाति विनी को गोद में लेकर किचन की ओर चली गई। विनी के लिए दूध और दो कप चाय ट्रे में लेकर ड्राइंगरूम में आई। चाय का कप आनंद को थमाते हुए उसके चेहरे को पढ़ने की नाकाम कोशिश करने लगी। कल तक जिस घर में हँसी का मंजर हुआ करता था, आज वहीं सन्‍नाटा सा पसर गया था, विनी भी डरी–सहमी सी बैठी थी। 

“खाना क्‍या खाओगे आनंद?” स्‍वाति ने खामोशी को तोड़ने की कोशिश की। 

“जो बनाओगी, खा लूंगा, वैसे मुझे ज्‍यादा भूख नहीं हैं। मैं जरा काम से बाहर जा रहा हूँ, एक- दो घंटे में लौट आऊंगा। खाने के बाद मुझे तुमसे जरूरी बात भी करनी है...” कहकर आनंद बाहर चला गया।

“मेरी हँसती खेलती प्‍यारी सी गृहस्‍थी को शायद मेरी ही नज़र लग गई है, पता नहीं क्‍या वजह हैं जो आनंद इतना बेगाना सा व्‍यवहार कर रहा हैं,” सोचती हुई स्‍वाति ने रोनी सूरत लिए पास खड़ी विनी को बाहों में समेट लिया।

आनंद वापस आया तो सीधे बेडरूम में गया और अलमारी में रखा ब्रीफकेस उठाकर उसमें रखी फाइलें निकाली, दो पासबुक और फाइलें लेकर वह बाहर आया। स्‍वाति को आवाज लगाकर बुलाया। 

“स्‍वाति, इस फाइल में मैने तुम्‍हारे और विनी के नाम से कुछ पॉलिसियाँ ले रखी हैं, जिसमें उसकी पढ़ाई, शादी और तुम्‍हारी सारी जरूरतों को पूरा करने लायक पैसा मिलता रहेगा। और ये दोनों पासबुक मेरी और तुम्‍हारे साथ विनी के ज्‍वाइंट एआउंट की है, जिसमें काफी अच्‍छा बैलेंस हैं। पॉलिसियों के प्रीमियम मेरे बैंक अकाउंट से जमा होते रहेंगे। तुमको चिंता करने की जरूरत नहीं...” आनंद बोलता रहा। “पर आनंद, इन सबकी क्‍या जरूरत, हम दोनों मिलकर देखेंगे न ये सब, अभी तुम इतने दिन बाद आये हो, आराम करो, फिर देखते हैं,” स्‍वाति ने रूंधे गले से कहा। “स्‍वाति, एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ, ... मैं अब तुम्‍हारे साथ नहीं रह सकता...” आनंद ने कहा। “पर आनंद ऐसा क्‍या हो गया इन दो महीनों में, कि तुम इतना बदल गये हो? क्‍या तुमको मुझसे और विनी से प्‍यार नहीं रहा अब?” बोलते बोलते स्‍वाति रोने ही लग गई। 
“स्‍वाति, अमेरिका में मुझे अपने स्‍कूल की कलीग मिली, हम बचपन से ही एक-दूसरे को प्‍यार करते थे, अब हम दोनों ने तय किया है कि अब हम दोनों साथ ही रहेंगे। इसीलिए तुम दोनों के खर्चे-पानी की व्‍यवस्‍था करके मैं तुमसे अलग उसके साथ ही रहूंगा” आनंद ने इतनी बेदर्दी से ये बात कही, जैसे प्‍यार फल-तरकारी जैसा हो, आज ये खाई तो कल दूसरी। 

“आनंद तुम ऐसा नहीं कर सकते, हमने भी एक-दूसरे से प्‍यार किया हैं, दस सालों का साथ हैं हमारा। यूँ दो-एक महीने भर में तुम हमारे प्‍यार को कैसे भुला सकते हो” स्‍वाति आनंद के आगे गिड़गिड़ाने ही लगी। “देखो स्‍वाति, तुम तो मुझे कॉलेज में मिली थी, पर गुल मेरी प्रायमरी की फ्रेंड हैं, हम दिलो-जाँ से प्‍यार करते थे एक दूसरे को पर उसके घरवाले हमारे खिलाफ़ थे, पर अब हमें किसी की परवाह नहीं, हमने फैसला कर लिया सो कर लिया, अब आगे बात करने का कोई फायदा नहीं” आनंद ने बात खत्‍म कर दी। “ठीक है आनंद, तुम्‍हारी खुशी में ही मेरी भी खुशी है। तो फिर आप अपने नये जीवन की शुरूआत कब कर रहे हैं? वैसे आप मेरी तरफ से एकदम फ्री हैं, आप चाहे तो तलाक के पेपर पर मेरे साइन अभी ले सकते हैं” स्‍वाति बोली तो आनंद ताज्‍जुब से उसे देखता रहा। शायद वह सोचता रहा हो कि स्‍वाति उसको छोड़कर जाने के नाम पर गिड़गिड़ायेगी।

“पर आनंद एक बात ध्‍यान रखना, इसके बाद मेरे या विनी के सामने आने की कोशिश भी मत करना, मैं आगे कभी भी तुम्‍हारी शक्‍ल भी नहीं देखना चाहती। तुम्‍हारे बैंक बैलेंस या पॉलिसियों की मुझे जरूरत नहीं, मैं खुद अपने पैरों पर खड़ी हूँ, अपनी बेटी की सारी जरूरतें पूरी करने में समर्थ हूँ। तुमने मेरा प्‍यार में समर्पण देखा हैं, स्‍वाभिमान की तटस्‍थता नहीं। मैं बस इतना जानती हूँ कि मैने तुमको दिल के अंतस से प्‍यार किया हैं, सो मैं तो तुमको जीवन भर नहीं भुला पाऊंगी। पर मेरे प्‍यार का जो सिला तुमने मुझे तोहफे में दिया हैं उसके बाद अब तुम्‍हारे लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं। चले जाओ इसी क्षण इस घर से। ये घर मेरा हैं, क्‍योंकि फ्लैट के लिए लोन मैंने लिया था...” कहकर स्‍वाति ने बाहर का दरवाजा खोल दिया और आनंद को उसकी राह दिखा दी।

“... और हाँ, एक गुज़ारिश करती हूँ कि अब कम से कम अपनी पहली प्रेयसी के साथ ऐसा धोखा मत करना, ऐसा न हो कि अब तुम्‍हें तुम्‍हारा कोई नर्सरी का प्‍यार मिल जाये और तुम गुल को भुलाकर फिर किसी तीसरी का हाथ थाम लो।” 

सच एक स्‍त्री प्रेम, समर्पण, सामंजस्‍य और त्‍याग का एकमात्र पर्याय होती है, यदि वह अपने प्रेम के लिए सारी दुनिया को दरकिनार कर अपने साथी को अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर करने में पीछे नहीं रहती, तो वही दूसरी ओर अपने साथ किसी तरह की बेवफाई या उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले को सबक सिखा कर सही राह दिखाने के लिए अपने स्वतंत्र वजूद का परिचय देने में भी पीछे नहीं रहती।

13 comments :

  1. औरत के आत्म सम्मान को दिखाती कहानी। ।
    👏👏👏👏👏

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  2. आत्मीय आभार जी

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  3. आत्मसम्मान मानव की उस अदृष्य शक्ति का नाम है जो प्रत्यक्ष शक्ति से भी शक्तिशाली है। अति सुंदर प्रेरणास्रोत कहानी। यशवंत

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  4. आत्मसम्मान सर्वोपरि की और इंगित करती सुंदर कहानी
    यशवंत

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  5. बहुत सही दिशा इंगित करती कहानी। स्त्री और वह भी नकारी हुई जब अपने सम्मान के लिए उठ खड़ी होती है तो वह शक्ति सिवरूपा ही होती है। बधाई।

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